आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 अभिषेक तैयारी
शिला शीलव्रत सा, पुण्य खान। रत्न प्रकाश से इंद्रधनुष। देव-दिक्पाल शिला घेरे। सेना पांडुक वन में व्याप्त, स्वर्ग खाली सा। सौधर्मेंद्र ने सिंहासन पर ऋषभदेव को रखा। दुंदुभि बजी, अप्सराएँ नृत्य करतीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
यामला शीलमालेव मुनीनामभिसम्मता । जैनी तनुरिवात्यन्तभास्वरा सुरभिः शुचिः ॥९२॥
वह निर्मल पांडुकशिला शीलव्रत की परंपरा के समान मुनियों को बहुत ही इष्ट है और जिनेंद्रदेव के शरीर के समान अत्यंत दैदीप्यमान, मनोज्ञ अथवा सुगंधित और पवित्र है ।।92।।
That pure Pānduka Shilā is as dear to the Munis as the sacred tradition of Śīlavrata (vows of discipline and virtue). It shines brilliantly like the divine body of Jinendra Bhagavān, radiating splendor, fragrance, and holiness. ||92||
श्लोक ( Shlok ) 93
स्वयं धौतापि या धौता शतशः सुरनायकैः । क्षीरार्णंवाम्बुभिः पुण्यैः पुण्यस्येवाकरक्षितिः ॥९३।
यद्यपि वह पांडुकशिला स्वयं धौत है अर्थात् श्वेतवर्ण अथवा उज्ज्वल है तथापि इंद्रों ने क्षीरसागर के पवित्र जल से उसका सैकड़ों बार प्रक्षालन किया है । वास्तव में वह शिला पुण्य उत्पन्न करने के लिए खान की भूमि के समान है ।।93।।
Although the Pānduka Shilā is naturally pure, white, and radiant, the Indras have bathed it hundreds of times with the sacred waters of the Kṣīra Sāgara (Ocean of Milk). Truly, this divine stone is like a mine of merit, constantly generating spiritual virtue and auspiciousness. ||93||
श्लोक ( Shlok ) 94
यस्याः पर्यन्तदेशेषु “रत्नालोकैर्वितन्यते । परितः सुरचापश्रीरन्योऽन्यव्यतिषङ्गिभिः ॥९४॥
उस शिला के समीपवर्ती प्रदेशों में चारों ओर परस्पर में मिले हुए रत्नों के प्रकाश से इंद्रधनुष की शोभा का विस्तार किया जाता है ।।94।।
In the regions surrounding Pānduka Shilā, the radiance of the interwoven gemstones creates a breathtaking spectacle, expanding the grandeur of a celestial rainbow in all directions. ||94||
श्लोक ( Shlok ) 95
तामावेष्ट्य सुरास्तस्थुर्यथास्वं दिक्ष्वनुक्रमात् । द्रष्टुकामा जिनस्यामूं जन्मकल्याणसंपदम् ॥९५॥
जिनेंद्रदेव के जन्मकल्याणक की विभूति को देखने के अभिलाषी देव लोग उस पांडुकशिला को घेरकर सभी दिशाओं में क्रम-क्रम से यथायोग्य रूप में बैठ गये ।।95।।
The Devas, eager to witness the glorious celebration of Jinendra Bhagavān’s Janma Kalyāṇaka (divine birth ceremony), gathered around the Pānduka Shilā and seated themselves in an orderly manner across all directions, each taking their appropriate place. ||95||
श्लोक ( Shlok ) 96
दिक्पालाश्च यथायोग्यदिग्विदिग्भागसंश्रिताः । तिष्ठन्ति स्म निकायैः स्वैर्जिनोत्सवदिदृक्षया ।।९६।
दिक्पाल जाति के देव भी अपने-अपने समूह (परिवार) के साथ जिनेंद्र भगवान् का उत्सव देखने की इच्छा से दिशा-विदिशा में जाकर यथायोग्य रूप से बैठ गये ।।96।।
The Dikpāla Devas (guardian deities of the directions), along with their respective retinues, also took their designated places in all directions and intercardinal directions, eager to witness the grand celebration of Jinendra Bhagavān’s divine birth ceremony. ||96||
श्लोक ( Shlok ) 97
गगनाङ्गणमारुध्य व्याप्य मेरोरधित्यकाम् । निवेशः सुरसैन्यानामभवत् पाण्डुके वने ॥९७।।
देवों की सेना भी उस पांडुक वन में आकाशरूपी आंगन को रोककर मेरु पर्वत के ऊपरी भाग में व्याप्त होकर जा ठहरी ।।97।।
The vast army of Devas filled the Pānduka Van, spreading across the upper region of Mount Meru, as if blocking the celestial courtyard of the sky. ||97||
श्लोक ( Shlok ) 98
पाण्डुकं वनमास्द्धं समन्तात् सुरनायकैः । जहासेय दिवो लक्ष्मीं क्ष्मारुहां कुसुमोत्करैः ॥९८।।
चारों ओर से देव और इंद्रों से व्याप्त हुआ वह पांडुक वन ऐसा मालूम होता था मानो वृक्षों के फूलों के समूह से स्वर्ग की शोभा की हँसी ही बड़ा रहा हो ।।98।।
Thus, the Pānduka Van, filled on all sides with Devas and Indras, appeared as if it were enhancing the grandeur of heaven itself, much like a forest in full bloom mocking the splendor of the celestial realms. ||98||
श्लोक ( Shlok ) 99
स्वस्थानाच्चलितः स्वर्गः सत्यमुद्धासित स्वदा । मेरुस्तु स्वर्गतां प्राप धृत नाकेशवैभवः ॥९९॥
उस समय ऐसा जान पड़ता था कि स्वर्ग अवश्य ही अपने स्थान से विचलित होकर खाली हो गया है और इंद्र का समस्त वैभव धारण करने से सुमेरु पर्वत ही स्वर्गपने को प्राप्त हो गया है ।।99।।
At that moment, it seemed as if heaven itself had been emptied, with all its divine splendor having shifted to Mount Sumeru, making it appear as though Sumeru had become the very embodiment of heaven. ||99||
श्लोक ( Shlok ) 100
ततोऽभिषेचनं भर्तुः कर्तुमिन्द्रः प्रचक्रमे । निवेश्याधिशिलं सैहे विष्टरे प्राङ्मुखं प्रभुम् ॥१००॥
तदनंतर सौधर्म स्वर्ग का इंद्र भगवान् को पूर्व दिशा की ओर मुँह कर के पांडुक शिला पर रखे हुए सिंहासन पर विराजमान कर उनका अभिषेक करने के लिए तत्पर हुआ ।।100।।
Thereafter, Indra of Saudharma Heaven and prepared to perform the holy consecration (Abhiṣeka) of Bhagavān Jinendra, faced toward the east seating Him upon the throne placed on the Pānduka Shilā ||100||
श्लोक ( Shlok ) 101
नमोऽशेषं तदापूर्य सुरदुन्दुभयोऽध्वनन् । समन्तात् सुरनारीभिरारेभे नृत्यमूर्जितम् ॥१०१॥
उस समय समस्त आकाश को व्याप्त कर देवों के दुंदुभि बज रहे थे और अप्सराओं ने चारों ओर उत्कृष्ट नृत्य करना प्रारंभ कर दिया था ।।101।।
At that moment, celestial drums (dundubhis) resounded throughout the entire sky, while Apsarās began performing their exquisite dances in all directions. ||101||
श्लोक 102 से 112
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91