भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122
श्लोक 123 से 131 सुविधि का रूप वर्णन (भाग 1)
सुविधि बाल्य से धर्मज्ञ था। उसका मुख सूर्य-चंद्र-तारों या कमल समान था। नाक लंबी, गला हार से शोभित, वक्ष रत्नों से चमकता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 123 to 131
श्लोक ( Shlok ) 123
बाल्यात् प्रभृति सर्वासां कलानां सोऽभवन्निधिः । शशीव जगत स्तन्वन्नन्व हं नयनोत्सवम् ॥१२३॥
वह सुविधि बाल्यावस्था से ही चंद्रमा के समान समस्त कला का भंडार था और प्रतिदिन लोगों के नेत्रों का आनंद बढ़ाता रहता था ।।123।।
“From childhood, Suvidhi was a reservoir of all virtues, akin to the moon with its complete phases, and he continually brought joy to the eyes of those who beheld him.”
श्लोक ( Shlok ) 124
स बाल्य एव सद्धर्ममबुद्ध प्रतिबुद्धधीः । प्रायेणात्मवतां चित्तमात्मश्रेयसि रज्यंते ॥१२४॥
उस बुद्धिमान् सुविधि ने बाल्य अवस्था में ही समीचीन धर्म का स्वरूप समझ लिया था । सो ठीक ही है, आत्मज्ञानी पुरुषों का चित्त आत्मकल्याण में ही अनुरक्त रहता है ।।124।।
“That wise Suvidhi understood the essence of the righteous path even in his childhood. Indeed, the minds of self-realized individuals remain devoted to their spiritual welfare.”
श्लोक ( Shlok ) 125
शैशवेऽपि स संप्रापज्जनतानन्ददायिनी । रूपसंपदमापूर्णयौवनस्तु विशेषतः ॥१२५॥
वह बाल्य अवस्था में ही लोगों को आनंद देने वाली रूपसंपदा को प्राप्त था और पूर्ण युवा होने पर विशेष रूप से मनोहर संपदा को प्राप्त हो गया था ।।125।।
“In his childhood, he possessed a charming appearance that brought joy to people, and upon reaching full youth, he acquired even more captivating beauty.”
श्लोक ( Shlok ) 126
“मकुटालङ्कृतप्रांशु मूर्द्धा प्रोन्नतिमादधे । मेरुः कुलमहीध्राणामिव मध्ये स भूभृताम् ॥१२६॥
उस सुविधि का ऊँचा मस्तक सदा मुकुट से अलंकृत रहता था इसलिए अन्य राजाओं के बीच में वह सुविधि उस प्रकार उच्चता धारण करता था जिस प्रकार कि कुलाचलों के बीच में चूलिकासहित मेरु पर्वत है ।।126।।
Suphidhi’s lofty forehead was always adorned with a crown, making him stand tall among other kings, just as Mount Meru with its peak stands supreme among the great Kulachala mountains.”
श्लोक ( Shlok ) 127
कुण्डलोभ्दासि तस्याभान् मुखमु द् भ्रूविलोचनम् । सचन्द्रार्क सतारं च सेन्द्रचापमिवाम्बरम् ॥१२७॥
उसका मुख, सूर्य, चंद्रमा, तारे और इंद्रधनुष से सुशोभित आकाश के समान शोभायमान हो रहा था । क्योंकि वह दो कुंडलों से शोभायमान था जो कि सूर्य और चंद्रमा के समान जान पड़ते थे तथा कुछ ऊँची उठी हुई भौंहोंसहित चमकते हुए नेत्रों से युक्त हुआ था इसलिए इंद्रधनुष और ताराओं से युक्त हुआ-सा जान पड़ता था ।।127।।
“His face radiated magnificence like the sky adorned with the sun, moon, stars, and a rainbow. The two earrings resembled the sun and moon, while his slightly raised eyebrows and shining eyes gave the impression of a rainbow and stars completing the celestial beauty.”
श्लोक ( Shlok ) 128
मुखं सुरमिनिश्वासं कान्ताधरमभाद् विभोः । महोत्पलमिवोभ्दिन्नदलं सुरभिगन्धि च ।।१२८॥
अथवा उसका मुख एक फूले हुए कमल के समान शोभायमान हो रहा था क्योंकि फूले हुए कमल में जिस प्रकार उसकी कलिकाएँ विकसित होती है उसी प्रकार उसके मुख में मनोहर ओठ शोभायमान थे और फूला हुआ कमल जिस प्रकार मनोज्ञ गंध से युक्त होता है उसी प्रकार उसका मुख भी श्वासोच्छ्वास की मनोज्ञ गंध से युक्त था ।।128।।
“Alternatively, his face resembled a blooming lotus in its splendor. Just as a lotus displays its charming petals when in full bloom, his face was adorned with delightful lips. And just as a lotus is filled with a pleasant fragrance, his face too exuded a captivating aroma with each breath.”
श्लोक ( Shlok ) 129
नासिका घ्रातुमस्येव गन्धमायतिमादधे । अवाङ्मुखी विरेकाभ्यामापिबन्तीव तद्रसम् ॥१२९॥
उसकी नाक स्वभाव से ही लंबी थी, इसीलिए ऐसी जान पड़ती थी मानो उसने मुख-कमल की सुगंधि सूँघने के लिए ही लंबाई धारण की हो । और उसमें जो दो छिद्र थे उनसे ऐसी मालूम होती थी मानो नीचे की ओर मुँह करके उन छिद्रों-द्वारा उसका रसपान ही कर रही हो ।।129।।
“His nose was naturally long, as though it had adopted that length solely to savor the fragrance of his lotus-like face. The two nostrils seemed as if they were turned downward, appearing to sip the nectar from his face.”
श्लोक ( Shlok ) 130
कन्धरस्तन्मुखाब्जस्य नाललीलां दधे पराम् । मृणालवलयेनेव हारेण परिराजितः ॥१३०॥
उसका गला मृणालवलय के समान श्वेत हार से शोभायमान था इसलिए ऐसा जान पड़ता था मानो मुखरूपी कमल की उत्तम नाल को ही धारण कर रहा हो ।।130।।
“His neck, adorned with a white necklace resembling a lotus stem, seemed as though it were gracefully supporting the exquisite stalk of his lotus-like face.”
श्लोक ( Shlok ) 131
महोरः स्थलमस्याभान्महारत्नांशुपेशलम् । ज्वलद्दीपमिवाम्भोज वासिन्या वासगेहकम् ॥ १३१ ॥
बड़े-बड़े रत्नों की किरणों से मनोहर उसका विशाल वक्षःस्थल ऐसा शोभायमान होता था मानो कमलवासिनी लक्ष्मी का जलते हुए दीपकों से शोभायमान निवासगृह ही हो ।।131।।
“His broad chest, radiant with the shimmering rays of precious jewels, appeared as if it were the resplendent abode of Goddess Lakshmi, adorned with glowing lamps.”
श्लोक 132 से 141
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122