भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184
श्लोक 185 से 201 श्रीमती और मंत्रियों का पूर्वभव
श्रीमती धातकीखंड में गृहस्थ पुत्री थी, फिर निर्नामिका हुई, उपवास किए, स्वयंप्रभा बनी, अब श्रीमती है। वज्रजंघ ने मंत्रियों का पूर्वभव पूछा। दमधर ने बताया कि मतिवर प्रभाकरी नगरी में अतिग्रंथ राजा था, नरक गया, व्याघ्र हुआ। प्रीतिवर्धन ने मुनिदान के लिए नगर सजाया, जिससे मुनि वहाँ आए।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 185 to 201
श्लोक ( Shlok ) 185 – 188
ततश्च्युस्वाधुनाभूस्त्वं वज्रजङ्घमहीपतिः । श्रीमती च पुरैकस्मिन् भवे द्वीपे द्वितीयके ॥१८५॥
प्राग्मेरोर्गन्धिले देशे प्रत्यक्पुत्री कुटुम्बिनः । पलालपर्वतग्रामे जाताल्पसुकृतोदयात् ॥१८६॥
तत्रैव विषये भूयः पाटलोग्रामकेऽभवत् । निर्नामिका वणिक्पुत्री संश्रित्य पिहितास्त्र वम् ॥१८७॥
विधिनोपोष्य तत्रासीत् तव देवी स्वयंप्रभा । श्रीप्रभेऽभूदिदानीं च श्रीमती वज्रदन्ततः ॥१८८॥
यह श्रीमती भी पहले एक भव में धातकीखंडद्वीप में पूर्व मेरु से पश्चिम की ओर गंधिलदेश के पलालपर्वत नामक ग्राम में किसी गृहस्थ की पुत्री थी । वहाँ कुछ पुण्य के उदय से तू उसी देश के पाटली नामक ग्राम में किसी वणिक के निर्नामिका नाम की पुत्री हुई । वहाँ उसने पिहितास्रव नामक मुनिराज के आश्रय से विधिपूर्वक जिनेंद्रगुणसंपत्ति और श्रुतज्ञान नामक व्रतों के उपवास किये जिसके फलस्वरूप श्रीप्रभ विमान में स्वयंप्रभा देवी हुई । जब तुम ललितांगदेव की पर्याय में थे तब यह तुम्हारी प्रिय देवी थी और अब वहाँ से चयकर वज्रदंत चक्रवर्ती के श्रीमती पुत्री हुई है ।।185-188।
his lady was previously, in one of her past lives, born as the daughter of a householder in the village named Palalaparvata in Gandhila country, located on Dhātakīkhaṇḍadvīpa between East and West Meru. Due to some merits from that life, she was later born as Nirnamika, the daughter of a merchant in the village of Patali in the same region. There, under the guidance of the monk Pihitasrava, she observed vows related to Jinendra’s virtues and the austerities of the Shrutajñana vow. As a result, she became the goddess Swayamprabha in the Shreeprabha celestial plane. When you were in the form of Lalitanga Deva, she was your beloved goddess, and now, having descended from there, she has been born as Shrimati, the daughter of Emperor Vajradanta. ( 185–188)
श्लोक ( Shlok ) 189
श्रुत्वेति स्वान् भवान् भूयो भूनाथः प्रियया समम् । पृष्टवानिष्टवर्गस्य भवानतिकुतूहलात् ॥१८९॥
इस प्रकार राजा वज्रजंघ ने श्रीमती के साथ अपने पूर्वभव सुनकर कौतूहल से अपने इष्ट संबंधियों के पूर्वभव पूछे ।।189।।
In this way, King Vajrajangha, after hearing about his past life with Shrimati, curiously inquired about the past lives of his dear relatives. ( 189)
श्लोक ( Shlok ) 190
स्वबन्धुनिविशेषा मे स्निग्धा मतिवरादयः । । तत्प्रसीद भवानेषा ब्रूहीत्याख्यच्च तान् मुनिः ॥१९०॥
हे नाथ, ये मतिवर, आनंद, धनमित्र और अकंपन मुझे अपने भाई के समान अतिशय प्यारे हैं इसलिए आप प्रसन्न होइए और इनके पूर्वभव कहिए । इस प्रकार राजा का प्रश्न सुनकर उत्तर में मुनिराज कहने लगे ।।190।।
“O Lord, Mativar, Anand, Dhanmitra, and Akampan are exceedingly dear to me, like my own brothers. Therefore, please be gracious and tell me about their past lives.” Hearing the king’s question, the monk began to reply. ( 190)
श्लोक ( Shlok ) 191 -193
अयं मतिवरोऽत्रैव जम्बूद्वीपे पुरोगते । विदेहो वत्सकावत्यां विषये त्रिदिवोपमे ॥१९१॥
तत्र पुर्या प्रभाकर्यामतिगृदध्रो नृपोऽभवत् । विषयेषु ‘विषक्तात्मा बह्वारम्भ परिग्रहैः ॥ १९२॥
बद्ध्वायुर्नारकं जातः श्वभ्रे पङ्क प्रभाह्वेये । दशाब्ध्युपमितं कालं नारकों वेदनामगात् ॥ १९३॥
हे राजन् इसी जंबूद्वीप के पूर्वविदेह क्षेत्र में एक वत्सकावती नाम का देश है जो कि स्वर्ग के समान सुंदर है, उसमें एक प्रभाकरी नाम की नगरी है । यह मतिवर पूर्वभव में इसी नगरी में अतिग्रंथ नाम का राजा था । वह विषयों में अत्यंत आसक्त रहता था । उसने-बहुत आरंभ और परिग्रह के कारण नरक आयु का बंध कर लिया था जिससे वह मरकर पंकप्रभा नाम के चौथे नरक में उत्पन्न हुआ । वहाँ दशसागर तक नरकों के दुःख भोगता रहा ।।191-193।।
“O King, in the eastern Videha region of this very Jambudvipa, there is a beautiful country named Vatsakavati, comparable to heaven. In that country lies the city of Prabhakari. In his past life, Mativar was the king of that city, known as Atigrantha. He was deeply engrossed in worldly pleasures and, due to extensive involvement in violence and material possessions, bound himself to a lifespan in hell. As a result, after his death, he was born in the fourth hell called Pankaprabha, where he suffered the torments of hell for the duration of ten sagaras.” (191–193)
श्लोक ( Shlok ) 194
ततो निष्पत्य पूर्वोक्तनगरस्य समीपगे । व्याघ्रोऽभूत् प्राक्तनात्मीयधननिक्षेपपर्वते ॥१९४।।
उसने पूर्वभव में पूर्वोक्त प्रभाकरी नगरी के समीप एक पर्वत पर अपना बहुत-सा धन गाड़ रखा था । वह नरक से निकलकर इसी पर्वत पर व्याघ्र हुआ ।।194।।
“In his past life, near the previously mentioned city of Prabhakari, he had buried a great amount of wealth on a mountain. After emerging from hell, he was reborn as a tiger on that very mountain.” ( 194)
श्लोक ( Shlok ) 195
अथान्यदा पुराधीशस्तत्रागत्य समावसत् । निवर्त्य’ स्वानुजन्मानं व्युत्थितं विजिगीषया ॥195॥
तत्पश्चात् किसी एक दिन प्रभाकरी नगरी का राजा प्रीतिवर्धन अपने प्रतिकूल खड़े हुए छोटे भाई को जीतकर लौटा और उसी पर्वतपर ठहर गया ।।195।।
“Subsequently, one day, King Pritivardhana of Prabhakari city, after defeating his rebellious younger brother, returned and stayed on that very mountain.” (195)
श्लोक ( Shlok ) 196
स्वानुजन्मानमत्रस्थं नृपमाख्यत्” पुरोहितः । अत्रैव ते महाँल्लाभो”भविता मुनिदानतः ॥१९६॥
वह वहाँ अपने छोटे भाई के साथ बैठा हुआ था इतने में पुरोहित ने आकर उससे कहा कि आज यहाँ आपको मुनिदान के प्रभाव से बड़ा भारी लाभ होने वाला है ।।196।।
“While he was sitting there with his younger brother, the royal priest approached and said, ‘Today, due to the influence of giving alms to monks, you are destined to receive great fortune here.'” (196)
श्लोक ( Shlok ) 197
स मुनिः कथमेवात्र लभ्यश्चेच्छृणु पार्थिव । वक्ष्ये तदागमोपायं दिव्यज्ञानावलोकितम् ॥१९७॥
हे राजन् वे मुनिराज यहाँ किस प्रकार प्राप्त हो सकेंगे । इसका उपाय मैं अपने दिव्यज्ञान से जानकर आपके लिए कहता हूँ । सुनिए―।।197।।
“O King, how will those monks arrive here? I shall discern the method through my divine knowledge and tell you. Listen carefully.” (197)
श्लोक ( Shlok ) 198 –199
महानद्य नरेन्द्रस्य प्रमदस्तेन’ नागराः । सर्वे यूयं स्वगेहेषु बद्ध्वा केतून् सतोरणान् ॥१९८॥
गृहाङ्गणानि रथ्याश्च कुरुताशुप्रसूनकैः । सोपहाराणि नीरन्ध्रमिति दद्मः प्रघोषणाम् ॥१९९॥
हम लोग नगर में यह घोषणा दिलाये देते हैं कि आज राजा के बड़े भारी हर्ष का समय है इसलिए समस्त नगरवासी लोग अपने-अपने घरों पर पताकाएँ फहराओ, तोरण बाँधो और घर के आंगन तथा नगर की गलियों में सुगंधित जल सींचकर इस प्रकार फूल बिखेर दो कि बीच में कहीं कोई रंध्र खाली न रहे ।।198-199।।
“Let us announce in the city that today is a moment of great joy for the king. Therefore, all the citizens should hoist flags on their homes, decorate with festoons, and sprinkle fragrant water in their courtyards and the city’s streets. Scatter flowers so densely that not a single gap remains.” (198-199)
श्लोक ( Shlok ) 200
ततो मुनिरसौ त्यक्त्वा पुरमत्रागमिष्यति । विचिन्त्याप्रासु कत्वेन विहारायोग्यमात्म नः ॥२००॥
ऐसा करने से नगर में जाने वाले मुनि अप्रासुक होने के कारण नगर को अपने विहार के अयोग्य समझ लौटकर यहाँ पर अवश्य ही आयेंगे ।।200।।
“By doing this, the monks, being non-attached (Aprasuka), will deem the city unsuitable for their stay and will certainly return here.” ( 200)
श्लोक ( Shlok ) 201
पुरोधीवचनात् तुष्टो नृपोऽसौ प्रीतिवर्द्धनः । तत् तथैवाकरोत् प्रीतो मुनिरप्यागमत् तथा ॥२०१
पुरोहित के वचनों से संतुष्ट होकर राजा प्रीतिवर्धन ने वैसा ही किया जिससे मुनिराज लौटकर वहाँ आये ।।201।।
“Being pleased with the priest’s words, King Pritivardhana followed his advice, which caused the monks to return there.” ( 201)
श्लोक 202 से 211
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184