भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
श्लोक 22 से 31 वज्रनाभि का रूप वर्णन
वक्ष लक्ष्मी-आलिंगित, कंधे क्रीड़ा-पर्वत, भुजाएँ तोरण-खंभे, नाभि में वज्र चिह्न था। कटि सरोवर, ऊरु अर्गलदंड, जंघाएँ संधि-प्रतीक, चरण कमल समान थे। उसका रूप देवांगनाओं को मोहित करता था।
English translation of Ādi purāṇa parv 11 – Shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
हारेण कण्ठपर्यन्तवर्त्तिनासौ श्रियं दधे । मृणालवयनेव लक्ष्म्यालिङ्गनसंगिना ॥२२॥
गले के समीप पड़े हुए हार से वह ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो वक्षःस्थलवासिनी लक्ष्मी का आलिंगन करने वाले मृणालवलय (गोल कमलनाल) से ही शोभायमान हो रहा हो ।।22।।
With a garland adorning his neck, he appeared as if he were radiant with a circular lotus-stem bracelet, embracing Goddess Lakshmi residing on his chest. ( 22)
श्लोक ( Shlok ) 23
वक्षोऽस्य पद्मरागांशुच्छुरितं रुचिमानशे । सान्द्रबालातपच्छन्नसानोः कनकशृङ्गिणः ॥२३॥
पद्मरागमणियों की किरणों से व्याप्त हुआ उसका वक्षःस्थल ऐसा सुशोभित हो रहा था मानो उदय होते हुए सूर्य की लाल-लाल सघन प्रभा से आच्छादित हुआ मेरु पर्वत का तट ही हो ।।23।।
His chest, illuminated by the rays of Padmaraga gems, shone brilliantly, resembling the slopes of Mount Meru enveloped in the dense, crimson radiance of the rising sun. ( 23)
श्लोक ( Shlok ) 24
वक्षःस्थलस्य पर्यन्ते तस्यांसौ रुचिमापतुः । लक्ष्म्याः क्रीडार्थमुतुङ्गौ क्रीडाद्री घटिताविव ॥२४॥
वक्षःस्थल के दोनों ओर उसके ऊँचे कंधे ऐसे जान पड़ते थे मानो लक्ष्मी की क्रीड़ा के लिए अतिशय ऊंचे दो क्रीड़ा-पर्वत ही बनाये गये हों ।।24।।
On either side of his chest, his broad shoulders appeared as if they were two lofty play-mountains, specially created for Goddess Lakshmi’s divine pastimes. (24)
श्लोक ( Shlok ) 25
वक्षोभवनपर्यन्ते तोरणस्तम्मविभ्रमम् । बाहू दधतुरस्योच्चैर्हारतोरणधारिणौ ।॥२५॥
हाररूपी तोरण को धारण करने वाली उसकी दोनों भुजाएं वक्ष:स्थलरूपी महल के दोनों ओर खड़े किये गये तोरण बाँधने के खंभों का संदेह पैदा कर रही थी ।।25।।
His arms, adorned with a garland-like arch, appeared like pillars erected on either side of the palace-like chest, creating the illusion of supports for a grand entrance. ( 25)
श्लोक ( Shlok ) 26
वञ्जाङ्ग बन्धनस्यास्य मध्येनाभि समैक्ष्यत । वज्रा लाञ्छनमुद्भूतं वर्त्स्यत्साम्राज्यलान्छनम् ॥२६॥
जिसके शरीर का संगठन वज्र के समान मजबूत है ऐसे उस वज्रनाभि की नाभि के बीच में एक अत्यंत स्पष्ट वज्र का चिह्न दिखाई देता था जो कि आगामी काल में होने वाले साम्राज्य (चक्रवर्तित्व) का मानो चिह्न ही था ।।26।।
The structure of his body was as firm as a thunderbolt, and at the center of his navel, a distinct mark of a thunderbolt was visible—appearing as a divine emblem of his future universal sovereignty (Chakravartin status). ( 26)
श्लोक ( Shlok ) 27
लसद्दुकूलपुलिनं रति हंसी निषेवितम् । परां श्रिय मधादस्य कटिस्थानसरोवरम् ॥ २७॥
जो रेशमी वस्त्ररूपी तट से शोभायमान था और रतिरूपी हंसी से सेवित था ऐसा उसका कटिप्रदेश किसी सरोवर की शोभा धारण कर रहा था ।।27।।
His waist, adorned with the border of silken garments and graced by the laughter of love, resembled the enchanting beauty of a serene lake. ( 27)
श्लोक ( Shlok ) 28
सुवृतमसृणाबूरू तस्य कान्तिमवापताम् । सञ्चरत्कामगन्धेभरोधे क्लृप्ताविवार्गंलौ ॥ २८॥
उसके अतिशय गोल और चिकने ऊरु, यहाँ-वहाँ फिरने वाले कामदेवरूपी हस्ती को रोकने के लिए बनाये गये अर्गलदंडों के समान शोभा को प्राप्त हो रहे शे ।।28।।
His perfectly round and smooth thighs appeared like sturdy barrier rods, crafted to restrain the roaming elephant of desire (Kamadeva). ( 28)
श्लोक ( Shlok ) 29
जानु गुल्फस्पृशौ जङ्घे तस्य शिश्रियतुः श्रियम् । सन्धिमेव युवां धत्तमित्यादेष्टुमिवोद्यते ॥२९॥
घुटनों और पैर के ऊपर की गाठों से मिली हुई उसकी दोनों जंघाएँ ऐसी सुशोभित हो रही थीं मानो लोगों को यह उपदेश देने के लिए ही उद्यत हुई हों कि हमारे समान तुम लोग भी संधि (मेल) धारण करो ।।29।।
His thighs, seamlessly joined at the knees and upper joints, shone beautifully, as if they were poised to impart a lesson to people—urging them to embrace harmony and unity just as they did. (29)
श्लोक ( Shlok ) 30
पद्मकान्तिश्रितावस्य पादावङ्गलिपत्रको । सिपेवे सुचिरं लक्ष्मीर्नं खेन्दुद्युति केसरी ॥३०॥
अँगुलीरूपी पत्तों से सहित और नखरूपी चंद्रमा की कांतिरूपी केशर से युक्त उसके दोनों चरण, कमल की शोभा धारण कर रहे थे और इसीलिए लक्ष्मी चिरकाल से उनकी सेवा करती थी ।।30।।
His feet, adorned with toe-like petals and radiant nails resembling the luminous pollen of a moon-like glow, bore the beauty of a lotus. For this very reason, Goddess Lakshmi had been devotedly serving them since time immemorial. ( 30)
श्लोक ( Shlok ) 31
इति लक्ष्मीपरिष्वङ्गाद स्याति रुचिरं वपुः । नूनं सुराङ्गनानां च कुर्यात् स्वे स्पृहयालुताम् ॥३१॥
इस प्रकार लक्ष्मी का आलिंगन करने से अतिशय सुंदरता को प्राप्त हुआ उसका शरीर अपने में देवांगनाओं की भी रुचि उत्पन्न करता था―देवांगनाएँ भी उस देखकर कामातुर हो जाती थी ।।31।।
Thus, embraced by Goddess Lakshmi, his body attained an extraordinary beauty that even captivated the celestial maidens—who, upon seeing him, became overwhelmed with desire. ( 31)
श्लोक 32 से 41
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
पर्व 1 – श्लोक 1 | पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296 ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 195
आदिपुराण पर्व 10 –श्रीमान् अच्युतेंद्र के ऐश्वर्य का वर्णन पर्व 10 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
आदिपुराण पर्व 11 – श्री भगवान वज्रनाभि के सर्वार्थसिद्धिगमन का वर्णन पर्व 11 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21