भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण त्रयोदशं पर्व भगवान के जन्माभिषेक का वर्णन Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 13 में प्रस्तुत करता है, जिसमें ऋषभदेव का जन्म, देव उत्सव, मेरु यात्रा, और अभिषेक तैयारी, ऋषभदेव का अभिषेक, जलप्रवाह की शोभा, और उत्सव समापन शामिल हैं।
his section narrates the birth of Lord Rishabhdev, the celestial celebrations, and the preparations for his consecration(abhishek) on Mount Meru, the grand consecration (abhishek) of Lord Rishabhdev on Mount Meru, the celestial rituals, and the divine celebration of his birth.
श्लोक 12 से 21 देवों का आगमन
देवों के मस्तक नम्र, घरों में घंटा-शंख बजे। समुद्र लहरों सा शब्द सुन देवों ने जन्म पहचाना। सौधर्मेंद्र ऐरावत पर, सेनाएँ (हाथी, रथ आदि) निकलीं। सामानिक आदि देवों ने घेरा। जय-शब्द, नृत्य, गान से कोलाहल। विमानों से आकाश व्याप्त।
श्लोक 22 से 32 अयोध्या में उत्सव
आकाश अप्सराओं से कमलिनी सा, हाथियों से मगरमच्छ सा। सेनाएँ अयोध्या पहुँची, सैनिकों ने घेरा। इंद्राणी ने प्रसूतिगृह में मरुदेवी-जिनबालक के दर्शन किए। प्रेम से प्रदक्षिणा, स्तुति: मरुदेवी तीन लोक माता। माया से नींद देकर, मायामयी बालक रख, ऋषभदेव को उठाया।
श्लोक 33 से 41 इंद्राणी का हर्ष
इंद्राणी ने स्पर्श से तीन लोक ऐश्वर्य माना। बार-बार मुख देखा, सूँघा, नेत्र प्रफुल्लित। सूर्य सा जिनबालक लेकर शोभित। दिक्कुमारियाँ अष्ट मंगलद्रव्य लिए चलीं। भगवान की दीप्ति से दीपक मंद। इंद्राणी ने इंद्र को सौंपा। इंद्र ने स्तुति की: तीन लोक ज्योति, गुरु, स्वामी।
श्लोक 42 से 51 इंद्र की स्तुति और प्रस्थान
भगवान केवलज्ञान सूर्य, भव्य कमलों को प्रबोधक। गुरुओं के गुरु, गुण समुद्र। चरणों में मस्तक धर श्रद्धा। मुक्ति स्नेह रखती, गुण बढ़ते। इंद्र ने गोद में लिया, मेरु की ओर संकेत। जय-शब्द से दिशाएँ बहरी। अप्सराएँ नृत्य करतीं, आकाश नेत्र खोले सा।
श्लोक 52 से 62 मेरु यात्रा
बादल-पताकाएँ बगुला सा। मेघ विमानों से चूर, भौंरे मद से आकृष्ट। इंद्र कांति से सूर्य फीका। ऐरावत दाँतों पर अप्सराएँ नृत्य करतीं। किन्नर संगीत, देव नेत्र-कर्ण सफल। इंद्र ने छत्र-चमर सेवा की। सौधर्मेंद्र गोद में, ऐशानेंद्र छत्र, अन्य चमर ढोते।
श्लोक 63 से 71 मेरु का वर्णन (भाग 1)
मिथ्यादृष्टि देवों में श्रद्धा। नीली मणि सीढ़ियाँ आकाश सा। ताराएँ कुमुदिनी सा। मेरु 99,000 योजन ऊँचा। चूलिका मुकुट सा, भद्रशाल धोती सा, नंदन करधनी सा, सौमनस दुपट्टा सा, पांडुक फूलों से अलंकृत।
श्लोक 72 से 81 मेरु का वर्णन (भाग 2)
चार जिनमंदिर विमानों सा। सुवर्णमय, जंबूद्वीप मुकुट सा। अभिषेक से पवित्र, चारण मुनि सेवा करते। भोगभूमियाँ रक्षित। गुफाओं में देव-धरणेंद्र। पांडुक शिलाएँ स्फटिक सा। सौधर्मेंद्र सा तुंग, विबुध सेवित। प्रदक्षिणा देकर ऋषभदेव शिखर पर विराजित।
श्लोक 82 से 91 पांडुक शिला
ऐशान दिशा में पांडुक शिला: पवित्र, रमणीय, 100x50x8 योजन, अर्धचंद्राकार। क्षीर जल से प्रक्षालित, माता सा। मुक्ताफल सा उज्ज्वल, पुष्प छिपते। सिंहासन-आसन धारण। देव पूजा, मंगल संगीत से शोभित। अष्ट मंगलद्रव्य युक्त।
श्लोक 92 से 101 अभिषेक तैयारी
शिला शीलव्रत सा, पुण्य खान। रत्न प्रकाश से इंद्रधनुष। देव-दिक्पाल शिला घेरे। सेना पांडुक वन में व्याप्त, स्वर्ग खाली सा। सौधर्मेंद्र ने सिंहासन पर ऋषभदेव को रखा। दुंदुभि बजी, अप्सराएँ नृत्य करतीं।
श्लोक 102 से 112 अभिषेक का प्रारंभ
कालागुरु धूप से पुण्य शोभा। देवों ने अर्घ्य चढ़ाया। विशाल मंडप रचना, कल्पवृक्ष मालाएँ, भ्रमर संगीत से यश गान। सौधर्मेंद्र ने प्रथम कलश, ऐशानेंद्र ने चंदन कलश उठाया। इंद्र-इंद्राणियाँ परिचर्या में। क्षीरसागर जल लाने देव निकले, भगवान के लिए योग्य माना।
श्लोक 113 से 122 कलश और जलधारा
8 योजन गहरे सुवर्ण कलशों से अभिषेक। कलश पाप नाशक, मोतियों से शोभित। इंद्र ने बहु-भुजाएँ बनाई, कल्पवृक्ष सा शोभित। सौधर्मेंद्र ने पहली जलधारा छोड़ी, कोलाहल। जलधारा आकाशगंगा सा, अन्य इंद्रों ने एक साथ जल छोड़ा, भगवान स्थिर रहे।
श्लोक 123 से 131 जल की शोभा
जल बूँदें उछलकर पापरहित सी। दिशाओं में छींटे, कर्णफूल सा। भगवान पर प्रतिबिंबित धारा भाग्यशाली सी। क्षीर जल झरना सा, स्वर्ग को पवित्र करता। भगवान ने जल, संसार को पवित्र किया। सेना क्षीरसागर में डूबी सी।
श्लोक 132 से 141 जल का प्रभाव
कमलों संग जल मेरु पर बहस सा। अशोक पल्लवों से मूँगा सा। स्फटिक सिंहासन पर स्वच्छतर। रत्न किरणों से इंद्रधनुष सा, पद्मराग से संध्या बादल सा, इंद्रनील से अंधकार सा, मरकत से हरा वस्त्र सा। आकाश हँसता सा, बूँदें स्वर्ग से फाग खेलतीं।
श्लोक 142 से 151 मेरु पर जलप्रवाह
जलप्रवाह मेरु को नापता सा, शिखरों से खकारा, गुफाओं से उगला। झरनों से स्वर्ग को धिक्कार। आकाश, ज्योतिष, पृथ्वी ढका। वनों में विश्राम, फिर फैला। वृक्षों से रुककर शीघ्र विस्तृत। मेरु को सफेद वस्त्र सा ढका, आकाशगंगा सा, शब्दाद्वैत सिद्ध करता सा।
श्लोक 152 से 161 मेरु की नव शोभा
मेरु जल से अपरिचित सा, मृणाल सा सफेद, चाँदी पर्वत सा। अमृत, स्फटिक, लक्ष्मी महल संदेह। बूँदें छत्र सा, हार-कमल सा यश प्रवाह। कर्णफूल सा, स्वर्ग तक फैला। तारे मोती सा, ओले सा।
श्लोक 162 से 171 ज्योतिष पर प्रभाव
सूर्य ठंडा, लोह गोला सा। चंद्र हंस सा तैरता। ग्रह वक्रगति में। सूर्य को चंद्र समझ तारे सेवा करते। ज्योतिश्चक्र कांतिरहित, चक्कर सा। जलप्रवाह ने मनुष्यलोक पवित्र किया, प्रजा कल्याणमय। शांत जल दिशाएँ भरा।
श्लोक 172 से 181 उत्सव का समापन
मेरु गुफाएँ रिक्त, विश्राम। धूप, दीपक प्रज्वलित। बंदीजन स्तोत्र, किन्नरी गीत। मंगल गान से कान उत्सव। नृत्य, संगीत, मृदंग ध्वनि। अप्सराएँ केसर-हार संग नृत्य। जय-घोष से मेरु स्तुति सा।
श्लोक 182 से 191 सुगंधित जल अभिषेक
वायु स्वेद चुंबन करता। द्वारपाल सभा नियंत्रित करते। सुगंधित जल से अभिषेक, धारा लज्जित सी। सुवर्ण झारी से नमस्कार सा, प्रभा से अग्नि आहुति सा। भगवान गुणों से धारा चरितार्थ।
श्लोक 192 से 201 सुगंधित जल की महिमा
श्वेत धारा रत्नत्रय संतुष्ट करे, विघ्न नाशक, मुनियों को मान्य। शांति-मंत्र पाठ। देवों ने गंधोदक लगाया, स्वर्ग ले गए। चूर्ण जल से फाग। प्रदक्षिणा, पूजा (जल, गंध, अक्षत आदि) से अमंगल नाश।
श्लोक 202 से 211 अभिषेक समापन
इंद्र-इंद्राणी ने प्रदक्षिणा, नमस्कार। फूल-अश्रु वर्षा। वायु पराग बरसाता। भगवान मेरु सा, देव कुलाचल सा। पवनकुमार भक्ति, मेघकुमार जलवृष्टि। वायु प्रदक्षिणा सा। दुंदुभि से कल्याण घोषणा।
श्लोक 212 से 216 अंतिम स्तुति
फूल वर्षा भ्रमर खींचती, लक्ष्मी नेत्र सा। देवांगनाएँ नृत्य, इंद्र-धरणेंद्र अभिषेक। वृषभनाथ जयवंत हों। सूर्य उष्णता छोड़े, चंद्र शीतल, तारे क्रीड़ा करते। जलप्रवाह सबकी रक्षा करे।
English translation of Ādi purāṇa parv 13 – Shlok 1 to 11
ऋषभदेव का जन्म
मरुदेवी ने 9 माह बाद चैत्र कृष्ण नवमी, सूर्योदय, उत्तराषाढ़ नक्षत्र में ऋषभदेव को जन्म दिया। वह तीन ज्ञानों से युक्त, गुणों में वृद्ध, तीन लोक स्वामी बालक था। दिशाएँ स्वच्छ, प्रजा हर्षित, देव आश्चर्यचकित। कल्पवृक्ष फूल बरसाते, दुंदुभि बिना बजाये बजी, पृथ्वी-समुद्र आनंदित। इंद्र ने सिंहासन कंपन से जन्म जाना, अभिषेक का विचार किया।
श्लोक ( Shlok ) 1
अथातो नवमासानामत्यये सुषुवे विभुम् । देवी देवीभिरुक्ताभिर्यथास्वं परिवारिता ॥१॥
अथानंतर, ऊपर कही हुई श्री, ह्री आदि देवियाँ जिसकी सेवा करने के लिए सदा समीप में विद्यमान रहती हैं ऐसी माता मरुदेवी ने नव महीने व्यतीत होने पर भगवान् वृषभदेव को उत्पन्न किया ।।1।।
Thereafter, the revered Mother Marudevi, who was constantly attended by goddesses such as Shri, Hri, and others for her service, gave birth to Lord Rishabhadeva after nine months. ॥1॥
श्लोक ( Shlok ) 2 – 3
प्राचीव’ बन्धुमब्जानां सा लेभे भास्वरं सुतम् । चैत्र मास्यसिते पक्षे नवम्यामुदये रवेः ॥२॥
विश्वे ब्रह्ममहायोगे जगतामेकवल्लभम् । भासमानं त्रिभिर्बोधेः शिशुमप्यशिशुं गुणैः ॥३॥
जिस प्रकार प्रातःकाल के समय पूर्व दिशा कमलों को विकसित करने वाले प्रकाशमान सूर्य को प्राप्त करती है उसी प्रकार मरुदेवी ने भी चैत्र कृष्ण नवमी के दिन सूर्योदय के समय उत्तराषाढ़ नक्षत्र और ब्रह्म नामक महायोग में मति, श्रुत और अवधि इन तीन ज्ञानों से शोभायमान, बालक होने पर भी गुणों से वृद्ध तथा तीनों लोकों के एक मात्र स्वामी दैदीप्यमान पुत्र को प्राप्त किया ।।2-3।।
श्लोक ( Shlok ) 4
त्रिबोधकिरणोद्भासिबालार्कोऽसौ स्फुरद्युतिः । नाभिराजोदयादिन्द्रादुदितो विबभौ विभुः ॥४॥
तीन ज्ञानरूपी किरणों से शोभायमान, अतिशय कांति का धारक और नाभिराजरूपी उदयाचल से उदय को प्राप्त हुआ वह बालकरूपी सूर्य बहुत ही शोभायमान होता था ।।4।।
Radiant with three knowledge-like rays, possessing immense brilliance, and having risen from King Nabhi, like the sun emerging from the eastern mountain, that child-like sun shone magnificently. ॥4॥
श्लोक ( Shlok ) 5
दिशः प्रसत्तिमासेदु रासीन्निर्मलमम्बरम् । गुणानामस्य वैमल्यमनुकर्तुमिव प्रभोः ॥५॥
उस समय समस्त दिशाएँ स्वच्छता को प्राप्त हुई थीं और आकाश निर्मल हो गया था । ऐसा मालूम होता था मानो भगवान् के गुणों की निर्मलता का अनुकरण करने के लिए ही दिशा और आकाश स्वच्छता को प्राप्त हुए हों ।।5।।
At that time, all directions became pure, and the sky turned clear. It seemed as if the directions and the sky had attained purity only to emulate the divine virtues of the Lord. ॥5॥
श्लोक ( Shlok ) 6
प्रजानां ववृधे हर्षः सुरा विस्मयमाश्रयन् । अम्लानिकुसुमान्युच्चैर्मुमुचुः सुरभूरुहाः ॥ ६॥
उस समय प्रजा का हर्ष बढ़ रहा था, देव आश्चर्य को प्राप्त हो रहे थे और कल्पवृक्ष ऊँचें से प्रफुल्लित फूल बरसा रहे थे ।।6।।
At that time, the joy of the people was increasing, the gods were filled with wonder, and the celestial Kalpavriksha trees were showering fragrant blossoms from above. ॥6॥
श्लोक ( Shlok ) 7
अनाहताः पृथुध्वाना दध्वनुर्दिविजानकाः । मृदुः सुगन्धिः शिशिरो मरुन्मन्दं तदा ववौ ॥७॥
देवों के दुंदुभि बाजे बिना बजाये ही ऊँचा शब्द करते हुए बज रहे थे और कोमल, शीतल तथा सुगंधित वायु धीरे-धीरे बह रहा था ।।7।।
The divine drums (dundubhis) resounded loudly on their own, without being played, while a gentle, cool, and fragrant breeze flowed softly. ॥7॥
श्लोक ( Shlok ) 8
प्रचचाल मही तोषात् नृत्यन्तीव चलदगिरिः । उद्वेलो जलधिर्नूनमगमत् प्रमदं परम् ॥८॥
उस समय पहाड़ों को हिलाती हुई पृथिवी भी हिलने लगी थी मानो संतोष से नृत्य ही कर रही हो और समुद्र भी लहरा रहा था मानो परम आनंद को प्राप्त हुआ ।।8।।
At that time, the earth began to tremble, shaking the mountains as if dancing with joy, and the ocean surged with waves as if overwhelmed with supreme bliss. ॥8॥
श्लोक ( Shlok ) 9
ततोऽबुद्ध सुराधीशः सिंहासनविकम्पनात्। प्रयुक्तावधिरुदभूतिं जिनस्य विजितैनसः ॥९॥
तदनंतर सिंहासन कंपायमान होने से अवधिज्ञान जोड़कर इंद्र ने जान लिया कि समस्त पापों को जीतने वाले जिनेंद्रदेव का जन्म हुआ ।।9।।
Thereafter, as his throne trembled, Indra, using his Avadhi Jnana (clairvoyant knowledge), realized that Lord Jinendra, the conqueror of all sins, had been born. ॥9॥
श्लोक ( Shlok ) 10
ततो अन्माभिषेकाय मतिं चक्रे शतक्रतुः । तीर्थकृद्भा विभव्याब्जबन्धौ तस्मिन्नुदेयुषि ॥१०॥
आगामी काल में उत्पन्न होने वाले भव्य जीवरूपी कमलों को विकसित करने वाले श्री तीर्थंकररूपी सूर्य के उदित होते ही इंद्र ने उनका जन्माभिषेक करने का विचार किया ।।10।।
As soon as the sun-like Tirthankara, who would one day enlighten the noble souls like blooming lotuses, took birth, Indra decided to perform his ceremonial birth anointment. ॥10॥
श्लोक ( Shlok ) 11
तदासनानि देवानामकस्मात् प्रचकम्पिरे । देवानुच्चासनेभ्योऽधः पातयन्तीव संभ्रमात् ॥११॥
उस समय अकस्मात् सब देवों के आसन कंपित होने लगे थे और ऐसे मालूम होते थे मानो उन देवों को बड़े संभ्रम के साथ ऊँचे सिंहासनों से नीचे ही उतार रहे हों ।।11।।
At that moment, all the thrones of the gods suddenly began to tremble, as if they were being forcefully pulled down from their lofty seats in great astonishment. ॥11॥
श्लोक 12 से 21
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 311 श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 257 श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 195 श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 273