आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 202
यथेष्टगतिका पुष्टा मृदुस्वादुतृणाङ्कुरैः । गीतासंगा न्मृतिं यान्ति ‘मृगयोमृगयोषितः ॥२०२॥
इसी प्रकार जो हरिणियाँ जंगल में अपने इच्छानुसार जहाँ-तहाँ घूमती हैं तथा कोमल और स्वादिष्ट तृण के अंकुर चरकर पुष्ट रहती हैं वे भी शिकारी के गीतों में आसक्त होने से मृत्यु को प्राप्त हो जाती हैं ।।202।।
“Similarly, the deer, which roam freely in the forest and thrive on tender and delicious sprouts, meet their end, enchanted by the hunter’s melodies.”
श्लोक ( Shlok ) 203
इत्येकशो ऽपि विषये बह्वपायो निषेवितः । किं पुनर्विषयाः पुंसां सामत्स्त्येन निषेविताः ॥२०३॥
इस प्रकार जब सेवन किया हुआ एक-एक इंद्रिय का विषय अनेक दुःखों से भरा हुआ है तब फिर समस्त रूप से सेवन किये हुए पाँचों ही इंद्रियों के विषयों का क्या कहना ? ।।203।।
“In this way, when the indulgence in even a single sense object is filled with numerous sufferings, then what can be said about the complete indulgence in all five sense objects?”
श्लोक ( Shlok ) 204
हृतोऽयं विषयैर्जन्तुः स्त्रोतोभिः सरितामिव । श्वभ्रे पतित्वा गम्भीरे दुःखावर्त्तेषु सीदति ॥ २०४॥
जिस प्रकार नदियों के प्रवाह से खींचा हुआ पदार्थ किसी गहरे गड्ढे में पढ़कर उसकी भँवरों में फिरा करता है उसी प्रकार इंद्रियों के विषयों से खींचा हुआ यह जंतु नरकरूपी गहरे गड्ढे में पड़कर दुःखरूपी भँवरों में फिरा करता है और दुःखी होता रहता है ।।204।।
“Just as an object carried away by the flow of rivers falls into a deep pit and is trapped in its whirlpools, similarly, a being drawn by the allure of sensory pleasures falls into the deep pit of hell and is trapped in the whirlpools of suffering, constantly experiencing misery.”
श्लोक ( Shlok ) 205 – 206
विषयैर्विप्रलब्धोऽयम धीरतिधनायति । धनायामासितो जन्तुः क्लेशानाप्नोति दुस्सहान् ॥२०५॥
क्लिष्टोऽसौ मुहुरार्त्तः स्यादिष्टालाभे शुचं गतः । तस्य लाभेऽप्यसंतुष्टो दुःखमेवानुधावति ॥२०६॥
विषयों से ठगा हुआ यह मूर्ख जंतु पहले तो अधिक धन की इच्छा करता है और उस धन के लिए प्रयत्न करते समय दुःखी होकर अनेक बखेड़ों को प्राप्त होता है । उस समय क्लिष्ट होने से यह भारी दुःखी होता है । यदि कदाचित् मनचाही वस्तुओं की प्राप्ति नहीं हुई तो शोक को प्राप्त होता है । और यदि मनचाही वस्तु की प्राप्ति भी हो गयी तो उतने से संतुष्ट नहीं होता जिससे फिर भी उसी दुःख के लिए दौड़ता है ।।205-206।।
“Deceived by sensory pleasures, this foolish being first desires more wealth and, in striving for it, suffers greatly, entangled in countless troubles. In that state of distress, he is deeply tormented. If he fails to obtain his desired objects, he falls into sorrow. And even if he does attain them, he is not satisfied, which compels him to continue running after the same suffering endlessly.”
श्लोक ( Shlok ) 207
ततस्तद्रागतद्द्वेषदूषितात्मा जडाशयः । कर्म बध्नाति दुर्मोचं येनामुत्रावसीदति ॥२०७॥
इस प्रकार यह जीव राग-द्वेष से अपनी आत्मा को दूषित कर ऐसे कर्मों का बंध करता है जो बड़ी कठिनाई से छूटते हैं और जिस कर्मजन्य के कारण यह जीव परलोक में अत्यंत दुःखी होता है ।।207।।
“In this way, this being defiles its soul with attachment and aversion, binding itself to karmas that are extremely difficult to shed. Due to these karmically induced consequences, the being suffers immensely in the afterlife.”
श्लोक ( Shlok ) 208
कर्मणानेन दौः स्थित्यं दुर्गतावनुसंश्रितः । दुःखासिकामवाप्नोति महतीमतिगर्हिताम् ॥२०८॥
इस कर्मबंध के कारण ही यह जीव नरकादि दुर्गतियों में दुःखमय स्थिति को प्राप्त होता है और वहाँ चिरकाल तक अतिशय निंदनीय बड़े-बड़े दुःख पाता रहता है ।।208।।
“Due to this bondage of karma, this being attains a sorrowful state in hell and other lower realms, where it endures extremely condemnable and immense suffering for a long time.”
श्लोक ( Shlok ) 209 – 210
विषयानीहते दुःखी तत्प्राप्तावतिगृद्धिमान् । ततोऽतिदुरनुष्ठानैः कर्म बध्नात्यशर्मदम् ॥२०९॥
इति भूयोऽपि तेनैव चक्रक्रेण परिभ्रमन् । संसारापारदुर्वार्द्धौ पतत्यत्यन्तदुस्तरे ॥२१०॥
वहाँ दुःखी होकर यह जीव फिर भी विषयों की इच्छा करता है और उनके प्राप्त होने में तीव्र लालसा रखता हुआ अनेक दुष्कर्म करता है जिससे दुःख देने वाले कर्मों का फिर भी बंध करता है । इस प्रकार दुःखी होकर फिर भी विषयों की इच्छा करता है, उसके लिए दुष्कर्म करता है, खोटे कर्मों का बंध करता है और उनके उदय से दुःख भोगता है । इस प्रकार चक्रक रूप से परिभ्रमण करता हुआ जीव अत्यंत दुःख से तैरने योग्य संसाररूपी अपार समुद्र में पड़ता है ।।209-210।।
“There, despite suffering, the being still desires sensual pleasures and, with intense longing for them, commits many sinful deeds, thereby binding more painful karmas. In this way, it continues to crave pleasures, engages in wrongful actions, binds negative karmas, and suffers their consequences. Thus, caught in an endless cycle, the being wanders in the vast ocean of existence, drowning in immense suffering.”
श्लोक ( Shlok ) 211
तस्माद् विषयजामेनां मत्वानर्थपरम्पराम् । विषयेषु रतिस्त्याज्या तीव्रदुःखानुबन्धिपु॥२११॥
इसलिए इस समस्त अनर्थ-परंपरा को विषयों से उत्पन्न हुआ मानकर तीव्र दुःख देने वाले विषयों में प्रीति का परित्याग कर देना चाहिए ।।211।।
“Therefore, recognizing this entire chain of misfortune as arising from sensual pleasures, one should renounce attachment to these intensely painful pleasures.”
श्लोक 212 से 221
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201