आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |
श्लोक 72 से 81 नाभिराज-मरुदेवी से भेंट
इंद्र ने भगवान को नाभिराज घर में सिंहासन पर रखा। नाभिराज रोमांचित, मरुदेवी प्रबोधित हो पुत्र देखीं। भगवान तेज पुंज सा, माता पूर्व दिशा सा। इंद्र ने माता-पिता की पूजा की, स्तुति: पुण्यशाली, महाभाग्यशाली, उदयाचल-पूर्व दिशा।
English translation of Ādi purāṇa parv 14 – Shlok 67 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
ततः कतिपयैर्दे वैर्दें वमादाय देवराट् । प्रविवेश नृपागारं परार्ध्य श्रीपरम्परम् ॥७२॥
तत्पश्चात् इंद्र ने भगवान् वृषभदेव को लेकर कुछ देवों के साथ उत्कृष्ट लक्ष्मी से सुशोभित महाराज नाभिराज के घर में प्रवेश किया ।।72।।
“Then, Indra,with several other deities and Lord Rishabhadeva , entered the residence of Maharaja Nabhiraja, magnificently adorned by the peerless Lakshmi.”
श्लोक ( Shlok ) 73
तत्रामरकृतानेक विन्यासे श्रीगृहाङ्गणे । हर्यासने कुमारं तं सौधर्मेन्द्रो न्यवीविशत् ॥७३॥
और वहाँ जहाँ पर देवों ने अनेक प्रकार की सुंदर रचना की है ऐसे श्रीगृह के आँगन में बालक रूपधारी भगवान् को सिंहासन पर विराजमान् किया ।।73।।
“And there, in the courtyard of the divine palace, where the gods had created various beautiful designs, they seated the child-form Lord upon the throne.”
श्लोक ( Shlok ) 74
नाभिराजः समुद्भिनपुलकं गात्रमुद्वहन् । प्रीतिविस्फारिताक्षस्तं ददर्श प्रियदर्शनम् ॥७४॥
महाराज नाभिराज उन प्रियदर्शन भगवान् को देखने लगे, उस समय उनका सारा शरीर रोमांचित हो रहा था, नेत्र प्रीति से प्रफुल्लित तथा विस्तृत हो रहे थे ।।74।।
“Maharaja Nabhiraja gazed upon the beloved and charming Lord, his entire body thrilled with joy, while his eyes widened and sparkled with delight.”
श्लोक ( Shlok ) 75
मायानिद्रामपाकृत्य देवी शच्या प्रबोधिता । देवीभिः सममैक्षिष्ट प्रहृष्टा जगतां पतिम् ॥७५॥
मायामयी निद्रा दूर कर इंद्राणी के द्वारा प्रबोध को प्राप्त हुई माता मरुदेवी भी हर्षित चित्त होकर देवियों के साथ-साथ तीनों जगत् के स्वामी भगवान् वृषभदेव को देखने लगी ।।75।।
“Awakened from her divine slumber by Indrani, Mother Marudevi, filled with joy, joined the celestial maidens in beholding Lord Rishabhadeva, the sovereign of the three worlds.”
श्लोक ( Shlok ) 76
तेजःपुञ्जमिवोद्भुतं सापश्यत् स्वसुतं सती । बालार्केन्द्रेण च [सा] तेन दिगैन्द्रीय विदिद्युते ॥७६॥
वह सती मरुदेवी अपने पुत्र को उदय हुए तेज के पुंज के समान देख रही थी और वह उससे ऐसी सुशोभित हो रही थी जैसी कि बालसूर्य से पूर्व दिशा सुशोभित होती है ।।76।।
“That virtuous Marudevi beheld her son as a radiant mass of rising brilliance, and she herself shone with his presence, just as the eastern horizon is illuminated by the rising sun.”
श्लोक ( Shlok ) 77
शच्या समं च नाकेशं तावद्राष्टां जगद्गुरोः । पितरौ नितरां प्रीतौ परिपूर्णमनोरथौ ॥७७॥
जिनके मनोरथ पूर्ण हो चुके हैं ऐसे जगद्गुरु भगवान् वृषभदेव के माता-पिता अतिशय प्रसन्न होते हुए इंद्राणी के साथ-साथ इंद्र को देखने लगे ।।77।।
“The parents of Lord Rishabhadeva, the world teacher whose divine purpose had been fulfilled, gazed upon Indra along with Indrani, overwhelmed with immense joy.”
श्लोक ( Shlok ) 78
ततस्तौ जगतां पूज्यौ पूजयामास वासवः । विचित्रर्भूषणैः स्त्रग्भिरंशुकैश्च महार्घकैः ॥७८॥
तत्पश्चात् इंद्र ने नाना प्रकार के आभूषणों, मालाओं और बहुमूल्य वस्त्रों से उन जगत्पूज्य माता-पिता की पूजा की ।।78।।
“Then, Indra honored the revered parents of the world with various ornaments, garlands, and priceless garments.”
श्लोक ( Shlok ) 79
तौ प्रीतः प्रशसंसेत्ति सौधर्मेन्द्रः सुरैः समम् । युवां पुण्यधवौ धन्यौ ययोर्लोंकाग्रणीः सुतः ।॥७९॥
फिर वह सौधर्म स्वर्ग का इंद्र अत्यंत संतुष्ट होकर उन दोनों की इस प्रकार स्तुति करने लगा कि आप दोनों पुण्यरूपी धन से सहित हैं तथा बड़े ही धन्य हैं क्योंकि समस्त लोक में श्रेष्ठ पुत्र आपके ही हुआ है ।।79।।
“Then, Indra of the Saudharma heaven, immensely pleased, began to praise them, saying, ‘You both are truly blessed and endowed with the wealth of virtue, for the most exalted son in all the worlds has been born to you.'”
श्लोक ( Shlok ) 80
युवामेव महाभागो युवां कल्याणभागिनौ । युवयोर्न तुला लोके युवामधि गुरोर्गुरु ॥८०॥
इस संसार में आप दोनों ही महाभाग्यशाली हैं, आप दोनों ही अनेक कल्याणों को प्राप्त होने वाले हैं और लोक में आप दोनों की बराबरी करने वाला कोई नहीं है, क्योंकि आप जगत् के गुरु के भी गुरु अर्थात् माता-पिता है ।।80।।
“In this world, you both are supremely fortunate and destined to attain great auspiciousness. There is none equal to you, for you are the parents—the very gurus—of the teacher of the universe.”
श्लोक ( Shlok ) 81
भो नाभिराज सत्यं ध्वमुदयाद्रिर्महोदयः । देवी प्राच्येव यज्ज्योतिर्युष्मत्तः परमुद् वभौ ॥८१॥
हे नाभिराज, सच है कि आप ऐश्वर्यशाली उदयाचल हैं और रानी मरुदेवी पूर्व दिशा है क्योंकि यह पुत्ररूपी परम ज्योति आप से ही उत्पन्न हुई है ।।81।।
“O King Nabhiraja, it is indeed true that you are like the majestic Udaya Mountain, and Queen Marudevi is like the eastern horizon, for from you both has arisen this supreme light in the form of your son.”
श्लोक 82 से 91
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 216
आदिपुराण पर्व 14 – भगवज्जातकर्मोत्सव वर्णन पर्व 14 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |