अनुंधरी अमिततेज का विवाह और विदाई
वज्रजंघ की बहन अनुंधरी का विवाह अमिततेज से हुआ। वज्रदंत ने वधू-वर को धन देकर विदा किया। पुरवासियों ने उनके प्रस्थान पर शोक किया। वज्रजंघ श्रीमती के साथ उत्पलखेटक नगर पहुँचा।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
“नित्यप्रसाद लाभेन तयोर्नित्यमहोत्सबैः । पुत्रोत्पत्यादिसर्गेश्च स कालोऽविदितोऽगमत् ।।३२।।
वहाँ अनेक लोग आकर वज्रजंघ के लिए उत्तम-उत्तम वस्तुएँ भेंट करते थे, पूजा आदि के उत्सव होते रहते थे तथा पुत्र-जन्म आदि के समय अनेक उत्सव मनाये जाते थे जिससे उन दोनों का दीर्घ समय अनायास ही व्यतीत हो गया था ।।32।।
Many people would come there, presenting exquisite gifts to Vajrajangha. Festivals involving worship and other celebrations were frequently held, and grand festivities took place on occasions such as the birth of their children. Thus, the couple’s long time together passed effortlessly and joyfully.
श्लोक ( Shlok ) 33
वज्रजङ्गानुजां कन्यामनुरूपामनुन्धरीम् । वज्रबाहुविंभूत्यासावदितामिततेजसे ।।३३।।
वज्रजंघ की एक अनुंधरी नाम की छोटी बहन थी जो उसी के समान सुंदरी थी । राजा वज्रबाहु ने वह बड़ी विभूति के साथ चक्रवर्ती के बड़े पुत्र अमिततेज के लिए प्रदान की थी ।।33।।
Vajrajangha had a younger sister named Anundhari, who was as beautiful as he was. King Vajrabahu gave her in marriage, with great honor and splendor, to Amitatej, the eldest son of the emperor.
श्लोक ( Shlok ) 34
चक्रिसूनुं तमासाद्य सुतरां पिप्रिये सती । अनुन्धरी नवोढासौ वसन्तमिव कोकिला ॥३४॥
जिस प्रकार कोयल वसंत को पाकर प्रसन्न होती है उसी प्रकार वह नवविवाहिता सती अनुंधरी, चक्रवर्ती के पुत्र को पाकर अत्यंत प्रसन्न हुई थी ।।34।।
Just as the cuckoo rejoices upon the arrival of spring, the newlywed Anundhari felt immense joy upon being united with the emperor’s son.
श्लोक ( Shlok ) 35
अथ चक्रधरः पूजासत्कारैरभिपूजितम् । स्वपुरं प्रति यानाये व्यसृजत् तद्वधूवरम् ॥३५॥
इस प्रकार जब सब कार्य पूर्ण हो चुके तब चक्रवर्ती वज्रदंत महाराज ने अपने नगर को वापस जाने के लिए पूजा सत्कार आदि से सबका सम्मान कर वधू-वर को विदा कर दिया ।।35।।
After all ceremonies were successfully completed, Emperor Vajradanta honored everyone with offerings and courtesies. He then bid farewell to the bride and groom, sending them off as he prepared to return to his city.
श्लोक ( Shlok ) 36
हस्त्यश्वरथपादातं रत्नं देशं सकोशकम् । तदान्वयिनिकं पुत्र्यै ददौ चक्रधरो महत् ॥३६॥
उस समय चक्रवर्ती ने पुत्री के लिए हाथी, घोड़े, रथ, पियादे, रत, देश और खजाना आदि कुलपरंपरा से चला आया बहुत-सा धन दहेज में दिया था ।।36।।
At that time, the emperor gave his daughter a grand dowry, including elephants, horses, chariots, foot soldiers, territories, and treasures—an abundance of wealth passed down through the royal lineage.
श्लोक ( Shlok ) 37
अथ प्रयाणसंक्षोभाद् दम्पत्योस्तत्पुरं तदा । परमाकुळतां भेजे वद्गुणैरुन्मनायितम् ॥३७॥
वज्रजंघ और श्रीमती ने अपने गुणों से समस्त पुरवासियों को उन्मुग्ध कर लिया था इसलिए उनके जाने का क्षोभकारक समाचार सुनकर समस्त पुरवासी अत्यंत व्याकुल हो उठे थे ।।37।।
Vajrajangha and Shrimati had captivated all the townspeople with their virtues. Therefore, upon hearing the distressing news of their departure, the entire populace became deeply anxious and saddened.
श्लोक ( Shlok ) 38
ततः प्रस्थानगम्भीरभेरीध्वानैः शुभे दिने । प्रयाणमकरोच्छीमान् वज्रजङ्गः सहाङ्गनः ॥३८॥
तदनंतर किसी शुभ दिन श्रीमान् वज्रजंघ ने अपनी पत्नी श्रीमती के साथ प्रस्थान किया । उस समय उनके प्रस्थान को सूचित करने वाले नगाड़ों का गंभीर शब्द हो रहा था ।।38।।
Thereafter, on an auspicious day, the honorable Vajrajangha departed with his wife, Shrimati. At that moment, the deep sound of drums announcing their departure echoed all around.
श्लोक ( Shlok ) 39
वज्रबाहुमहाराजो देवी चास्य वसुन्धरा । वज्रजङ्गः सपनीकं व्रजस्तमनुजग्मतुः ॥३९॥
वज्रजंघ अपनी पत्नी के साथ आगे चलने लगे और महाराज वज्रबाहु तथा उनकी पत्नी वसुंधरा महाराज्ञी उनके पीछे-पीछे जा रहे थे ।।39।।
Vajrajangha and his wife Shrimati led the way, while King Vajrabahu and his queen Vasundhara followed closely behind.
श्लोक ( Shlok ) 40
पौरवर्गं तथा मन्त्रिसेनापतिपुरोहितान् । सोऽनुव्रजितुमायातान्ना। तिदूराद् व्यसर्जयत् ॥४०॥
पुरवासी, मंत्री, सेनापति तथा पुरोहित आदि जो भी उन्हें पहुँचाने गये थे वज्रजंघ ने उन्हें थोड़ी दूर से वापस विदा कर दिया था ।।40।।
The townspeople, ministers, commanders, and priests who had come to see them off were respectfully sent back by Vajrajangha after a short distance.
श्लोक ( Shlok ) 41
हस्त्यश्वरथभूयिष्ठं साधनं सहपत्तिकम् । संवाहयन् स संप्रापत् पुरमुत्पलखेटकम् ॥४१॥
हाथी, घोड़े, रथ और पियादे आदि की विशाल सेना का संचालन करता हुआ वज्रजंघ क्रम-क्रम से उत्पलखेटक नगर में पहुँचा ।।41।
Leading a massive army of elephants, horses, chariots, and foot soldiers, Vajrajangha gradually made his way to the city of Utpalakhetaka.
श्लोक 42 से 51
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 |
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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