आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-भावक अर्थात् भावना करने वाला स्वयं ही प्रतिबोध को प्राप्त होकर सोचता है कि-नहीं, ऐसा नहीं हो सकता है, कारण कि-
भुक्तोज्झिता मुहुर्मोहान्मया सर्वेऽपि पुद्गला: उच्छिष्टेष्विव तेष्वद्य, मम विज्ञस्य का स्पृहा ॥30॥
अन्वयार्थ – (सर्वे अपि) सभी (पुद्गलाः) पुद्गल परमाणु (मया मोहात्) मेरे द्वारा मोह से (मुहुः) वार-बार (भुक्तोज्झिता) भोगे और छोड़े जा चुके हैं अतः (अद्य) अब (उच्छिष्टेषु इव) जूठन के समान (तेषु) उन पुद्गलों में (मम विज्ञस्य) मुझ बुद्धिमान् की (का स्पृहा) क्या लालसा हो सकती है?
पद्यानुवाद
मोह-भाव से विगत-काल में, मुझसे ये पुद्गल-सारे,
बहुत बार भी, बार-बार भी, भोगे, छोड़े, उर धारे।
वमनरूप-सम भोगों में अब, मेरा मन यदि फिर जाता,
विज्ञ बना मुझको शोभा क्या? देता उत्तर लजवाता ॥ ३०॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 30
विवेचना
मोह एवं अविद्या के आवेश में आकर इस संसारी प्राणी ने कर्म, नोकर्मरूप में लोक की समस्त पुद्गल वर्गणाओं को बार-बार भोगा और छोड़ा। कुछ भी नया नहीं है फिर भी अविद्या के कारण नये को पुराना और पुराने को नया मानकर ग्रहण करता है और छोड़ता है। मोह के प्रभाव से विपरीत मान्यतायें उत्पन्न होती है, जिनके कारण सारभूत वस्तु को असार समझकर और असार को सारभूत समझकर उन्हीं असार पुद्गलों को बार-बार ग्रहण करता है। भेदविज्ञान के अभाव में ऐसा ही होता है।
संसारी प्राणी की स्थिति उस श्वान की तरह है, जिसने अपने मुख में हड्डी रखी है, वह उसे चबाता है, बार-बार चबाता है। चबाते चबाते उसके मसूड़ों में दर्द होने लगता है बाद में चबाने की क्रिया को बन्द करता है। चर्वण क्रिया बन्द करने से उसके मुख की हड्डी नीचे गिर जाती है, फिर भी स्वाद आता रहता है। उस समय वह चर्वण करते-करते अपने ही मसूड़ों से निकले खून का स्वाद लेता रहता है। इसी प्रकार संसारी प्राणी पञ्चेन्द्रियों की विषय भोग सामग्री में सुख का अनुभव करता है जबकि वह सुखाभास है। यदि भोग सामग्री में सुख होता तो सबको सुख होना चाहिए।
जैसे कि अस्सी साल का कोई वृद्ध है, जिसकी इन्द्रियाँ शिथिल हो चुकी हैं, दाँत निकल चुके हैं, स्वाद लेने की क्षमता ही नहीं रह गई है, क्योंकि ज्वर चढ़ा है उसे आप खाने के लिए लड्डू भी दे दें, हलवा दे दें, गुलाबजामुन दे दें तो भी उसे कड़वा ही स्वाद आयेगा। यदि मधुर रस में सुख है तो उस वृद्ध को भी सुख का अनुभव होना चाहिए। जबकि लड्डू, हलवा आदि का सेवन करते समय भी उस वृद्ध की मुखाकृति बिगड़ी हुई दिखती है। जैसे कोई कष्ट हो रहा हो। ऐसा क्यों होता है? क्या उस वृद्ध के असाताकर्म का उदय आ गया, तो कह सकते हैं कि कर्म भी परिवर्तित होकर उदय में आ गया और नोकर्म में परिवर्तन आ गया हो। कर्म का फल नोकर्म के माध्यम से अनुभूत होता है। यदि नोकर्म परिवर्तित हो गया तो कर्मोदय भी परिवर्तित होकर फल का अनुभव करायेगा। इस प्रकार से कर्मफल चेतना बदलती रहती है।
ज्ञानी जीव इन बदलती हुई कर्मफल चेतना के बीच अपने भेदविज्ञान को मजबूत बनाए रखता है, जिसके माध्यम से वह सुख का अनुभव करता रहता है। उसे यह ज्ञात होता है कि सुख का अनुभव न कर्म में हैं, न नोकर्म में किन्तु सुख का अनुभव अपनी चैतन्य शक्ति के द्वारा होता है। इस भेदविज्ञान के बल पर वह इधर-उधर की बातों को छोड़कर ज्ञान स्वभाव का चिन्तन करता है तथा दुनिया के समस्त पदार्थों को “उच्छिष्ट वमन” के समान समझता है। जिससे पञ्चेन्द्रियों के विषय सेवन के समय आसक्ति का भाव भी नहीं रहता और उन्हें बार-बार भोगने का मन भी नहीं करता बल्कि उन्हें छोड़ने का प्रयास करता है। मानलो आप भोजन कर रहे हैं और बीच में वमन हो जाये तो आप क्या करेंगे? जिस भोजन को रुचि पूर्वक कर रहे थे, अब उसी भोजन को देखकर उल्टी होने लग जाती है तो भोजन करना बन्द कर देते हैं। संसारी प्राणी भोजन को तो छोड़ देता है किन्तु भोगकर छोड़े हुए वमन सम लोक के समस्त पुद्गलों को बार-बार ग्रहण करने की इच्छा करता है। वमन सम भोजन को पुनः कौन ग्रहण कर सकता है? मात्र एक बुद्धिहीन, अविवेकी, अज्ञानी बालक ही ऐसा कर सकता है। आपने देखा होगा कि छोटे बालक को माँ दूध पिलाती है। लेकिन वह दूध अंदर रहने वाली विकृति के परिणाम स्वरूप दही के रूप में बाहर आ जाता है फिर बालक उसे दूध समझकर पुनः पीने की कोशिश करता है। उसी प्रकार जिनवाणी माँ दुग्ध रस के समान हितकारी वचनामृत का पान कराती है और कहती है कि दुनिया के सभी पदार्थ उल्टी के समान हैं। इनको तुमने बार-बार भोगा है और छोड़ा है उन्हीं को पुनः ग्रहण किया और पुनः छोड़ा है। अब और कब तक इस वमन को ग्रहण करोगे ?
अज्ञानी, अविवेकी संसारी प्राणी जिनवाणी माँ के वचनामृत का कोई महत्त्व नहीं समझता। लेकिन ज्ञानी जीव सोचता है कि अरे! माँ के वचनों पर विश्वास करो और “उच्छिष्ट सम” इन पदार्थों को ग्रहण करने की इच्छा समाप्त करो। फलतः वह कहता है कि इन सभी पदार्थों में क्या इच्छा करना ? ” मम विज्ञस्य का स्पृहा”। जो उच्छिष्ट है उससे विरक्त हो जाता है।
“मोह महामद पियो अनादि ॥ छहढाला, १/३ ॥
मोहरूपी मदिरा के नशे में और अज्ञान के अंधकार में संसारी प्राणी को यह वास्तविकता समझ में नहीं आती। कैसी दशा हो रही है फिर भी कोई ख्याल नहीं आता। क्या करें ? तीव्र कर्मोदय में ऐसा ही होता है।
एक बात और बताता हूँ कि कोई भी व्यक्ति ‘बारह भावनाओं’ पर बहुत सुन्दर और बृहद् ग्रन्थ लिख सकता है, लिखने वाला अपने ज्ञान से एक बार नहीं बारह बार भी बारह भावनाओं पर ग्रन्थ लिख सकता है, लेकिन उसे बारह भावनाओं को भाने का अवसर एक बार भी न मिले, ऐसा हो सकता है। ऐसा कैसे हो सकता है? तो भावनाओं को भाना यह एक प्रयोग है। इसका प्रयोग करना बहुत दुर्लभ होता है। तीर्थंकर भी जब तक घर में रहते हैं बारह भावना नहीं भाते और जिस समय बारह भावना भाते हैं तो फिर घर में नहीं रहते। जिस समय वे बारह भावना भाते हैं, उनका चिन्तन करते हैं, उसी समय स्वर्ग से लौकांतिक देव आ जाते हैं और उनके चिन्तन की सराहना करते हैं क्योंकि वे लौकांतिक देव स्वयं भी इन बारह भावनाओं के प्रयोग के समर्थक होते हैं।
“बारह भावनाओं पर प्रवचन करना, उनकी विवेचना करना, यह ज्ञान की बात है। लेकिन बारह भावनाओं को भाना उनका चिन्तन करके प्रयोग करना यह भेदविज्ञान की बात है।” बारह भावनाओं का बार-बार चिन्तन करने से हमारा मस्तिष्क बिल्कुल तनाव रहित और साफ सुथरा हो जाता है। ज्ञान भी दृढ़ हो जाता है। नया-नया भेदविज्ञान उत्पन्न होता जाता है और वह भी मजबूत होता जाता है।
“कहाँ गये चक्री जिन जीता भरत खण्ड सारा।” मंगतराय, २
इस भावनात्मक पंक्ति से हम अतीत में हुए चक्रवर्ती के बारे में सोचते हैं कि जिस चक्रवर्ती ने सारा का सारा भरत क्षेत्र जीत लिया था वह भी जब यहाँ सुरक्षित नहीं रहा तो हमारी और आपकी क्या बात? क्या हम यहाँ सुरक्षित रह पायेंगे या ये समस्त पदार्थ सुरक्षित रहेंगे? इत्यादि रूप से बारह भावना की बात हमारे अंदर आ जाती है और इन भावनाओं के लिए जो कोई भी कारणभूत पदार्थ होते हैं वे हमारे लिए भेदविज्ञान की पृष्ठभूमि का काम करते हैं।
देखो, भावना भाने का कितना महान् फल होता है? वैराग्य भावना या बारह भावना के वातावरण से जब व्यक्ति बाहर होता है, तो चक्रवर्ती के वैभव को जानकर चक्रवर्ती बनने की भावना जागृत हो जाती है और वैराग्य भावना या बारह-भावना के वातावरण में रहने से जो अतीत में चक्रवर्ती हो गये “वे कहाँ गये” इस प्रकार की वैराग्य भावना उत्पन्न हो जाती है। भावनात्मक विचार क्षेत्र की अपेक्षा बाहर का क्षेत्र अलग होता है। एक में वैराग्य भाव पैदा हो सकता है तो दूसरे में राग भाव पैदा हो जाता है। अतः यह निश्चित बात है कि द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव के माध्यम से भावनाओं में भी परिवर्तन होता हुआ देखा जाता है। प्रेक्टीकल में ज्यादा नम्बर मिलते हैं, थ्योरी की अपेक्षा। प्रयोग में तो जितने नम्बर रखे हैं उतने पूरे भी मिल सकते हैं क्योंकि प्रेक्टिकल में वस्तु का साक्षात्कार होता है। जिस समय वस्तु का साक्षात्कर होना प्रारम्भ होता है तो संतुष्टि होती है क्योंकि उसे यह अनुभूत होता है कि जैसा हमने ज्ञान किया था वैसा आज देखा लिया। साक्षात्कार करने से उसका श्रद्धान और अधिक मजबूत होता चला जाता है।
“भेदविज्ञान के माध्यम से ज्ञान प्रौढ़ होता चला जाता है और भेदविज्ञान के अभाव में ज्ञान लचकदार हो जाता है।” जीवनपर्यन्त आप ज्ञान की कितनी भी चर्चा करो तो भी ज्ञान संयत नहीं हो पाता, लेकिन भेदविज्ञान होने पर ज्ञान संयत हो जाता है। सैकड़ों हजारों ग्रन्थ पढने की अपेक्षा एक बार भेदविज्ञान प्राप्त करने का अभ्यास करो। जैसे कि मान लो कुम्भकार ने सैकड़ों घट बनाए, उन्हें रखने के लिए व्यवस्थित स्थान का अभाव होने से वर्षा होने पर सभी घट गल गये, बह गये, नुकसान हो गया इसलिए सैकड़ों घट बनाने की अपेक्षा ५ घट या व्यवस्था के अनुसार घट बनाओ, नियन्त्रित बनाओ। यहाँ पर प्रयोगशाला में आकर संयत ज्ञान की उपलब्धियों से आत्मिक आनन्द प्राप्त करो।
प्रयोग के बिना ज्ञान का कोई महत्त्व नहीं होता क्योंकि प्रयोग के बिना ज्ञान संयत नहीं होने से मलिन बना रहता है, असंयम की धूल से मलिन हो जाता है। भेदविज्ञान होने के उपरान्त ज्ञान में मलिनता नहीं आती बल्कि मलिन ज्ञान निर्मल होता चला जाता है। भेदविज्ञानी प्रत्येक कार्य को सावधानी के साथ करता है। अतः भेदविज्ञान को सुरक्षित बनाने का प्रयास करते रहिये, इसी का नाम मोक्षमार्ग है।
पुद्गल द्रव्य संवेदनशील नहीं है इसलिए वह स्वयं का कर्ता होते हुए भी स्वयं का भोक्ता नहीं होता और स्वयं का ज्ञाता भी नहीं होता, क्योंकि जो पदार्थ संवेदनशील होते हैं वे ही स्व और पर पदार्थों के ज्ञाता होते हैं। स्वभाव दशा में जीव पर का ज्ञाता होते हुए भी पर का संवेदन करने वाला नहीं होता। जब जीव के समस्त संयोगज भाव समाप्त हो जाते हैं तो उसका ज्ञान केवलज्ञान चेतना स्वरूपमय हो जाता है।
जब जीव स्वयं अपना ही कर्ता होता है तो स्वयं को सिद्ध क्यों नहीं बना लेता ? क्यों नहीं बना पा रहा है? आचार्य कहते हैं कि जीव स्वयं को सिद्ध बनाने में स्वतन्त्र तो है लेकिन वर्तमान में कर्मसापेक्ष होने के कारण स्वतन्त्र नहीं है। जैसे कि जानने देखने की शक्ति होते हुए भी प्रकाश के अभाव में हम देख नहीं पाते, दूर की आवाज होने के कारण कान होने पर भी हम सुन नहीं पाते। इन्द्रिय में यदि कुछ भी गड़बड़ हो जाती है तो वह अपने-अपने विषय को ग्रहण करने में समर्थ नहीं हो पाती। जब तक इन्द्रियों के माध्यम से ज्ञान होगा अर्थात् जब तक इन्द्रियजन्य ज्ञान रहेगा तब तक पराधीनता भी रहेगी।
आज सबके मन में अपना हित करने की भावना है, लेकिन हित कर नहीं पाते, क्योंकि कर्म की परतन्त्रता साथ में है, कर्म का प्रभाव है। जीव स्वयं कर्मों के कारण इतनी दीन-हीन जघन्य दशा का अनुभव करता है कि चाहते हुए भी अपना हित नहीं कर पाता। अपना हित करने के लिए उत्साहित होना चाहता है फिर भी वीर्यान्तराय कर्म का तीव्र क्षयोपशम न होने के कारण अथवा वीर्यान्तराय कर्म का उदय होने के कारण उत्साहित नहीं हो पाता। अतः अनन्त वीर्य को प्रकट करने में सक्षम नहीं हो पाता। इस विवक्षा से जीव को कर्म काटना भी अपने हाथ की बात नहीं है। आज ढाईद्वीप के भरत, ऐरावत क्षेत्रीय मनुष्य या तिर्यञ्च सोलहवें स्वर्ग से ऊपर जाना चाहें तो नहीं जा सकते। क्यों नहीं जा सकते ? तो आचार्य कहते हैं कि उसके पास इस प्रकार के कर्म बाँधने की क्षमता नहीं है। ऐसी स्थिति में वह कमजोर और दीन हो जाता है फिर आत्मा का हित कब होगा? इसको आगे की कारिका में बतायेंगे।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 30
इष्टोपदेश गाथा 30 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (सर्वे अपि) सभी (पुद्गलाः) पुद्गल परमाणु (मया मोहात्) मैंने मोह से (मुहुः) बार-बार (भुक्तोज्झिता) भोगकर छोड़ दिये हैं अतः (अद्य) अब (उच्छिष्टेषु) झूठन के समान (तेषु) उन पुद्गलों में (मम विज्ञस्य) मुझ बुद्धिमान् की (का स्पृहा) अभिलाषा कैसे हो सकती है ?
भावार्थ – प्रत्येक संसारी जीव इस संसार में अनादिकाल से जन्म मरण कर रहा है। इस जीव ने तीनों लोकों में जितने भी पुद्गल परमाणु हैं वे अनेक बार भोजन पान आदि के रूप में तथा शरीर के भोग्य, उपभोग्य पदार्थों के रूप में भोग भोगकर छोड़ दिये हैं, ऐसा कोई भी परमाणु नहीं बचा जो इसके भोगने में अनेक बार न आया हो इसलिए सभी पुद्गल वर्गणाओं को जब यह आत्मा खाने पीने आदि के रूप में अनेक बार भोग चुका है, तो सभी पुद्गल परमाणु इसके लिए जूठन की तरह हो चुके हैं, इसलिए फिर उन्हीं जूठन रूप पुद्गल परमाणुओं के भोगने में सम्यग्दृष्टि जीव की रुचि नहीं होती। जिस तरह कोई भी बुद्धिमान् अपने मुख से उगले हुए भोजन को फिर नहीं खाना चाहता।
उत्थानिका – यहाँ पर शिष्य कहता है कि वे पुद्गल क्यों बंध जाते हैं ? अर्थात् जीव के द्वारा पुद्गल क्यों और किस प्रकार से हमेशा बंध को प्राप्त होते रहते हैं ? आचार्य उत्तर देते हुए कहते हैं – गाथा 31
स्वाध्याय गाथा सं 29 – 30
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