भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण द्वादशं पर्व – भगवान के स्वर्गावतरण का वर्णन Ādi purāṇa Parv 12 by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 12 में नाभिराज-मरुदेवी का परिचय, अयोध्या की रचना, और ऋषभदेव के अवतरण की तैयारी, मरुदेवी के स्वप्न, नाभिराज की व्याख्या, और गर्भावतरण के दौरान देव सेवा शामिल हैं।
This Parv 12 narrates the transition of Vajranabhi from Sarvarthasiddhi to earth, the context of Nabhiraaj and Marudevi, their divine qualities, the creation of Ayodhya, and the celestial events heralding the birth of Lord Rishabhdev, Marudevi’s sixteen auspicious dreams, her awakening, Nabhiraaj’s interpretation of the dreams, and the divine service provided to her during her pregnancy with Lord Rishabhdev, her interactions with the devis through poetic exchanges, and the glory of her bearing Lord Rishabhdev.
श्लोक 12 से 21 मरुदेवी का परिचय
नाभिराज की रानी मरुदेवी इंद्राणी समान थी। उसकी कांति चंद्रमा, शरीर कृश, ओठ बिंबफल, चरण लक्षणयुक्त थे। वह नाट्य-संगीत शास्त्र का आधार, सौंदर्य से अन्य स्त्रियों को पराजित करने वाली थी। उसके चरण कमल समान, हंसिनी गति से श्रेष्ठ थे।
श्लोक 22 से 31 मरुदेवी के अंगों की शोभा
मरुदेवी के चरण नुपूरों से शोभायमान, जंघाएँ एक-दूसरे की उपमा, घुटने सुंदर, ऊरु देवांगनाओं से स्पर्धायुक्त थे। नितंब कामदेव का स्थान, कटि किला, उदर रोमपंक्ति से शोभित थी।
श्लोक 32 से 41 मरुदेवी का ऊपरी शरीर
उसके स्तन क्रीडाचल, हार से शोभित, कंठ सूक्ष्म रेखाओं वाला, भुजाएँ कल्पवृक्ष शाखा, हस्त अशोक किसलय, कंधे हंसिनी पंख समान थे। वह विधाता की सुंदर रचना थी।
श्लोक 42 से 51 मरुदेवी का मुख वर्णन
मरुदेवी का मुख चंद्रमा से श्रेष्ठ, ओठ मूंगा से सुंदर, कंठ राग प्रसिद्ध, कपोल केश धारण करने वाले, नाक सुगंधित, नेत्र कमल, कान शास्त्रालंकृत, ललाट दर्पण, भौंहें धनुष समान थे।
श्लोक 52 से 61 मरुदेवी की महिमा
उसके केश राहु समान, चोटी फूल बिखेरती थी। वह यशस्विनी, दीर्घायु, संतानवती थी। गुणों की खान, पुण्यवती, सौभाग्य सीमा, पातिव्रत्य परम थी। इंद्र ने उसका विवाह कराया। वह नाभिराज को प्रिय थी।
श्लोक 62 से 71 नाभिराज और मरुदेवी का वैवाहिक जीवन
मरुदेवी की मुसकान नाभिराज के मन को विस्तृत करती थी। नाभिराज उसे लक्ष्मी मानते थे। वह संभोग में अनुकूल थी। दोनों पुण्यवान, भोगभूमि लक्ष्मी के प्रतीक थे। इंद्र ने उनके लिए नगरी रची।
श्लोक 72 से 81 अयोध्या नगरी की रचना
देवों ने अयोध्या बनाई, जो स्वर्गपुरी समान थी। मनुष्यों को बसाया, राजमहल बनाया। यह वप्र, प्राकार, परिखा से युक्त थी। इसके नाम—साकेत, सुकोशला, विनीता—गुणों से सार्थक थे। नाभिराज-मरुदेवी ने निवास शुरू किया।
श्लोक 82 से 91 ऋषभदेव के अवतरण की तैयारी
इंद्र ने नाभिराज-मरुदेवी की पूजा की। छह माह बाद ऋषभदेव के अवतार से पहले कुबेर ने रत्नवृष्टि की। यह वर्षा इंद्रधनुष, ऐरावत सूँड, कल्पवृक्ष अंकुर, सुवर्णमयी थी। लोग इसे निधि गर्भपात मानते थे।
श्लोक 92 से 101 गर्भावतरण उत्सव
रत्नवृष्टि नक्षत्र पंक्ति, बिजली समान थी। यह गर्भावतरण से 6 माह पहले से 9 माह बाद तक चली। पृथ्वी रत्नों, फूलों, सुगंधित जल से व्याप्त, गर्भिणी समान भारी हुई। वह मरुदेवी की तरह पुष्पवती थी।
श्लोक 102 से 111 मरुदेवी के सोलह स्वप्न (भाग 1)
मरुदेवी ने शुभ स्वप्न देखे: 1) ऐरावत हाथी (गरजता बादल समान), 2) सफेद बैल (अमृत राशि समान), 3) सिंह (चंद्र-संध्या निर्मित), 4) लक्ष्मी (कमल आसन पर अभिषिक्त), 5) दो पुष्पमालाएँ (भौंरे गूंजते), 6) पूर्ण चंद्र (मुख समान), 7) उदित सूर्य (सुवर्ण कलश), 8) दो कलश (कमल ढके)।
श्लोक 112 से 121 मरुदेवी के सोलह स्वप्न (भाग 2)
9) दो मछलियाँ (नेत्र समान), 10) तालाब (सुवर्ण जल), 11) समुद्र (अट्टहास करता), 12) सुवर्ण सिंहासन (मेरु शिखर), 13) स्वर्ग विमान (प्रसूतिगृह), 14) नागेंद्र भवन (स्पर्धायुक्त), 15) रत्न राशि (पृथ्वी खजाना), 16) निर्धूम अग्नि (प्रताप)। अंत में पीला बैल उसके मुख में प्रवेश करता दिखा। वह बाजों से जगी।
श्लोक 122 से 131 बंदीजनों का मंगल पाठ
बंदीजन मंगल गीत गाते हुए मरुदेवी को जगाते हैं: प्रभात समय है, चंद्र कांतिरहित, कमल प्रफुल्लित, सारस-भौंरे स्तुति करते, चकवा-चकवी सूर्य की प्रतीक्षा करते हैं।
श्लोक 132 से 141 सूर्योदय और मंगल कामना
सूर्य अंधकार नष्ट करता, संध्या प्रकट होती, कमलिनी प्रस्फुरित, कुमुदिनी म्लान होती। सूर्य पूर्व से उदित, जगत प्रकाशित। बंदीजन कहते हैं: शय्या छोड़ो, मंगलमय प्रभात हो, पुत्र तीन लोक को प्रकाशित करे।
श्लोक 142 से 153 मरुदेवी का जागरण और स्वप्न कथन
मरुदेवी स्वप्न से पहले जागी, फिर बंदीजनों ने जगाया। रोमांचित होकर स्नान-शृंगार कर नाभिराज से स्वप्न कहे: हाथी, बैल, सिंह आदि। फल सुनने की उत्सुकता व्यक्त की।
श्लोक 154 से 161 नाभिराज का स्वप्न फल
नाभिराज ने कहा: हाथी—उत्तम पुत्र, बैल—ज्येष्ठ, सिंह—बलवान, मालाएँ—तीर्थ स्थापक, लक्ष्मी—अभिषिक्त, चंद्र—आनंददायक, सूर्य—प्रभायुक्त, कलश—निधियुक्त, मछलियाँ—सुखी, सरोवर—लक्षणयुक्त, समुद्र—केवली, सिंहासन—जगद्गुरु, विमान—स्वर्गावतीर्ण, नाग भवन—अवधिज्ञानी, रत्न—गुणवान, अग्नि—कर्मदाहक, बैल—वृषभदेव गर्भ में।
श्लोक 162 से 171 गर्भावतरण और देव सेवा
मरुदेवी हर्ष से रोमांचित। वज्रनाभि सर्वार्थसिद्धि से मरुदेवी के गर्भ में अवतीर्ण। इंद्रादि देवों ने उत्सव मनाया। दिक्कुमारियाँ सेवा करने लगीं। श्री आदि देवियों ने शोभा, लज्जा आदि गुण दिए। गर्भ शोधन हुआ। मरुदेवी स्फटिक समान शोभित। देवियाँ मंगलद्रव्य, तांबूल, स्नान आदि देतीं।
श्लोक 172 से 181 देवियों की परिचर्या
देवियाँ रेशमी वस्त्र, मालाएँ, सुगंधित विलेपन, तलवार से रक्षा, पराग झाड़ना, चंदन सींचना, रंगावली बनाना, फूल चढ़ाना, दिव्य प्रभाव से सेवा करती थीं। अदृश्य होकर माला-आहार देतीं, आकाश से रक्षा का आह्वान करतीं।
श्लोक 182 से 191 सेवा और क्रीड़ा
देवियाँ वस्त्र उठातीं, आसन देतीं, दीपक जलातीं, आरती-रक्षाबंधन करतीं। जागरण कर पहरा देतीं। जल-वनक्रीड़ा, कथा-संगीत-नृत्य से संतुष्ट करतीं। नृत्य में बिजली समान चमकतीं, धनुर्वेद सीखती प्रतीत होतीं।
श्लोक 192 से 201 देवियों का नृत्य और संगीत
देवियाँ नृत्य में चौक बिखेरतीं, स्तन कमल-बोड़ियों सा हिलते, भौंह-कटाक्ष से कामदेव अभ्यास सा। मुस्कान, गीत, फिरकी से विलासमय। गीत-नृत्य से मरुदेवी का मन उत्कंठित। वीणा बजाती देवियाँ कमलिनी सा शोभित, हाथों से मन हर्षित करतीं।
श्लोक 202 से 211 वाद्य और सेवा की शोभा
वीणाएँ ताड़न से मधुर, बाँसुरी ओठों पर, मृदंग गंभीर ध्वनि से कौशल प्रकट करते। पणव, शंख, तुरही से मंगलगान। मरुदेवी तीन लोक लक्ष्मी सा शोभित। देवियों की सेवा से उत्कृष्ट शोभा धारण।
श्लोक 212 से 221 काव्य-गोष्ठी और पहेलियाँ
नौवें माह में देवियाँ गूढ़ काव्य से प्रसन्न करतीं। चंद्रमा से मुख श्रेष्ठ, भ्रमर मरुदेवी को सूँघते। पहेलियाँ: अधर (लाल, प्रिय), करेणुका (हाथ रेखा, हस्तिनी), साल-कानन (वन, मुख)।
श्लोक 222 से 231 काव्य और प्रश्नोत्तर
अमृत भोजन, सिंह चोटी पर, पुत्र से संताप नाश। वटवृक्ष-ऋक्ष भ्रम, स्तन-विरही श्लेष। पुत्र जयवंत, कल्याणकारी। इंद्र नंदीश्वर जाते, बिंदुच्युत से हाथी-श्रुति अर्थ।
श्लोक 232 से 241 बिंदु-मात्राच्युत श्लोक
परिखा जल विविध, सिंह-शीत प्रश्न, विरही गायन। एकाक्षरच्युत: शुक, काक, लोक, श्लोक। द्वयक्षरच्युत: केकी, केसर, केतकी, केवल। कोयल, कोटर, क्रोधी, विद्वान। वीणा, कामला, कामिनी, भेरी।
श्लोक 242 से 251 प्रश्नोत्तर और चित्रबद्ध श्लोक
तुक, शुक, रुक (पुत्र, शोक, रोग)। सूप, कूप, भूप (दाल, कुआँ, राजा)। पलाल, कुलाल, बिलाव (पियाल, कुम्हार, बिल्ली)। भवति (संबोधन, क्रिया, नक्षत्र)। सुरवरद (जिनेंद्र, हाथी)। केसरी शब्द-प्रहेलिका। नानागार-विराराजित से चार उत्तर। नृत्य चित्र।
श्लोक 252 से 261 रत्नवर्षा और गर्भ शोभा
रत्नधारा से आंगन शोभित, स्वर्ग लक्ष्मी सा। पुत्र तेजस्वी, मरुदेवी संतुष्ट। गर्भ तेज से पूर्व दिशा सा, रत्न खान सा। ऋषभदेव कष्ट न देते, त्रिवलियाँ यथावत।
श्लोक 262 से 273 मरुदेवी-नाभिराज की महिमा
नाभिराज सुगंध से संतुष्ट। ऋषभदेव स्फटिक दीपक सा। मरुदेवी लक्ष्मी सा, इंद्राणी सेवा करती। तीन लोक जननी। कल्पलता-कल्पवृक्ष सा दंपत्ति। मुख कमल-चंद्र सा, नाभिराज राजहंस-तृष्णायुक्त। तेजःपुंज धारण।
English translation of Ādi purāṇa parv 12 – Shlok 1 to 11
गौतम स्वामी का कथन और नाभिराज का परिचय
गौतम स्वामी ने वज्रनाभि के पृथ्वी अवतार की कथा शुरू की। मुनियों ने पूछा कि कर्मभूमि में अंतिम कुलकर नाभिराज ने ऋषभदेव को कैसे उत्पन्न किया। गौतम ने बताया कि नाभिराज भरत क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत के दक्षिण, मध्यम-आर्य खंड में हुए। वे तेजस्वी, ऐश्वर्यशाली, सूर्य समान थे।
श्लोक ( Shlok ) 1
अथ तस्मिन् महाभागे स्वर्लोकाद् भुवमेप्यति । यद्वृत्तकं जगत्यस्मिन् तद्दृश्ये श्रृ णुवाधुना ॥१॥
अनंतर गौतम स्वामी कहने लगे कि जब वह वज्रनाभि का जीव अहमिंद्रों, स्वर्गलोक से पृथ्वी पर अवतार लेने के सम्मुख हुआ तब इस संसार में जो वृत्तांत हुआ था अब मैं उसे ही कहूँगा । आप लोग ध्यान देकर सुनिए ।।1।।
Thereafter, Gautama Swami began to speak: “When the soul of Vajranabhi was about to descend from the realm of the Ahmindra gods and heaven to be reborn on earth, the events that took place in this world—I shall now narrate them. Listen attentively.” ॥1॥
श्लोक ( Shlok ) 2
अत्रान्तरे पुराणार्थकोविदं वदतां वरम् । पप्रच्छर्मुनयो नम्रा गौतमं गणनायकम् ॥२॥
इसी बीच में मुनियों ने नम्र होकर पुराण के अर्थ जानने वाले और वक्ताओं में श्रेष्ठ श्री गौतम गणधर से प्रश्न किया ।।2।।
Meanwhile, the ascetics humbly approached Sri Gautama Gandhara, who was well-versed in the meanings of the Purāṇa and foremost among orators, and asked him a question. ॥2॥
श्लोक ( Shlok ) 3 – 6
भगवन् भारते वर्ष भोगभूमिस्थितिच्युतौ । कर्मभूमिव्यवस्थायां प्रसृतायां यथायथम् ॥३॥
तथा कुलधरोत्पत्तिस्त्वया प्रागेव वर्णिता । नाभिराजश्च तत्रान्त्यो विश्वक्षत्रगणाग्रणीः ॥४॥
स एष धर्मसर्गस्य सूत्रधारं महाधियम् । इक्ष्वाकुज्येष्ठटमृषभं क्वाश्रमे समजीजनत् ॥५॥
तस्य स्वर्गात्रतारादिकल्याणर्द्धिश्च कीदृशी । इदमेतत् त्वया बोद्धमिच्छामस्त्वदनुग्रहात् ॥ ६॥
कि हे भगवन् जब इस भारतवर्ष में भोगभूमि की स्थिति नष्ट हो गयी थी और क्रम-क्रम से कर्मभूमि की व्यवस्था फैल चुकी थी उस समय जो कुलकरों की उत्पत्ति हुई थी उसका वर्णन आप पहले ही कर चुके हैं । उन कुलकरों में अंतिम कुलकर नाभिराज हुए थे जो कि समस्त क्षत्रिय-समूह के अगुआ (प्रधान) थे । उन नाभिराज ने धर्मरूपी सृष्टि के सूत्रधार, महाबुद्धिमान् और इक्ष्वाकु कुल सर्वश्रेष्ठ भगवान् ऋषभदेव को किस आश्रम में उत्पन्न किया था उनके स्वर्गावतार आदि कल्याणकों का ऐश्वर्य कैसा था ? आपके अनुग्रह से हम लोग यह सब जानना चाहते हैं ।।3-6।।
O Bhagavan, when the era of Bhogabhūmi (the land of enjoyment) in Bhāratavarṣa came to an end and, step by step, the system of Karmabhūmi (the land of action and effort) expanded, you have already described the emergence of the Kulakars (patriarchs) during that time.
Among them, the last Kulakar was Nābhirāja, who was the foremost leader of all the Kshatriyas. It was Nābhirāja who gave birth to Bhagavān Ṛṣabhadeva, the supreme intellect, the foremost of the Ikṣvāku lineage, and the creator of the spiritual path.
In which Āśrama (household or stage of life) was Bhagavān Ṛṣabhadeva born? What was the divine magnificence of his heavenly descent (Svargāvatāra) and other auspicious events (Kalyāṇakas)?
By your grace, we wish to know all of this.” ॥3-6॥
श्लोक ( Shlok ) 7
तत्प्रश्नावसितानित्थं व्याजहार गणाधिपः । । स “तान् विकल्मषान् कुर्वन् शुचिभिर्दशनांशुभिः ॥७॥
इस प्रकार जब उन मुनियों का प्रश्न समाप्त हो चुका तब गणनायक गौतम स्वामी अपने दाँतों की निर्मल किरणों के द्वारा मुनिजनों को पापरहित करते हुए बोले ।।7।।
Thus, when the ascetics had completed their question, Gautama Swami, the leader of the disciples, spoke—his pure, radiant teeth casting a glow that symbolically purified the monks, freeing them from sin. ॥7॥
श्लोक ( Shlok ) 8 – 9
इह जम्बूमति द्वीपे भरते खचराचलात् । दक्षिणे मध्यमे खण्डे कालसन्धो पुरोदिते ॥८॥
पूर्वोक्तकुलकृत्स्वन्त्यो नाभिराजोऽग्रिमोऽप्यभूत् । व्यावर्णितायुरुत्सेधरूपसौन्दर्यविभ्रमः ॥९॥
कि हम पहले जिस कालसंधि का वर्णन कर चुके हैं उस कालसंधि (भोगभूमि का अंत और कर्मभूमि का प्रारंभ होने) के समय इसी जंबूद्वीप के भरत क्षेत्र में विजयार्ध पर्वत से दक्षिण की ओर मध्यम–आर्य खंड में नाभिराज हुए थे । वे नाभिराज चौदह कुलकरों में अंतिम कुलकर होने पर भी सबसे अग्रिम (पहले) थे (पक्ष में सबसे श्रेष्ठ थे) । उनकी आयु, शरीर की ऊँचाई, रूप, सौंदर्य और विलास आदि का वर्णन पहले किया जा चुका है ।।8-9।।
Gautama Swami said:
“The time period that we have previously described—when the Bhogabhūmi (land of enjoyment) came to an end and the Karmabhūmi (land of action) began—during that very era, in the Bharata Kṣetra of Jambūdvīpa, to the south of Vijayārdha Mountain, in the Madhyam-Ārya region, Nābhirāja was born.
Although Nābhirāja was the last of the fourteen Kulakars, he was still considered the foremost among them (the greatest in terms of virtues).
His lifespan, height, beauty, grace, and royal splendor have already been described earlier.” ॥8-9॥
श्लोक ( Shlok ) 10
सनाभिर्भाविनां राज्ञां सनाभिः “स्वगुणांशुभिः । मास्वानिव बभौ लोके भास्वन्मौलिर्महाद्युतिः । १०
दैदीप्यमान मुकुट से शोभायमान और महाकांति के धारण करने वाले वे नाभिराज आगामी काल में होने वाले राजाओं के बंधु थे और अपने गुणरूपी किरणों से लोक में सूर्य के समान शोभायमान हो रहे थे ।।10।।
Adorned with a radiant crown and possessing great brilliance, Nābhirāja was like a kinsman to the kings of the future era. He shone in the world like the sun, illuminating it with the rays of his virtues. ॥10॥
श्लोक ( Shlok ) 11
शशीव स कलाधारस्तेजस्वी भानुमानिव । प्रभुः शक्र इवाभीष्टफलदः कल्पशाखिवत् ॥११॥
वे चंद्रमा के समान कलाओं (अनेक विद्याओं) के आधार थे, सूर्य के समान तेजस्वी थे, इंद्र के समान ऐश्वर्यशाली थे और कल्पवृक्ष के समान मनचाहे फल देने वाले थे ।।11।।
He was the abode of many arts and sciences, like the moon; radiant like the sun; majestic like Indra; and as bountiful as the Kalpavriksha, granting desired blessings to all. ॥11॥
श्लोक 12 से 21
द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय – आदिपुराण
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 142 | श्लोक 143 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 191 | श्लोक 192 से 201