आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 नृत्य का समापन
देव-देवियाँ भुजाओं पर प्रदक्षिणा संग नृत्य, इंद्र सूत्रधार सा। तांडव-लास्य रस मिश्रण, प्रेम उत्पन्न। गंधर्व बाजों संग आनंद नृत्य समाप्त। नृत्य उद्यान सा—झाँझ ताल, बाँसुरी शब्द, अप्सराएँ, शृंगार रस। नाभिराज-मरुदेवी आश्चर्यचकित, प्रशंसित।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
इतश्वेतः स्वदोर्जाले गूढं संचारयन् नटीः । सभवान् हस्तसंचारमिवासीदाचरन् हरिः ॥१५२॥
नृत्य करने वाली देवियों को अपनी भुजाओं के समूह पर गुप्तरूप से जहाँ-तहाँ घुमाता हुआ वह इंद्र हाथ की सफाई दिखलाने वाले किसी बाजीगर के समान जान पड़ता था ।।152।।
Indra, secretly moving the dancing celestial maidens across his arms in various ways, appeared like a skilled juggler displaying his sleight of hand. ||152||
श्लोक ( Shlok ) 153
नर्तयन्नेकतो यूनो युवतीरन्यतो हरिः । भुजशाखासु सोऽनर्तींदू दर्शिताद्भुतविक्रियः ॥१५३॥
वह इंद्र अपनी एक ओर की भुजाओं पर तरुण देवों को नृत्य करा रहा था और दूसरी ओर की भुजाओं पर तरुण देवियों को नृत्य करा रहा था तथा अद्भुत विक्रिया शक्ति दिखलाता हुआ अपनी भुजारूपी शाखाओं पर स्वयं भी नृत्य कर रहा था ।।153।।
Indra was making the young celestial gods dance on one side of his arms and the young celestial maidens on the other. Displaying an astonishing power of transformation, he himself was also dancing upon his branch-like arms. ||153||
श्लोक ( Shlok ) 154
नेटुस्त द्भुजरङ्गेषु ते च ताश्च परिक्रमैः । सुत्रामा सूत्रधारोऽभूनाट्य वेदविदांवरः ॥१५४॥
इंद्र की भुजारूपी रंगभूमि में वे देव और देवांगनाएँ प्रदक्षिणा देती हुई नृत्य कर रही थीं इसलिए वह इंद्र नाट्यशास्त्र के जानने वाले सूत्रधार के समान मालूम होता था ।।154।।
On the stage formed by Indra’s arms, the celestial gods and maidens danced while moving in circular motions. Thus, Indra appeared like a master director well-versed in the art of dramaturgy. ||154||
श्लोक ( Shlok ) 155
“दीप्तोद्धतरसप्रायं नृत्यं ताण्डवमेकतः । सुकुमारप्रयोगाढ्यं ललितं लास्यमन्यतः ॥ १५५
उस समय एक ओर तो दीप्त और उद्धत रस से भरा हुआ तांडव नृत्य हो रहा था और दूसरी ओर सुकुमार प्रयोगों से भरा हुआ लास्य नृत्य हो रहा था ।।155।।
At that moment, on one side, a Tāṇḍava dance filled with intensity and vigor was being performed, while on the other, a Lāsya dance, full of graceful and delicate movements, was taking place. ||155||
श्लोक ( Shlok ) 156
विभिन्नरसमित्युच्चैर्दर्शयन् नाट्यमद्भुतम् । सामाजिकजने शक्रः परां प्रीतिमजीजनत् ॥१५६॥
इस प्रकार भिन्न-भिन्न रस वाले, उत्कृष्ट और आश्चर्यकारक नृत्य दिखलाते हुए इंद्र ने सभा के लोगों में अतिशय प्रेम उत्पन्न किया था ।।156।।
In this way, by showcasing extraordinary and astonishing dances infused with different emotions, Indra deeply captivated the hearts of the audience, filling them with immense delight. ||156||
श्लोक ( Shlok ) 157
गन्धर्वनायकारब्धविविधातोद्यसंविधिः । आनन्दनृत्यमित्युच्चैर्मघवा निरवर्त्तयत् ॥ १५७॥
इस प्रकार जिसमें श्रेष्ठ गंधर्वों के द्वारा अनेक प्रकार के बाजों का बजाना प्रारंभ किया गया था ऐसे आनंद नामक नृत्य को इंद्र ने बड़ी सजधज के साथ समाप्त किया ।।157।।
Thus, Indra gracefully concluded the Ānanda Nṛtya (Dance of Joy), which had begun with the enchanting melodies of various instruments played by the finest Gandharvas. ||157||
श्लोक ( Shlok ) 158
“सर्कसतालमुद्वेणु” “विततध्वनिसंकुलम् । साप्सरः सरसं नृत्तं तदुद्यानमिवाद्युतत् ॥ १५८॥
उस समय वह नृत्य किसी उद्यान के समान जान पड़ता था क्योंकि जिस प्रकार उद्यान कांस और ताल (ताड़) वृक्षों से सहित होता है उसी प्रकार वह नृत्य भी काँसे की बनी हुई झाँझों के ताल से सहित था, उद्यान जिस-प्रकार ऊँचे-ऊँचे बाँसों के फैलते हुए शब्दों से व्याप्त रहता है उसी प्रकार वह नृत्य भी उत्कृष्ट बाँसुरियों के दूर तक फैलने वाले शब्दों से व्याप्त था, उद्यान जिस प्रकार अप्सर अर्थात् जल के सरोवरों से सहित होता है उसी प्रकार वह नृत्य भी अप्सर अर्थात् देवनर्तकियों से सहित था और उद्यान जिस प्रकार सरस अर्थात् जल से सहित होता है उसी प्रकार वह नृत्य भी सरस अर्थात् शृंगार आदि रसों से सहित था ।।158।।
At that moment, the dance resembled a magnificent garden. Just as a garden is adorned with Kaṁsa (bronze) and Tāla (palm) trees, the dance was accompanied by the rhythmic beats of Kaṁsa (cymbals) and Tāla (musical rhythms). Just as a garden is filled with the echoing rustle of tall bamboo trees, the dance was pervaded by the far-reaching melodies of exquisite flutes. Just as a garden is enriched with Apsar (water reservoirs), the dance was graced by Apsarās (celestial dancers). And just as a garden is abundant with Saras (water), the dance was infused with Saras (charming sentiments like Śṛṅgāra—romantic emotions). ||158||
श्लोक ( Shlok ) 159
नाभिराजः समं देण्या दृष्ट्वा तन्नाट्यमद्द्भुतम् । विसिस्मिये परां श्लाघां प्रापच्च सुरसत्तमैः ॥१५९॥
महाराज नाभिराज मरुदेवी के साथ-साथ वह आश्चर्यकारी नृत्य देखकर बहुत ही चकित हुए और इंद्र के द्वारा की हुई प्रशंसा को प्राप्त हुए ।।159।।
King Nābhirāja, along with Queen Marudevī, was utterly amazed upon witnessing that extraordinary dance and received great praise from Indra. ||159||
श्लोक ( Shlok ) 160
वृषभोऽयं जगज्ज्येष्टो वर्षिष्यति जगद्धितम् । धर्मामृतमितीन्द्रास्तम कार्पुर्वृषभाह्वयम् ॥ १६०॥
ये भगवान् वृषभदेव जगत्-भर में श्रेष्ठ हैं और जगत् का हित करने वाले धर्मरूपी अमृत की वर्षा करेंगे इसलिए ही इंद्रों ने उनका वृषभदेव नाम रखा था ।।160।।
Lord Ṛṣabhadeva is the greatest in the entire world and will shower the nectar of righteousness for the welfare of all beings. For this reason, the Indras bestowed upon him the name Ṛṣabhadeva (the Supreme Bull). ||160||
श्लोक ( Shlok ) 161
वृषो हि भगवान् धर्मस्तेन यद्भाति तीर्थकृत् । ततोऽयं वृषभस्वामीत्याह्वा स्तैनं पुरन्दरः ॥१६१॥
अथवा वृष श्रेष्ठ धर्म को कहते हैं और तीर्थंकर भगवान् उस वृष अर्थात् श्रेष्ठ धर्म से शोभायमान हो रहे हैं इसलिए ही इंद्र ने उन्हें ‘वृषभ-स्वामी’ इस नाम से पुकारा था ।।161।।
Or, “Vṛṣa” means supreme Dharma (righteousness), and since the Tīrthaṅkara Bhagavān is resplendent with this highest Dharma, Indra addressed him by the name “Vṛṣabhasvāmi” (Lord of Dharma). ||161||
श्लोक 162 से 171
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आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151