भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131
श्लोक 132 से 141 सुविधि का रूप वर्णन (भाग 2)
सुविधि दिग्गज समान था। भुजाएँ वज्र अर्गल, हथेलियाँ तारा-चिह्न युक्त, मध्य कृश, ऊरुएँ तोरण-स्तंभ, चरण लक्ष्मी-सेवित थे। यौवन में छह शत्रुओं पर विजय पाई।
English translation of Ādi purāṇa parv 10 – Shlok 132 to 141
श्लोक ( Shlok ) 132
अंसावभ्युन्नतौ तस्य दिग्गजस्येव सद्गतेः । कुम्भावित रराजाते सुवंशस्थ महोन्नतेः ॥१३२॥
वह सुविधि स्वयं दिग्गज के समान शोभायमान था और उसके ऊँचे उठे हुए दोनों कंधे दिग्गज के कुंभस्थल के समान शोभायमान हो रहे थे । क्योंकि जिस प्रकार दिग्गज सद्गति अर्थात् समीचीन चाल का धारक होता है उसी प्रकार वह सुविधि भी सद्गति अर्थात् समीचीन आचरणों का धारक अथवा सत्पुरुषों का आश्रय था । दिग्गज जिस प्रकार सुवंश अर्थात् पीठ की रीढ़ से सहित होता है इसी प्रकार वह सुविधि भी सुवंश अर्थात् उच्च कुल वाला था और दिग्गज जिस प्रकार महोन्नत अर्थात् अत्यंत ऊँचा होता है उसी प्रकार वह सुनिधि भी महोन्नत अर्थात् अत्यंत उत्कृष्ट था ।।132।।
“Suvidhi himself radiated grandeur like a celestial elephant. His broad, elevated shoulders resembled the majestic humps of a mighty elephant. Just as the celestial elephant embodies noble gait, Suvidhi embodied righteous conduct and was a refuge for virtuous souls. Just as the elephant has a strong spine symbolizing a noble lineage, Suvidhi hailed from a prestigious family. And just as the elephant stands tall in magnificence, Suvidhi too was distinguished by his supreme excellence.”
श्लोक ( Shlok ) 133
‘व्यायामशाखिनावस्य रेजतुर्भूभुजो भुजौ । भूलोकापायरक्षार्थ क्लृप्तौ वा ज्राविवार्गली ॥ १३३॥
उस राजा की अत्यंत लंबी दोनों भुजाएँ ऐसी सुशोभित हो रही थी मानो उपद्रवों से लोक की रक्षा करने के लिए वज्र के बने हुए दो अर्गलदंड ही हों ।।133।।
“The king’s exceedingly long arms appeared splendid, as though they were two thunderbolt-like bars crafted to protect the world from calamities.”
श्लोक ( Shlok ) 134
नखताराभिरुद्भूत चन्द्रार्कस्फुटलक्षणम् । चारुहस्ततलं तस्य नमस्थलमिवाबभौ ॥१३४॥
उसकी दोनों सुंदर हथेलियाँ नखरूपी ताराओं से शोभायमान थी और सूर्य तथा चंद्रमा के चिह्नों से सहित थी इसलिए तारे और सूर्य-चंद्रमा से सहित आकाश के समान शोभायमान हो रही थी ।।134।।
“His two beautiful palms, adorned with star-like nails and marked with the symbols of the sun and moon, appeared as radiant as the sky filled with stars alongside the sun and moon.”
श्लोक ( Shlok ) 135
मध्यमस्य जगन्मध्यविभ्रमं विभ्रदद्युतत् । धृतता’ नवमूद् र्ध्वाधोविस्तीर्ण परिमण्डलम् ॥१३५।।
उसका मध्य भाग लोक के मध्य भाग की शोभा को धारण करता हुआ अत्यंत शोभायमान था, क्योंकि लोक का मध्य भाग जिस प्रकार कृश है उसी प्रकार उसका मध्य भाग भी कृश था और जिस प्रकार लोक के मध्य भाग से ऊपर और नीचे का हिस्सा विस्तीर्ण होता है उसी प्रकार उसके मध्य भाग से ऊपर, नीचे का हिस्सा भी विस्तीर्ण था ।।135।।
“His midsection, embodying the beauty of the middle region of the universe, appeared exceedingly graceful. Just as the universe’s central region is slender, so was his waist slender. Similarly, just as the regions above and below the universe’s center are expansive, his upper and lower body parts were also broad and well-proportioned.”
श्लोक ( Shlok ) 136
जघनाभोगमामुक्त कटिसूत्रमसौ दधे । मेरुनितम्बमालम्बिसेन्द्रचापाम्बुदं यथा ॥१३६॥
जिस प्रकार मेरु पर्वत इंद्रधनुषसहित मेघों से घिरे हुए नितंब भाग (मध्यभाग को) धारण करता है उसी प्रकार वह सुविधि भी सुवर्णमय करधनी को धारण किये हुए नितंब भाग (जघन भाग) को धारण करता था ।।136।।
“Just as Mount Meru, adorned with clouds and accompanied by a rainbow, holds its majestic midsection, similarly, that graceful Suvidhi adorned his hips, encircled by a golden waistband, radiating unparalleled splendor.”
श्लोक ( Shlok ) 137
सोऽधात् कनकराजीवकिञ्जल्कपरिपिञ्जरो । ऊरू जगद् गृहोदग्रतोरणस्तम्भसन्नियौ ॥१३७॥
वह सुविधि, सुवर्ण कमल की केशर के समान पीली जिन दो ऊरुओं को धारण कर रहा था वे ऐसी मालूम होती थीं मानो जगत्रूपी घर के दो तोरण-स्तंभ (तोरण बाँधने के खंभे) ही हों ।।137।।
“Suvidhi’s thighs, golden-yellow like the filaments of a lotus, appeared as though they were two grand pillars supporting the entrance of the house of the universe.”
श्लोक ( Shlok ) 138
जङ्गाद्वयं च सुश्लिष्ट नृणां चित्तस्य रञ्जकम् । साकङ्कारं व्यजेष्टा
स्यसुकवेः काव्य बन्धनम् ॥१३८॥॥
उसकी दोनों जंघाएँ सुश्लिष्ट थीं अर्थात् संगठित होने के कारण परस्पर में सटी हुई थीं, मनुष्यों के चित्त को प्रसन्न करने वाली थीं और उनके अलंकारों (आभूषणों से) सहित थीं इसलिए किसी उत्तम कवि की सुश्लिष्ट अर्थात् श्लेषगुण से सहित मनुष्यों के चित्त को प्रसन्न करने वाली और उपमा, रूपक आदि अलंकारों से युक्त काव्य-रचना को भी जीतती थीं ।।138।।
“His two well-formed thighs, perfectly aligned and close together, delighted the hearts of onlookers. Adorned with ornaments, they surpassed even the finest poetic compositions crafted by accomplished poets—those enriched with intricate metaphors, similes, and literary embellishments.”
श्लोक ( Shlok ) 139
तत्क्रमाब्जं मृदुस्पर्श लक्ष्मी संवाहनोचितम् । शोणिमानं दधे लग्नमिव तस्करपल्लवात् ॥१३९॥
अत्यंत कोमल स्पर्श के धारक और लक्ष्मी के द्वारा सेवा करने योग्य (दाबने के योग्य) उसके दोनों चरण-कमल जिस स्वाभाविक लालिमा को धारण कर रहे थे वह ऐसी मालूम होती थी मानो सेवा करते समय लक्ष्मी के कर-पल्लव से छूटकर ही लग गयी हो ।।139।।
“His lotus-like feet, possessing an exceptionally soft touch and worthy of being served by the goddess Lakshmi, naturally radiated a crimson hue, as if that very color had transferred from Lakshmi’s tender hands while rendering her service.”
श्लोक ( Shlok ) 140
इत्याविष्कृतरूपेश हारिणा चारुलक्ष्मणा । मनांसि जगतां जह्रे स बालाद् बालकोऽपि सन् ॥ १४०॥
इस प्रकार वह सुविधि बालक होने पर भी अनेक सामुद्रिक चिह्नों से युक्त प्रकट हुए अपने मनोहर रूप के द्वारा संसार के समस्त जीवों के मन को जबरदस्ती हरण करता था ।।140।।
“In this way, even as a child, that Suvidhi, adorned with numerous auspicious bodily marks, captivated the hearts of all living beings in the world with his enchanting appearance.”
श्लोक ( Shlok ) 141
स तथा योगनारम्भे मदनोत्को चकारिणो । वशी युवजरन्नासीद रिषड्वर्गनिग्रहात् ॥१४१॥
उस जितेंद्रिय राजकुमार ने काम का उद्रेक करने वाले यौवन के प्रारंभ समय में ही काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद और मात्सर्य इन छह अंतरंग शत्रुओं का निग्रह कर दिया था इसलिए वह तरुण होकर भी वृद्धों के समान जान पड़ता था ।।141।।
“That self-disciplined prince subdued the six inner enemies—desire, anger, greed, delusion, pride, and envy—right at the onset of youth, which is known to stir passions. Therefore, despite being young, he appeared wise and composed like the elders.”
श्लोक 142 से 151
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131