भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
श्लोक 232 से 241 वर-वधू का अलंकरण
दोनों ने पुष्पमाला, कर्णभूषण, कड़े, करधनी, और नुपूर पहने। लक्ष्मीमती और वसुंधरा ने उन्हें सजाया। रत्न-वेदी पर बैठे, वे मेरु तट समान शोभायमान हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232
पुष्पमाला बभौ मूर्ध्नि तयोः कुञ्चितमूर्द्धजे । सीतापगेय नीलाद्विशिखरोपान्तवर्तिनी ॥२३२॥
कुटिल केशों से सुशोभित उनके मस्तक पर धारण की हुई पुष्पमाला नीलगिरि के शिखर के समीप बहती हुई सीता नदी के समान शोभायमान हो रही थी ।।232।।
The flower garland worn on their heads, adorned with tangled hair, appeared as radiant as the Sita River flowing near the peaks of the Nilgiri Mountains. ||232||
श्लोक ( Shlok ) 233
कणिका भरणन्यास’ कर्णयोर्निरविक्षताम् । यद्रत्नाभीशुभिर्भेजे तद्वक्त्राब्जं परां श्रियम् ॥२३३॥
उन दोनों ने कानों में ऐसे कर्णभूषण धारण किये थे कि जिनमें लगे हुए रत्नों की किरणों से उनका मुख-कमल उत्कृष्ट शोभा को प्राप्त हो रहा था ।।233।।
They both wore ear ornaments in their ears, adorned with gems, the rays of which made their faces shine with exquisite beauty, like the finest lotus blossoms. ||233||
श्लोक ( Shlok ) 234
आजानुलम्धमानेन तो प्रालम्बेन रेजतुः । शरज्ज्योत्स्नामयेनेव मृणालच्छविचारुणा ॥२३४॥
वे दोनों शरद्ऋतु की चाँदनी अथवा मृणाल तंतु के समान सुशोभित सफेद, घुटनों तक लटकती हुई पुष्पमालाओं से अतिशय शोभायमान हो रहे थे ।।234।।
They both appeared exceedingly radiant, adorned with white flower garlands that hung down to their knees, resembling the moonlight of the autumn season or the threads of a lotus stem. ||234||
श्लोक ( Shlok ) 235
*कटकाङ्गदकेयूर मुद्रिका दिविभूषणेः । बाडू व्यरुचतां कल्पतरुशाखाच्छवी तयोः ॥ २३५॥
कड़े, बाजूबंद, केयर और अँगूठी आदि आभूषण धारण करने से उन दोनों की भुजाएँ भूषणांग जाति के कल्पवृक्ष की शाखाओं की तरह अतिशय सुशोभित हो रही थीं ।।235।।
By wearing ornaments such as bracelets, armlets, earrings, and rings, their arms became exceedingly radiant, resembling the branches of the Kalpavriksha, the wish-fulfilling tree, adorned with jewelry. ||235||
श्लोक ( Shlok ) 236
जघने रसनावेष्टं किङ्किणीकृत निःस्वनम् । तावनङ्गद्विपस्येव जयडिण्डिममूहतुः ॥२३६
उन दोनों ने अपने-अपने नितंब भाग पर करधनी पहनी थी । उसमें लगी हुई छोटी-छोटी घंटियाँ (बोरा) मधुर शब्द कर रही थीं । उन करधनियों से वे ऐसे शोभायमान हो रहे थे मानो उन्होंने कामदेवरूपी हस्ती के विजय-सूचक बाजे ही धारण किये हों ।।236।।
They both wore girdles around their waists, with small bells attached to them, producing sweet sounds. These girdles made them appear as radiant as if they were wearing the victory-symbolizing drums of Kama, the god of love. ||236||
श्लोक ( Shlok ) 237
मणिनुपुरझङ्कारैः क्रमौ शिश्रियतुः श्रियम् । श्रीमत्याः पद्मयोर्भृङ्गकलनिःक्वणशोभिनोः ॥२३७
श्रीमती के दोनों चरण मणिमय नुपूरों की झंकार से ऐसे मालूम होते थे मानो भ्रमरों के मधुर शब्दों से शोभायमान कमल ही हों ।।237।।
The feet of Shrimati, adorned with jeweled anklets, seemed to be as radiant as lotuses, embellished with the sweet sounds of buzzing bees. ||237||
श्लोक ( Shlok ) 238
, महालंकृतिमाचार इत्येव बिभ्रतः स्म तो । अन्यथा सुन्दराकारशोभैवालंकृतिस्तयोः ॥२३८॥
विवाह के समय आभूषण धारण करना चाहिए, केवल इसी पद्धति को पूर्ण करने के लिए उन्होंने बड़े-बड़े आभूषण धारण किये थे । नहीं तो उनके सुंदर शरीर की शोभा ही उनका आभूषण थी ।।238।।
They wore large ornaments only to fulfill the customary practice of adorning themselves during the wedding. Otherwise, the beauty of their own bodies was the only ornament they needed. ||238||
श्लोक ( Shlok ) 239
लक्ष्मीमतिः स्वयं लक्ष्मीरिव पुत्रीमभूषयत् । पुत्रं च भूषयामास वसुधेव वसुन्धरा ॥२३९॥
साक्षात् लक्ष्मी के समान लक्ष्मीमति ने स्वयं अपनी पुत्री श्रीमती को अलंकृत किया था और साक्षात् वसुंधरा पृथिवी के समान वसुंधरा ने अपने पुत्र वज्रजंघ को आभूषण पहनाये थे ।।239।।
Just as Goddess Lakshmi herself adorned her daughter Shrimati, the embodiment of wealth, Vasundhara, resembling the Earth herself, adorned her son Vajrajangha with jewels. ||239||
श्लोक ( Shlok ) 240
प्रसाधन विधेरन्ते यथास्वं तो निवेशितौ । रत्नवेदीतटे पूर्व कृतमङ्गलसत्क्रिये ॥२४०॥
इस प्रकार अलंकार धारण करने के बाद वे दोनों जिसकी मंगल क्रिया पहले ही की जा चुकी है ऐसी रत्न-वेदी पर यथायोग्य रीति से बैठाये गये ।।240।।
After adorning themselves with ornaments, the two of them were seated on a gem-encrusted altar, where the auspicious rituals had already been performed, according to the proper customs. ||240||
श्लोक ( Shlok ) 241
मणिप्रदीपरुचिरा मङ्गलैरुपशोभिता । बभौ बेदी तदाकान्ता सामरेवाद्रिराट्तटी ॥२४१॥
मणिमय दीपकों के प्रकाश से जगमगाती हुई और मंगल-द्रव्यों से सुशोभित वह वेदी उन दोनों के बैठ जाने से ऐसी शोभायमान होने लगी थी मानो देव-देवियों से सहित मेरु पर्वत का तट ही हो ।।241।।
The altar, shining with the light of gem-encrusted lamps and adorned with auspicious items, became even more radiant as the two of them sat upon it, resembling the shore of Mount Meru, adorned with gods and goddesses. ||241||
श्लोक 242 से 251
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 11आदिपुराण Ādi purāṇa
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
Download PDF