आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 |
श्लोक 172 से 181 देवियों की परिचर्या
देवियाँ रेशमी वस्त्र, मालाएँ, सुगंधित विलेपन, तलवार से रक्षा, पराग झाड़ना, चंदन सींचना, रंगावली बनाना, फूल चढ़ाना, दिव्य प्रभाव से सेवा करती थीं। अदृश्य होकर माला-आहार देतीं, आकाश से रक्षा का आह्वान करतीं।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
काचिदा भरणान्यस्यै ददती मृदुपाणिना । विबभो कल्पवल्लीव शाखाग्रोद्भिन्न भूषणाः ।।१७२।।
कोई देवी अपने कोमल हाथ से माता के लिए आभूषण दे रही थी जिससे वह ऐसी शोभायमान हो रही थी मानो जिसकी शाखा के अग्रभाग पर आभूषण प्रकट हुए हों ऐसी कल्पलता ही हो ।।172।।
One goddess, with her delicate hands, was offering jewelry to the queen, making her shine so brilliantly that she appeared like a Kalpavriksha (wish-fulfilling tree) whose branches bore jewelry at their tips. ||172||
श्लोक ( Shlok ) 173
वासः क्षौमं स्त्रजो दिव्याः सुमनोमञ्जरीरपि । तस्यै समर्पयामासुः काश्चित् कल्पलता इव ॥१७३।
मरुदेवी के लिए कोई देवियां कल्पलता के समान रेशमी वस्त्र दे रही थीं, कोई दिव्य मालाएँ दे रही थी ।।173।।
Some of the goddesses were offering silken garments to Queen Marudevi, resembling the Kalpavriksha, while others were giving her divine garlands. ||173||
श्लोक ( Shlok ) 174
काचित् “सौगन्धिकाहूतद्विरेफैरनुलेपनैः । स्वकरस्थैः कृतामोदाद् गन्धैर्युक्तिरिवारुचत् ।।१७४।।
कोई देवी अपने हाथ पर रखे हुए सुगंधित द्रव्यों के विलेपन से मरुदेवी के शरीर को सुवासित कर रही थी । विलेपन की सुगंधि के कारण उस देवी के हाथ पर अनेक भौंरे आकर गुंजार करते थे जिससे वह ऐसी मालूम होती थी मानो सुगंधित द्रव्यों की उत्पत्ति आदि का वर्णन करने वाले गंधशास्त्र की युक्ति ही हो ।।174।।
One goddess was anointing Queen Marudevi’s body with fragrant substances she held in her hand. Due to the sweet fragrance of the mixture, numerous bees began buzzing around her hand, making her appear as though she embodied the principles of the Gandhashastra (science of fragrances) that describes the origin and properties of aromatic substances. ||174||
श्लोक ( Shlok ) 175
अङ्गरक्षाविधौ काश्चिदुत्खातासिलता बभुः । सरस्व इव वित्रस्तपाठीनाः सुरयोषितः ॥१७५॥
माता की अंग-रक्षा के लिए हाथ में नंगी तलवार-धारण किये हुई कितनी ही देवियां ऐसी शोभायमान होती थीं मानो जिनमें मछलियां चल रही हैं ऐसी सरसी (तलैया) ही हो ।।175।।
Several goddesses, holding naked swords in their hands to protect the queen, were so resplendent that they appeared as if they were Sarsi (fish-filled ponds), with fish swimming within them. ||175||
श्लोक ( Shlok ) 176
संममार्जुर्महीं काश्चिदाकीर्णा पुष्परेणुभिः । तद्गन्धासङ्गिनो भृङ्गानाधुनानाः स्वनांशुकैः ॥१७६॥
कितनी ही देवियाँ पुष्प की पराग से भरी हुई राजमहल की भूमि को बुहार रही थीं और उस पराग की सुगंध से आकर इकट्ठे हुए भौंरों को अपने स्तन ढकने के वस्तु से उड़ाती भी जाती थीं ।।176।।
Many goddesses were sweeping the royal palace grounds, filled with the pollen of flowers. The fragrance of the pollen attracted bees, and the goddesses would gently drive them away with the cloth they used to cover their breasts. ||176||
श्लोक ( Shlok ) 177
कुर्वन्ति स्मापराः सान्द्रचन्दनच्छटयोक्षिताम् । क्षितिमार्द्राशुकैरन्याः निर्ममार्जुरतन्द्रिताः ॥१७७॥
कितनी ही देवियाँ आलस्यरहित होकर पृथिवी को गीले कपड़े से साफ कर रही थीं और कितनी ही देवियाँ घिसे हुए गाई चंदन से पृथिवी को सींच रही थीं ।।177।।
Many goddesses, free from any laziness, were cleaning the earth with wet cloths, while others were sprinkling the earth with ground cow sandalwood paste. ||177||
श्लोक ( Shlok ) 178
कुर्वते वलिविन्यासं रत्नचूर्णैः पुरोऽपराः । पुष्पैरुपहन्त्यन्यास्ततामोदैर्द्युशाखिनाम् ॥१७८॥
कोई देवियाँ माता के आगे रत्नों के चूर्ण से रंगावली का विन्यास करती थीं―रंग-बिरंगे चौक पूरती थीं, बैल-बूटा खींचती थीं और कोई सुगंधि फैलाने वाले, कल्पवृक्षों के फूलों से माता की पूजा करती थीं―उन्हें फूलों का उपहार देती थीं ।।178।।
Some goddesses were arranging a decorative design with powdered gems in front of the queen, filling the space with colorful patterns, drawing motifs of bulls, and others were offering flowers from Kalpavriksha (wish-fulfilling trees), spreading fragrance, and worshiping the queen by presenting floral tributes. ||178||
श्लोक ( Shlok ) 179
काश्चिद्दर्शितदिव्यानुभावाः प्रच्छन्नविग्रहाः । नियोगैरुचितैरेनामनारतमुपाचरन् ॥१७९॥
कितनी ही देवियां अपना शरीर छिपाकर दिव्य प्रभाव दिखलाती हुई योग्य सेवाओं के द्वारा निरंतर माता की शुश्रूषा करती थीं ।।179।।
Many goddesses, concealing their bodies and displaying divine power, continuously served the queen with appropriate duties and care. ||179||
श्लोक ( Shlok ) 180
प्रभातरलितां काश्चिद् दधानास्तनुयष्टिकाम् । सौदामिन्य इवानिन्युरुचितं रुचितं च यत् ॥ १८०॥
बिजली के समान प्रभा से चमकते हुए शरीर को धारण करने वाली कितनी ही देवियाँ माता के योग्य और अच्छे लगने वाले पदार्थ लाकर उपस्थित करती थीं ।।180।।
Many goddesses, their bodies shining with a brilliance like lightning, would bring and present materials that were fitting and pleasing for the queen. ||180||
श्लोक ( Shlok ) 181
काश्चिदन्तर्हिता देव्यो देव्यै दिव्यानुभावतः । स्त्रजमंशुकमाहारं भूषां चास्थै समर्पयन् ॥१८१॥
कितनी ही देवियाँ अंतर्हित होकर अपने दिव्य प्रभाव से माता के लिए माला, वस्त्र, आहार और आभूषण आदि देती थीं ।।181।।
Many goddesses, hidden from view but using their divine powers, would offer garlands, garments, food, jewelry, and other items to the queen. ||181||
श्लोक 182 से 191
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257 आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221
आदिपुराण पर्व 12 – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन पर्व 12 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 |