महीधर का वैराग्य और अजितंजय का जन्म
वज्रदंत (अच्युत इंद्र) ने प्रभाकरी नगरी में महीधर को उपदेश दिया कि वह उनकी माता का जीव है और भोगों से विरक्त हो। महीधर ने राज्य पुत्र को सौंपकर जंगनंदन मुनि से दीक्षा ली, कनकावली तप कर प्राणत स्वर्ग में इंद्र बना। वहाँ से च्युत होकर अयोध्या में जयवर्मा और सुप्रभा का पुत्र अजितंजय हुआ।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 |
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 33 to 41
श्लोक ( Shlok ) 33 – 37
कदाचिदथ गत्वाहं पुष्करार्द्धस्य पश्चिमे । मागे पूर्वविदेहे तं विषयं वत्सकावतीम् ।।३३।।
तत्र प्रभाकरीपुर्या विनयन्धरयोगिनः । निर्वाणपूजां निध्याप्य महामेरुमथागमम् ।। ३४।।
तत्र नम्दनपूर्वाश। चैत्यालयमुपाश्रितम् । महीधरं समालोक्य विद्यापूजोद्यतं तदा ॥३५॥
प्रत्यबुध मित्युच्चैः अहो खेन्द्र महीधरम् । विद्धि मामच्युताधीश ललिताङ्गस्टवमप्यसौ ।। ३६।।
त्वय्यसाधारणी प्रोतिः ममास्ति जननीघरे । तद्भद्र विषयासङ्गाद् दुरस्ताद् विरमाधुना ।।३७।।
तदनंतर किसी दिन मैं पुष्करार्ध द्वीप के पश्चिम भाग के पूर्व विदेहसंबंधी वत्सकावती देश में गया वहाँ प्रभाकरी नगरी में श्री विनयंधर मुनिराज की निर्वाण-कल्याण की पूजा की और पूजा समाप्त कर मेरु पर्वत पर गया वहाँ उस समय नंदनवन के पूर्व दिशासंबंधी चैत्यालय में स्थित राजा महीधर को (ललितांग का जीव) विद्याओं की पूजा करने के लिए उद्यत देखकर मैंने उसे उच्चस्वर में इस प्रकार समझाया―अहो भद्र, जानते हो, मैं अच्युत स्वर्ग का इंद्र हूँ और तू ललितांग है । तू मेरी माता का जीव है इसलिए तुझ पर मेरा असाधारण प्रेम है । हे भद्र, दुःख देने वाले इन विषयों की आसक्ति से अब विरक्त हो ।।33-37।।
One day, I went to the western part of Pushkarardha Dweep, specifically to the Vatsakavati region of eastern Videha. There, in the city of Prabhakari, I worshipped in celebration of the Nirvana Kalyana of Shri Vinayandhara Muni. After completing the worship, I ascended Mount Meru. At that time, I saw King Mahidhara (the soul of Lalitanga) in a temple located in the eastern direction of Nandanvana, preparing to worship various mystical powers.
Seeing this, I addressed him in a loud voice and said: ‘O noble one! Do you know that I am Indra of the Achyuta heaven, and you are Lalitanga? You are the soul of my mother, which is why I have extraordinary love for you. Dear one, renounce attachment to these worldly pleasures that only bring suffering.'” (33-37)
श्लोक ( Shlok ) 38 – 41
इत्युक्तमात्र एवासौ निर्विष्णः कामभोगतः । महीकम्पे सुते ज्येष्ठे राज्यभारं स्वमर्पयन् ॥३८।।
बहुभिः खेचरैः साई ‘जगनन्दन शिष्यताम् । प्रपद्य कनकावल्या प्राणतेन्द्रोऽभवद् विभुः ॥३९।।
विंशत्यग्धिस्थितिस्तत्र भोगाश्विविश्य निश्च्युतः । धातकीखण्डपूर्वाशापश्चिमोरुविदेहगे ।।४०।।
गन्धिले विषयेऽयोध्यानगरे अयवर्मणः । सुप्रभायाश्च पुत्रोऽभूद अजितंजय इत्यसौ ॥४१॥
इस प्रकार से उससे कहा ही था कि वह विषयभोगों से विरक्त हो गया और महीकंप नामक ज्येष्ठ पुत्र के लिए राज्यभार सौंपकर अनेक विद्याधरों के साथ जगंनंदन मुनि का शिष्य हो गया, तथा कनकावली तप तपकर उसके प्रभाव से प्राणत स्वर्ग में बीस सागर की स्थिति का धारक इंद्र हुआ । वहाँ वह अनेक भोगों को भोगकर धातकीखंड द्वीप के पूर्व दिशासंबंधी पश्चिमविदेह क्षेत्र में स्थित गंधिलदेश के अयोध्या नामक नगर में जयवर्मा राजा के घर उसकी सुप्रभा रानी से अजितंजय नामक पुत्र हुआ ।।38-41।।
“Upon hearing this, he became detached from worldly pleasures. He entrusted the kingdom to his eldest son, Mahīkampa, and, along with many Vidyādharas, became a disciple of Jagannandana Muni. By performing the Kanakāvali penance, he attained immense spiritual power and was reborn as Indra in the Prāṇata heaven with a lifespan of twenty Sāgaras. There, he enjoyed numerous divine pleasures.
Later, he was reborn in the eastern part of Dhātakīkhaṇḍa Dweep, in the western Videha region, in the city of Ayodhyā in the land of Gandhila. He was born as Ajitanjaya, the son of King Jayavarma and Queen Suprabhā.” (38-41)
श्लोक 42 से 54
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41
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