भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31
श्लोक 32 से 41 उत्तरकुरु और कल्पवृक्ष
पात्रदान के पुण्य से दोनों उत्तरकुरु भोगभूमि में जन्मे। वहाँ दस कल्पवृक्ष (मद्यांग, वादित्रांग आदि) हैं, जो मधु, वाद्य, आभूषण आदि देते हैं। मद्य रस है, नशा नहीं करता।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 32 to 41
श्लोक ( Shlok ) 32
भोगाङ्गेरपि जन्तूनां यदि चेदीदृसी दशा । जनाः किमेभिरस्वन्तैः कुरुताप्तमते रतिम् ॥३२॥
हे भव्यजन, जब कि भोगोपभोग के साधनों से ही जीवों की ऐसी अवस्था हो जाती है तब अंत में दुःख देने वाले इन भोगों से क्या प्रयोजन है इन्हें छोड़कर जिनेंद्रदेव के वीतराग मत में ही प्रीति करो ।।32।।
O noble souls, when even the means of pleasure bring living beings to such a tragic state, what is the purpose of indulging in these ultimately sorrowful enjoyments? Abandon them and cultivate devotion to the passionless teachings of Lord Jinedra.
श्लोक ( Shlok ) 33
पात्रदानात्तपुण्येन बद्धोदक्कुरुजायुषौ । क्षणात् कुरून् समासाद्य तत्र तौ जन्म भेजतुः ॥३३॥
उन दोनों ने पात्रदान से प्राप्त हुए पुण्य के कारण उत्तरकुरु भोगभूमि की आयु का बंध किया था इसलिए क्षण-भर में वहीं जाकर जन्म-धारण कर लिया ।।33।।
Due to the merit earned from their charitable deeds, both secured a lifespan in the pleasure-filled land of Uttarakuru. Thus, in an instant, they were reborn there.
श्लोक ( Shlok ) 34
जम्बूद्वीपमहामेरोरुत्तरां दिशमाश्रिताः । सन्त्युदक्कुरवो नाम स्वर्गश्रीपरिहासिनः ॥३४॥
जंबूद्वीप संबंधी मेरु पर्वत से उत्तर की ओर उत्तरकुरु नाम की भोगभूमि है जो कि अपनी शोभा से सदा स्वर्ग की शोभा को हँसती रहती है ।।34।।
To the north of Mount Meru in Jambudweep lies the land of Uttarakuru, a pleasure-filled realm that constantly surpasses and mocks the splendor of heaven with its beauty.
श्लोक ( Shlok ) 35 – 36
मद्यातोद्यत्रिभूषास्त्रग्दीपज्योतिर्गृहाङ्गकाः ।भोजनामन्त्र वस्त्राङ्गा इत्यन्वर्थ समाह्व याः ॥३५॥
यत्र कल्पद्रुमा रम्या दशधा परिकीर्त्तिताः । नानारत्नमयाः स्फीतप्रभोद्योतितदिङ्मुखा
जहाँ मद्यांग, वादित्रांग, भूषणांग, मालांग, दीपांग, ज्योतिरांग, गृहांग, भोजनांग, भाजनांग और वस्त्रांग ये सार्थक नाम को धारण करने वाले दश प्रकार के कल्पवृक्ष हैं । ये कल्पवृक्ष अनेक रत्नों के बने हुए हैं और अपनी विस्तृत प्रभा से दशों दिशाओं को प्रकाशित करते रहते हैं ।।35-36।।
There, ten types of Kalpavrikshas (wish-fulfilling trees) bear meaningful names: Madyang (giver of intoxicating drinks), Vaditrang (provider of musical instruments), Bhushanang (giver of ornaments), Malang (provider of garlands), Deepang (giver of lamps), Jyotirang (radiant with light), Grihang (giver of dwellings), Bhojanang (provider of food), Bhajanang (giver of utensils), and Vastrang (provider of clothes). These Kalpavrikshas are made of various precious gems and illuminate all ten directions with their radiant brilliance.
श्लोक ( Shlok ) 37
मद्याङ्गा मधुमैरेयसीध्वरिष्टासवादिकान् । रसभेदांस्ततामोदान वितरन्त्य मृतोपमान् ॥37॥
इनमें मद्यांगजाति के वृक्ष फैलती हुई सुगंधि से युक्त तथा अमृत के समान मीठे मधु―मैरेय, सीधु, अरिष्ट और आसव आदि अनेक प्रकार के रस देते हैं ।।37।।
The Madyang trees are filled with spreading fragrances and provide various types of nectarine, sweet beverages akin to divine elixirs, including Mareya, Sidhu, Arishta, Asava, and many other delightful drinks.
श्लोक ( Shlok ) 38
कामोद्दीपनसाधर्म्यात् मद्यमित्युपचर्यते । तारवों रसभेदोऽयं यः सेव्यो भोगभूमिजैः ॥३८॥
कामोद्दीपन की समानता होने से शीघ्र ही इन मधु आदि को उपचार से मय कहते हैं । वास्तव में ये वृक्षों के एक प्रकार के रस हैं जिन्हें भोगभूमि में उत्पन्न होनेवाले आर्य पुरुष सेवन करते हैं ।।38।।
Due to their similarity in stimulating desire, these honey-like drinks are quickly termed as “May” (intoxicants) by tradition. In reality, they are a type of sap from the trees, consumed by the noble beings born in the pleasure-filled land (Bhogabhumi).
श्लोक ( Shlok ) 39
मदस्य करणं मद्यं पानशोण्डेर्यदादृतम् । तद् वर्जनीयमार्याणामन्तः करण मोहदम् ॥३९॥
मद्यपायी लोग जिस मद्य का पान करते हैं वह नशा करने वाला है और अंतःकरण को मोहित करने वाला है इसलिए आर्यपुरुषों के लिए सर्वथा त्याज्य है ।।39।।
The intoxicating drinks consumed by ordinary drinkers cause inebriation and captivate the mind, making them entirely unsuitable and worthy of rejection by noble beings.
श्लोक ( Shlok ) 40
पटहान् मर्दलांस्वालं सल्लरीशङ्गकारकम् । फलम्ति पणवाद्यांच वाद्यभेदस्तिदक्षिपाः ॥४०॥
वादित्रांग जाति के वृक्ष में दुंदुभि, मृदंग, झल्लरी, शंख, भेरी, चंगा आदि अनेक प्रकार के बाजे फलते हैं ।।40।।
The Vaditrang trees bear various types of musical instruments as their fruits, including Dundubhi (drums), Mridanga, Jhallari (cymbals), Shankha (conch), Bheri (war drums), and Changa, among many others.
श्लोक ( Shlok ) 41
तुकाकोटिक केयूररुचकाङ्गदवेष्टकान् । हारान् मकुटभेदांश्च” सुवते भूषणाङ्गकाः ॥४१॥
भूषणांग जाति के वृक्ष नूपुर, बाजूबंद, रुचिक, अंगद (अनंत), करधनी, हार और मुकुट आदि अनेक प्रकार के आभूषण उत्पन्न करते हैं ।।41।।
The Bhushanang trees produce various types of ornaments, including anklets (Nupur), armlets (Bajuband), rings (Ruchik), bracelets (Angad/Anant), waistbands (Kardhani), necklaces (Haar), and crowns (Mukut), among many others.
श्लोक 42 से 51
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 |