आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
श्लोक 92 से 101 गर्भावतरण उत्सव
रत्नवृष्टि नक्षत्र पंक्ति, बिजली समान थी। यह गर्भावतरण से 6 माह पहले से 9 माह बाद तक चली। पृथ्वी रत्नों, फूलों, सुगंधित जल से व्याप्त, गर्भिणी समान भारी हुई। वह मरुदेवी की तरह पुष्पवती थी।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
खाङ्गणे गणनातोता रत्नधारा रराज सा । विप्रकीर्णेव कालेन तरला तारकावली ॥९२॥
आकाशरूपी आंगन में वह असंख्यात रत्नों की धारा ऐसी जान पड़ती थी मानो समय पाकर फैली हुई नक्षत्रों की चंचल और चमकीली पंक्ति ही हो ।।92।।
n the vast courtyard of the sky, that countless stream of gems appeared as if it were a shimmering and restless row of stars spread out at the right moment. ||92||
श्लोक ( Shlok ) 93
विद्यदिन्द्रायुधे किंचित् जटिले सुरनायकैः । दिवो विगलिते स्यातामिस्यसौ क्षणमैक्ष्यत ॥९३॥
अथवा उस रत्न-वर्षा को देखकर क्षणभर के लिए यही उत्प्रेक्षा होती थी कि स्वर्ग से मानो परस्पर मिले हुए बिजली और इंद्रधनुष ही देवों ने नीचे गिरा दिये हों ।।93।।
Or, for a moment, upon seeing that shower of gems, it seemed as if the gods had cast down from heaven a fusion of lightning and a rainbow. ||93||
श्लोक ( Shlok ) 94
किमेषा वैद्युती दीप्तिः किमुत द्युसदाँ द्युतिः । इति व्योमचरैरैक्षि क्षणमाशङ्कय साम्बरे ॥९४॥
अथवा देव और विद्याधर उसे देखकर क्षणभर के लिए यही आशंका करते थे कि यह क्या आकाश में बिजली की कांति है अथवा देवों की प्रभा है ।।94।।
Or, upon seeing it, the gods and celestial beings momentarily wondered—was this the radiance of lightning in the sky, or the divine glow of the gods? ||94||
श्लोक ( Shlok ) 95
सैषा हिरण्मयी वृष्टिर्धनेसेम निपातिता । विभोहिरण्यगर्भत्वमिव बोधयितुं जगत् ॥९५॥
कुबेर ने जो यह हिरण्य अर्थात् सुवर्ण की वृष्टि की थी वह ऐसी मालूम होती थी मानो जगत् को भगवान् की ‘हिरण्यगर्भता’ बतलाने के लिए ही की हो [जिसके गर्भ में रहते हुए हिरण्य-सुवर्ण की वर्षा आदि हो वह हिरण्यगर्भ कहलाता है] ।।95।।
The golden shower bestowed by Kubera seemed as if it had been performed to reveal the “Hiranyagarbha” nature of the Lord to the world—one whose very essence holds within it the abundance of gold and celestial riches. ||95||
श्लोक ( Shlok ) 96
षण्मासानिति सापप्तत् पुण्ये नाभिनृपालये । स्वर्गावतरणाद् भर्तुः प्राक्तरां द्युम्न सन्ततिः ॥९६॥
इस प्रकार स्वामी वृषभदेव के स्वर्गावतरण से छह महीने पहले से लेकर अतिशय पवित्र नाभिराज के घर पर रत्न और सुवर्ण की वर्षा हुई थी ।।96।।
Thus, from six months prior to the divine descent of Lord Rishabhdev, there was a continuous shower of gems and gold at the sacred home of the noble King Nabhiraj. ||96||
श्लोक ( Shlok ) 97
पश्चाच्च नवमासेषु वसुधारा तदा मता । भहो महान् प्रभावोऽस्य तीर्थकृत्वस्य भावि नः ।।९७।।
और इस प्रकार गर्भावतरण से पीछे भी नौ महीने तक रत्न तथा सुवर्ण की वर्षा होती रही थी सो ठीक ही है क्योंकि होने वाले तीर्थंकर का आश्चर्यकारक बड़ा भारी प्रभाव होता है ।।97।।
And in this way, even after the divine conception, the shower of gems and gold continued for nine more months. This is only fitting, for the coming of a Tirthankara carries an astonishing and immense divine influence. ||97||
श्लोक ( Shlok ) 98
रत्नगर्भा धरा आता हर्षगर्भाः सुरोत्तमाः । क्षोभमा याज्जगद्रर्भो गर्भाधानोत्सबै विभोः ॥९८॥
भगवान् के गर्भावतरण-उत्सव के समय यह समस्त पृथ्वी रत्नों से व्याप्त हो गयी थी, देव हर्षित हो गये थे और समस्त लोक क्षोभ को प्राप्त हो गया था ।।98।।
At the time of the Lord’s divine conception celebration, the entire earth was filled with precious gems, the gods were overjoyed, and the entire cosmos experienced a wondrous stir. ||98||
श्लोक ( Shlok ) 99
सिक्ता जलकणैर्गाङ्गै र्मही रत्नैरलंकृता । गर्भाधाने जगद्भर्तु र्गर्भिणीवाभवद् गुरुः ॥९९॥
भगवान् के गर्भावतरण के समय यह पृथ्वी गंगा नदी के जल के कणों से सींची गयी थी तथा अनेक प्रकार के रत्नों से अलंकृत की गयी थी इसलिए वह भी किसी गर्भिणी स्त्री के समान भारी हो गयी थी ।।99।।
At the time of the Lord’s divine conception, the earth was bathed with the sacred drops of the Ganga and adorned with countless precious gems. Thus, it too seemed heavy, like a woman carrying a child. ||99||
श्लोक ( Shlok ) 100
रत्नैः कीर्णा प्रसूनैश्च सिक्ता गन्धाम्बुभिर्बभौ । तदास्नातानुलिप्तेव भूषिताङ्गी धराङ्गना ॥१००॥
उस समय रत्न और फूलों से व्याप्त तथा सुगंधित जल से सींची गयी यह पृथिवीरूपी स्त्री स्नान कर चंदन का विलेपन लगाये और आभूषणों से सुसज्जित-सी जान पड़ती थी ।।100।।
At that time, covered with gems and flowers and bathed in fragrant water, the earth appeared like a celestial woman who had just bathed, adorned herself with sandalwood paste, and decorated herself with exquisite ornaments. ||100||
श्लोक ( Shlok ) 101
सम्मत्ता नाभिराजस्य पुष्पवत्य रजस्वला । वसुन्धरा तदा भेजे जिनमातुरनुक्रियाम् ॥१०१॥
अथवा उस समय वह पृथिवी भगवान् वृषभदेव की माता मरुदेवी की सदृशता को प्राप्त हो रही थी क्योंकि मरुदेवी जिस प्रकार नाभिराज को प्रिय थी उसी प्रकार वह पृथ्वी उन्हें प्रिय थी और मरुदेवी जिस प्रकार रजस्वला न होकर पुष्पवती थी उसी प्रकार वह पृथ्वी भी रजस्वला (धूलि से युक्त) न होकर पुष्पवती (जिस पर फूल बिखरे हुए थे) थी ।।101।।
Or, at that time, the earth seemed to resemble Mother Marudevi, the mother of Lord Rishabhdev. Just as Marudevi was beloved to King Nabhiraj, the earth was dear to him as well. And just as Marudevi was not impure but adorned with flowers, the earth too was not covered in dust but was beautifully decorated with blossoms. ||101||
श्लोक 102 से 111
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91