भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291
श्लोक 292 से 301 जिन प्रातिहार्यों का वर्णन
जिन के प्रातिहार्य—अशोकवृक्ष, पुष्पवृष्टि, दिव्य ध्वनि, चमर, सिंहासन, भामंडल, दुंदुभि, छत्र—शोभायमान हैं। ये वैराग्य को नहीं रोकते।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 292 to 301
श्लोक ( Shlok ) 292
प्रातिहार्यमयी भूति त्वं दधानोऽप्यनन्यगाम् । वीतरागो महांश्चासि जगत्येत ज्जिनाद्भुतम् ॥ २९२॥
हे जिनेंद्र, यद्यपि आप अन्यत्र नहीं पायी जाने वाली प्रातिहार्यरूप विभूति को धारण करते हैं तथापि संसार में परम वीतराग कहलाते हैं, यह बड़े आश्चर्य की बात है ।।292।।
O Jinendra, although you possess the extraordinary, incomparable glory that cannot be found elsewhere, you are still called the Supreme Vitaraga (free from attachment) in this world. This is truly a remarkable thing.
श्लोक ( Shlok ) 293
तवायं शिशिरच्छायो भात्यशोकतरुर्महान् । शोकमाश्रितभव्यानां विदूर मपहस्तयन् ॥२९३॥
शीतल छाया से युक्त तथा आश्रय लेने वाले भव्य जीवों के शोक को दूर करता हुआ यह आपका अतिशय उन्नत अशोकवृक्ष बहुत ही शोभायमान हो रहा है ।।293।।
This highly exalted Ashoka tree of Yours, providing cool shade and relieving the sorrow of noble souls seeking refuge, is indeed very beautiful.
श्लोक ( Shlok ) 294
पुष्पवृष्टि दिवो देवाः किरन्ति त्वां जिनाभितः । परितो मेरुमुत्फुल्ला यथा कल्पमहीरुहाः ॥२९४॥
हे जिनेंद्र, जिस प्रकार फूले हुए कल्पवृक्ष मेरु पर्वत के सब तरफ पुष्पवृष्टि करते हैं उसी प्रकार ये देव लोग भी आपके सब ओर आकाश से पुष्पवृष्टि कर रहे हैं ।।294।।
O Jinendra, just as the blooming Kalpavriksha showers flowers all around the Mount Meru, in the same way, these divine beings are showering flowers from the sky all around You.
श्लोक ( Shlok ) 295
दिव्यभाषा तवाशेषभाषाभेदानुकारिणी । “विकरोति मनोध्वान्तमवाचामपि देहिनाम् ॥२९५॥
हे देव समस्त भाषारूप परिणत होने वाली आपकी दिव्य ध्वनि उन जीवों के भी मन का अज्ञानांधकार दूर कर देती है जो कि मनुष्यों की भाँति स्पष्ट वचन नहीं बोल सकते ।।295।।
O Lord, Your divine sound, which manifests in all forms of language, dispels the darkness of ignorance in the minds of beings who, like humans, cannot speak clearly.
श्लोक ( Shlok ) 296
प्रकीर्णकंयुगं भाति त्वां जिनोभयतो धुतम् । पतन्निर्भरसंवादि शशाङ्ककरनिर्मलम् ॥२९६॥
हे जिन, आपके दोनों तरफ ढुराये जाने वाले, चंद्रमा की किरणों के समान उज्ज्वल दोनों चमर ऐसे शोभायमान हो रहे हैं मानों ऊपर से पड़ते हुए पानी के झरने ही हों ।।296।।
O Jin, the two fans, shining brightly like the rays of the moon on either side of You, are so splendid that they seem like waterfalls of water cascading down from above.
श्लोक ( Shlok ) 297
चामीकरविनिर्मार्ण हरिभिर्धृमासनम् । गिरीन्द्रशिखर रस्पर्द्धिराजते जिनराज ते॥२९७॥
हे जिनराज, मेरु पर्वत के शिखर के साथ ईर्ष्या करने वाला और सुवर्ण का बना हुआ आपका यह सिंहासन बड़ा ही भला मालूम होता है ।।297।।
O Lord of the Jinas, this throne of Yours, made of gold and perched atop the peak of Mount Meru, seems to rival even it in grandeur and beauty.
श्लोक ( Shlok ) 298
ज्योतिर्मण्डलमुत्सर्पत् तवालं कुरुते तनुम् । मार्तण्डमण्डलद्वेषि विधुन्वजगतां तमः ॥२९८॥
हे देव, सूर्यमंडल के साथ विद्वेष करने वाला तथा जगत् के अंधकार को दूर करने वाला और सब ओर फैलता हुआ आपका यह भामंडल आपके शरीर को अलंकृत कर रहा है ।।298।।
O Lord, this radiant halo around Your body, which dispels the darkness of the world and extends everywhere, competes with the sun in brilliance, adorning You in divine splendor.
श्लोक ( Shlok ) 299
तवोद्घोषयतीवोच्चैः जगतामेकमर्तृताम् । दुन्दुभिस्तनितं मन्द्रमुच्चरत्पथि वार्मुचाम् ॥२९९॥
हे देव, आकाश में जो दुंदुभि का गंभीर शब्द हो रहा है वह मानो जोर-जोर से यही घोषणा कर रहा है कि संसार के एक मात्र स्वामी आप ही हैं ।।299।।
O Lord, the deep sound of the drum resonating in the sky seems to loudly proclaim that You alone are the supreme ruler of the entire world.
श्लोक ( Shlok ) 300
तवाविष्कुरुते देव प्राभवं भुवनातिगम् । विधुविम्बप्रतिस्पद्धि छत्रत्रितयमुच्छ्रितम् ॥३००॥
। हे देव, चंद्रबिंब के साथ स्पर्धा करने वाले और अत्यंत ऊँचे आपके तीनों छत्र आपके सर्वश्रेष्ठ प्रभाव को प्रकट कर रहे हैं ।।300।।
O Lord, Your three umbrellas, competing with the reflection of the moon and rising high, are revealing Your supreme radiance.
श्लोक ( Shlok ) 301
विभ्राजते जिनैतत्ते प्रातिहार्यकदम्बकम् । त्रिजगत्सारसर्वस्वमिवैकत्र समुच्चितम् ॥३०१॥
हे जिन, ऊपर कहे हुए आपके इन आठ प्रातिहार्यों का समूह ऐसा शोभायमान हो रहा है मानो एक जगह इकट्ठे हुए तीनों लोकों के सर्वश्रेष्ठ पदार्थों का सार ही हो ।।301।।
O Jin, the group of these eight divine ornaments of Yours, as mentioned above, is so splendid that it seems to be the essence of the finest treasures from all three worlds gathered in one place.
श्लोक 302 से 311
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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