आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
श्लोक 172 से 181 वनों की रमणीयता
वन प्रकाश से दिन-रात रहित थे। सूर्य किरणें संकोच करती थीं। बावड़ियाँ पीली थीं। तालाब, पर्वत, और महल थे। वन स्त्रियों-से मनोहर और सुखद थे। अशोक वन लाल फूलों से प्रेम वमन करता था। सप्तपर्ण सात स्थानों को दिखाता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
इत्य मूनि वनान्यासन्नतिरम्याणि पादपैः । यत्र पुष्पमयी वृष्टिर्नर्तुपर्यायमैक्षत ॥१७२॥
इस प्रकार वे वन वृक्षों से बहुत ही रमणीय जान पड़ते थे, वहाँ पर होने वाली फूलों की वर्षा ऋतुओं के परिवर्तन को कभी नहीं देखती थी अर्थात् वहाँं सदा ही सब ऋतुओं के फूल फूले रहते थे ।।172।।
In this way, those forests appeared extremely delightful with their trees. The continuous shower of flowers there never witnessed the change of seasons, meaning that flowers of all seasons bloomed there perpetually. ||172||
श्लोक ( Shlok ) 173
न रात्रिर्न दिवा तत्र तरुभिर्भास्वरैर्भृशम् । तरुशैत्यादिवाबिभ्यत्संजहार करान् रविः ॥१७३॥
उन वनों के वृक्ष इतने अधिक प्रकाशमान थे कि उनसे वहाँ न तो रात का ही व्यवहार होता था और न दिन का ही । वहां सूर्य की किरणों का प्रवेश नहीं हो पाता था जिससे ऐसा जान पड़ता था मानो वहाँ के वृक्षों की शीतलता से डरकर ही सूर्य ने अपने कर अर्थात् किरणों (पक्ष में हाथों) का संकोच कर लिया हो ।।173।।
The trees in those forests were so radiant that neither night nor day existed there. The rays of the sun could not penetrate, making it seem as if the sun had withdrawn its rays (or hands) out of fear of the coolness of those trees. ||173||
श्लोक ( Shlok ) 174
अन्त र्वंणं क्वचिद्वाप्यस्त्रिकोणचतुरस्त्रिकाः । स्नातोत्तीर्णामरस्त्रीणां स्तनकुङ्कुमपिञ्जराः ॥१७४॥
उन वनों के भीतर कहीं पर तिखूंटी और कहीं पर चौखूँटी बावड़ियां थीं तथा वे बावड़ियां स्नान कर बाहर निकली हुई देवांगनाओं के स्तनों पर लगी हुई केसर के घुल जानें से पीली-पीली हो रही थीं ।।174।।
Inside those forests, there were triangular and quadrangular reservoirs. These reservoirs appeared yellowish due to the saffron dissolving in the water from the bodies of celestial maidens who had bathed in them. ||174||
श्लोक ( Shlok ) 175
पुष्करिण्यः क्वचिच्चासन् क्वचिच्च कृतकाद्रयः। क्वचिद्रम्याणि हर्म्याणि क्वचिदाक्रीडमण्डपाः ॥१७५॥
उन वनों में कहीं कमलों से युक्त छोटे-छोटे तालाब थे, कहीं कृत्रिम पर्वत बने हुए थे और कहीं मनोहर महल बने हुए थे और कहीं पर क्रीड़ा-मंडप बने हुए थे ।।175।।
In those forests, there were small ponds filled with lotuses in some places, artificial mountains in others, magnificent palaces elsewhere, and enchanting pavilions for playful activities. ||175||
श्लोक ( Shlok ) 176
क्वचित्प्रेक्षागृहाण्यासन् चित्रशालाः क्ववचित्क्वचित् । एकशाला द्विशालाद्या महाप्रासादपङ्क्तयः ॥ १७६॥
कहीं सुंदर वस्तुओं के देखने के घर (अजायबघर) बने हुए थे, कहीं चित्रशालाएँ बनी हुई थी, और कहीं एक खंड की तथा कहीं दो तीन आदि खंडों की बड़े-बड़े महलों की पंक्तियाँ बनी हुई थीं ।।176।।
In some places, there were museums showcasing beautiful objects, in others, there were art galleries, and elsewhere, rows of grand palaces stood—some single-storied, while others had two or three levels. ||176||
श्लोक ( Shlok ) 177
कचिच्च शाद्वला भूमिरिन्द्रगोपैस्तता क्वचित् । सरांस्यतिमनोज्ञानि सरितश्च ससैकताः ॥१७७॥
कहीं हरी-हरी घास से युक्त भूमि थी कहीं इंद्रगोप नाम के कीड़ों से व्याप्त पृथ्वी थी, कहीं अतिशय मनोज्ञ तालाब थे और कहीं उत्तम बालू के किनारों से सुशोभित नदियाँ बह रही थीं ।।177।।
In some places, the land was covered with lush green grass; in others, the earth was filled with bright Indragopa insects. Some areas had exceedingly delightful ponds, while elsewhere, rivers flowed gracefully, adorned with excellent sandy shores. ||177||
श्लोक ( Shlok ) 178
हारिमेदु रमुन्निद्रकुसुमं सश्रि कामदम् । सुकलत्रमिवासीत्तत् सेव्यं वनचतुष्टयम् ॥१७८॥
वे चारों ही वन उत्तम स्त्रियों के समान सेवन करने योग्य थे क्योंकि वे वन भी उत्तम स्त्रियों के समान ही मनोहर थे, मेदुर अर्थात् अतिशय चिकने थे, उन्निद्रकुसुम अर्थात् फूले हुए फूलों से सहित (पक्ष में ऋतुधर्म से सहित) थे, सश्री अर्थात् शोभा से सहित थे, और कामद अर्थात् इच्छित पदार्थों के (पक्ष में काम के) देने वाले थे ।।178।।
All four of those forests were as worthy of enjoyment as noble women, for they too possessed the qualities of such women—they were enchanting, exceedingly smooth, adorned with fully bloomed flowers (just as women experience their natural cycle), radiant with beauty, and capable of fulfilling desires. ||178||
श्लोक ( Shlok ) 179
अपास्तातपसंबन्धं विकसत्पल्लवाञ्चितम् । पयोधरस्पृगाभासि तत्स्त्रीणामुत्तरीयवत् ॥१७९॥
अथवा वे वन स्त्रियों के उत्तरीय (ओढ़ने की चूनरी) वस्त्र के समान सुशोभित हो रहे थे क्योंकि जिस प्रकार स्त्रियों का उत्तरीय वस्त्र आतप की बाधा को नष्ट कर देता है उसी प्रकार उन वनों ने भी आतप की बाधा को नष्ट कर दिया था, स्त्रियों का उत्तरीय वस्त्र जिस प्रकार उत्तम पल्लव अर्थात् अंचल से सुशोभित होता है उसी प्रकार वे वन भी पल्लव अर्थात् नवीन कोमल पत्तों से सुशोभित हो रहे थे और स्त्रियों का उत्तरीय वस्त्र जिस प्रकार पयोधर अर्थात् स्तनों का स्पर्श करता है उसी प्रकार वे वन भी ऊँचे होने के कारण पयोधर अर्थात् मेघों का स्पर्श कर रहे थे ।।179।।
Or, those forests appeared as enchanting as the upper garments (scarves) of noble women. Just as a woman’s scarf shields her from the heat of the sun, those forests had eliminated the scorching heat. Just as an upper garment is adorned with a graceful border, those forests were embellished with tender, newly-sprouted leaves. And just as a scarf gently touches a woman’s bosom, those tall forests seemed to be touching the bosom of the clouds. ||179||
श्लोक ( Shlok ) 180
बभासे वनमाशोकं शोकापनुदमङ्गिनाम् । रागं वमदिवात्मीयमारक्तैः पुष्प पल्लवैः ॥१८०॥
उन चारों वनों में से पहला अशोक वन जो कि प्राणियों के शोक को नष्ट करने वाला था, लाल रंग के फूल और नवीन पत्तों से ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो अपने अनुराग (प्रेम) का ही वमन कर रहा हो ।।180।।
Among those four forests, the first one, the Ashoka forest— which dispelled the sorrows of living beings—was adorned with red flowers and fresh leaves. It appeared as if it were pouring out its own deep affection and love. ||180||
श्लोक ( Shlok ) 181
पर्णानि सप्त बिभ्राणं वनं साप्त च्छदं बभौ । सप्तस्था नानि वाभर्तुर्दर्शंयत्प्रति पर्व यत् ॥१८१॥
प्रत्येक गाँठ पर सात-सात पत्तों को धारण करने वाले सप्तछंद वृक्षों का दूसरा वन भी सुशोभित हो रहा था जो कि ऐसा जान पड़ता था मानो वृक्षों के प्रत्येक पर्व पर भगवान् के सज्जातित्व सद्गृहस्थत्व पारिव्राज्य आदि सात परम स्थानों को ही दिखा रहा हो ।।181।।
The second forest, adorned with Saptachchhada trees, each bearing seven leaves at every node, was also resplendent. It appeared as if, at every segment of its trees, it was symbolizing the seven supreme stages of existence—such as noble birth, virtuous household life, renunciation, and other exalted states of being. ||181||
श्लोक 182 से 191
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