आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-जो इस लोक सम्बन्धी फल हैं, या जो कुछ परलोक सम्बन्धी फल हैं, उन दोनों ही फलों का प्रधान कारण ध्यान ही है। मतलब यह है कि “झाणस्स ण दुल्लहं किंपि” ध्यान के लिए कुछ भी दुर्लभ नहीं है अर्थात् ध्यान से सब कुछ मिल सकता है। इस विषय में आचार्य विचार करते हुए विवेक को जागृत करने का निर्देश देते हैं-
इतश्चिन्तामणिर्दिव्य इत: पिण्याकखण्डकम् ध्यानेन चेदुभे लभ्ये क्वाद्रियन्तां विवेकिन: ॥20॥
अन्वयार्थ – (इतःदिव्यः) एक तरफ दिव्य (चिन्तामणिः) चिन्तामणि रत्न और (इतः) दूसरी तरफ (पिण्याकखण्डकम्) खली का टुकड़ा (चेत् उभे) यदि ये दोनों (ध्यानेन लभ्ये) ध्यान के द्वारा प्राप्त होते हैं तो (विवेकिनः) बुद्धिमान् मनुष्य (क्व) किसमें (आद्रियन्तां) आदर करे ?
पद्यानुवाद
एक ओर तो चिन्तामणि है, दिव्य रही, मन हरती है,
और दूसरी ओर काँच की, मणिका जग को छलती है।
ध्यान-साधना से ये दोनों, मानो भ्राता ! मिलती हैं,
आदर किसका बुधजन करते? आँखें किस पर टिकती हैं ॥२०॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 20
विवेचना
एक ओर चिन्तामणि रत्न रखा है जो मन को आकर्षित करता है और दूसरी ओर काँच की कणिका है जो जग को छलती है, क्योंकि उससे भी हीरे जैसी आभा का भान होता है। एक ओर कणिका और एक ओर दिव्यांक है। कहने का तात्पर्य यह है कि मान लीजिये ध्यान के द्वारा चिन्तामणि रत्न और काँच का टुकड़ा दोनों प्राप्त हो सकते हैं, तो उनमें से बुद्धिमान् जीव किसकी इच्छा करेगा ? ‘क्वाद्रियन्तां विवेकिनः’ आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी ने विवेकी जनों के सामने प्रश्न रखा है कि तुम्हारी क्या इच्छा होगी। यह प्रश्न इसलिए रखा है कि यदि विवेकी होगा तो चिन्तामणि रत्न प्राप्त करने की इच्छा करेगा। रत्न की ओर ध्यान नहीं जाने पर भी अपने आपको विवेकी मान रहा है तो यह उसका अज्ञान है। अज्ञानी की कोटि में रखने से उसे बुरा लगता है कि इन्होंने मुझे अज्ञानी सिद्ध किया है, लेकिन बुराई का काम करने पर बुरा कहने वालों के प्रति बुरा नहीं सोचना चाहिए। यदि सोचें कि हम अज्ञानी भी नहीं हैं और ज्ञानी भी नहीं हैं तो दोनों बातें एक साथ सिद्ध नहीं हो सकती। कोई भी जीव दोनों संज्ञाओं से रहित नहीं हो सकता क्योंकि वह या तो ज्ञानी होगा अथवा अज्ञानी होगा।
“क्वाद्रियन्तां विवेकिनः “? यह एक ऐसा प्रश्न है कि जो अपने आपको विवेकी नहीं होने पर भी विवेकी मानता है उसे तिलमिला देता है। भीतर ही भीतर ठेस पहुँच जाती है। ये कैसा व्यंग है? अज्ञान के कारण सही-सही मूल्यांकन नहीं होता है परन्तु ज्ञान के द्वारा सही-सही मूल्यांकन होता है।’खली’ का अर्थ धूर्त भी होता है और खली का अर्थ तेल निकलने के बाद शेष निस्सार भूत बची हुई वस्तु भी होता है। खल यानि दुष्ट भी होता है। अर्थ यह हुआ कि शरीर को उपकारक मानना कहाँ तक उचित है? चिन्तामणि रत्न के समान आत्मतत्त्व को छोड़कर शरीर का मूल्यांकन करना अविवेक है।
आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी ने अनेक स्थानों पर ऐसे प्रश्न रखे हैं। एक स्थान पर ‘समयसार ग्रन्थ’ में भी उपरोक्त कथन को स्पष्ट किया है कि जैसे एक व्यक्ति कपूर की खेती कर रहा है और एक व्यक्ति प्याज की खेती कर रहा है। प्याज की खेती की सुरक्षा के लिए वह कपूर के वृक्ष को काटकर बाड़ लगाता है, यह उचित है क्या? प्याज फलेगी तो एकाध हजार रुपये ही मिल पायेंगे जबकि कपूर के एक पेड़ से ही बहुत सारी कीमत मिलेगी। लेकिन कपूर के वृक्ष की कीमत जिसे ज्ञात नहीं है वह व्यक्ति प्याज की खेती की सुरक्षा कपूर के वृक्ष को काटकर करता है। यह ज्ञान है या अज्ञान बताओ ? महा अज्ञान है।
उसी प्रकार एक व्यक्ति को डोर की आवश्यकता पड़ी। इधर-उधर देखा, नहीं मिली तो उसने गले के हार को ही तोड़ दिया और भीतर जो डोर थी उसे लेकर अपना कार्य किया। बताइये यह उसकी मूर्खता है या नहीं? निश्चित ही यह उसकी मूर्खता है।
ऐसा ही एक और प्रसंग है कि एक व्यक्ति बरसात होने के कारण दल-दल में फँस गया। घुटने तक कीचड़ में फँस गया। घर पर आया सब तरफ देखा पानी नहीं मिला। एक घड़ा अमृत का रखा था उससे ही उसने पैर धो लिए। ठीक है क्या? नहीं, क्योंकि उसने अमृत की कीमत को नहीं आंका और व्यर्थ ही खर्च कर दिया।
वैसे ही एक व्यक्ति बैठा था। पास की दीवार पर एक कौआ आकर बैठ गया। काँव-काँव करने लगा। उस व्यक्ति को काँव काँव सुनना अच्छा नहीं लगा। अतः उसे उड़ाने के लिए आसपास में देखा। कंकड़-पत्थर नहीं मिले, तो उसकी अण्टी में जो हीरे की कणिका थी। उसको खोलकर फेंक दिया। कौआ उड़कर चला गया। उसका ऐसा करना ठीक है क्या ? नहीं।
इनमें से किसी एकाध व्यक्ति को तो ठीक कह दो। नहीं कह सकते, क्योंकि उक्त सभी का कार्य उचित नहीं था, किसी ने भी विवेक से कार्य नहीं किया। अंजः जिस प्रकार इन सभी के कार्य उचित नहीं हैं, उसी प्रकार हम और आप सभी के कार्य उचित नहीं हैं। यह सुनकर जो तत्त्वज्ञान रखते हैं उनको भी पसीना आए बिना नहीं रहता। इसी को बोलते हैं हृदयस्पर्शी वाणी। विवेकवान एवं विद्यावान को समयसार का एक शब्द भी कह दो तो भीतर हृदय तक पहुँच जाता है। तत्त्वज्ञान रखने वाला यदि समयसार को पढ़ लेता है तो उसे विषय कषायों से घृणा आए बिना नहीं रह सकती है। तत्त्वज्ञान होने पर भी जिसको विषय-कपायों से घृणा नहीं होती तो समझो उसका कर्मोदय अतितीव्र है, क्योंकि जब कर्म का तीव्र उदय होता है तो उसे समयसार आदि ग्रन्थों के पढ़ने से कोई मतलब सिद्ध नहीं होता। कर्मोदय की तीव्रता से उसकी बुद्धि विकृत हो जाती है। फलतः वह तत्त्वज्ञान से विमुख हो जाता है। उस समय उसे सब कुछ ज्ञात होने पर भी कुछ भी समझ में नहीं आता। जबकि तत्त्वज्ञानी तो ऐसा होता है कि एक बार भी सुन ले या पढ़ ले, तो भी पर्याप्त होता है। कहा भी है कि “समझदारों को इशारा काफी होता है।”
आप लोग भी बोलते हैं न, कि दवाई पेटभर नहीं खायी जाती। पेट भर खा ली जायेगी तो वह औषधि नहीं रहती। वह खुराक बन जायेगी। उसके द्वारा कभी भी रोग का निवारण नहीं हो सकता। उसी प्रकार आचार्य महाराज कह रहे हैं कि लगातार स्वाध्याय मात्र करते जाओ, घण्टों-घण्टों उपदेश देते चले जाओ। तभी जाकर अपने अन्तस् में ज्ञान की किरण फूटेगी, ऐसी धारणा उचित नहीं है। एक इशारे में ज्ञान की किरण फूटे और विषय कषाय छूटे, ऐसा प्रयास करना चाहिए।
आप लोग कैमरा लेकर आ जाते हैं। फोटो निकालना चाहते हैं। सामने भीड़ के हटते ही आप बटन दबा देते हैं। बटन दबा देने के बाद जब कभी फ़्लैश नहीं चलता तो पुनः बटन दबा देते हैं।। फिर फ्लैश आ जाता है। फोटो निकल आता है। ऐसा क्यों होता है? एक बार में चित्र नहीं उतरता तो दूसरी बार बटन दबा देते हैं। बटन के साथ कैमरे को ही दबा देते हैं। उसी प्रकार आप लोगों को सोचना चाहिए कि जब आपके कानों तक जिनवाणी की बात आ रही है, तो समझो एक बार बटन दबा दिया गया, फिर भी भीतर से “नो एडमीशन विदाउट परमीशन” वाली बात होती है क्योंकि सुचने वाला सोचता है कि अभी तो हम गृहस्थ अवस्था में हैं फिर कभी सुन लेंगे। हम तो दिन भर काम करते हैं अतः दिन में नहीं रात में सुन लेंगे। फिर रात में कैसे सुनेंगे? दिन भर के श्रम से थकान होने के कारण ऊँघते ऊँघते सुनेंगे। सुनते-सुनते सो जायेंगे। उसके उपरान्त फिर वही कथा, भोजन की कथा। इसमें कहो जिनवाणी माता के श्रवण की बात कैसे संभव है? कहने का मतलब यह है कि हम लोगों की परिणति ऐसी हो गई है, कि हम लोगों के ऊपर जिनवाणी का प्रभाव नहीं पड़ रहा है अतः जिनवाणी सुनने से भी कोई मतलब सिद्ध नहीं होता। भीतर से परिवर्तन लाने के लिए पुनः कैमरे का बटन दबाने की आवश्यकता होती है, तभी कार्य सिद्ध होता है।
एक ओर चिन्तामणिरत्न है तो दूसरी ओर काँच का टुकड़ा है। दोनों ध्यान के द्वारा प्राप्त हो सकते हैं, लेकिन विवेकी का क्या कर्त्तव्य है? दोनों में से किसको चाहेगा? किसका आदर करेगा? आचार्य कहते हैं- विवेकी तो हीरे का, रत्न का आदर करेगा। आत्मा हीरे के समान है, दिव्यमणि के समान है, वैसे आत्मा के लिए कोई उपमा नहीं दी जाती है क्योंकि आत्मतत्त्व अनुपम और अतुलनीय है। ऐसे आत्म तत्त्व को प्राप्त करना चाहोगे तो निश्चित रूप से कल्याण होगा अन्यथा कल्याण नहीं हो सकता।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 20
इष्टोपदेश गाथा 20 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – ( इतःदिव्य) एक तरफ दिव्य (चिन्तामणिः) चिन्तामणि रत्न और (इतः) दूसरी तरफ (पिण्याकखण्डकम् ) खली का टुकड़ा (चेत् उभे) ये दोनों यदि (ध्यानेन लभ्ये) ध्यान के द्वारा प्राप्त होते हैं तो (विवेकिनः) बुद्धिमान् मनुष्य (क्व) किसमें (आद्रियन्तां) आदर करेगा ?
भावार्थ – एक तरफ देवों से पूज्य इच्छित फल को देने वाला चिन्तामणि रत्न है और एक तरफ निस्सार निंदनीय खली का टुकड़ा है। ध्यान से यदि दोनों प्राप्त होते हैं तो विवेकी जनों को किसमें आदर करना चाहिए। किसी एक आलम्बन पर मन को केन्द्रित करना ध्यान है। ध्यान के चार भेद हैं – आर्तध्यान, रौद्रध्यान, धर्म्यध्यान, शुक्लध्यान। आर्तध्यान-आर्त शब्द का अर्थ है-पीड़ा या दुःख, अर्थात् दुःख में होने वाले ध्यान को आर्तध्यान कहते हैं। रौद्रध्यान-रौद्र शब्द का अर्थ क्रूर है। अर्थात् क्रूर परिणामों को रौद्र ध्यान कहते है। धर्म्यध्यान- पवित्र विचारों में मन को स्थिर रखना धर्म्य ध्यान है। शुक्लध्यान-मन की अत्यन्त निर्मलता होने पर जो एकाग्रता होती है वह शुक्लध्यान है। यह परिपूर्ण समाधि की स्थिति है, इसी ध्यान से आत्मानुभूति के द्वार खुलते हैं। इसमें आर्तध्यान, रौद्रध्यान से तो संसार में जनम-मरण होता रहता है, धर्म्यध्यान द्वारा कर्मों का संवर, निर्जरा तथा तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलभद्र, वासुदेव, इन्द्र, धरणेन्द्र, स्वर्ग आदि पद प्राप्त होते हैं और शुक्लध्यान द्वारा कर्मों का क्षय होकर संसार से मुक्ति मिलती है, अनन्तज्ञान, अनन्तसुख मिलता है। इसलिए बुद्धिमान् स्त्री पुरुषों को आर्तध्यान, रौद्रध्यान का त्याग करना चाहिए और धर्म्य ध्यान और शुक्लध्यान करने का प्रयत्न करना चाहिए।
उत्थानिका – अब वह शिष्य जिसे समझाये जाने से श्रद्धा उत्पन्न हो रही है, पृछता है कि जिसे आपने ध्यान करने योग्य बतलाया है वह कैसा है ? उस आत्मा का क्या स्वरूप है ? आचार्य कहते हैं – गाथा 21
स्वाध्याय गाथा सं 19 & 20
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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