भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 |
श्लोक 42 से 51 कल्पवृक्षों का विस्तार
मालांग से मालाएँ, दीपांग से दीपक, गृहांग से भवन, भोजनांग से चार आहार और छह रस, भाजनांग से बर्तन, वस्त्रांग से वस्त्र मिलते हैं। ये वृक्ष अनादि, स्वाभाविक फलदायी हैं।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 42 to 51
श्लोक ( Shlok ) 42
स्त्रजो नानाविधाः कर्गपूरभेदांश्च नैकधा । सर्वर्तुरुकुसुमाकीर्णाः सुमनोङ्गा दधत्यलम् ॥४२॥
मालांग जाति के वृक्ष सब ऋतुओं के फूलों से व्याप्त अनेक प्रकार की मालाएँ और कर्णफूल आदि अनेक प्रकार के कर्णाभरण अधिक रूप से धारण करते हैं ।।42।।
The Malang trees are adorned with various types of garlands, ear ornaments, and other ear adornments made abundantly from flowers that bloom throughout all seasons. ||42||
श्लोक ( Shlok ) 43
मणिप्रदीपैराभान्ति दीपाङ्गाख्या महाद्रमा । ज्योतिरङ्गाः सदा द्योतमातन्वन्ति स्फुरद्रचः ॥४३॥
दीपांग नाम के कल्पवृक्ष मणिमय दीपकों से शोभायमान रहते हैं और प्रकाशमान कांति के धारक ज्योतिरंग जाति के वृक्ष सदा प्रकाश फैलाते रहते हैं ।।43।।
The celestial trees named Deepang are adorned with jewel-studded lamps, radiating brilliance. The trees of the Jyotirang species constantly emit radiant light, spreading illumination everywhere. ||43||
श्लोक ( Shlok ) 44
गृहाङ्गाः सोधमुतुङ्गं मण्डपं च सभागृहम् । चित्रनर्तनशालाश्च संनिवापयितुं क्षमाः ॥४४।।
गृहांगजाति के कल्पवृक्ष, ऊँचे-ऊँचे राजभवन, मंडप, सभागृह, चित्रशाला और नृत्यशाला आदि अनेक प्रकार के भवन तैयार करने के लिए समर्थ रहते हैं ।।44।।
The celestial trees of the Gruhang species are capable of creating various types of magnificent structures, such as towering royal palaces, pavilions, assembly halls, art galleries, and dance halls. ||44||
श्लोक ( Shlok ) 45
भोजनाङ्गा वराहारानमृत स्वाददायिनः । वपुष्करान् फलन्त्यात्तषड् रसान शनादिकान् ॥45৷৷
भोजनांग जाति के वृक्ष, अमृत के समान स्वाद देने वाले, शरीर को पुष्ट करने वाले और छहों रससहित अशन-पान आदि उत्तम-उत्तम आहार उत्पन्न करते हैं ।।45।।
The celestial trees of the Bhojanang species produce excellent food and drinks, imbued with all six tastes, offering nourishment to the body and flavors akin to divine nectar. ||45||
श्लोक ( Shlok ) 46
अशनं पानकं खाद्यं स्वाद्यं चान्नं चतुर्विधम् । कष्ट्वम्लतिक्तमधुरकषायलवणा रसाः ॥46
अशन (रोटी, दाल, भात आदि खाने के पदार्थ), पानक (दूध, पानी आदि पीने के पदार्थ) खाद्य (लड्डू आदि खाने योग्य पदार्थ) और स्वाद्य (पान, सुपारी, जावित्री आदि स्वाद लेने योग्य पदार्थ) ये चार प्रकार के आहार और कड़वा, खट्टा, चरपरा, मीठा, कसैला और खारा ये छह प्रकार के रस हैं ।।46।।
Ashana (foods like bread, lentils, and rice), Panaka (drinks like milk and water), Khadya (edibles like sweets such as laddoos), and Swadya (taste-enhancing items like betel leaves, areca nuts, and mace) are the four types of food. The six types of tastes are bitter, sour, pungent, sweet, astringent, and salty. ||46||
श्लोक ( Shlok ) 47
स्थालानि चषकान् शुक्ति भृङ्गारकरकादिकान्। भाजनाङ्गा दिशन्त्या विर्भवच्छाखा विषङ्गिणः ।।47।
भाजनांग जाति के वृक्ष थाली, कटोरा, सीप के आकार के बरतन, भृंगार और करक (करवा) आदि अनेक प्रकार के बरतन देते हैं । ये बरतन इन वृक्षों की शाखाओं में लटकते रहते हैं ।।47।।
The celestial trees of the Bhajanang species provide various types of utensils, such as plates, bowls, shell-shaped vessels, pitchers, and jars. These utensils hang from the branches of these trees. ||47||
श्लोक ( Shlok ) 48
चीनपट्टदुकूलानि प्रावारपरिधानकम् । मृदुश्लक्ष्णमहार्घाणि वस्त्राङ्गा दधतिद्रमाः ॥४८॥
और वस्त्रांग जाति के वृक्ष रेशमी वस्त्र, दुपट्टे और धोती आदि अनेक प्रकार के कोमल, चिकने और महामूल्य वस्त्र धारण करते हैं ।।48।।
The celestial trees of the Vastrang species bear various types of soft, smooth, and highly valuable garments, such as silk fabrics, scarves, and dhotis. ||48||
श्लोक ( Shlok ) 49
न वनस्पतयोऽप्येते नैव दिव्यैरधिष्ठिताः। केवलं पृथिवीसारा स्तन्मयत्वमुपागताः ॥४९॥
ये कल्पवृक्ष न तो वनस्पतिकायिक हैं और न देवों के द्वारा अधिष्ठित ही हैं । केवल, वृक्ष के आकार परिणत हुआ पृथ्वी का सार ही हैं ।।49।।
These celestial trees are neither botanical in nature nor governed by divine beings. They are simply the essence of the earth transformed into tree-like forms. ||49||
श्लोक ( Shlok ) 50
अनादिनिधनाश्चैते निसर्गात् फलदायिनः । नहिभावस्वभावानामुपालम्भः सुसङ्गतः ॥५०॥
ये सभी वृक्ष अनादिनिधन हैं और स्वभाव से ही फल देने वाले हैं । इन वृक्षों का यह ऐसा स्वभाव ही है इसलिए ये वृक्ष वस्त्र तथा बरतन आदि कैसे देते होंगे, इस प्रकार कुतर्क कर इनके स्वभाव में दूषण लगाना उचित नहीं है । भावार्थ―पदार्थों के स्वभाव अनेक प्रकार के होते हैं इसलिए उनमें तर्क करने की आवश्यकता नहीं है जैसा कि कहा भी है, ‘स्वभावोऽतर्कगोचर:’ अर्थात् स्वभाव तर्क का विषय नहीं है ।।50।।
All these celestial trees are eternal and naturally yield fruits. Their nature is such that questioning how they provide garments, utensils, and other items is unreasonable. The essence here is that the inherent nature of things varies in many ways and should not be subjected to logical debate. As it is said, “Svabhavo’tarkagocharah” — the inherent nature of things is beyond the realm of logic. ||50||
श्लोक ( Shlok ) 51
नृणां दानफलादेते फलन्ति विपुलं फलम् । यथान्य पादपाः काले प्राणिनामुपकारकाः ॥५१॥
जिस प्रकार आजकल के अन्य वृक्ष अपने-अपने फलने का समय आने पर अनेक प्रकार के फल देकर प्राणियों का उपकार करते हैं उसी प्रकार उपर्युक्त कल्पवृक्ष भी मनुष्यों के दान के फल से अनेक प्रकार के फल फलते हुए वहाँ के प्राणियों का उपकार करते हैं ।।51।।
Just as the trees of the present time bear various fruits in their respective seasons, benefiting living beings, similarly, the aforementioned celestial trees also bear diverse fruits as a result of the virtuous deeds (charity) of humans, thereby serving the beings there. ||51||
श्लोक 52 से 61
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41