आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 देवियों का नृत्य और संगीत
देवियाँ नृत्य में चौक बिखेरतीं, स्तन कमल-बोड़ियों सा हिलते, भौंह-कटाक्ष से कामदेव अभ्यास सा। मुस्कान, गीत, फिरकी से विलासमय। गीत-नृत्य से मरुदेवी का मन उत्कंठित। वीणा बजाती देवियाँ कमलिनी सा शोभित, हाथों से मन हर्षित करतीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
पुष्पाञ्जलिं किरन्त्येका परितो रङ्गमण्डलम् । मदनग्रहमावेशे योक्तुकामेव लक्षिता ॥१९२॥
कोई देवी रंग-बिरंगे चौक के चारों ओर फूल बिखेर रही थी और उस समय वह ऐसी मालूम होती थी मानो चित्रशाला में कामदेवरूपी ग्रह को नियुक्त ही करना चाहती हो ।।192।।
One goddess was scattering flowers around the colorful square, and at that moment, she appeared as though she intended to place the planet representing Kamadeva in a celestial art gallery. ||192||
श्लोक ( Shlok ) 193
तदुरोजसरोजातमुकुलानि चकम्पिरे । अनुनर्तितुमतासामिवं नृत्तं कुतुहलात् ॥१९३॥
नृत्य करते समय उन देवांगनाओं के स्तनरूपी कमलों की बोड़ियाँ भी हिल रही थीं जिससे ऐसी जान पड़ती थीं मानो उन देवांगनाओं के नृत्य का कौतुहलवश अनुकरण ही कर रही हों ।।193।।
While dancing, the breasts of the celestial maidens, resembling lotuses, also swayed, making it seem as though their dance was being mimicked out of curiosity. ||193||
श्लोक ( Shlok ) 194
अपाङ्गशरसन्धानैर्भू लताचापकर्षणैः । “धनुर्गुणनिकेवासीत् नृत्तगोष्ठी मनोभुवः ॥१९४॥
देवांगनाओं की उस नृत्यगोष्ठी में बार-बार भौंहरूपी चाप खींचे जाते थे और उनपर बार-बार कटाक्षरूपी बाण चढ़ाये जाते थे जिससे वह ऐसी मालूम होती थी मानो कामदेव की धनुषविद्या का किया हुआ अभ्यास ही हो ।।194।।
In the dance gathering of the celestial maidens, bows resembling bees were repeatedly drawn, and arrows in the form of glances were continuously aimed, making it seem as though they were practicing the archery skills taught by Kamadeva himself. ||194||
श्लोक ( Shlok ) 195– 196
स्मितमुद्भिन्नदन्तांशु पाठ्यं कलमनाकुलम् । सापाङ्गवीक्षितं चक्षुः सलयश्च परिक्रमः ॥ १९५॥
इतीदमन्यदप्यासां धतेऽनङ्गशराङ्गताम् । किमङ्ग संगतं भावै राङ्गिकैरसतां गतेः ॥१९६॥
नृत्य करते समय वे देवियाँ दाँतों की किरणें फैलाती हुई मुसकराती जाती थीं, स्पष्ट और मधुर गाना गाती थीं, नेत्रों से कटाक्ष करती हुई देखती थीं और लय के साथ फिरकी लगाती थीं, इस प्रकार उन देवियों का वह नृत्य तथा हाव-भाव आदि अनेक प्रकार के विलास, सभी कामदेव के बाणों के सहायक बाण मालूम होते थे और रसिकता को प्राप्त हुई शरीरसंबंधी चेष्टाओं से मिले हुए उनके शरीर का तो कहना ही क्या है―वह तो हरएक प्रकार से अत्यंत सुंदर दिखाई पड़ता था ।।195-196।।
“While dancing, those goddesses smiled, spreading beams of light from their teeth, singing clear and sweet songs, casting glances filled with suggestiveness, and spinning in rhythm. In this way, their dance, gestures, and various forms of enjoyment seemed to be the supporting arrows of the God of Love, and their body, combined with the sensuous gestures that embodied this passion, was indescribably beautiful in every way.”
श्लोक ( Shlok ) 197
चारिभिः करणैश्चित्रैः साङ्गहारैश्च रेचकैः । मनोऽस्याः सुरनर्त्तक्यश्चधकुः संप्रेक्षणोत्सुकम् ॥१९७॥
वे नृत्य करने वाली देवियाँ अनेक प्रकार की गति, तरह-तरह के गीत अथवा नृत्यविशेष, और विचित्र शरीर की चेष्टासहित फिरकी आदि के द्वारा माता के मन को नृत्य देखने के लिए उत्कंठित करती थीं ।।197।।
“The dancing goddesses, with various types of movements, different songs or specific dances, and peculiar bodily gestures like spinning, would stir the mother’s mind, making her eager to watch the dance.”
श्लोक ( Shlok ) 198
काश्चित् संगीतगोष्ठीषु दरोद्भिन्नस्मि तैर्मुखैः । बभुः पद्मैरिवाब्जिन्यो विरलोद्भिन्नकेसरेः ॥१९८॥
कितनी ही देवांगनाएँ संगीतगोष्ठियों में कुछ-कुछ हँसते हुए मुखों से ऐसी सुशोभित होती थी जैसे कुछ-कुछ विकसित हुए कमलों से कमलिनियाँ सुशोभित होती हैं ।।198।।
“Many celestial nymphs would shine in musical gatherings, with their faces adorned with gentle smiles, like lotus flowers blooming, decorated by the beauty of the fully developed lotuses.”
श्लोक ( Shlok ) 199
काश्चिदोष्टाग्रसंदष्टवेणवो ऽणुभ्रुवो बभुः । मदनाग्निमिवाध्मातुं कृतयत्नाः सफूत्कृतम्: ॥ १९९
जिनकी भौंहें बहुत ही छोटी-छोटी हैं ऐसी कितनी ही देवियां ओठों के अग्रभाग से वीणा दबाकर बजाती हुई ऐसी शोभायमान हो रही थीं मानो हंसकर कामदेवरूपी अग्नि को प्रज्वलित करने के लिए ही प्रयत्न कर रही हों ।।199।
“Many goddesses, whose eyebrows were very small, were pressing the strings of a lute with the tips of their lips, playing it in such a way that they appeared to be trying to ignite the fire of Love itself with a smile.”
श्लोक ( Shlok ) 200
वेणुध्मा वैणवीर्यष्टीर्मार्जिन्त्यः करपल्लवैः । चित्रं पल्लवितांश्चकुः प्रेक्षकाणां मनोद्रुमान् ॥ २००॥
यह एक बड़े आश्चर्य की बात थी कि वीणा बजाने वाली कितनी ही देवियाँ अपने हस्तरूपी पल्लवों से वीणा की लकड़ी को साफ करती हुई देखने वालों के मनरूपी वृक्षों को पल्लवित अर्थात् पल्लवों से युक्त कर रही थी । (पक्ष में हर्षित अथवा शृंगार रस से सहित कर रही थी ।) भावार्थ―उन देवांगनाओं के हाथ पल्लवों के समान थे वीणा बजाते समय उनके हाथरूपी पल्लव वीणा की लकड़ी अथवा उसके तारों पर पड़ते थे ।जिससे वह वीणा पल्लवित अर्थात नवीन पत्तों से व्याप्त हुई-सी जान पड़ती थी परंतु आचार्य ने यहाँ पर वीणा को पल्लवित न बताकर देखने वालों के मनरूप वृक्षों को पल्लवित बतलाया है जिससे विरोधमूलक अलंकार प्रकट हो गया है, परंतु पल्लवित शब्द का हर्षित अथवा शृंगाररस से सहित अर्थ बदल देने पर वह विरोध दूर हो जाता है । संक्षेप में भाव यह है कि वीणा बजाते समय उन देवियों के हाथों की चंचलता, सुंदरता और बजाने की कुशलता आदि देखकर दर्शक पुरुषों का मन हर्षित हो जाता था ।।200।।
“It was quite a marvel that many goddesses playing the lute were cleaning the wood of the instrument with their hands, which resembled tender leaves, and in doing so, they were nurturing the trees of the viewers’ hearts, causing them to bloom, as if filled with joy or love.
Interpretation: The hands of those celestial nymphs were like tender leaves. As they played the lute, their hands, resembling leaves, would touch the wood or strings of the instrument, making it seem as though the lute was covered with fresh leaves. However, the teacher has not described the lute as being adorned with leaves, but rather, the trees of the viewers’ hearts being nurtured, creating a figure of contrast. This contrast can be resolved by interpreting the term ‘pallavit’ (blooming) in a context of joy or love, rather than literal leaves. In short, the essence is that the grace, beauty, and skill of the goddesses’ hands while playing the lute made the hearts of the male viewers joyful.”
श्लोक ( Shlok ) 201
संगीतकविधौ काश्चित् स्पृशन्त्यः परिवादिनीः । कराङ्गुलीभिरातेनुर्गान मामन्द्रमूर्च्छनाः ॥२०१॥
कितनी ही देवियाँ संगीत के समय गंभीर शब्द करने वाली वीणाओं को हाथ की अँगुलियों से बजाती हुई गा रही थी ।।201।।
“Many goddesses, during the musical performance, were singing while playing the serious-sounding lutes with their fingers.”
श्लोक 202 से 211
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191