आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71
श्लोक 72 से 81 देवों का आगमन और समवसरण
आकाश चित्रपट और वर्षा की शोभा धारण करता था। स्वर्ग शून्य हो गया। देवों से जगत दूसरा स्वर्ग-सा लगा। देवों ने समवसरण देखा। यह बारह योजन का और इंद्रनीलमय था। यह दर्पण-सा सुशोभित था। इंद्र ने इसकी रचना की। इसकी शोभा भव्य जीवों को प्रसन्न करती है।
English translation of Ādi purāṇa parv 22 – Shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
तदा दिव्याङ्गनारूपैर्हयहस्त्यादिवाहनैः । उच्चावचैर्नभोवर्त्म भेजे चित्रपटश्रियम् ॥७२॥
उस समय देवांगनाओं के रूपों और ऊँचे-नीचे हाथी, घोड़े आदि की सवारियों से वह आकाश एक चित्रपट की शोभा धारण कर रहा था ।।72।।
At that moment, with the celestial maidens’ radiant forms and the varied heights of elephants, horses, and other mounts, the sky resembled a beautifully painted canvas, adorned with a mesmerizing display of divine splendor. ( 72)
श्लोक ( Shlok ) 73
देवाङ्गद्युतिविद्युद्भि स्तदाभरणरोहितैः । सुरेभनील जीमूतैर्व्योमाधात् प्रावृषः श्रियम् ॥७३।।
अथवा उस समय यह आकाश देवों के शरीर की कांतिरूपी बिजली, देवों के आभूषणरूपी इंद्रधनुष और देवों के हाथीरूपी काले बादलों से वर्षाऋतु की शोभा धारण कर रहा था ।।73।।
Or, at that moment, the sky appeared as if it had adorned itself with the beauty of the monsoon season—with the radiance of the gods’ bodies resembling flashes of lightning, their ornaments forming a celestial rainbow, and their elephant-like mounts resembling dark rain clouds. ( 73)
श्लोक ( Shlok ) 74
इत्यापतत्सु देवेषु समं यानविमानकैः । सजानिषु तदा स्वर्गश्चिरादुद्वासितो बत ॥७४॥
इस प्रकार जब सब देव अपनी-अपनी देवियोंसहित सवारियों और विमानों के साथ-साथ आ रहे थे तब खेद की बात थी कि स्वर्गलोक बहुत देर तक शून्य हो गया था ।।74।।
Thus, as all the gods, along with their celestial consorts, mounts, and divine chariots, proceeded together, it was indeed regrettable that the heavens remained empty for a long time. ( 74)
श्लोक ( Shlok ) 75
समारुद्ध्य नभोऽशेषमित्यायातैः सुरासुरैः । जगत्प्रादुर्भवद्दिव्यस्वर्गान्तरमिवारुचत् ॥७५ []
इस प्रकार उस समय समस्त आकाश को घेरकर आये हुए सुर और असुरों से यह जगत् ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो उत्पन्न होता हुआ कोई दूसरा दिव्य स्वर्ग ही हो ।।75।।
Thus, at that moment, with the gods and demons filling the entire sky, the world appeared as if a new divine heaven was emerging. ( 75)
श्लोक ( Shlok ) 76
सुरैर्दूरादथालोकि विभोरास्थानमण्डलम् । सुरशिल्पिभिरारब्धपरार्ध्यरचनाशतम् ॥७६॥
अथानंतर जिसमें देवरूपी कारीगरों ने सैकड़ों प्रकार की उत्तम-उत्तम रचनाएँ की हैं ऐसा भगवान् वृषभदेव का समवसरण देवों ने दूर से ही देखा ।।76।।
Thereafter, the gods beheld from afar the Samavasarana of Lord Rishabhadeva, which had been exquisitely crafted by celestial artisans with hundreds of magnificent designs. (76)
श्लोक ( Shlok ) 77
द्विषड्योजन विस्तारमभू दास्थानमीशितुः । हरिनीलमहारत्मघाटितं विलसत्तलम् ॥७७॥
जो बारह योजन विस्तार वाला है और जिसका तलभाग अतिशय दैदीप्यमान हो रहा है ऐसा इंद्रनील मणियों से बना हुआ वह भगवान् का समवसरण बहुत ही सुशोभित हो रहा था ।।77।।
The Samavasarana of Lord Rishabhadeva, spanning twelve yojanas in extent, was magnificently adorned with Indranila (sapphire) gems, and its radiant foundation shone brilliantly, making it exceedingly resplendent. ( 77)
श्लोक ( Shlok ) 78
सुरेन्द्रनीलनिर्माणं समवृतं तदा बभौ । त्रिजगच्छ्रीमुखालोकमङ्गलादर्शविभ्रमम् ॥७८॥
इंद्रनील मणियों से बना और चारों ओर से गोलाकार वह समवसरण ऐसा जान पड़ता था मानो तीन जगत् की लक्ष्मी के मुख देखने के लिए मंगलरूप एक दर्पण ही हो ।।78।।
The Samavasarana, made of Indranila (sapphire) gems and perfectly circular from all sides, appeared as if it were an auspicious mirror created to reflect the graceful face of the Goddess of prosperity of the three worlds. ( 78)
श्लोक ( Shlok ) 79 – 80
आस्थानमण्डलस्यास्य विन्यासं कोऽनुवर्णयेत् । सुत्रामा सूत्रधारोऽभून्निर्माणे यस्य कर्मठः ॥७९॥
तथाप्यनू द्यते किंचिदस्य शोभासमुच्चयः ।श्रुतेन येन संप्रीतिं भजेद् भव्यात्मनां मनः ॥८०॥
जिस समवसरण के बनाने में सब कामों में समर्थ इंद्र स्वयं सूत्रधार था ऐसे उस समवसरण की वास्तविक रचना का कौन वर्णन कर सकता है ? अर्थात् कोई नहीं, फिर भी उसकी शोभा के समूह का कुछ थोड़ा-सा वर्णन करता हूँ क्योंकि उसके सुनने से भव्य जीवों का मन प्रसन्नता को प्राप्त होता है ।।79-80।।
Who can truly describe the actual construction of the Samavasarana, when Indra himself, who is capable of accomplishing all tasks, was its chief architect? No one can.
Yet, I shall attempt to describe a small portion of its grandeur, for merely hearing about its splendor brings joy to the hearts of virtuous beings. ( 79-80)
श्लोक ( Shlok ) 81
तस्य पर्यन्त भूभागमलंचक्रे स्फुरद् द्युतिः ।धुलीसालपरिक्षेपो रत्नपांसुभिराचितः ॥८१॥
उस समवसरण के बाहरी भाग में रत्नों की धूलि से बना हुआ एक धूलीसाल नाम का घेरा था जिसकी कांति अतिशय दैदीप्यमान थी ओर जो अपने समीप के भूभाग को अलंकृत कर रहा था ।।81।।
On the outer part of that Samavasarana, there was a radiant enclosure called Dhoolishala, made of gem dust. Its splendor was extremely dazzling, and it adorned the surrounding land with its brilliance. ( 81)
श्लोक 82 से 91
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209 नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 205 | श्लोक 206 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 242 | श्लोक 243 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 268
आदिपुराण पर्व 22 – समवसरण का वर्णन पर्व 22 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71