भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151
श्लोक 152 से 161 अन्य जीव और मुनियों का प्रस्थान
सिंह आदि चार जीवों ने भी सम्यग्दर्शन पाया। मुनियों ने स्पर्श कर आशीर्वाद दिया। वज्रजंघ ने प्रणाम कर विदा की। मुनि गगनगामी हो गए। वज्रजंघ उत्कंठित हुआ, मुनियों के गुणों का चिंतन किया।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 152 to 161
श्लोक ( Shlok ) 152
अलब्धपूर्वभास्वाद्य सद्दर्शनरसायनम् । प्रापतुस्तौ परां पुष्टि धर्मे कर्मनिबर्हणे ॥१५२॥
जो पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ है ऐसे सम्यग्दर्शनरूपी रसायन का आस्वाद कर वे दोनों ही दंपती कर्म नष्ट करनेवाले जैन धर्म में बड़ी दृढ़ता को प्राप्त हुए ।।152।।
“Tasting the elixir of right perception, which had never been attained before, the couple firmly dedicated themselves to the Jain path, which destroys karmas.”
श्लोक ( Shlok ) 153
शार्दूलार्यादयोऽप्याभ्यां समं सद्दर्शनामृतम् । तथा भेजुर्गुरोरस्य पादमूलमुपाश्रिताः ॥१५३॥
पहले कहे हुए सिंह, वानर, नकुल और सूकर के जीव भी गुरुदेव―प्रीतिंकर मुनि के चरण-मूल का आश्रय लेकर आर्य वज्रजंघ और आर्या श्रीमती के साथ-साथ ही सम्यग्दर्शनरूपी अमृत को प्राप्त हुए थे ।।153।।
“The souls of the previously mentioned lion, monkey, mongoose, and boar also took refuge at the feet of the venerable sage Preetinkar and, along with Arya Vajrajangha and Arya Shrimati, attained the nectar of right perception.”
श्लोक ( Shlok ) 154
तौ दम्पती कृतानन्दसंदर्शितमनोरथौ । मुनीन्द्रौ धर्मसंवेगाच्चिरस्यास्पृक्षतां मुहुः ।।१५४॥
जिन्होंने हर्षसूचक चिह्नों से अपने मनोरथ की सिद्धि को प्रकट किया है ऐसे दोनों दंपतियों को दोनों ही मुनिराज धर्मप्रेम से बार-बार स्पर्श कर रहे थे ।।154।।
“Both the ascetic sages repeatedly touched the two couples with affection for their devotion to Dharma, as they displayed signs of joy, indicating the fulfillment of their spiritual aspirations.”
श्लोक ( Shlok ) 155
जन्मान्तरनिबद्धेन प्रेम्णा विस्फारितेक्षणः । क्षणं मुनिपदाम्भोजसंस्पर्शात् सोऽन्वभूद् धृतिम् ॥१५५
वह वज्रजंघ का जीव जंमांतर संबंधी प्रेम से आँखें फाड़-फाड़कर श्री प्रीतिंकर मुनि के चरण-कमलों की ओर देख रहा था और उनके क्षण-भर के स्पर्श से बहुत ही संतुष्ट हो रहा था ।।155।।
“The soul of Vajrajangha, with love carried over from past births, gazed intently at the lotus feet of Sage Preetinkar and felt immense satisfaction from even a momentary touch.”
श्लोक ( Shlok ) 156 – 157
कृतप्रणाममाशीर्भिराशास्य तमनुस्थितम् । ततो यथोचितं देशं तावृषी गन्तुमुद्यतौ ॥१५६॥
पुनर्दर्शनमस्त्वार्य सद्धर्म मा स्म विस्मरः । इत्युक्त्वान्तर्हितौं सद्यश्चारणौ व्योमचारिणौ ॥ १५७ ॥
तत्पश्चात् वे दोनों चारण मुनि अपने योग्य देश में जाने के लिए तैयार हुए । उस समय वज्रजंघ के जीव ने उन्हें प्रणाम किया और कुछ दूर तक भेजने के लिए वह उनके पीछे खड़ा हो गया । चलते समय दोनों मुनियों ने, उसे आशीर्वाद देकर हित का उपदेश दिया और कहा कि हे आर्य, फिर भी तेरा दर्शन हो, तू इस सम्यग्दर्शनरूपी समीचीन धर्म को नहीं भूलना । यह कहकर वे दोनों गगनगामी मुनि शीघ्र ही अंतर्हित हो गये ।।156-157।।
“Afterward, the two Charan Munis prepared to depart for their suitable destination. At that time, the soul of Vajrajangha bowed to them and stood behind to see them off for some distance. While departing, the two sages blessed him, gave him beneficial teachings, and said, ‘O noble one, may we meet again. Never forget this right perception, which is the true path of Dharma.’ Saying this, the two sky-traveling sages soon disappeared.”
श्लोक ( Shlok ) 158
गतेऽथ चारणद्वन्द्वे सोऽभूदुत्कण्ठितः क्षणम् । प्रेयसां विप्रयोगो हि मनस्तापाय कल्प्यते ।।१५८॥
अनंतर जब दोनों चारण मुनिराज चले गये तब वह वज्रजंघ का जीव एक क्षण तक बहुत ही उत्कंठित होता रहा । सो ठीक ही है, प्रिय मनुष्यों का विरह मन के संताप के लिए ही होता है ।।158।।
“After the departure of the two Charan Munis, the soul of Vajrajangha remained deeply yearning for a moment. This is only natural, as separation from beloved beings inevitably causes anguish to the heart.”
श्लोक ( Shlok ) 159
मुहुर्मुनिगुणा ध्यानै रार्द्रयन्नात्मनो मनः। इति चिन्तामसौ भेजे चिरं धर्मानुबन्धिनीम् ॥159॥
वह बार-बार मुनियों के गुणों का चिंतवन कर अपने मन को आर्द्र करता हुआ चिर काल तक धर्म बढ़ाने वाले नीचे लिखे हुए विचार करने लगा ।।159।।
“Repeatedly contemplating the virtues of the sages and softening his heart, he began reflecting for a long time on the following thoughts that nurtured Dharma.”
श्लोक ( Shlok ) 160
धुनोति दवथुं स्वान्तात् तनोत्यानन्दथु परम् । धिनोति च मनोवृत्तिमहो साधुसमागमः ॥॥१६०।।
अहा कैसा आश्चर्य है कि साधु पुरुषों का समागम हृदय से संताप को दूर करता है, परम आनंद को बढ़ाता है और मन की वृत्ति को संतुष्ट कर देता है ।।160।।
“Ah, what a wonder it is that the company of virtuous sages removes sorrow from the heart, enhances supreme bliss, and brings satisfaction to the mind.”
श्लोक ( Shlok ) 161
मुष्णाति दुरितं दूरात् परं पुष्णाति योग्यताम् । भूयः श्रेयोऽनुबध्नाति प्रायः साधुसमागमः ।।१६१
प्राय: साधु पुरुषों का समागम दूर से ही पाप को नष्ट कर देता है, उत्कृष्ट योग्यता को पुष्ट करता है, और अत्यधिक कल्याण को बढ़ाता है ।।161।।
“The association of virtuous sages generally destroys sin from afar, strengthens noble virtues, and greatly enhances supreme well-being.”
श्लोक 162 से 171
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151