भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 |
श्लोक 142 से 151 श्रीमती को उपदेश और स्वीकृति
मुनि ने श्रीमती को सम्यग्दर्शन ग्रहण करने, स्त्री पर्याय छोड़ने को कहा। वज्रजंघ और श्रीमती ने इसे स्वीकारा, संतुष्ट हुए। सम्यग्दर्शन मोक्ष का युवराज पद देता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 142 to 151
श्लोक ( Shlok ) 142
सम्स्यत्वमधि कृत्यैवमाप्तसूक्त्यनुसारतः । कृतार्य देशनास्माभिर्ग्राह्यैसा श्रेयसे त्वया ॥१४२॥
हे आर्य, इस प्रकार मैंने अरहंत देव के कहे अनुसार, सम्यग्दर्शन विषय को लेकर, यह उपदेश किया है सो मोहरूपी कल्याण की प्राप्ति के लिए तुझे यह अवश्य ही ग्रहण करना चाहिए ।।142।।
“O noble one, in this way, I have given this teaching on right perception as instructed by the Arhant Lords. You must certainly accept it for attaining liberation by overcoming delusion.”
श्लोक ( Shlok ) 143
त्वमप्यम्बावलम्बेथाः सम्यक्त्वमविलम्बितम्। भवाम्बुधेस्तरण्डं तत् स्त्रैणात् किं वत खिद्यसि ।।१४३॥
इस प्रकार वे मुनिराज आर्य वज्रजंघ को समझाकर आर्या श्रीमती से कहने लगे कि माता, तू भी बहुत शीघ्र ही संसाररूपी समुद्र से पार करने के लिए नौका के समान इस सम्यग्दर्शन को ग्रहण कर । वृथा ही स्त्रीपर्याय में क्यों खेद-खिन्न हो रही है ।।143।।
“Thus, after instructing Arya Vajrajangha, the sage addressed Arya Shrimati, saying: ‘Mother, you too should quickly accept this right perception, which is like a boat to cross the ocean of worldly existence. Why grieve unnecessarily over being in the female state?'”
श्लोक ( Shlok ) 144
सद्दष्टेः स्त्रीष्वनुत्पतिः पृथिवीष्वपि षट्स्वधः । त्रिषु देवनिकायेषु नोचेष्वन्येषु वाम्बिके ॥१४४॥
हे माता, सब स्त्रियों में, रत्नप्रभा को छोड़कर नीचे की छह पृथ्वीयों में, भवनवासी व्यंतर और ज्योतिषी देवों में तथा अन्य नीच पर्यायों में सम्यग्दृष्टि जीवों की उत्पत्ति नहीं होती ।।144।।
“O mother, except for Ratnaprabha, right perception does not arise among beings in the six lower earthly regions, the Bhavanavasi and Vyantara celestial beings, the Jyotishi deities, and other lower states of existence.”
श्लोक ( Shlok ) 145
धिगिदं स्त्रेणमश्लाघ्यं नैर्ग्रन्थ्यपतिबन्धि यत् । कारीषाग्निनिभं तापं निराहुस्तत्र तद् विदः ॥ १४५॥
इस निंद्य स्त्रीपर्याय को धिक्कार है जो कि निर्ग्रंथ-दिगंबर मुनिधर्म पालन करने के लिए बाधक है और जिसमें विद्वानों ने करीष (कंडा की आग) की अग्नि के समान काम का संताप कहा है ।।145।।
“Condemnation be upon this despicable female state, which hinders the practice of the Nirgrantha Digambara monk’s path. Scholars have compared the torment of lust in this state to the burning fire of dung fuel.”
श्लोक ( Shlok ) 146
तदेतत् स्त्रेणमुत्सृज्य सम्यगाराध्य दर्शनम् । प्राप्तासि परमस्थान सप्तकं त्वमनुक्रमात् ॥१४६॥
हे माता, अब तू निर्दोष सम्यग्दर्शन की आराधना कर और इस स्त्रीपर्याय को छोड़कर क्रम से सप्त परम स्थानों को प्राप्त कर । भावार्थ―1 ‘सज्जाति’, 2 ‘सद᳭गृहस्थता’ (श्रावक के व्रत), 3 ‘पारिव्रज्य’ (मुनियों के व्रत), 4 ‘सुरेंद्र पद’, 5 ‘राज्यपद’ 6 ‘अरहंतपद’, 7 ‘सिद्धपद’ ये सात परम स्थान (उत्कृष्ट पद) कहलाते हैं । सम्यग्दृष्टि जीव क्रम-क्रम से इन परम स्थानों को प्राप्त होता है ।।146।।
O mother, now worship the faultless right perception and, leaving behind this female state, gradually attain the seven supreme positions: 1) Noble birth (Sajjati), 2) The virtuous householder state (Sadgrihastha with vows), 3) The ascetic state (Parivrajya with monk vows), 4) The position of celestial lord (Surendra Pad), 5) The position of sovereignty (Rajyapad), 6) The position of an Arhant (Arhantpad), and 7) The state of liberation (Siddhapad). A being with right perception attains these supreme states step by step.”
श्लोक ( Shlok ) 147
युवां कतिपयैरेव भवैः श्रेयोऽनुबन्धिभिः । ध्यानाग्निदग्धकर्माणौ प्राप्तास्थः परमं पदम् ॥१४७।।
आप लोग कुछ पुण्य भवों को धारण कर ध्यानरूपी अग्नि से समस्त कर्मों को भस्म कर परम पद को प्राप्त करोगे ।।147।।
“You will attain the supreme state by assuming some virtuous existences and burning all karmas with the fire of meditation.”
श्लोक ( Shlok ) 148
इति प्रीतिंकराचार्यवचनं स प्रमाणयन् । सजानिरादधे सम्यग्दर्शनं प्रीतमानसः ॥१४८।।
इस प्रकार प्रीतिंकर आचार्य के वचनों को प्रमाण मानते हुए आर्य वज्रजंघ ने अपनी स्त्री के साथ-साथ प्रसन्नचित्त होकर सम्यग्दर्शन धारण किया ।।148 ।।
“Thus, accepting the words of the benevolent Acharya as authoritative, Arya Vajrajangha, along with his wife, joyfully embraced right perception.”
श्लोक ( Shlok ) 149
स सद्दर्शनमासाद्य सप्रियः पिप्रियेतराम् । पुष्णात्यलब्धलाभो हि देहिनां महतीं धृतीम् ॥१४९।।
वह वज्रजंघ का जीव अपनी प्रिया के साथ-साथ सम्यग्दर्शन पाकर बहुत ही संतुष्ट हुआ । सो ठीक ही है, अपूर्व वस्तु का लाभ प्राणियों के महान् संतोष को पुष्ट करता ही है ।।149।।
“The soul of Vajrajangha, along with his beloved, became highly content after attaining right perception. This is only natural, as the attainment of a rare treasure always brings great satisfaction to beings.”
श्लोक ( Shlok ) 150
प्राप्य” सूत्रानुगां हृद्यां सम्यग्दर्शनकण्ठिकाम् । यौवराज्यपदे सोऽस्थात् मुक्तिसाम्राज्यसम्पदः ॥ 150॥
जिस प्रकार कोई राजकुमार सूत्र तंतु में पिरोयी हुई मनोहर माला को प्राप्त कर अपनी राज्यलक्ष्मी के युवराज पद पर स्थित होता है उसी प्रकार वह वज्रजंघ का जीव भी सूत्र (जैन सिद्धांत) में पिरोयी हुई मनोहर सम्यग्दर्शनरूपी कंठमाला को प्राप्त कर मुक्तिरूपी राज्यसंपदा के युवराज-पद पर स्थित हुआ था ।।150।।
“Just as a prince attains a beautiful garland strung with threads and ascends to the position of crown prince of his kingdom, similarly, the soul of Vajrajangha, adorned with the beautiful garland of right perception strung with Jain principles, ascended to the position of crown prince of the kingdom of liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 151
सापि सम्यक्त्वलाभेन नितरामतुषत् सती । विशुद्धपुंस्त्वयोगेन निर्वाणमभिलाषुका ।।१५१।।
विशुद्ध पुरुष पर्याय के संयोग से निर्वाण प्राप्त करने की इच्छा करती हुई वह सती आर्या भी सम्यक्त्व की प्राप्ति से अत्यंत संतुष्ट हुई थी ।।151।।
“Desiring liberation through the pure male state, the virtuous Arya, too, became extremely content upon attaining right perception.”
श्लोक 152 से 161
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 |