वज्रदंत का वैराग्य
वज्रदंत ने कमल में मरे भ्रमर को देखकर वैराग्य पाया। उन्होंने विषयों को विषम, शरीर को क्षणभंगुर, और लक्ष्मी को चंचल माना। भोग संताप देते हैं, आयु नष्ट होती है।
भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 62 to 71
श्लोक ( Shlok ) 62
तथासीनस्य चोद्यानपाली विकसितं नवम् । सुगन्धिपद्यमानीय तस्य हस्ते ददौ मुदा ॥६२॥
कि इतने में ही वनपाल ने एक नवीन खिला हुआ सुगंधित कमल लाकर बड़े हर्ष से उनके हाथ पर अर्पित किया ।।62।।
“In the meantime, the forest guard joyfully brought a freshly bloomed fragrant lotus and respectfully offered it into their hands.”
श्लोक ( Shlok ) 63
पाणौकृस्य तदाजिघ्रम् स्थाननामोदसुन्दरम् । संप्रीतः करपद्मेन सविभ्रममविभ्रमत् ॥६३॥
वह कमल राजा के मुख की सुगंध के समान सुगंधित और बहुत ही सुंदर था । उन्होंने उसे अपने हाथ में लिया और अपने करकमल से घुमाकर बड़ी प्रसन्नता के साथ सूँघा ।।63।।
“The lotus was as fragrant as the scent of the king’s face and exceedingly beautiful. They took it in their hand, twirled it gracefully with their lotus-like hands, and inhaled its fragrance with great delight.”
श्लोक ( Shlok ) 64
तद्गन्धलोलुपं तत्र रुद्धं लोकान्तराश्रितम् । दृष्टावलिं विषयासंगाद विरराम” सुधीरसौ ॥६४॥
उस कमल के भीतर उसकी सुगंधि का लोभी एक भ्रमर रुककर मरा हुआ पड़ा था । ज्यों ही बुद्धिमान महाराज ने उसे देखा त्यों ही वे विषयभोगों से विरक्त हो गये ।।64।।
“Inside that lotus, a bee, lured by its fragrance, lay dead. As soon as the wise king saw it, he immediately became detached from worldly pleasures.”
श्लोक ( Shlok ) 65
अहो मदालिरेषोऽव गन्धाकृष्ट्या रसं पिबन् । दिनापायेरुद्धोऽभूद”व्यसुर्षिग्विषयैपिताम् ॥६५॥
वे विचारने लगे कि―अहो, यह मदोन्मत्त भ्रमर इसकी सुगंधि से आकृष्ट होकर यहाँ आया था और रस पीते-पीते ही सूर्यास्त हो जाने से इसी में घिरकर मर गया । ऐसी विषयों की चाह को धिक्कार हो ।।65।।
“They began to reflect, ‘Alas! This intoxicated bee, drawn by the lotus’s fragrance, came here and, while drinking its nectar, was trapped as night fell, ultimately dying within it. Curse this craving for worldly pleasures!'”
श्लोक ( Shlok ) 66
विषया विषमाः पाके किम्पाकसदृशा इमे । आपातरम्या” धिगिमाननिष्टफलदायिनः ॥६६॥
ये विषय किंपाक फल के समान विषम हैं । प्रारंभ काल में अर्थात् सेवन करते समय तो अच्छे मालूम होते हैं परंतु फल देते समय अनिष्ट फल देते हैं इसलिए इन्हें धिक्कार हो ।।66।।
“These worldly pleasures are like poisonous wild fruits. In the beginning, during their enjoyment, they seem delightful, but when they bear fruit, they bring misfortune. Therefore, they are worthy of condemnation.”
श्लोक ( Shlok ) 67
अहो धिगस्तु मोगाङ्गमिदमङ्ग”शरीरिणाम्। ‘विलीयते शरन्मेघविळायमतिपेलवम् ॥६७॥
प्राणियों का यह शरीर जो कि विषय-भोगों का साधन है शरद्ऋतु के बादल के समान क्षण-भर में विलीन हो जाता है इसलिए ऐसे शरीर को भी धिक्कार हो ।।67।।
“This body, which serves as a means for indulging in worldly pleasures, vanishes in an instant like autumn clouds. Therefore, this fleeting body is also worthy of condemnation.”
श्लोक ( Shlok ) 68
तडिदुन्मिपिता लोला लक्ष्मीराकालिकं सुखम् । इमाः स्वप्नद्विदेशीया विनश्वर्यो धनर्द्वयः ॥६८॥
यह लक्ष्मी बिजली की चमक के समान चंचल है, यह इंद्रिय-सुख भी अस्थिर हैं और धन-धान्य आदि की विभूति भी स्वजन में प्राप्त हुई विभूति के समान शीघ्र ही नष्ट हो जाने वाली है ।।68।।
“The pleasures that come merely to entice worldly beings and quickly vanish after doing so — O wise ones, why do you exert such great efforts to attain these fleeting enjoyments?”
श्लोक ( Shlok ) 69
भोगान् भो गाढु मीहन्ते कथमेतान् मनस्विनः । ये विलोभयितुं जन्तूनायान्ति च वियन्ति च॥69॥
जो भोग संसारी जीवों को लुभाने के लिए आते हैं और लुभाकर तुरंत ही चले जाते हैं ऐसे इन विषयभोगों को प्राप्त करने के लिए हे विद्वजनों, तुम क्यों भारी प्रयत्न करते हो ।।69।।
“The pleasures that come merely to entice worldly beings and vanish immediately after enticing them — why do you, O wise ones, exert such great efforts to attain these fleeting enjoyments?”
श्लोक ( Shlok ) 70
वपुरारोग्यमैश्वर्य यौवनं सुखसंपदः । वस्तुवाहनमन्यश्च सुरचापवदस्थिरम् ॥७०॥
शरीर, आरोग्य, ऐश्वर्य, यौवन, सुखसंपदाएँ, गृह, सवारी आदि सभी कुछ इंद्रधनुष के समान अस्थिर हैं ।।70।।
“Body, health, wealth, youth, pleasures, prosperity, homes, and vehicles — all are as fleeting and unstable as a rainbow.”
श्लोक ( Shlok ) 71
तृणाग्रलग्नवार्बिन्दुर्विनिपातोन्मुखो यथा । तथा प्राणभृतामायु र्विलासो विनिपातुकः॥71॥
जिस प्रकार तृण के अग्रभाग पर लगा हुआ जल का बिंदु पतन के सम्मुख होता है उसी प्रकार प्राणियों की आयु का विलास पतन के सम्मुख होता है ।।71।।
“Just as a drop of water on the tip of a blade of grass is on the verge of falling, similarly, the splendor of a being’s lifespan is always on the verge of decline.”
श्लोक 72 से 82
कथामुखवर्णन पर्व 1 – श्लोक 1 से 210 | कथामुखवर्णन पर्व 2 – श्लोक 1 से 162 | पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 239 श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 198 | ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 296 |
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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