भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11
श्लोक 12 से 21 वज्रनाभि और अन्यों का जन्म
मतिवर सुबाहु, आनंद महाबाहु, अकंपन पीठ, धनमित्र महापीठ बने। केशव धनदेव हुआ। वज्रनाभि का यौवन सुवर्ण समान चमका। उसका शिर बादलों से ढके पर्वत, मुख कमल, नाक सीमा रेखा समान था।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 12 – 13
सुबाहुरहमिन्द्रोऽभूद् यः प्राग्मतिवरः कृती । आनन्दश्च महाबाहुः पीठाह्वोऽ भूदकम्पनः ॥१२॥
महापीठोऽभवत् सोऽपि धनमित्रचरः सुरः । संस्कारैः प्राक्तनैरेव घटनैकत्र देहिनाम् ॥१३॥
जो पहले (वज्रजंघ के समय में) मतिवर नाम का बुद्धिमान् मंत्री था वह अधोग्रैवेयक से च्युत होकर उनके सुबाहु नाम का पुत्र हुआ । आनंद पुरोहित का जीव महाबाहु नाम का पुत्र हुआ । सेनापति अकंपन का जीव पीठ नाम का पुत्र हुआ और धनमित्र सेठ का जीव महापीठ नाम का पुत्र हुआ । सो ठीक ही है, जीव पूर्वभव के संस्कारों से ही एक जगह इकट्ठे होते हैं ।।12-13।।
“The wise minister Mativar from the time of Vajrajangha was reborn as their son Subahu after falling from Adhograiveyaka. The soul of Ananda, the royal priest, was reborn as Mahabahu. The soul of General Akampana became their son Peetha, and the soul of the wealthy merchant Dhanamitra was reborn as Mahapeetha. This is only natural, as souls are drawn together by the impressions of their past lives.”
श्लोक ( Shlok ) 14
नगर्या केशवोऽत्रैव धनदेवाह्वयोऽभवत् । कुबेरदत्तवणिजोऽनन्तमत्याश्च नन्दनः ॥१४॥
श्रीमती का जीव केशव, जो कि अच्युत स्वर्ग में प्रतींद्र हुआ था वह भी वहाँ से च्युत होकर इसी नगरी में कुबेरदत्त वणिक् के उसकी स्त्री अनंतमती से धनदेव नाम का पुत्र हुआ ।।14।।
“The soul of Shrimati, who was Keshava and had attained the position of Pratindra in Achyuta heaven, also fell from there and was reborn in the same city as Dhanadeva, the son of the merchant Kuberdatta and his wife Anantamati.”
श्लोक ( Shlok ) 15
बञ्जनाभिरभापूर्णयौवनो रुरुचे भृशम् । बालार्क इव निष्टप्तचामीकरसमद्युतिः ॥१५॥
अथानंतर जब वज्रनाभि पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त हुआ तब उसका शरीर तपाये हुए सुवर्ण के समान अतिशय दैदीप्यमान हो उठा और इसीलिए वह प्रातःकाल के सूर्य के समान बड़ा ही सुशोभित होने लगा ।।15।।
“Thereafter, when Vajranabhi reached the full bloom of youth, his body shone with an extraordinary radiance, resembling molten gold. Because of this, he appeared as resplendent as the morning sun.”
श्लोक ( Shlok ) 16
विनीलकुटिलैः केशैः शिरोऽस्य रुचिमानशे । प्रावृषेण्याम्बुदच्छन्नमिव श्रृङ् गं महीभृतः ॥१६॥
अत्यंत काले और टेढ़े बालों से उसका शिर ऐसा सुशोभित होता था जैसा कि वर्षा ऋतु के बादलों से ढका हुआ पर्वत का शिखर ।।16।।
“His head, adorned with extremely dark and curly hair, appeared as magnificent as a mountain peak covered with rain clouds.”
श्लोक ( Shlok ) 17
कुण्डलार्कंकरस्पृष्टगण्डपर्यन्तशोभिना । स बभासे मुखाब्जेन पद्माकर इवोन्मिषन् ॥१७॥
कुंडलरूपी सूर्य की किरणों के स्पर्श से जिसके कपोलों का पर्यंत भाग शोभायमान हो रहा है ऐसे मुखरूपी कमल से वह वज्रनाभि फूले हुए कमलों से सुशोभित किसी सरोवर के समान शोभायमान हो रहा था ।।17।।
“Vajranabhi, with his lotus-like face illuminated by the touch of the sun-like earrings on his cheeks, appeared as radiant as a lake adorned with blooming lotuses.”
श्लोक ( Shlok ) 18
ललाटाद्रितटे तस्य भ्रूलते रेजतुस्तराम् । नेत्रांशुपुष्पमञ्जर्या मधुपायिततारया ॥१८॥
उसके ललाटरूपी पर्वत के तट पर दोनों भौंहरूपी लताएँ नेत्रों की किरणोंरूपी पुष्पमंजरियों और तारेरूप भ्रमरों से बहुत ही अधिक शोभायमान हो रही थीं ।।18।।
“On the slopes of his forehead-like mountain, his eyebrow-like vines, adorned with the flower clusters of his eye’s radiant beams and bee-like stars, appeared exceedingly beautiful.”
श्लोक ( Shlok ) 19
कामिनीनेत्रभृङ्गास्लिमाकर्षन् मुखपङ्कजम् । स्वामोद्माविरस्याभूत् स्मित केशरनिर्गमम् ॥१९॥
उसका मुख श्वासोच्छ्वास की सुगंधि से सहित था, मुसकानरूपी केशर से युक्त था और स्त्रियों के नेत्ररूपी भ्रमरों का आकर्षण करता था इसलिए ठीक कमल के समान जान पड़ता था ।।19।।
“His face, fragrant with the scent of his breath, adorned with the saffron of his smile, and attracting the bee-like eyes of women, truly resembled a lotus.”
श्लोक ( Shlok ) 20
कान्त्यासवमिवापातुमापतन्त्यतृपत्तराम् । जनतानेत्रभृङ्गाली तन्मुखाब्जे विकासिनि ॥२०॥
सदा विकसित रहने वाले उसके मुख-कमल पर जनसमूह के नेत्ररूपी भ्रमरों की पंक्ति मानो कांतिरूपी आसव को पीने के लिए ही सब ओर से आकर झपटती थी और उसका पान कर अत्यंत तृप्त होती थी ।।20।।
“On his ever-blooming lotus-like face, the swarm of bee-like eyes of the people seemed to rush from all directions as if to drink the nectar of his radiance, becoming utterly satisfied by its essence.”
श्लोक ( Shlok ) 21
नासिकास्य रुचि दध्रे नेत्रयोर्मध्यवर्त्तिनी । सीमेव रचिता धात्रा तयोः क्षेत्रानतिक्रमे ॥२१॥
दोनों नेत्रों के मध्यभाग में रहने वाली उसकी नाक ऐसी मालूम होती थी मानो अपने-अपने क्षेत्र का उल्लंघन न करने के लिए ब्रह्मा ने उनके बीच में सीमा ही बना दी हो ।।21।।
“His nose, situated between his two eyes, appeared as if Brahma himself had created it as a boundary to prevent them from encroaching upon each other’s domain.”
श्लोक 22 से 31
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11