भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111
श्लोक 112 से 122 शतबुद्धि का उद्धार और पुनर्जन्म
श्रीधरदेव ने शतबुद्धि को नरक में समझाया। शतबुद्धि ने सम्यग्दर्शन ग्रहण किया, नरक से मुक्त होकर जयसेन बना, दीक्षा ली, और ब्रह्मस्वर्ग में इंद्र हुआ। श्रीधरदेव स्वर्ग से च्युत होकर सुविधि राजा बना।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 112 to 122
श्लोक ( Shlok ) 112
तदासीत् तव मिध्यात्वमुद्रिक्तं दुर्नंयाश्रयात् । पश्य तत्परिपाकोऽयमस्वन्तस्ते पुरःस्थितः ॥ ११२॥
उस भव में अनेक मिथ्यानयों के आश्रय से तेरा मिथ्यात्व बहुत ही प्रबल हो रहा था । देख, उसी मिथ्यात्व का यह दुःख देनेवाला फल तेरे सामने है ।।112।।
“In that previous life, due to associating with many deluded beings, your false belief had become extremely powerful. Behold, the suffering you now face is the painful result of that very delusion.”
श्लोक ( Shlok ) 113
इत्यसौ बोधितस्तेन शुद्धं दर्शनमग्रहीत् । मिध्यात्वकलुषापायात् परां शुद्धिमुपाश्रितः ॥११३॥
इस प्रकार श्रीधरदेव के द्वारा समझाये हुए शतबुद्धि के जीव ने शुद्ध सम्यग्दर्शन धारण किया और मिथ्यात्वरूपी मैल के नष्ट हो जाने से उत्कृष्ट विशुद्धि प्राप्त की ।।113।।
“Thus, upon being counseled by Shridhar Deva, the soul of Shatabuddhi attained pure Samyag Darshan (right belief) and, with the destruction of the filth of delusion, achieved supreme purity.”
श्लोक ( Shlok ) 114 – 117
कालान्ते नरकाभ्दीमान्निर्गत्य शतधीचरः । पुष्करद्वीपपूर्वार्द्ध प्राग्विदेहमुपागतः ॥११४॥
विषये मङ्गलावत्यां नगर्या रत्नसञ्चये । महीधरस्य सम्राजः सुन्दर्याश्च सुतोऽभवत् ।।११५॥
जयसेनश्रुतिर्बुद् ध्वा विवाहसमये सुरात् । श्रीधराख्यात् प्रवव्राज गुरु यमधरं श्रितः ॥११६॥
नारकों वेदनां घोरां तेनासौ किल बोधितः । निर्विंद्य विषयासंगात् तपो दुश्चरमाचरत् ॥११७॥
तत्पश्चात् वह शतबुद्धि का जीव आयु के अंत में भयंकर नरक से निकलकर पूर्व पुष्कर द्वीप के पूर्व विदेह क्षेत्र में मंगलावती देश के रत्नसंचयनगर में महीधर चक्रवर्ती के सुंदरी नामक रानी से जयसेन नाम का पुत्र हुआ । जिस समय उसका विवाह हो रहा था उसी समय श्रीधरदेव ने आकर उसे समझाया जिससे विरक्त होकर उसने यमधर मुनिराज के समीप दीक्षा धारण कर ली । श्रीधरदेव ने उसे नरकों के भयंकर दुःख की याद दिलायी जिससे वह विषयों से विरक्त होकर कठिन तपश्चरण करने लगा ।।114-117।।
“Afterward, at the end of his lifespan, the soul of Shatabuddhi emerged from the dreadful hell and was reborn as Jayasen, the son of Queen Sundari and Emperor Mahidhar Chakravarti, in the prosperous city of Ratnasanchaya in the Manglavati region of the eastern Videha area of Purva Pushkar Dweep. During his wedding ceremony, Shridhar Deva appeared and counseled him. Inspired by this, Jayasen renounced worldly attachments and took initiation under Yamadhar Muni. Reminded by Shridhar Deva of the terrifying sufferings of hell, he became dispassionate and devoted himself to rigorous penance.”
श्लोक ( Shlok ) 118
ततो ब्रह्मेन्द्रतां सोऽगात् जीवितान्ते समाहितः । क नारकः क देवोऽयं विचित्रा कर्मणां गतिः ॥ ११८॥
तदनंतर आयु के अंत समय में समाधिपूर्वक प्राण छोड़कर ब्रह्मस्वर्ग में इंद्र पद को प्राप्त हुआ । देखो, कहाँ तो नारकी होना और कहाँ इंद्र पद प्राप्त होना । वास्तव में कर्म की गति बड़ी ही विचित्र है ।।118।।
“Afterward, at the end of his lifespan, he renounced his life in a state of deep meditation and was reborn in Brahma Heaven, attaining the position of Indra. Behold the contrast—once a being in hell, now attaining the position of Indra. Truly, the ways of karma are extraordinarily mysterious.”
श्लोक ( Shlok ) 119
नीचैर्वृत्तिरधर्मेण धर्मेणोच्चैः स्थिति भजेत् । तस्मादुच्चैः पदं वाञ्छन् नरो धर्मपरो भवेत् ॥११९॥
यह जीव हिंसा आदि अधर्मकार्यों से नरकादि नीच गतियों में उत्पन्न होता है और अहिंसा आदि धर्मकार्यों से स्वर्ग आदि उच्च गतियों को प्राप्त होता है इसलिए उच्च पद की इच्छा करने वाले पुरुष को सदा धर्म में तत्पर रहना चाहिए ।।119।।
“This soul is born into lower realms such as hell due to sinful acts like violence and attains higher realms such as heaven through virtuous acts like non-violence. Therefore, one who desires a higher position should always remain devoted to righteousness.”
श्लोक ( Shlok ) 120
ब्रह्मलोकादथागत्य ब्रह्मेन्द्रः सोऽवधीक्षणः । श्रीधरं पूजयामास गतं कल्याणमित्रताम् ॥१२०॥
अनंतर अवधिज्ञानरूपी नेत्र से युक्त उस ब्रह्मेंद्र ने (शतबुद्धि या जयसेन के जीव ने) ब्रह्म स्वर्ग से आकर अपने कल्याणकारी मित्र श्रीधरदेव की पूजा की ।।120।।
“Afterward, endowed with the eye of Avadhi Jnana (clairvoyant knowledge), that Brahmendra (the soul of Shatabuddhi or Jayasen) descended from Brahma Heaven and worshipped his benevolent friend Shridhar Deva.”
श्लोक ( Shlok ) 121 – 122
श्रीधरोऽथ दिवश्च्युत्वा जम्बुद्वीपमुपाश्रिते । प्राग्विदेहे महावत्सविषये स्वर्गसन्निभे ॥१२१
सुसीमानगरे जज्ञे सुदृष्टिनृपतेः सुतः । मातुः सुन्दरनन्दायाः सुविधिर्नाम पुण्यधीः ॥१२२॥
अनंतर वह श्रीधरदेव स्वर्ग से च्युत होकर जंबूद्वीप संबंधी पूर्व विदेह क्षेत्र में स्वर्ग के समान शोभायमान होने वाले महावत देश के सुसीमानगर में सुदृष्टि राजा की सुंदरनंद नाम की रानी से पवित्र-बुद्धि का धारक सुविधि नाम का पुत्र उत्पन्न हुआ ।।121-122।।
“Subsequently, Shridhar Deva descended from heaven and was reborn in the Mahavat country of the eastern Videha region in Jambudweep, a land as splendid as heaven. He was born as a son named Suvidhi, endowed with pure wisdom, to King Sudrishti and Queen Sundarananda.”
श्लोक 123 से 131
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111