भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |
श्लोक 112 से 121 अरविंद की नरकगति और दंड की कथा
अरविंद पाप के योग से नरक गया। यह कथा अलकापुरी में प्रसिद्ध है। पिता की मृत्यु से कुरुविंद शोकाकुल हुआ। स्वयंबुद्ध ने दूसरी कथा शुरू की: दंड नामक प्रतापी विद्याधर ने शत्रुओं को दंडित किया। उसके पुत्र मणिमाली को युवराज बनाकर वह विषयासक्त हुआ। आर्तध्यान से तिर्यंच आयु बाँधी और मृत्यु पर अजगर बना। जातिस्मरण से वह भंडार में केवल मणिमाली को प्रवेश देता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 5- Shlok 112 to 121
श्लोक ( Shlok ) 112 – 113
नरकायुरपर्याप्तं पर्याविषयिषनिव । दधे स तुम्वधे चित्तमधीः पापोदधेर्विधुः ॥११२॥
स रुष्टः पुत्रमाहन्तुमाधावन् पतितोऽन्तरे । “स्वासिधेनुकया दोर्णहृदयो मृतिमासदत् ॥११३॥
यह जानकर पापरूपी समुद्र को बढ़ाने के लिए चंद्रमा के समान वह बुद्धिरहित राजा अरविंद, मानो नरक की पूर्ण आयु प्राप्त करने की इच्छा से ही रुष्ट होकर पुत्र को मारने के लिए दौड़ा परंतु बीच में इस तरह गिरा कि अपनी ही तलवार से उसका हृदय विदीर्ण हो गया तथा मर गया ।।112-113।।
“Upon realizing this, the foolish King Arvind, like the moon increasing the ocean of sin, as if enraged by the desire to attain the full span of hellish life, ran to kill his son. However, he fell in such a way that his own sword pierced his heart, and he died.”
श्लोक ( Shlok ) 114
स तथा दुर्मृतिं प्राप्य गतः श्वाभीमधर्मतः । कथेयमधुनाप्यस्यां नगर्यां स्मर्य्यते जनैः ॥११४॥
वह कुमरण को पाकर पाप के योग से नरकगति को प्राप्त हुआ । हे राजन् ! यह कथा इस अलका नगरी में लोगों को आज तक याद है ।।114।।
“By acquiring the son, he, through the influence of sin, attained the path to hell. O King! This story is still remembered by the people in the city of Alka to this very day.”
श्लोक ( Shlok ) 115 – 116
तत्तो भग्नैकरदनो दन्तीवानमिताननः । उत्खातफणमाणिक्यो महाहिरिव निष्प्रभः ॥११५॥
पितुर्भानोरिवापायात् कुरुविन्दोऽरविन्दवत् । परिम्लामतनुच्छायः स शोच्यामगमद् दशाम् ॥११६॥
जिस प्रकार दाँत टूट जाने से न हाथी अपना मुँह नीचा कर लेता है अथवा जिस प्रकार फण का मणि उखाड़ लेने से सर्प तेज रहित हो जाता है अथवा सूर्य अस्त हो जाने से जिस प्रकार कमल मुरझा जाता है उसी प्रकार पिता की मृत्यु से कुरुविंद ने अपना मुँह नीचा कर लिया, उसका सब तेज जाता रहा तथा सारा शरीर मुरझा गया―शिथिल हो गया । इस प्रकार वह शोचनीय अवस्था को प्राप्त हुआ था ।।115-116।।
“Just as an elephant does not lower its head upon losing a tusk, or a snake loses its venom when the jewel from its hood is removed, or a lotus withers when the sun sets, in the same way, with the death of his father, Kuruvind lowered his head, lost all his strength, and his entire body withered—becoming weak and frail. Thus, he reached a pitiable state.”
श्लोक ( Shlok ) 117
तथात्रैव भवद्वशे विस्तीर्ण जलधाविव । दण्डो नाम्नामवत् खेन्द्रो दण्डितारातिमण्डलः ॥११७॥
हे राजन् अब दूसरी कथा सुनिए―समुद्र के समान विस्तीर्ण आपके इस वंश में एक दंड नाम का विद्याधर हो गया है । वह बड़ा प्रतापी था । उसने अपने समस्त शत्रुओं को दंडित किया था ।।117।।
“O King, now listen to another story—In your vast lineage, as expansive as the ocean, there was a being named Dand, who was a great and powerful celestial being. He was highly influential and had punished all of his enemies.”
श्लोक ( Shlok ) 118
मणिमाळीस्यभूतस्मात् सूनुर्मणिरिवाम्बुधैः । नियोज्य यौवराज्ये तं स्वेष्टान् भोगानभुक्क सः ॥११८॥
जिस प्रकार समुद्र से मणि उत्पन्न होता है उसी प्रकार उस दंड विद्याधर से भी मणिमाली नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ । जब वह बड़ा हुआ तब राजा दंड ने उसे युवराज पद पर नियुक्त कर दिया और आप इच्छानुसार भोग भोगने लगा ।।118।।
“Just as a jewel is produced from the ocean, in the same way, from that celestial being Dand, a son named Manimali was born. When he grew up, King Dand appointed him as the crown prince, and he began to indulge in pleasures as he wished.”
श्लोक ( Shlok ) 119
मुक्त्वापि सुचिरं भोगान्नातृप्यद् विषयोत्सुकः । प्रत्युतासक्तिममजत् स्त्रीवस्नामरणादिषु ॥११९॥
वह विषयों में इतना अधिक उलूक हो रहा था कि चिरकाल तक भोगों को भोगकर भी तृप्त नहीं होता था बल्कि स्त्री, वस्त्र तथा आभूषण आदि में पहले की अपेक्षा अधिक आसक्त होता जाता था ।।119।।
“He was so engrossed in worldly pleasures that even after indulging in them for a long time, he was never satisfied. Instead, he became increasingly attached to women, clothes, jewelry, and other luxuries, more than before.”
श्लोक ( Shlok ) 120
सोऽत्यन्तविषयासक्तिकृतकौटिल्य चेष्टितः । बबन्ध तीव्रसंक्लेशात् तिरश्रामायुरार्त्तधीः ॥१२०॥
अत्यंत विषयासक्ति के कारण मायाचारी चेष्टाओं को करनेवाले उस आर्तध्यानी राजा ने तीव्र संक्लेश भावों से तिर्यंच आयु का बंध किया ।।120।।
“Due to his intense attachment to worldly pleasures, the deluded king, engaged in deceitful actions, bound himself to a triyanch aayu and miserable existence with intense feelings of regret.”
श्लोक ( Shlok ) 121
जीवितान्ते स दुर्ध्यानमार्त्तमापूर्य दुर्मृतेः । माण्डागारे निजे मोहान् महानजगरोऽजनि ।।१२१
चूँकि मरते समय उसका आर्तध्यान नाम का कुध्यान पूर्णता को प्राप्त हो रहा था, इसलिए कुमरण से मरकर वह मोह के उदय से अपने भंडार में बड़ा भारी अजगर हुआ ।।121।।
Since at the time of his death, his sorrowful meditation, known as ‘aartadhyana,’ was reaching its peak, he died and, due to the rise of his attachment, transformed into a large serpent in his next life, dwelling in his own storehouse.”
श्लोक 122 से 131
पर्व 1 – श्लोक 1 | श्लोक 2 से 15 | श्लोक 16 से 25 | श्लोक 26 से 35 | श्लोक 36 to 45 | श्लोक 46 से 55 | श्लोक 56 से 65 | श्लोक 66 से 75 | श्लोक 76 से 85 | श्लोक 86 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 116 | श्लोक 117 से 126 | श्लोक 127 से 136 | श्लोक 137 से 146 | श्लोक 147 से 156 | श्लोक 157 से 166 | श्लोक 167 से 171 | श्लोक 172 से 180 | श्लोक 181 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 |
Download PDF