भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
श्लोक 282 से 291 जिन गुणों की स्तुति
वज्रदंत ने कहा कि जिन धर्मोपदेश से चातकों को आनंदित करते हैं, मोक्षमार्ग दिखाते हैं, वैभव छोड़ मुक्ति पाते हैं, और तप से कर्म नष्ट करते हैं। उनकी दया से संसार नहीं बढ़ता।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 282 to 291
श्लोक ( Shlok ) 282
त्वया प्रवर्षता धर्मवृष्टिं दुष्कर्मधर्मतः । ओदन्पङ्गवभृवारिस्पृहां नवघनाथितम् ॥२८२॥
हे प्रभो, आपने धर्मोपदेशरूपी वर्षा करके, दुष्कर्मरूपी संताप से अत्यंत प्यासे संसारी जीवरूपी चातकों को नवीन मेघ के समान आनंदित किया है ।।282।।
O Lord, by showering the rain of righteous teachings, You have delighted the worldly beings, who are like thirsty chataka birds suffering from the scorching heat of sinful actions, just as a fresh cloud brings joy to the parched earth.
श्लोक ( Shlok ) 283
त्वया प्रदर्शितं मार्गमासेवन्ते हितैषिणः । भास्वता द्योतितं मार्गमिव कार्यार्थिनो जनाः ॥२८३॥
हे देव, जिस प्रकार कार्य की सिद्धि चाहने वाले पुरुष सूर्य के द्वारा प्रकाशित हुए मार्ग की सेवा करते हैं―उसी मार्ग से आते-जाते हैं उसी प्रकार आत्महित चाहने वाले पुरुष आपके द्वारा दिखलाये हुए मोक्षमार्ग की सेवा करते हैं ।।283।।
O Lord, just as people seeking success follow the path illuminated by the sun, similarly, those desiring self-liberation faithfully tread the path of salvation shown by You.
श्लोक ( Shlok ) 284
संसारोच्छेदने बीजं त्वया तत्वं निदर्शितम् । आत्रिकामुत्रिकार्थानां यतः सिद्धिरिहाङ्गिनाम् ॥२८४॥
हे देव, आपके द्वारा निरूपित तत्त्व जन्ममरणरूपी संसार के नाश करने का कारण है तथा इसी से प्राणियों की इस लोक और परलोकसंबंधी समस्त कार्यों की सिद्धि होती है ।।284।।
O Lord, the principles established by You are the cause of the destruction of the cycle of birth and death. Through these principles, beings achieve success in all matters related to this world and the afterlife.
श्लोक ( Shlok ) 285
लक्ष्मीसर्वस्वमुज्झित्वा साम्राज्यं प्राज्यवैभवम् । त्वया चित्रमुदूढासौ मुक्ति श्रीः स्पृहयालुना ॥२८५॥
हे प्रभो, आपने लक्ष्मी के सर्वस्वभूत तथा उत्कृष्ट वैभव से युक्त साम्राज्य को छोड़कर भी इच्छा से सहित हो मुक्तिरूपी लक्ष्मी का वरण किया है, यह एक आश्चर्य की बात है ।।285।।
O Lord, it is truly astonishing that, even though endowed with supreme wealth and sovereignty, you willingly chose the divine goddess of liberation over worldly prosperity.
श्लोक ( Shlok ) 286
दयावल्लीपरिष्वक्तोमहोदर्को महोन्नतिः । प्रार्थितार्थान् प्रपुष्णाति भवान् कल्पद्रुमो यथा ॥२८६॥
हे देव, आप दयारूपी लता से वेष्टित हैं, स्वर्ग आदि बड़े-बड़े फल देने वाले हैं, अत्यंत उन्नत हैं―उदार हैं और मनवान्छित पदार्थ प्रदान करने वाले हैं इसलिए आप कल्पवृक्ष के समान हैं ।।286।।
O Lord, you are entwined with the vine of compassion, bear great fruits like heaven and other blessings, are supremely elevated, generous, and grant all desired wishes. Therefore, you are akin to the divine Kalpavriksha (wish-fulfilling tree).
श्लोक ( Shlok ) 287
त्वया कर्ममहाशत्रूनुच्चानुश्छेतुमिच्छता । धर्मचकं तपोभारं पाणौकृतमसंभ्रमम् ॥२८७
हे देव, आपने कर्मरूपी बड़े-बड़े शत्रुओं को नष्ट करने की इच्छा से तपरूपी धार से शोभायमान धर्मरूपी चक्र को बिना किसी घबराहट के अपने हाथ में धारण किया है ।।287।।
O Lord, with the desire to destroy the formidable enemies of karma, you have fearlessly wielded the wheel of righteousness, adorned with the sharp edge of austerity.
श्लोक ( Shlok ) 288
न बद्धो भ्रकुटिन्यासोन दृष्ठौष्ठं मुखाम्बुजम् । न भिन्न सौष्ठवं स्थानं व्यरच्यरिजये त्वया ॥२८८॥
हे देव, कर्मरूपी शत्रुओं को जीतते समय आपने न तो अपनी भौंह ही चढ़ायी, न ओठ ही चबाये, न मुख की शोभा नष्ट की और न अपना स्थान ही छोड़ा है ।।288।।
O Lord, while conquering the enemies in the form of karma, you neither furrowed your brows, nor bit your lips, nor lost the radiance of your face, nor abandoned your position.
श्लोक ( Shlok ) 289
दयालुनापि दुःसाध्यमोहशत्रुजिगीषया । तपःकुठारे कठिने स्वया व्यापारितः करः ॥२८९॥
हे देव, आपने दयालु होकर भी मोहरूपी प्रबल शत्रु को नष्ट करने की इच्छा से अतिशय कठिन तपश्चरणरूपी कुठार पर अपना हाथ चलाया है अर्थात् उसे अपने हाथ में धारण किया है ।।289।।
O Lord, though compassionate by nature, you wielded the exceedingly difficult axe of severe austerity to destroy the formidable enemy in the form of delusion.
श्लोक ( Shlok ) 290
स्वया संसारदुर्वल्ली रूढाऽज्ञानजलोक्षणैः । नाना दुःखफला चित्रं वर्द्धितापि न वर्द्धते ॥ २९०॥
हे देव, अज्ञानरूपी जल के सींचने से उत्पन्न हुई और अनेक दुःखरूपी फल को देने वाली संसाररूपी लता आपके द्वारा वर्धित होने पर भी बढ़ाये जाने पर भी बढ़ती नहीं है यह भारी आश्चर्य की बात है (पक्ष में आपके द्वारा छेदी जाने पर बढ़ती नहीं है अर्थात् आपने संसाररूपी लता का इस प्रकार छेदन किया है कि वह फिर कभी नहीं बढ़ती ।) भावार्थ―संस्कृत में ‘वृधु’ धातु का प्रयोग छेदना और बढ़ाना इन दो अर्थों में होता है । श्लोक में आये हुए वर्धिता शब्द का जब ‘बढ़ाना’ अर्थ में प्रयोग किया जाता है तब विरोध होता है और जब छेदन अर्थ में प्रयोग किया जाता है तब उसका परिहार हो जाता है ।।290।।
O Lord, it is truly astonishing that the vine of worldly existence, nourished by the water of ignorance and bearing fruits of countless sorrows, does not grow despite being nurtured by You. (In fact, it never grows again because You have cut it in such a way that it is completely destroyed forever.)
श्लोक ( Shlok ) 291
प्रसीदति भवत्पादपद्मे पद्मा प्रसीदति । विमुखे याति बैमुख्यं भवन्माध्यस्थ्यमोदृशम् ॥ २९१॥
हे भगवन्, आपके चरण-कमल के प्रसन्न होने पर लक्ष्मी प्रसन्न हो जाती है और उनके विमुख होने पर लक्ष्मी भी विमुख हो जाती है । हे देव, आपकी यह मध्यस्थ वृत्ति ऐसी ही विलक्षण है ।।291।।
O Lord, when your lotus feet are pleased, Goddess Lakshmi becomes pleased, and when they turn away, she too withdraws. O Divine One, this impartial disposition of yours is truly remarkable.
Note: In Sanskrit, the root “वृधु” (vridhu) can mean both “to grow” and “to cut.” In this verse, when “वर्धिता” is interpreted as “to grow,” a contradiction arises. However, when interpreted as “to cut,” the meaning becomes harmonious.
श्लोक 292 से 301
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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