आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121
श्लोक 122 से 131 अहमिंद्र का रूप
वज्रनाभि का दोषरहित, यौवनयुक्त शरीर क्षण में प्रकट हुआ। यह शुभ परमाणुओं से बना, चाँदनी से घिरा, हंस समान शोभायमान था। वह सिंहासन पर बैठा, पुण्य से अभिषिक्त, फूलमाला और लक्ष्मी से सुशोभित था।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 122 to 131
श्लोक ( Shlok ) 122
इत्यकृत्रिमनिश्शेषपराद्धर्थरचनाञ्चिते । तत्रोपपादशयने ‘पर्याप्तिं स क्षणाद् ययौ ॥१२२॥
इस प्रकार अकृत्रिम और श्रेष्ठ रचना से शोभायमान रहने वाले उस विमान में उपपाद शय्या पर वह देव क्षण-भर में पूर्ण शरीर को प्राप्त हो गया ।।122।।
“Thus, in that viman which was adorned with a natural and excellent creation, the deity attained a complete body in an instant on the prepared bed.”
श्लोक ( Shlok ) 123
दोषधातुमलस्पर्शवर्जितं चारुलक्षणम् । क्षणादाविरभूदस्य रूपमापूर्णयौवनम् ॥१२३॥
दोष, धातु और मल के स्पर्श से रहित, सुंदर लक्षणों से युक्त तथा पूर्ण यौवन अवस्था को प्राप्त हुआ उसका शरीर क्षण-भर में ही प्रकट हो गया था ।।123।।
“His body, free from faults, bodily humors, and impurities, adorned with beautiful features, and having attained full youthfulness, manifested in an instant.”
श्लोक ( Shlok ) 124
अम्लानशोभमस्याभाद् वपुरव्याजसुन्दरम् । दृशोरुत्सवमातन्वदमृतेनेव निर्मितम् ॥१२४॥
जिसकी शोभा कभी म्लान नहीं होती, जो स्वभाव से ही सुंदर है और जो नेत्रों को आनंद देने वाला है ऐसा उसका शरीर ऐसा सुशोभित होता था मानो अमृत के द्वारा ही बनाया गया हो ।।124।।
“His body, whose radiance never fades, naturally beautiful, and pleasing to the eyes, appeared so magnificent as if it were crafted from nectar itself.”
श्लोक ( Shlok ) 125
शुभाः सुगन्धयः स्निग्धा लोके ये कंचनाणवः । तैरस्य देहनिर्माणमभूत् पुण्यानुभावतः ॥१२५॥
इस संसार में जो शुभ सुगंधित और चिकने परमाणु थे, पुण्योदय के कारण उन्हीं परमाणुओं से उसके शरीर की रचना हुई थी ।।125।।
“In this world, his body was formed from the most auspicious, fragrant, and smooth atoms, which came together due to the rise of his merit (punya).”
श्लोक ( Shlok ) 126
पर्याप्त्यनन्तरं सोऽभात् स्वदेहज्योत्स्नया वृतः । शय्योत्सङ्गे नभोरङ्गे शशीवाखण्डमण्डलः ॥ १२६॥
पूर्ण होने के बाद उपपाद शय्या पर अपने ही शरीर की कांतिरूपी चांदनी से घिरा हुआ वह अहमिंद्र ऐसा सुशोभित होता था जैसा कि आकाश में चाँदनी से घिरा हुआ पूर्ण चंद्रमा सुशोभित होता है ।।126।।
“Once complete, that supreme Indra, surrounded by the moonlight-like radiance of his own body on the celestial birth bed, shone brilliantly like the full moon enveloped in its luminous glow in the sky.”
श्लोक ( Shlok ) 127
दिव्यहंसः स तत्तल्पमावसन् क्षणमाबभौ । गङ्गासैकतमाश्लिष्यन्निव हंसयुबैककः ।।१२७॥
उस उपपाद शय्या पर बैठा हुआ वह दिव्यहंस (अहमिंद्र) क्षण-भर तक ऐसा शोभायमान होता रहा जैसा कि गंगा नदी के बालू के टीले पर अकेला बैठा हुआ तरुण हंस शोभायमान होता है ।।127।।
“Seated on the celestial birth bed, that divine swan (Ahmindra) shone brilliantly for a moment, just like a young swan sitting alone on a sandy mound of the Ganges River.”
श्लोक ( Shlok ) 128
सिंहासनमथाभ्यर्णम लंकुर्वन्न्यभादसौ । परार्ध्य निषधोत्सङ्गमाश्रयन्निव भानुमान् ॥१२८॥
उत्पन्न होने के बाद वह अहमिंद्र निकटवर्ती सिंहासन पर आरूढ़ हुआ था । उस समय वह ऐसा शोभायमान होता था जैसा कि अत्यंत श्रेष्ठ निषध पर्वत के मध्य पर आश्रित हुआ सूर्य शोभायमान होता है ।।128।।
“After his birth, that Ahmindra ascended the nearby throne. At that moment, he shone brilliantly, just like the radiant sun resting at the peak of the majestic Nishadha Mountain.”
श्लोक ( Shlok ) 129
स्वपुण्याम्बुभिरेवायमभ्यपेचि न केवलम् । अलंचक्रे च शारीरैर्गुणैरिव विभूषणैः ॥१२९॥
वह अहमिंद्र अपने पुण्यरूपी जल के द्वारा केवल अभिषिक्त ही नहीं हुआ था किंतु शारीरिक गुणों के समान अनेक अलंकारों के द्वारा अलंकृत भी हुआ था ।।129।।
“That Ahmindra was not only anointed with the waters of his own merit but was also adorned with numerous ornaments, just like the virtues of his own body.”
श्लोक ( Shlok ) 130
सोऽधिवक्षःस्थलं दध्रे स्रजमेव न केवलम् । सहजां दिव्यलक्ष्मीं च यावदायुरविप्लुताम् ॥१३०॥
उसने अपने वक्षःस्थल पर केवल फूलों की माला ही धारण नहीं की थी किंतु जीवनपर्यंत नष्ट नहीं होने वाली, साथ-साथ उत्पन्न हुई स्वर्ग की लक्ष्मी भी धारण की थी ।।130।।
“He did not merely wear a garland of flowers on his chest but also bore the divine prosperity of heaven, which was born with him and would remain undiminished throughout his life.”
श्लोक ( Shlok ) 131
अस्नातलिप्तदीप्ताङ्गः सहजाम्बरभूषणः । सोऽद्युतद् द्द्युसदां मूर्ध्नि द्युलोकैकशिखामणिः ॥१३१
स्नान और विलेपन के बिना ही जिसका शरीर सदा दैदीप्यमान रहता है और जो स्वयं साथ-साथ उत्पन्न हुए वस्त्र तथा आभूषणों से शोभायमान है ऐसा वह अहमिंद्र देवों के मस्तक पर (अग्रभाग में) ऐसा सुशोभित होता था मानो स्वर्गलोक का एक शिखामणि ही हो अथवा सूर्य ही हो क्योंकि शिखामणि अथवा सूर्य भी स्नान और विलेपन के बिना ही दैदीप्यमान रहता है और स्वभाव से ही अपनी प्रभा-द्वारा आकाश को भूषित करता रहता है ।।131।।
“Without the need for bathing or anointing, his body always radiated a divine brilliance. Adorned with celestial garments and ornaments that manifested alongside him, that Ahmindra shone at the forefront of the gods, much like the crest jewel of heaven or the sun itself. For, just as the crest jewel and the sun remain ever-luminous without bathing or anointment, so too did he, by his very nature, illuminate the heavens with his splendor.”
श्लोक 132 से 142
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208 श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318 आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121