आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 209 | श्लोक 210 से 213
आदिपुराण पर्व 15 – भगवान का कुमारकाल, यशस्वती और सुनंदा का विवाह तथा भरत की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 15 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 शरीर का मध्य और निचला भाग
महाराज नाभिराज के पुत्र भगवान वृषभदेव की नाभि लक्ष्मीरूपी हंसी से सेवित और आवर्त से युक्त सरोवर सी शोभायमान थी। करधनी और वस्त्र से युक्त उनका जघनभाग बिजली और शरद बादलों से युक्त पर्वत के नितंब सा शोभायमान था। उनकी सुवर्ण-कांतियुक्त ऊरुएँ लक्ष्मी के झूले के स्तंभ से प्रतीत होती थीं। उनकी जंघाएँ कामदेवरूपी हाथी के लिए अर्गल सी थीं, जो लक्ष्मी द्वारा उज्ज्वल की गई सी लगती थीं। उनके चरणकमल तीनों लोकों की लक्ष्मी के आलिंगन से सौभाग्य के गर्व से शोभायमान थे, जिनकी कोई उपमा नहीं थी। पैरों के नख से शिर के केशों तक उनकी कांति ऐसी थी मानो अनन्य गति से उनके शरीर में प्रकट हुई हो। उनका शरीर स्वाभाविक रूप से सुंदर, वज्रमय हड्डियों से युक्त, और अभेद्य था, जो मेरु की कांति को प्राप्त था। उनका वज्रवृषभनाराच संहनन वज्रमयी हड्डियों और कीलों से युक्त था। वात, पित्त, कफ से उत्पन्न व्याधियाँ उनके शरीर में स्थान नहीं पाती थीं, जैसे वायु मेरु को नहीं हिला सकती। उनके शरीर में न बुढ़ापा, न खेद, न असमय मृत्यु थी; वे सुख में पूजित थे।
English translation of Ādi purāṇa parv 15 – Shlok 2 2to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
मध्येकायमसौ नाभिमदधन्नाभिनन्दनः । सरसीमिव सावर्त्ता लक्ष्मीहंसीनिषेविताम् ॥२२॥
महाराज नाभिराज के पुत्र भगवान् वृषभदेव अपने शरीर के मध्यभाग में जिस नाभि को धारण किये हुए थे वह लक्ष्मीरूपी हंसी से सेवित तथा आवर्त से सहित सरस के समान सुशोभित हो रही थी ।।22।।
The navel of Lord Rishabhadeva, the son of Maharaj Nabhiraj, which was located in the middle of His body, was adorned like a whirlpool in a lake, radiating beauty and charm. It was served by the divine smile of Goddess Lakshmi, making it even more splendid. ||22||
श्लोक ( Shlok ) 23
“समेखलमधात् कान्ति जघनं तस्य सांशुकम् । नितम्बमिव भूभर्तुः सतडिच्छरदम्बुदम् ॥२३॥
करधनी और वस्त्र से सहित भगवान का जघनभाग ऐसी शोभा धारण कर रहा था मानो बिजली और शरद्ऋतु के बादलों से सहित किसी पर्वत का नितंब मध्यभाग ही हो ।।23।।
The waist and lower body of the Lord, adorned with a girdle and garments, radiated such splendor as if it were the midsection of a mountain enveloped by lightning and autumn clouds. ||23||
श्लोक ( Shlok ) 24
बभारोरुद्वयं धीरः कार्तस्वरविभास्वरम् । लक्ष्मीदेव्या इवान्दोलस्तम्भयुग्मकमुच्चकैः ॥२४॥
धीर-वीर भगवान् सुवर्ण के समान दैदीप्यमान जिन दो ऊरुओं (घुटनों से ऊपर का भाग) को धारण कर रहे थे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी देवी के झूला के दो ऊँचे स्तंभ ही हों ।।24।।
The steadfast and valiant Lord, whose two thighs shone brilliantly like gold, appeared as if they were the two lofty pillars of Goddess Lakshmi’s divine swing. ||24||
श्लोक ( Shlok ) 25
जङ्गे मदनमातङ्गदुर्लङ्घयार्गलविभ्रमे । लक्ष्म्येवोद्वर्तिते भर्तुः परां कान्तिमवापताम् ॥२५॥
कामदेवरूपी हाथी के उल्लंघन न करने योग्य अर्गलों के समान शोभायमान भगवान् की दोनों जंघाएँ इस प्रकार उत्कृष्ट कांति को प्राप्त हो रही थीं मानो लक्ष्मीदेवी ने स्वयं उबटन कर उन्हें उज्ज्वल किया हो ।।25।।
The Lord’s two shanks, resplendent like impenetrable barriers that even the elephant of Kamadeva dared not cross, radiated an exceptional brilliance, as if Goddess Lakshmi herself had anointed them with a divine unguent. ||25||
श्लोक ( Shlok ) 26
पादारविन्दयोः कान्तिरस्य केनोपमीयते । त्रिजगच्छ्रीसमाश्लेषसौभाग्यमदशालिनोः ॥२६॥
भगवान् के दोनों ही चरणकमल तीनों लोकों की लक्ष्मी के आलिंगन से उत्पन्न हुए सौभाग्य के गर्व से बहुत ही शोभायमान हो रहे थे, संसार में ऐसा कोई पदार्थ नहीं जिसके कि साथ उनकी उपमा दी जा सके ।।26।।
Both lotus feet of the Lord, radiant with the fortune born from the embrace of the Goddess of Wealth of all three worlds, shone with supreme splendor. In this world, there exists no object worthy of comparison to their divine beauty. ||26||
श्लोक ( Shlok ) 27
इत्यस्याविरभूत् कान्ति रालकाग्रं नखाग्रतः । नूनमन्यत्र नालब्ध सा “प्रतिष्टां स्ववान्छिताम् ॥२७।
इस प्रकार पैरों के नख के अग्रभाग से लेकर शिर के बालों के अग्रभाग तक भगवान के शरीर की कांति प्रकट हो रही थी और ऐसी मालूम होती थी मानो उसे किसी दूसरी जगह अपनी इच्छानुसार स्थान प्राप्त नहीं हुआ था इसलिए वह अनन्य गति होकर भगवान के शरीर में आ प्रकट हुई हो ।।27।।
Thus, from the tips of His toenails to the ends of His hair, the divine radiance of the Lord’s body manifested in its full glory. It seemed as if this brilliance, having found no other place worthy of its presence, had chosen to reside exclusively in His transcendental form. ||27||
श्लोक ( Shlok ) 28
निसर्गसुन्दरं तस्य वपुर्वज्रास्थिबन्धनम् । विषशस्त्राभेद्यत्वं भेजे रुक्मादिसच्छवि ॥२८॥
भगवान् का शरीर स्वभाव से ही सुंदर था, वज्रमय हड्डियों के बंधन से सहित था, विष शस्त्र आदि से अभेद्य था और इसीलिए वह मेरु पर्वत की कांति को प्राप्त हो रहा था ।।28।।
The Lord’s body was naturally beautiful, strengthened by the bond of diamond-like bones, and impenetrable by poison, weapons, or any harm. For this reason, it radiated the brilliance of Mount Meru. ||28||
श्लोक ( Shlok ) 29
यत्र वज्रमयास्थीनि “वज्रैर्वलयितानि च । वज्रनाराचभिन्नानि तत्संहननमीशितुः ॥२९॥
जिस संहनन में वज्रमयी हड्डियाँ वज्रों से वेष्टित होती हैं और वज्रमयी कीलों से कीलित होती हैं, भगवान वृषभदेव का वही वज्रवृषभनाराचसंहनन था ।।29।।
The divine physique of Lord Rishabhadeva possessed the Vajra-Vrishabha-Nāracha structure, in which diamond-like bones were encased in a sheath of adamantine strength and fastened with unbreakable, thunderbolt-like joints. ||29||
श्लोक ( Shlok ) 30
त्रिदोषजा महातङ्का नास्य देहे न्यधुः पदम् । मरुतां चलितागानां ननु मेरुरगोचरः ।।३०।।
वात, पित्त और कफ इन तीन दोषों से उत्पन्न हुई व्याधियाँ भगवान् के शरीर में स्थान नहीं कर सकी थीं सो ठीक ही है वृक्ष अथवा अन्य पर्वतों को हिलाने वाली वायु मेरु पर्वत पर अपना असर नहीं दिखा सकती ।।30।।
It is only natural that diseases arising from the three doshas—Vata, Pitta, and Kapha—could not affect the Lord’s divine body. Just as the winds capable of shaking trees and other mountains have no effect on the mighty Mount Meru, similarly, no ailment could touch Him. ||30||
श्लोक ( Shlok ) 31
न जरास्य न खेदो वा नोपघातोऽपि जातुचित् । केवलं सुखसाद्भूतो “महीतल्पेऽमहीयत ॥३१॥
उनके शरीर में न कभी बुढ़ापा आता था, न कभी उन्हें खेद होता था और न कभी उनका उपघात (असमय में मृत्यु) ही हो सकता था । वे केवल सुख के अधीन होकर पृथ्वीरूपी शय्या पर पूजित होते थे ।।31।।
Old age never approached His divine body, nor did He ever experience sorrow or untimely death. He remained ever blissful, revered as He rested upon the Earth, which served as His sacred bed. ||31||
श्लोक 32 से 44
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भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
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