भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201
श्लोक 202 से 211 मतिवर के पूर्वभव और सिंह की समाधि
पिहितास्रव मुनि ने प्रीतिवर्धन के घर आहार लिया। राजा ने दान दिया, जिससे रत्नवर्षा हुई। सिंह (अतिगृंध्र का जीव) ने यह देखकर जाति-स्मरण पाया, शांत हुआ, और समाधि में बैठ गया। मुनि ने प्रीतिवर्धन को बताया कि यह सिंह भविष्य में चक्रवर्ती और मोक्ष पाएगा। राजा ने सेवा की, मुनि ने नमस्कार मंत्र सुनाया। सिंह ने 18 दिन उपवास कर दिवाकरप्रभ देव बना। प्रीतिवर्धन के सहयोगी भी शांत हुए।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 202 to 211
श्लोक ( Shlok ) 202
पिहितास्रव नामासौ मासक्षपण संयुतः । प्रविष्टो नृपतेः सद्मं चरं श्रर्या मनुक्रमात् ।।२०२।।
पिहितास्रव नाम के मुनिराज एक महीने के उपवास समाप्त कर आहार के लिए भ्रमण करते हुए क्रम-क्रम से राजा प्रीतिवर्धन के घर में प्रविष्ट हुए ।।202।।
“Monk Pihitasrava, after completing a month-long fast, wandered in search of alms and eventually entered King Pritivardhana’s residence.” ( 202)
श्लोक ( Shlok ) 203
ततो नृपतिना तस्मै दत्तं दानं यथाविधि । पातिता च दिवो देवैः वसुधारा कृतारवम् ।।२०३।।
राजा ने उन्हें विधिपूर्वक आहार दान दिया जिससे देवों ने आकाश से रत्नों की वर्षा की और वे रत्न मनोहर शब्द करते हुए भूमि पर पड़े ।।203।।
“The king offered alms to the monk with proper rituals, prompting the gods to shower jewels from the sky. These jewels fell to the ground, producing delightful sounds.” ( 203)
श्लोक ( Shlok ) 204
ततस्तदवलोक्यासौ शार्दूलो जातिमस्मत् । उप शान्तश्च निर्मूर्च्छः शरीराहारमत्य जत् ॥ २०४॥
राजा अतिगृंध्र के जीव सिंह ने भी वहाँ यह सब देखा जिससे उसे जाति-स्मरण हो गया । वह अतिशय शांत हो गया, उसकी मूर्च्छा (मोह) जाती रही और यहाँ तक कि उसने शरीर और आहार से भी ममत्व छोड़ दिया ।।204।।
“The soul of King Atigrantha, now in the form of a tiger, witnessed all this. This awakened his memory of past lives. He became exceedingly calm, his delusion vanished, and he even renounced attachment to his body and food.” ( 204)
श्लोक ( Shlok ) 205
शिलातले निविष्टं च संन्यस्तनिखिलोपधिम् । दिव्यज्ञानमयेनाक्ष्णा सहसाबुद्ध तं मुनिः ।।२०५।।
वह सब परिग्रह अथवा कषायों का त्याग कर एक शिलातल पर बैठ गया । मुनिराज पिहितास्रव ने भी अपने अवधिज्ञानरूपी नेत्र से अकस्मात् सिंह का सब वृत्तांत जान लिया ।।205।।
“He renounced all possessions and passions and sat on a rock surface. Monk Pihitasrava, through his clairvoyant knowledge, instantly became aware of the entire story of the tiger.” (205)
श्लोक ( Shlok ) 206
ततो नृपमुवाचेत्थम स्मिन्नद्रावुपासकः । संन्यासं कुरुते कोऽपि स त्वया परिचर्यताम् ॥206।।
और जानकर उन्होंने राजा प्रीतिवर्धन से कहा कि―हे राजन्, इस पर्वत पर कोई श्रावक होकर (श्रावक के व्रत धारण कर) संन्यास कर रहा है तुम्हें उसकी सेवा करनी चाहिए ।।206।।
“Upon realizing this, he said to King Pritivardhana, ‘O King, there is someone on this mountain who, as a lay disciple, is renouncing worldly attachments. You should serve him.'” (206)
श्लोक ( Shlok ) 207
स चक्रवर्त्तितामेत्य चरमाङ्गः पुरोः पुरा । सूनुर्भूत्वा परं धाम व्रजत्यत्र न संशयः ॥२०७॥
वह आगामी काल में भरतक्षेत्र के प्रथम तीर्थंकर श्रीवृषभदेव के चक्रवर्ती पद का धारक पुत्र होगा और उसी भव से मोक्ष प्राप्त करेगा इस विषय में कुछ भी संदेह नहीं है ।।207।।
“In the future, he will be the son who holds the position of Chakravarti (universal monarch) under Lord Shri Rishabhadeva, the first Tirthankara of Bharat Kshetra, and will attain liberation from that very life. There is no doubt about this.” ( 207)
श्लोक ( Shlok ) 208
इति तद्वचनाज्जातविस्मयो मुनिना समम् । गत्वा नृपस्तमद्राक्षीत् शार्दूलं कृतसाहसम् ॥२०८॥
मुनिराज के इन वचनों से राजा प्रीतिवर्धन को भारी आश्चर्य हुआ । उसने मुनिराज के साथ वहाँ जाकर अतिशय साहस करने वाले सिंह को देखा ।।208।।
The monk’s words greatly astonished King Pritivardhana. He went there with the monk and saw the exceptionally courageous tiger.” ( 208)
श्लोक ( Shlok ) 209
ततस्तस्य सपर्यायां साचिव्यमकरोन्नृपः । मुनिश्चास्मै ददौ कर्णजापं स्वर्गो भवेत्यसौ ॥ २०९ ॥
तत्पश्चात् राजा ने उसकी सेवा अथवा समाधि में योग्य सहायता की और यह देव होने वाला है यह समझकर मुनिराज ने भी उसके कान में नमस्कार मंत्र सुनाया ।।209।।
“Subsequently, the king served and provided appropriate assistance for the tiger’s meditation. Understanding that it was destined to become a divine being, the monk recited the Namaskar Mantra into its ear.” ( 209)
श्लोक ( Shlok ) 210
व्याघ्रोऽष्टादशभिर्भक्त महोभिरुपसंहरन् । दिवाकरप्रभो नाम्ना देवोऽभूत् तद्वि मानके ॥२१०।।
वह सिंह अठारह दिन तक आहार का त्याग कर समाधि से शरीर छोड़ दूसरे स्वर्ग के दिवाकरप्रभ नामक विमान में दिवाकरप्रभ नाम का देव हुआ ।।210।।
“The tiger renounced food for eighteen days and, through meditation, abandoned its body. It was then reborn as a celestial being named Divakaraprabha in the Divakaraprabha celestial plane of the second heaven.” ( 210)
श्लोक ( Shlok ) 211
तदाश्वयं महद् दृष्ट्वा नृपस्यास्य चमूपतिः । मन्त्री पुरोहितश्च द्रागुपशान्ति परां गताः ॥ २११॥
इस आश्चर्य को देखकर राजा प्रीतिवर्धन के सेनापति, मंत्री और पुरोहित भी शीघ्र ही अतिशय शांत हो गये ।।211।।
“Upon witnessing this astonishing event, King Pritivardhana’s commander, ministers, and priest also quickly became exceedingly calm and composed.” ( 211)
श्लोक 212 से 221
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201