संसार की अनित्यता
वज्रदंत ने यमराज को शत्रु, वृद्धावस्था को सेना, और विषयों को दुःखदायक कहा। संसार में सुख अल्प, दुःख अधिक है। विषय अर्जन, भोग, और वियोग में दुःख देते हैं। उन्होंने राज्य अमिततेज को देना चाहा, पर वह तैयार न हुआ।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 72 to 82
श्लोक ( Shlok ) 72
अग्रेसरीजरातङ्काः पार्विणग्राहा स्तरस्विनः । कषायाटविकैः सा र्द्ध यमराइमरोधमी ॥७२॥
यह यमराज संसारी जीवों के साथ सदा युद्ध करने के लिए तत्पर रहता है । वृद्धावस्था इसकी सबसे आगे चलने वाली सेना है, अनेक प्रकार के रोग पीछे से सहायता करने वाले बलवान् सैनिक हैं और कषायरूपी भील सदा इसके साथ रहते हैं ।।72।।
“Yama, the lord of death, is always ready to wage war against worldly beings. Old age is his vanguard army, various diseases are his strong supporting soldiers, and the thorn-like passions are ever his companions.”
श्लोक ( Shlok ) 73
अक्षआमं दृइम्स्येते संतर्षविषमार्चिषा । विषया विषमोत्थान वेदना लुषयःत्यदून् ॥७३॥
ये विषय-तृष्णारूपी विषम ज्वालाओं के द्वारा इंद्रियसमूह को जला देते हैं और विषमरूप से उत्पन्न हुई वेदना प्राणों को नष्ट कर देती है ।।73।।
“These cravings for worldly pleasures scorch the senses with their fierce flames, and the torment arising from them ultimately destroys life.”
श्लोक ( Shlok ) 74
प्राणिनां सुखनल्पीयो भूयिष्ठं दुःखमेव तु । संसृतौ तदिहाश्वासः कस्कः कौतस्कुतोऽथया ॥७४॥
जब कि इस संसार में प्राणियों को सुख तो अत्यंत अल्प है और दुःख ही बहुत है तब फिर इसमें संतोष क्या है और कैसे हो सकता है ? ।।74।।
“When pleasures are so fleeting and suffering is abundant in this world, what satisfaction can there be, and how can one possibly find contentment?”
श्लोक ( Shlok ) 75
तनुमान् विषयानीप्सन् क्लेशैः प्रागेव ताम्यति । भुञ्जानस्तृप्तयोगेन वियोगेऽनुशयानकः ॥75॥
विषय प्राप्त करने की इच्छा करता हुआ यह प्राणी पहले तो अनेक क्लेशों से दुःखी होता है फिर भोगते समय तृप्ति न होने से दुःखी होता है और फिर वियोग हो जाने पर पश्चात्ताप करता हुआ दुःखी होता है । भावार्थ―विषय-सामग्री की तीन अवस्थाएँ होती हैं―1 अर्जन, 2 भोग और 3 वियोग । यह जीव उक्त तीनों ही अवस्थाओं में दुःखी रहता है ।।75।।
“A being desiring worldly pleasures first suffers from numerous hardships in acquiring them, then remains dissatisfied while indulging in them, and finally suffers regret when separated from them.
Meaning: There are three stages of worldly possessions:
- Acquisition
- Enjoyment
- Separation
In all three stages, the being remains afflicted by sorrow.”
श्लोक ( Shlok ) 76
यद्याढ्यतरं तृप्त श्वस्तदाढ्यचरं भवेत् । यच्चाद्य व्यसनेभुक्तं तत्कुलं श्वोवसीयसम् ॥७६॥
जो कुल आज अत्यंत धनाढ्य और सुखी माना जाता है वह कल दरिद्र हो सकता है और जो आज अत्यंत दुःखी है वही कल धनाढ्य और सुखी हो सकता है ।।76।।
“A family that is considered extremely wealthy and prosperous today may become destitute tomorrow, while one that is deeply afflicted today may become wealthy and happy tomorrow.”
श्लोक ( Shlok ) 77
सुखं दुःखानुबन्दंधीदं सदा सनिधनं धनम् । संयोगा विप्रयोगान्ता विपदन्ताश्च संपदः ॥७७॥
सांसारिक सुख दुःख उत्पन्न करने वाला है, धन विनाश से सहित है, संयोग के बाद वियोग अवश्य होता है और संपत्तियों के अनंतर विपत्तियाँ आती हैं ।।77।।
“Worldly pleasures give rise to sorrow, wealth is accompanied by destruction, union is inevitably followed by separation, and prosperity is always followed by adversity.”
श्लोक ( Shlok ) 78
इत्यशाश्वतिकं विश्वं जीवलोकं विलोकयन् । विषयान् विषवन्मेने पर्यन्तविरसानसौ ॥७८॥
इस प्रकार समस्त संसार को अनित्यरूप से देखते हुए चक्रवर्ती ने अंत में नीरस होने वाले विषयों को विष के समान माना था ।।78।।
“Thus, perceiving the entire world as impermanent, the emperor regarded the ultimately insipid worldly pleasures as akin to poison.”
श्लोक ( Shlok ) 79
इति निर्विद्य भोगेषु साम्राज्यभरमात्मनः । सूनवेऽमिततेजोऽभिधानाय स्म प्रदित्सति ॥७९॥
इस तरह विषयभोगों से विरक्त होकर चक्रवर्ती ने अपने साम्राज्य का भार अपने अमिततेज नामक पुत्र के लिए देना चाहा ।।79।।
“Thus, renouncing worldly pleasures, the emperor decided to entrust the responsibility of his empire to his son, Amitatej.”
श्लोक ( Shlok ) 80
प्रदित्सतामुना राज्यं भूयो भूयोऽनुबध्नता । समादिष्टोऽप्यसौ नैच्छत् सानुजो राज्यसंपदम् ॥८०॥
और राज्य देने की इच्छा से उससे बार-बार आग्रह भी किया परंतु वह राज्य लेने के लिए तैयार नहीं हुआ । इसके तैयार न होने पर इसके छोटे भाइयों से कहा गया परंतु वे भी तैयार नहीं हुए ।।80।।
“He repeatedly urged him to accept the throne, but Amitatej refused. When he declined, the emperor turned to his younger sons, but they too were unwilling to accept it.”
श्लोक ( Shlok ) 81
सदेव यदिदं राज्यं युष्माभिः प्रजिहासितम् । नेच्छाम्बलमनेनार्य मा भूदाज्ञाप्रतीपता ॥८१॥
पुष्माभिः सममेवाई प्रयास्यामि तपोवनम् । यौष्माकी या गतिः सा वैममापीत्मयभणीद् गिरम् ॥८२॥ पुष्माभिः सममेवाहं प्रयास्यामि तपोवनम् । यौष्माकी या गतिः सा वै ममापीत्यभणीद् गिरम् ॥८२॥
अमिततेज ने कहा―हे देव, जब आप ही इस राज्य को छोड़ना चाहते हैं तब यह हमें भी नहीं चाहिए । मुझे यह राज्यभार व्यर्थ मालूम होता है । हे पूज्य, मैं आपके साथ ही तपोवन को चलूँगा इससे आपकी आज्ञा भंग करने का दोष नहीं लगेगा । हमने यह निश्चय किया है कि जो गति आपकी है वही गति मेरी भी है ।।81-82।।
“Amitatej said, ‘O revered one, when you yourself wish to renounce this kingdom, it holds no value for me either. This responsibility seems futile to me. I shall accompany you to the hermitage so that I do not disobey your command. I have resolved that wherever you go, I shall follow the same path as you.'”
श्लोक 83 से 91
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 |
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 |
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |