आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
श्लोक 192 से 201 सुगंधित जल की महिमा
श्वेत धारा रत्नत्रय संतुष्ट करे, विघ्न नाशक, मुनियों को मान्य। शांति-मंत्र पाठ। देवों ने गंधोदक लगाया, स्वर्ग ले गए। चूर्ण जल से फाग। प्रदक्षिणा, पूजा (जल, गंध, अक्षत आदि) से अमंगल नाश।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
समस्ताः पूरयन्त्याशा जगदानन्ददायिनी । वसुधारेव धारासौ क्षीरधारा मुदेऽ॓स्तु नः ॥ १९२॥
वह दूध के समान श्वेत जल की धारा हम सबके आनंद के लिए हो जो कि रत्नों की धारा के समान समस्त आशाओं (इच्छाओं) और दिशाओं को पूर्ण करने वाली तथा समस्त जगत् को आनंद देने वाली थी ।।192।।
May that stream of milk-white water, which resembled a flow of precious gems, fulfilled all desires and directions, and brought joy to the entire world, be for the delight of us all. ॥192॥
श्लोक ( Shlok ) 193
या पुण्यास्त्रवधारेव सूते संपत्परम्पराम् । सास्मान्गन्धपयोधारा “धिनोत्वनिधनैर्धनैः ॥ १९३॥
जो पुण्यास्रव की धारा के समान अनेक संपदाओं को उत्पन्न करने वाली है ऐसी वह सुगंधित जल की धारा हम लोगों को कभी नष्ट नहीं होने वाले रत्नत्रयरूपी धन से संतुष्ट करे ।।193।।
May that stream of fragrant water, which, like the flow of meritorious deeds, bestows countless riches, grant us everlasting satisfaction with the wealth of the three jewels (Ratnatraya). ॥193॥
श्लोक ( Shlok ) 194
या निशातासिधारेव विघ्नवर्ग विनिघ्नती । पुष्यगन्धाम्भसां धारा सा शिवाय सदास्तु नः ॥१९४॥
जो पैनी तलवार की धार के समान विघ्नों का समूह नष्ट कर देती है ऐसी वह पवित्र सुगंधित जल की धारा सदा हम लोगों के मोक्ष के लिए हो ।।194।।
May that sacred stream of fragrant water, which, like the sharp edge of a sword, destroys all obstacles, always be for our liberation. ॥194॥
श्लोक ( Shlok ) 195
माननीया मुनीन्द्राणां जगतामेकपाचनी । साव्याद गन्धाम्बुधारास्मान् या स्म व्योमापगायते ॥१९५।
जो बड़े-बड़े मुनियों को मान्य है, जो जगत् को एकमात्र पवित्र करने वाली है और जो आकाशगंगा के समान शोभायमान है ऐसी वह सुगंधित जल की धारा हम सबकी रक्षा करे ।।195।।
May that fragrant stream of water, revered by great sages, the sole purifier of the world, and as radiant as the celestial Ganga, protect us all. ॥195॥
श्लोक ( Shlok ) 196
तनुं भगवतः प्राप्य याता यातिपवित्रिताम् । पवित्रयत्तु नः स्वान्तं धारा गन्धाम् सामसो ॥१९६।।
और जो भगवान् के शरीर को पाकर अत्यंत पवित्रता को प्राप्त हुई है ऐसी वह सुगंधित जल की धारा हम सब के मन को पवित्र करे ।।196।।
And may that fragrant stream of water, having attained supreme purity by touching the Lord’s body, sanctify our hearts. ॥196॥
श्लोक ( Shlok ) 197
कृत्वा गन्धोदकैरित्थमभिषेकं सुरोत्तमाः । जगतां शान्तये’ शान्ति घोषयामासुरुच्चकैः ।।१९७।।
इस प्रकार इंद्र सुगंधित जल से भगवान् का अभिषेक कर जगत् की शांति के लिए उच्च स्वर से शांति-मंत्र पढ़ने लगे ।।197।।
Thus, Indra, after performing the Lord’s consecration with fragrant water, began to recite the peace mantra in a loud voice for the tranquility of the world. ॥197॥
श्लोक ( Shlok ) 198
प्रचक्रुरुत्तमाङ्गेषु चक्रः सर्वाङ्गसंगतम् । स्वर्गस्योपायनं चक्रस्तद्रधाम्बुदिवौकसः ।॥१९८॥
तदनंतर देवों ने उस गंधोदक को पहले अपने मस्तकों पर लगाया, फिर सारे शरीर में लगाया और फिर बाकी बचे हुए को स्वर्ग ले जाने के लिए रख लिया ।।198।।
Thereafter, the gods first applied that fragrant consecration water to their heads, then to their entire bodies, and finally kept the remaining water to take back to heaven. ॥198॥
श्लोक ( Shlok ) 199
गन्धाम्बुस्नपनस्यान्ते जयकोलाहलैः समम् । “व्यात्युक्षीममराश्चक्रुः सचूणैर्गन्धवारिभिः ॥ १९९॥
सुगंधित जल का अभिषेक समाप्त होने पर देवों ने जय-जय शब्द के कोलाहल के साथ-साथ चूर्ण मिले हुए सुगंधित जल से परस्पर में फाग की अर्थात् वह सुगंधित जल एक-दूसरे पर डाला ।।199।।
After the fragrant water consecration was completed, the gods, amidst the uproar of victorious cheers, joyfully played by sprinkling each other with scented water mixed with fragrant powders. ॥199॥
श्लोक ( Shlok ) 200
निर्वृत्ता वभिषेकस्य कृतावभृथमज्जनाः । परीत्य परमं ज्योतिरा नर्चुर्भुवनार्चितम् ॥२००॥
इस प्रकार अभिषेक की समाप्ति होनेपर सब देवों ने स्नान किया और फिर त्रिलोकपूज्य उत्कृष्ट ज्योतिस्वरूप भगवान् की प्रदक्षिणा देकर पूजा की ।।200।।
Thus, after the completion of the consecration, all the gods bathed and then, after circumambulating the supremely radiant Lord, who is worshipped by the three worlds, they offered their reverence and worship. ॥200॥
श्लोक ( Shlok ) 201
गन्धैर्धूपैश्च दीपैश्च साक्षतैः कुसुमोदकैः । मन्त्रपूतैः फलैः सार्घैः सुरेन्द्रा विभुमीजिरें ॥२०१॥
सब इंद्रों ने मंत्रों से पवित्र हुए जल, गंध, अक्षत, पुष्प, नैवेद्य, दीप, धूप, फल और अर्घ के द्वारा भगवान् की पूजा की ।।201।।
All the Indras worshipped the Lord with water sanctified by mantras, sandalwood paste, sacred rice, flowers, offerings, lamps, incense, fruits, and oblations. ॥201॥
श्लोक 202 से 211
आदिपुराण Ādi purāṇa
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195 आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273
आदिपुराण पर्व 13 – भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन पर्व 13 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191