भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 |
श्लोक 103 से 111 वज्रनाभि की तपस्या और उपशम
वज्रनाभि ने दस धर्म (क्षमा, मार्दव आदि) और बारह अनुप्रेक्षाएँ (अनित्यता, अशरण आदि) धारण कीं। वह द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर चढ़े, शुक्लध्यान पूर्ण कर 11वें गुणस्थान में पहुँचे, और वहाँ से सर्वार्थसिद्धि में अहमिंद्र बने।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 103 to 111
श्लोक ( Shlok ) 103 – 104
स भेजे मतिमान् क्षान्ति परं मादेयमार्जवम् । शौचं च संयमं सत्यं तपस्त्यागौ च निर्मदः ।।१०३।।
आकिश्चन्यमथ ब्रह्मचर्य च वदतां वरः । धर्मो दशतयोऽयं हि गणेशामभिसम्मतः ॥१०४।।
बुद्धिमान् मदरहित और विद्वानों में श्रेष्ठ वज्रनाभि मुनि ने उत्तम क्षमा, मार्दव, आर्जव, शौच, सत्य, संयम, तप, त्याग, आकिंचन्य और ब्रह्मचर्य ये दश धर्म धारण किये थे । वास्तव में ये ऊपर कहे हुए दश धर्म गणधरों को अत्यंत इष्ट हैं ।।103-104।।
The wise, ego-free, and foremost among scholars, sage Vajranabhi upheld the ten supreme virtues (Dash Dharma):
- Forgiveness (Kshama)
- Humility (Mardava)
- Straightforwardness (Arjava)
- Purity (Shaucha)
- Truthfulness (Satya)
- Self-restraint (Samyama)
- Austerity (Tapa)
- Renunciation (Tyaga)
- Non-possessiveness (Akinchanya)
- Celibacy (Brahmacharya)
Indeed, these ten virtues are highly revered by the Ganadharas (chief disciples of the Tirthankaras).
श्लोक ( Shlok ) 105 -109
सोऽनु दध्यावनित्यत्वं सुखायुर्बलसंपदाम् । तयाऽशरणतां मृत्युजसजन्मभये नृणाम् ॥ १०५ ॥
संसृतेर्दुः स्वभावत्वं विचित्रपरिवर्तनैः । एकत्वमात्मनो ज्ञानदर्शनात्मत्वमीयुषः ॥१०६॥
अन्यत्वमात्मनो देह घनबन्धुकलत्रतः । तथाऽशौचं शरीरस्थ नवद्वारैर्मलस्त्रुतः ॥१०७॥
आस्त्रवं पुण्यपापात्मकर्मणां सह संवरम् । निर्जरां विपुलां बोधेदुर्लभस्वं भवाम्बुधौ ॥१०८॥
धर्मस्वाख्याततां चेति तत्त्वानुध्यानभावनाः । लेश्या विशुद्धिमधिकां दधानः शुमभावनः ॥१०९॥
इनके सिवाय वे प्रति समय बारह अनुप्रेक्षा का चिंतवन करते रहते थे जैसे कि संसार के सुख, आयु, बल और संपदाएँ सभी अनित्य हैं । तथा मृत्यु, बुढ़ापा और जन्म का भय उपस्थित होने पर मनुष्यों को कुछ भी शरण नहीं है; द्रव्य, क्षेत्र, काल, भव और भावरूप विचित्र परिवर्तनों के कारण यह संसार अत्यंत दुःखरूप हैं । ज्ञानदर्शन स्वरूप को प्राप्त होने वाला आत्मा सदा अकेला रहता है । शरीर, धन, भाई और स्त्री वगैरह से यह आत्मा सदा पृथक् रहता है । इस शरीर के नव द्वारों से सदा मल झरता रहता है इसलिए यह अपवित्र है । इस जीव के पुण्य पापरूप कर्मों का आस्रव होता रहता है । गुप्ति समिति आदि कारणों से उन कर्मों का संवर होता है । तप से निर्जरा होती है । यह लोक चौदह राजूप्रमाण ऊँचा है । संसाररूपी समुद्र में रत्नत्रय की प्राप्ति होना अत्यंत दुर्लभ है और दयारूपी धर्म से ही जीवों का कल्याण हो सकता है । इस प्रकार तत्त्वों का चिंतन करते हुए उन्होंने बारह भावनाओं को भाया । उस समय शुभभावों को धारण करने वाले वे मुनिराज लेश्याओं की अतिशय विशुद्धि को धारण कर रहे थे ।।105-109।।
Apart from these, he constantly contemplated the Twelve Reflections (Anuprekshas), such as:
- Impermanence (Anitya): The pleasures, life, strength, and wealth of this world are all temporary.
- Helplessness (Asharanata): At the time of death, old age, and birth, no one can provide refuge.
- Worldly Suffering (Samsara): Due to constant transformations of matter, space, time, existence, and thoughts, the world is full of suffering.
- Solitariness of the Soul (Ekatva): The soul is always alone, even when it attains knowledge and perception.
- Separation (Anyatva): The soul is always separate from the body, wealth, relatives, and spouse.
- Impurity (Asuchi): The nine openings of the body constantly release impurities, making it unclean.
- Karmic Influx (Ashrava): The influx of good and bad karmas constantly binds the soul.
- Karmic Stoppage (Samvara): Restraint through carefulness (Gupti, Samiti) stops karma from entering the soul.
- Karmic Shedding (Nirjara): Austerity (Tapa) leads to the shedding of karma.
- Nature of the Universe (Loka): The universe is 14 Rajjus high (immeasurably vast).
- Rarity of Enlightenment (Durlabha Bodhi): Attaining the Three Jewels (Ratnatraya) in this ocean of samsara is extremely rare.
- Compassion (Daya): Only compassion leads to the true welfare of all living beings.
By meditating on these fundamental truths, Vajranabhi deeply embraced the Twelve Reflections. At that time, with supremely pure thoughts, he attained extraordinary purity of Leshyas (mental vibrations and colors of the soul).
श्लोक ( Shlok ) 110
द्वितीमवारमारुह्य श्रेणीमुपशमादिकाम् । पृथक्त्व ध्यानमापूर्य समाधि परमं श्रितः ॥११०॥
वे द्वितीय बार उपशम श्रेणी पर आरूढ़ हुए और पृथक्त्ववितर्क नामक शुक्लध्यान को पूर्ण कर उत्कृष्ट समाधि को प्राप्त हुए ।।110।।
He ascended the Upashama Shreni (the ladder of suppression) for the second time and, by perfectly practicing Shukla Dhyana (Pure Meditation) known as Pṛthaktva-vitarka, he attained supreme spiritual absorption (Samadhi).
श्लोक ( Shlok ) 111
उपशान्तगुणस्थाने कृतप्राणविसर्जनः । सर्वार्थसिद्धिमासाद्य संप्रापत् सोऽहमिन्द्रताम् ॥ १११ ॥
अंत में उपशांतमोह नामक ग्यारहवें गुणस्थान में प्राण छोड़कर सर्वार्थसिद्धि पहुँचे और वहाँ अहमिंद्र पद को प्राप्त हुए ।।111।।
In the end, shedding his mortal life in the Upashanta Moha (11th Gunasthana), he attained Sarvarthasiddhi (the supreme liberation realm) and achieved the Ahmindra (supreme celestial) status there.
श्लोक 112 से 121
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 |