आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141
श्लोक 142 से 151 धर्म्यध्यान का विस्तार
अपायविचय में उपायों का चिंतवन है। विपाकविचय कर्मों के उदय का ध्यान है। कर्म स्वयं और तप से फल देते हैं। संस्थानविचय लोक के आकार का चिंतवन है। मुनि लोक की रचना और जीवों का ध्यान करता है। संसार दुस्तर और गंभीर है।
English translation of Ādi purāṇa parv 21 – Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
तदपा यप्रतीकारचि श्रोपायानुचिन्तनम् । अत्रैवान्तर्गतं ध्ये यमनुप्रेक्षादिलक्षणम् ॥१४२॥
अथवा उन अपायों (दुःखों) के दूर करने की चिंता से उन्हें दूर करने वाले अनेक उपायों का चिंतवन करना भी अपायविचय कहलाता है । बारह अनुप्रेक्षा तथा दश धर्म आदि का चिंतवन करना इसी अपायविचय नाम के धर्म्यध्यान में शामिल समझना चाहिए ।।142।।
Alternatively, contemplating ways to eliminate these sufferings (Apāya) and reflecting on various methods to overcome them is also called Apāya Vichaya.
Meditation on the twelve reflections (Anuprekshas) and the ten virtues (Dasha Dharma) should also be considered as part of Apāya Vichaya Dharma Dhyana.142.
श्लोक ( Shlok ) 143 –145
शुभाशुमविभक्तानां कर्मणां परिपाकतः । भवावर्तस्य वैचित्र्यमभि संदधतो मुनेः ॥ १४३॥
विपाकविचयं धर्म्यमामनन्ति कृता गमाः । विपाकश्च द्विधाम्नातः कर्मणामाप्तसूक्तिषु ॥१४४॥
यथाकालमुपायाच्च फलप क्तिर्वनस्पतेः । यथा तथैव कर्मापि फलं दते शुभाशुभम् ॥१४५॥
शुभ और अशुभ भेदों में विभक्त हुए कर्मों के उदय से संसाररूपी आवर्त की विचित्रता का चिंतवन करने वाले मुनि के जो ध्यान होता है उसे आगम के जानने वाले गणधरादि देव विपाकविचय नाम का धर्म्यध्यान मानते हैं । जैन शास्त्रों में कर्मों का उदय दो प्रकार का माना गया है । जिस प्रकार किसी वृक्ष के फल एक तो समय पाकर अपने आप पक जाते हैं और दूसरे किन्हीं कृत्रिम उपायों से पकाये जाते हैं उसी प्रकार कर्म भी अपने शुभ अथवा अशुभ फल देते हैं अर्थात् एक तो स्थिति पूर्ण होने पर स्वयं फल देते हैं और दूसरे तपश्चरण आदि के द्वारा स्थिति पूर्ण होने से पहले ही अपना फल देने लगते हैं ।।143-145।।
The contemplation of the complexities of the cyclic existence (samsara) arising from the fruition of karmas, which are classified as auspicious (shubh) and inauspicious (ashubh), is considered Vipakavichaya Dharmadhyana by the enlightened Ganadharas, who are well-versed in the Agamas.
According to Jain scriptures, the fruition of karma is believed to occur in two ways. Just as the fruits of a tree ripen either naturally over time or through artificial means, karma also yields its results in a similar manner. Some karmas produce their effects automatically when their duration (stithi) is complete, while others bear fruit earlier due to practices such as austerities (tapas) and spiritual discipline.( 143-145)
श्लोक ( Shlok ) 146
मूलोत्तर प्रकृत्यादिबन्धस त्वाद्युपाश्रयः । कर्मणामुदयश्चित्रः प्राप्य द्रव्यादिसन्निधिम् ॥१४६॥
मूल और उत्तर प्रकृतियों के बंध तथा सत्ता आदि का आश्रय लेकर द्रव्य क्षेत्र काल भाव के निमित्त से कर्मों का उदय अनेक प्रकार का होता है ।।146।।
The fruition of karma occurs in various ways, depending on the binding and existence of the Mula (primary) and Uttara (secondary) prakritis of karma. This process is influenced by the factors of substance (dravya), location (kshetra), time (kal), and disposition (bhav) as contributing conditions.( 146)
श्लोक ( Shlok ) 147
“यतश्च तद्विपाकज्ञस्तदपायाय चेष्टते । ततो ध्येयमिदं ध्यानं मुक्त्युपायो मुमुक्षुभिः ॥१४७॥
क्योंकि कर्मों के विपाक (उदय) को जानने वाला मुनि उन्हें नष्ट करने के लिए प्रयत्न करता है इसलिए मोक्षाभिलाषी मुनियों को मोक्ष के उपायभूत इस विपाकविचय नाम के धर्म्यध्यान का अवश्य ही चिंतवन करना चाहिए ।।147।।
Since a monk who understands the fruition (vipak) of karma makes efforts to destroy them, monks who desire liberation (moksha) must certainly contemplate Vipakavichaya Dharmadhyana, as it serves as a means to attain liberation.( 147)
श्लोक ( Shlok ) 148
संस्थानविचयं प्राहुर्लोंकाकारानुचिन्तनम् । तदन्तर्भूतजीवादितत्वान् वीक्षणलक्षितम् ॥१४८॥
लोक के आकार का बार-बार चिंतवन करना तथा लोक के अंतर्गत रहने वाले जीव अजीव आदि तत्त्वों का विचार करना सो संस्थानविचय नाम का धर्म्यध्यान है ।।148।।
Repeated contemplation of the form of the Lok (universe) and reflection on the elements within it, such as Jiva (living beings), Ajiva (non-living entities), and other fundamental principles, is known as Sansthanavichaya Dharmadhyana.( 148)
श्लोक ( Shlok ) 149 –150
द्वीपाब्धिवलयानद्रीन् सरितश्च सरांसि च। विमानभवनव्यन्तरावासनरकक्षितीः ॥१४९॥
त्रिजगत्सन्निवेशेन सममेतान्यथागमम् । भावान् मुनिरनुध्यायेत् संस्थानविचयोपगः ॥१५०॥
संस्थानविचय धर्म्यध्यान को प्राप्त हुआ मुनि तीनों लोकों की रचना के साथ-साथ द्वीप, समुद्र, पर्वत, नदी, सरोवर, विमानवासी, भवनवासी तथा व्यंतरों के रहने के स्थान और नरकों की भूमियाँ आदि पदार्थों का भी शास्त्रानुसार चिंतवन करे ।।149-150।।
A monk engaged in Sansthanavichaya Dharmadhyana should contemplate, according to the scriptures, not only the structure of the three worlds (Trailokya) but also the various elements within them. This includes continents (dvipa), oceans (samudra), mountains (parvata), rivers (nadi), lakes (sarovara), celestial beings residing in aerial palaces (vimanavasi), terrestrial deities (bhavanavasi), Vyantara deities, and the different realms of hell (naraka bhumi), among other entities.(Verses 149-150)
श्लोक ( Shlok ) 151
जीवभेदांश्च तत्रस्यान् ध्यायेन्मुक्तेतरात्मकान् । ज्ञत्वकर्तृ त्वभोक्तृत्वद्रष्ट्टत्वादींश्च तद्गुणान् ॥१५१॥
इसके सिवाय उस लोक में रहने वाले संसारी और मुक्त ऐसे दो प्रकार वाले जीवों के भेदों का जानना, कर्तापना, भोक्तापना और दर्शन आदि जीवों के गुणों का भी ध्यान करे ।।151।।
Apart from this, one should also contemplate the distinctions between the two types of beings residing in the Lok (universe)—worldly (samsari) beings and liberated (mukta) souls. Additionally, one should reflect on the attributes of the soul, such as doership (kartapan), experiencership (bhoktapan), perception (darshan), and other inherent qualities of the soul.( 151)
श्लोक 152 से 161
आदिपुराण Ādi purāṇa home page
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208 श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 221 भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 273 भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 216 भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 213 भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 224 भगवान् के साम्राज्य का वर्णन पर्व 16 – श्लोक 1 से 275 भगवान् के तप-कल्याणक का वर्णन पर्व 17 – श्लोक 1 से 257 धरणेंद्र का विजयार्ध पर्वत पर जाना आदि का वर्णन पर्व 18 – श्लोक 1 से 209
आदिपुराण पर्व 19 – नमि-विनमि की राज्यप्राप्ति का वर्णन पर्व 19 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192
आदिपुराण पर्व 20 – भगवान के कैवल्योत्पत्ति का वर्णन पर्व 20 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 253 | श्लोक 254 से 261
आदिपुराण पर्व 21 – ध्यानतत्त्व का वर्णन पर्व 21 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 95 | श्लोक 96 से 111 | श्लोक 112 से 120 | श्लोक 121 से 131 | श्लोक 132 से 141