भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132
श्लोक 133 से 141 सम्यग्दर्शन की महिमा
यह रत्नहार समान है, संसार को सांत करता है। इसे ग्रहण करने वाला उत्तम जन्म पाता, नरक-तिर्यंच से मुक्त होता। यह मोक्ष का प्रधान अंग है। वज्रजंघ को इसे स्वीकारने का उपदेश दिया।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 133 to 141
श्लोक ( Shlok ) 133
अलंकरिष्णु रोचिष्णु रत्नसारमनुत्तरम् । सम्यक्त्वं हृदये धत्स्व मुक्तिश्रीहारविभ्रमम् ॥१३३
यह सम्यग्दर्शन जीवों को अलंकृत करने वाला है, स्वयं दैदीप्यमान है, रत्नों में श्रेष्ठ है, सबसे उत्कृष्ट है और मुक्तिरूपी लक्ष्मी के हार के समान है । ऐसे इस सम्यग्दर्शनरूपी रत्नहार को हे भव्य, तू अपने हृदय में धारण कर ।।133।।
“This right perception adorns living beings, is self-radiant, the supreme among jewels, the most excellent, and comparable to a garland of gems symbolizing the goddess of liberation. O noble soul, embrace this jewel-like garland of right perception in your heart.”
श्लोक ( Shlok ) 134
सम्यग्दर्शनसद्रत्नं येनासादि दुरासदम् । सोऽचिरान्मुक्तिपर्यन्तां सुखतातिमवाप्नुयात् ॥१३४॥
जिस पुरुष ने अत्यंत दुर्लभ इस सम्यग्दर्शनरूपी श्रेष्ठ रत्न को पा लिया है वह शीघ्र ही मोक्ष तक के सुख को पा लेता है ।।134।।
“The person who attains the extremely rare and precious jewel of right perception quickly attains the bliss of liberation.”
श्लोक ( Shlok ) 135
लब्ध सद्दर्शनो जीवो मुहूर्त्तमपि पश्य यः । संसारलतिकां छित्वा कुरुते ह्वासिनीमसौ ॥१३५॥
देखो, जो पुरुष एक मुहूर्त के लिए भी सम्यग्दर्शन प्राप्त कर लेता है वह इस संसाररूपी बेल को काटकर बहुत ही छोटी कर देता है अर्थात् वह अर्द्ध पुद्गल परावर्तन से अधिक समय तक संसार में नहीं रहता ।।135।।
“Behold, the person who attains right perception even for a single moment cuts down the vine of worldly existence, making it significantly shorter, meaning they do not remain in the cycle of existence for more than half a pudgala paravartan.”
श्लोक ( Shlok ) 136
सुदेवत्व सुमानुष्ये जन्मनी तस्य नेतरत् । दुर्जन्म जायते जातु हृदि यस्यास्ति दर्शनम् ॥१३६॥
जिसके हृदय में सम्यग्दर्शन विद्यमान है वह उत्तम देव और उत्तम मनुष्य पर्याय में ही उत्पन्न होता है । उसके नारकी और तिर्यंचों के खोटे जन्म कभी भी नहीं होते ।।136।।
“One whose heart is endowed with right perception is born only in the superior states of existence as a divine being or an exalted human. They never take birth in the inferior realms of hell or as lower beings.”
श्लोक ( Shlok ) 137
किं वा बहुभिरालापैः श्लाघेपैः वास्तु दर्शने। लब्धेन येन संसारो यात्यनन्तोऽपि सान्तताम् ॥१३७ ॥
इस सम्यग्दर्शन के विषय में अधिक कहने से क्या लाभ इसकी तो यही प्रशंसा पर्याप्त है कि सम्यग्दर्शन के प्राप्त होने पर अनंत संसार भी सांत (अंतसहित) हो जाता है ।।137।।
“What is the benefit of speaking further about this right perception? Its highest praise is sufficient: upon attaining right perception, even the endless cycle of worldly existence becomes finite.”
श्लोक ( Shlok ) 138
तत्त्वं जैनेश्वरीमाज्ञामस्मद्वाक्यात् प्रमाणयन् । अनन्यशरणो भूत्वा प्रतिपद्यस्व दर्शनम् ॥१३८॥
हे आर्य, तू मेरे कहने से अर्हंत देव की आज्ञा को प्रमाण मानता हुआ अनन्यशरण होकर अन्य रागी द्वेषी देवताओं की शरण में न जाकर सम्यग्दर्शन स्वीकार कर ।।138।।
“O noble one, following my words, accept the command of the Arhant Lords as the ultimate authority. Seek refuge solely in them without turning to other attachment- and aversion-driven deities, and embrace right perception.”
श्लोक ( Shlok ) 139
उत्तमाङ्गमिवाङ्गेषु नेत्रद्वयमिवानने । मुक्त्यङ्गेषु प्रधानाङ्गमाप्ताः सद्दर्शनं विदुः ॥139॥
जिस प्रकार शरीर के हस्त, पाद आदि अंगों में मस्तक प्रधान है और मुख में नेत्र प्रधान है उसी प्रकार मोक्ष के समस्त अंगों में गणधरादि देव सम्यग्दर्शन को ही प्रधान अंग मानते हैं ।।139।।
“Just as the head is the most important part of the body and the eyes are the most important feature of the face, similarly, among all components of liberation, the Ganadharas and other divine beings consider right perception as the principal element.”
श्लोक ( Shlok ) 140
अपास्य लोक पाषण्डदेवतासु विमूढताम् । परतीर्थे रनालीढमुज्ज्वलीकुरु दर्शनम् ॥१४०॥
हे आर्य, तू लोकमूढ़ता, पाषंडिमूढ़ता और देवमूढ़ता का परित्याग कर, जिसे मिथ्यादृष्टि प्राप्त नहीं कर सकते ऐसे सम्यग्दर्शन को उज्ज्वल कर―विशुद्ध सम्यग्दर्शन धारण कर ।।140।।
“O noble one, abandon worldly delusion, guru delusion, and delusion towards deities. Illuminate the right perception, which is beyond the reach of the deluded, and embrace pure right perception.”
श्लोक ( Shlok ) 141
संसारलतिकायामं छिन्धि सद्दर्शनासिना । नासि नासन्नभव्यस्त्वं भविष्यतीर्थ नायकः ॥141॥
त् सम्यग्दर्शनरूपी तलवार के द्वारा संसाररूपी लता की दीर्घता को काट । तू अवश्य ही निकट भव्य है और भविष्यत्काल में तीर्थंकर होने वाला है ।।141।।
“With the sword of right perception, cut down the length of the vine of worldly existence. You are undoubtedly a noble soul and destined to become a Tirthankara in the future.”
श्लोक 142 से 151
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132