आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य का कहना है कि भगवन्! आत्मद्रव्य और कर्मद्रव्य का अध्यात्मयोग के बल से बन्ध नहीं होता, तो फिर किस प्रकार से उन दोनों में (आत्मा और कर्मरूप पुद्गल द्रव्यों में) परस्पर एक के प्रदेशों में दूसरे के प्रदेशों का मिल जाने रूप बन्ध होगा ? क्योंकि बन्धाभाव अर्थात् मोक्ष तो बन्धपूर्वक ही होता है। तो बन्ध का प्रतिपक्षी, सम्पूर्ण कर्मों की विमुक्तावस्था रूप मोक्ष भी जीव को कैसे बन सकेगा ? जो कि अविच्छिन्न, अविनाशी सुख का कारण होने से योगियों के द्वारा प्रार्थनीय हुआ करता है? आचार्य कहते हैं-
बध्यते मुच्यते जीव:, सममो निर्मम: क्रमात् तस्मात्सर्वप्रयत्नेन, निर्ममत्वं विचिन्तयेत् ॥26॥
अन्वयार्थ – (सममः) ममता सहित और (निर्ममः) ममता रहित (जीवः) जीव (क्रमात्) क्रम से [कर्मों से] (बध्यते) बँधता है तथा (मुच्यते) छूटता है (तस्मात्) इस कारण (सर्वप्रयत्नेन) सर्व प्रयत्न से (निर्ममत्वं) निर्ममत्व को (विचिन्तयेत्) ध्यावे।
पद्यानुवाद
इसीलिए तुम पूर्ण यत्न से, निर्ममता का मनन करो,
चिन्तन-मन्थन-आराधन भी, तथा उसी को नमन करो।
जीव कर्म से बंधता तब है, ममता से जब मण्डित हो,
बन्धन से भी मुक्त वही हो, निर्ममता में पण्डित हो ॥२६॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 26
विवेचना
संसारी जीव जब ममत्व-भाव से युक्त होता है तो बन्ध को प्राप्त होता है। वह मेरा, यह मेरा इस प्रकार का भाव ममत्व कहलाता है। मेरापन जब तक रहता है तब तक बन्ध होता है और मेरापन निकल गया तो मुक्ति होती है। आप किसमें मेरापन मानते हो ? यह शरीर मेरा, यह अंगुली मेरी, यह तर्जनी मेरी आदि-आदि। यह सब क्या है? समझ में नहीं आता। कोई-कोई कभी बोलते हैं कि नाक कट गई मेरी, क्या है यह? सब कुछ मोह है, ममत्व है। स्वयं कुद्ध हैं, दूसरों को भी क्रुद्ध मानते हैं। यह भी तो संसार का तमाशा है, कि कोई रोता है तो हम भी रोने लगते हैं। दस- बीस लोग मिल जाते हैं तो वे भी रोने लगते हैं। पूछा जाता है-भैया क्यों रो रहे हो? वे कहते हैं कि तुम रो रहे थे इसलिए मैं भी रोने लगा, तुम हमारे दोस्त हो न। यह अच्छी बात है कि आप मुझे मित्र मानते हो किन्तु मुझे तो उसने मारा था इसलिए रो रहा था। तुम किसलिए रोये ? वह पुनः कहता है कि आप हमारे दोस्त हो न, मेरा दोस्त किसी के द्वारा मारा जाये फलस्वरूप वह रोए और मैं हँसता हुआ कैसे रह सकता हूँ ? बल्कि दोस्ती तो ऐसी होती है कि “दोस्त को यदि मारा गया तो मुझे भी मारा गया” ऐसा अनुभव होना चाहिए इसलिए तुमको देखकर मैं भी रोया।
सोचने की बात है कि यदि एक व्यक्ति कुछ कह रहा है तो सारे के सारे वही कहने लग जाते हैं। एक रो रहा है तो सभी रोने लगते हैं। वह कहता है जो तुम्हारा हो गया, वही हमारा हो गया, इस प्रकार के भावों से जनता मूढ़मति हो रही है। ज्ञानी जीव कभी इनके बहकावे में नहीं आता। ज्ञानी तो अध्यात्म दृष्टि से देखता है और कहता है कि देखो! यह संसार का तमाशा है। उस तमाशा देखने वाले को तमाचा भी नहीं देता क्योंकि वह जानता है कि तमाचा दे भी देंगे तो इन्हें कोई असर हो या न हो परन्तु मेरे हाथ में तो दर्द हो ही जायेगा। उस स्थान से सब कुछ देखते हुए भी वहाँ से अपना मुख फेर लेता है क्योंकि इस प्रकार की अज्ञानमय क्रियाओं से ही तो संसार बढ़ता है। संसारी प्राणी मोह ममता के कारण अध्यात्म के रहस्य को समझ नहीं पा रहा इसलिए तो बाह्य पदार्थों से ममता का भाव रखता है। जबकि आचार्य कहते हैं कि तेरे पास कुछ है ही नहीं फिर ममत्व किसमें रखता है और क्यों रखता है? मेरा-तेरापन का भाव बहुत खतरनाक होता है। संस्कृत भाषा में इसे तव-मम, तव-मम बोलते हैं।
भरत चक्रवर्ती और बाहुबली के बीच युद्ध क्यों हो गया ? विचार किया कभी। इसी मेरा- तेरापन के कारण हुआ था। चक्रवर्ती क्षायिक सम्यग्दृष्टि थे, घर में वैरागी थे, लौकिक दृष्टि से वे निर्मम माने जाते थे, फिर भी भाई के साथ युद्ध। यह तो दयाहीनता का परिचायक था। अकेले में लड़ाई नहीं होती। एक के साथ ध्यान होता है, दो के साथ बन्ध या सम्बन्ध होता है। ध्यान हितकारक होता, बन्ध अहितकारक होता है। अतः ऐसी क्रिया करो जो स्व और पर दोनों के हित में हो।
द्वैत अर्थात् द्वन्द्व जब तक रहता है तब तक संसार रहता है, अतः अद्वैत का चिन्तन होना चाहिए। “बध्यते मुच्यते जीवाः” जीव ममता भाव से बंधते हैं और निर्ममत्व भाव से मुक्त होते हैं। अतः ममत्व को छोड़कर निर्ममत्व का चिन्तन-मनन करना चाहिए यही मुक्ति का कारण है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 26
इष्टोपदेश गाथा 26 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ (सममः) ममता भाव वाला और (निर्ममः) ममता रहित (जीवः) जीव (क्रमात्) क्रम से (कर्मों से) (बध्यते) बँधता है तथा (मुच्यते) छूटता है (तस्मात्) इस कारण (सर्वप्रयत्नेन) सर्व प्रयत्न से (निर्ममत्वं) निर्ममत्व को (विचिन्तयेत्) ध्यावे ।
भावार्थ – संसारी जीव रागद्वेष परिणामों के कारण कर्म बन्धन से बंधकर संसार में भ्रमण करता है। वह राग और द्वेष जीव को पर पदार्थों के साथ ये मेरे हैं ऐसी भावना करने से होते हैं। शरीर तथा स्त्री, पुत्र, माता, पिता आदि परिवार, धन तथा मकान आदि पदार्थों को अपना समझना ममता भाव है, इस ममता भाव के कारण अपने इष्ट पदार्थों से संसारी जीव राग करता है और किसी पदार्थ को अनिष्ट समझकर उससे द्वेष आदि करता है। इन दुर्भावों से उसके कर्म बंधते रहते हैं, जब आत्मा अपने स्वरूप को समझकर अपने आत्मा को अन्य पदार्थों से भिन्न अनुभव करने लगता है तब उसकी किसी पर पदार्थ से ममता नहीं रहती, तब वह निर्मोह भाव के कारण कर्म बन्धन से छूटकर मुक्त हो जाता है। संसार के कोई भी पदार्थ न मेरे हैं और न मैं उनका हूँ इत्यादि श्रुतभावना के द्वारा निर्ममत्व का चिंतन करना चाहिए।
उत्थानिका – यहाँ पर शिष्य कहता है कि इसमें निर्ममता कैसे होवे ? अर्थात् इसमें निर्ममता के चिन्तन करने के उपायों का प्रश्न किया गया है। अब आचार्य उसकी प्रक्रिया को “एकोऽहं निर्ममः ” से प्रारम्भ कर “मम विज्ञस्य का स्पृहा” तक के श्लोकों द्वारा बतलाते हैं –गाथा 27
स्वाध्याय गाथा सं 26 to 29
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