भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 पंडिता का वज्रजंघ को जवाब
पंडिता ने बताया कि श्रीमती, वज्रदंत की पुत्री, ने चित्र बनाया। वह सुंदर, यौवनवती, और दुर्लभ है। उसके कटाक्ष, मुख, चरण, और कर्णफूल की प्रशंसा की। श्रीमती वज्रजंघ को खोज रही है। वज्रजंघ ने कहा कि कर्मों का उदय अद्भुत है, जो जन्मांतर से मिलन कराता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
तां विद्धि मदनस्येव पताकामुज्ज्वलांशुकाम् । स्त्रीसृष्टेरिव निर्माण रेखां माधुर्यशालिनीम् ॥१४२।
हे राजकुमार, तुम उसे उज्ज्वल वस्त्र से शोभायमान कामदेव की पताका ही समझो, अथवा स्त्रीसृष्टि की माधुर्य से शोभायमान अंतिम निर्माणरेखा ही जानों अर्थात् स्त्रियों में इससे बढ़कर सुंदर स्त्रियों की रचना नहीं हो सकती ।।142।।
O prince, consider her as the radiant flag of Kamadeva adorned in bright garments, or as the final masterpiece of the creation of women, shining with sweetness—indeed, no creation of a woman more beautiful than her can exist.142
श्लोक ( Shlok ) 143
समग्रयौवनारम्भसूत्रपातैरिवायतैः । दृष्टिपातैः स्वभूस्तस्याः श्लाघते शरकौशलम् ॥१४३।।
उसके लंबायमान कटाक्ष क्या हैं मानो पूर्ण यौवन के प्रारंभ को सूचित करनेवाले सूत्रपात ही हैं । उसके ऐसे कटाक्षों से ही कामदेव अपने बाणों के कौशल की प्रशंसा करता है अर्थात् उसके लंबायमान कटाक्षों को देखकर मालूम होता है कि उसके शरीर में पूर्ण यौवन का प्रारंभ हो गया है तथा कामदेव जो अपने बाणों की प्रशंसा किया करता है सो उसके कटाक्षों के भरोसे ही किया करता है ।।143।।
Her elongated glances are like the very symbols of the onset of full youth. It is through these glances that Kamadeva praises the skill of his arrows. In other words, by seeing her long glances, it is evident that the beginning of full youth has taken place in her body, and Kamadeva, who often praises the skill of his arrows, does so on the strength of her glances. 143
श्लोक ( Shlok ) 144
तक्ष्मीकराग्रसंसक्तलीलाम्बुजजिगीषया । तद्वक्त्रेन्दुः सदा भाति नूनं दन्ताशुपेशलः ।।१४४।।
उसका मुखरूपी चंद्रमा सदा दाँतों की उज्ज्वल किरणों से शोभायमान रहता है । इसलिए ऐसा जान पड़ता है मानो लक्ष्मी के हाथ में स्थित क्रीड़ाकमल को ही जीतना चाहता हो ।।144।।
Her face, resembling the moon, is always adorned with the bright rays of her teeth. Therefore, it seems as though she is trying to win the playful lotus held in the hand of Lakshmi. 144
श्लोक ( Shlok ) 145
तस्थाश्चरणविन्यासे लाक्षारक्तां पदावलीम् ।भ्रमरा लङ्घयन्त्याशु रक्ताम्बुजविशङ्कया ॥१४५।।
चलते समय, उसके लाक्षा रस से रँगे हुए चरणों को लालकमल समझकर भ्रमर शीघ्र ही घेर लेते हैं ।।145।।
While walking, her feet, stained with lac juice, are mistaken for red lotuses, and bees quickly surround them. 145
श्लोक ( Shlok ) 146
कामविद्यामिवादेष्टुभ्रमर्यः कलनिस्वनाः । तस्याः कर्णोत्पले लग्ना नाप यान्त्यपि ताडिताः ॥ १४६॥
उसके कर्णफूल पर बैठी तथा मनोहर शब्द करती हुई भ्रमरियाँ ऐसी मालूम होती हैं मानो उसे कामशास्त्र का उपदेश ही दे रही हों और इसीलिए वे ताड़ना करने पर भी नहीं हटती हों ।।146।।
The bees sitting on her earrings, making delightful sounds, seem as though they are offering her teachings on the science of love. And for this reason, they do not leave, even when she tries to shake them off. 146
श्लोक ( Shlok ) 147
देवस्य वज्रदन्तस्य प्रियपुत्र्या तयादरात् । कलाकौशलमामीत्य मिहालेख्ये प्रदर्शितम् ॥ १४७৷৷
राजा वज्रदंत की प्रियपुत्री उस श्रीमती ने ही इस चित्र में अपना कलाकौशल दिखलाया है ।।147।।
The beloved daughter of King Vajradanta, Shrimati, is the one who has displayed her artistic skill in this painting. 147
श्लोक ( Shlok ) 148
लक्ष्मीरिवार्थिनां प्रार्थ्यासैषा कन्या घनस्तनी । मृग्या मृगयते त्वाद्य नान्यस्त्वमिव पुण्यवान् ॥ १४८॥
जो लक्ष्मी की तरह अनेक अर्थीजनों के द्वारा प्रार्थनीय है अर्थात् जिसे अनेक अर्थीजन चाहते हैं । जो यौवनवती होने के कारण स्थूल और कठोर स्तनों से सहित है तथा जो अच्छे-अच्छे मनुष्यों-द्वारा खोज करने के योग्य है अर्थात् दुर्लभ है, ऐसी वह श्रीमती आज आपकी खोज कर रही है । आपकी खोज के लिए ही उसने मुझे यहाँ भेजा है । इसलिए समझना चाहिए कि आपके समान और कोई पुण्यवान् नहीं है ।।148।।
She, who is to be prayed for by many worthy men, like Lakshmi, and who, being youthful, possesses full and firm breasts, is also rare and sought after by good individuals—she, Shrimati, is seeking you today. She has sent me here to find you. Therefore, it should be understood that there is no one as virtuous as you. 148
श्लोक ( Shlok ) 149
ललिताङ्ग ब्रवीति त्वां प्रिया “दिव्येव तन्मृषा । येनेहापि भवान् सौम्यो लक्ष्यते ललिताङ्गकः ॥१४९।।
वह प्यारी श्रीमती आपका स्वर्ग का (पूर्वभव का) नाम ललितांग बतलाती है । परंतु वह झूठ है क्योंकि आप इस मनुष्य-भव में भी सौम्य तथा सुंदर अंगों के धारक होने से साक्षात् ललितांग दिखायी पड़ते हैं ।।149।।
The beloved Shrimati tells me that your heavenly (previous life’s) name is Lalitang. However, that is not true, for in this human life as well, you, being the possessor of gentle and beautiful limbs, appear to be none other than Lalitang in person. 149
श्लोक ( Shlok ) 150
इत्युक्तस्तु मया साधु पण्डिते साधु जल्पितम् । विधेर्विलसितं चित्रम दृष्टार्थप्रसिद्धिषु ॥ १५०॥
इस प्रकार मेरे कहने पर वह राजकुमार कहने लगा कि ठीक पंडिते, ठीक, तुमने बहुत अच्छा कहा । अभिलषित पदार्थों की सिद्धि में कर्मों का उदय भी बड़ा विचित्र होता है ।।150।।
Upon hearing this, the prince replied, “Indeed, Pandit, indeed, you have spoken very well. The rise of actions in the attainment of desired things is indeed quite mysterious.” 150
श्लोक ( Shlok ) 151
पश्य जन्मान्तराज्जन्तूनानीयैवमनन्तरे । भवे संघटयत्याशु विधिर्यातोऽनुलोमताम् ॥१५१॥
देखो, अनुकूलता को प्राप्त हुआ कर्मों का उदय जीवों को जंमांतर से लाकर इस दूसरे भव में भी शीघ्र मिला देता है ।।151।।
Look, the rise of actions that have gained favorable conditions brings beings from past lives and swiftly grants them success in this current life as well. 151
श्लोक 152 से 162
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121| श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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