भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51
श्लोक 52 से 61 उत्तरकुरु की शोभा
उत्तरकुरु में रत्नमयी भूमि, चार अंगुल घास, कमल तालाब, कोमल वायु, और पुष्पपराग से शोभा है। न गरमी, न वर्षा, न दुष्ट जंतु हैं। सुख सदा एकरूप रहता है।
English translation of Ādi purāṇa parv 9- Shlok 52 to 61
श्लोक ( Shlok ) 52
सर्वरत्नमयं यत्र धरणीतलमुज्ज्वलेः । प्रसूनैः सोपहारत्वात् मुच्यते जातु न श्रिया ॥५२॥
जहाँ की पृथ्वी सब-प्रकार के रत्नों से बनी हुई है और उस पर उज्जवल फूलों का उपहार पड़ा रहता है इसलिए उसे शोभा कभी छोड़ती ही नहीं है ।।52।।
The land there is made of all kinds of precious gems and is adorned with radiant flowers scattered across it. Therefore, its beauty never fades. ||52||
श्लोक ( Shlok ) 53
यत्र तृण्या महीपृष्ठं चतुरङ्गुलसंमिता । शुकच्छायांकेनेव प्रच्छादयति हारिणी ॥५३॥
जहाँ की भूमि पर हमेशा चार अंगुल प्रमाण मनोहर घास लहलहाती रहती है जिससे ऐसा मालूम होता है कि मानो हरे रंग के वस्त्र से भूपृष्ठ को ढक रही हो अर्थात् जमीन पर हरे रंग का कपड़ा बिछा हो ।।53।।
The land there is always covered with lush, charming grass about four fingers high, giving the impression that the earth’s surface is draped with a green-colored fabric. ||53||
श्लोक ( Shlok ) 54
मृगाश्चरन्ति यत्रत्याः कोमलास्तृणसंपदः । स्वाद्वीर्भृदयसीर्हृद्या रसायनरसास्थया
जहाँ के पशु स्वादिष्ट, कोमल और मनोहर तृणरूपी संपत्ति को रसायन समझकर बडे हर्ष से चरा करते हैं ।।54।।
The animals there graze joyfully, considering the delicious, tender, and delightful grass-like treasure to be a form of elixir. ||54||
श्लोक ( Shlok ) 55
सोत्पला दीर्घिका यत्र विदलत्कनकाम्बुजाः । हंसानां कलमन्द्रेण विरुतेन मनोहराः ॥५५॥
जहाँ अनेक वापिकाएँ हैं जो कमलों से सहित हैं, उनमें सुवर्ण के समान पीले कमल फूल रहे हैं और जो हंसों के मधुर तथा गंभीर शब्दों से अतिशय मनोहर जान पड़ती हैं ।।55।।
There are numerous lotus-filled ponds, where golden-yellow lotuses bloom. These ponds appear exceptionally delightful, resonating with the sweet and melodious sounds of swans. ||55||
श्लोक ( Shlok ) 56
सरांस्युत्फुल्लपद्मानि वनमुन्मत्तकोकिलम् । क्रीडाद्रयश्च रुचिराः सन्ति यत्र पदे पदे ॥56
जहाँ जगह-जगह पर फूले हुए कमलों से सुशोभित तालाब, उन्मत्त कोकिलाओं से भरे हुए वन और सुंदर क्रीड़ापर्वत हैं ।।56।।
There are lotus-adorned ponds scattered everywhere, forests filled with blissful cuckoos, and beautiful mountains for playful activities. ||56||
श्लोक ( Shlok ) 57
यत्राधूय तरुन्मन्दभावाति मृदुमारुतः । पटवासमिवातन्वन् मकरन्दरजोऽमितः ॥५७॥
जहाँ कोमल वायु वृक्षों को हिलाता हुआ धीरे-धीरे बहता रहता है । वह वायु बहते समय सब ओर कमलों की पराग को उड़ाता रहता है जिससे ऐसा मालूम होता है मानो सब ओर सुगंधित चूर्ण ही फैला रहा हो ।।57।।
The gentle breeze there softly sways the trees as it flows slowly. While flowing, it carries lotus pollen everywhere, making it seem as though fragrant powder is being spread all around. ||57||
श्लोक ( Shlok ) 58
यत्र गन्धवहाधूतैराकीर्णा पुष्परेणुभिः । वसुधा राजते पीत क्षौमेणेवावकुण्ठिता ।॥५८॥
जहाँ वायु के द्वारा उड़कर आये हुए पुष्पपराग से ढकी हुई पृथ्वी ऐसी शोभायमान हो रही है मानो पीले रंग के रेशमी वस्तु से ढकी हो ।।58।।
The earth, covered with flower pollen carried by the breeze, appears radiant, as if draped in yellow silk fabric. ||58||
श्लोक ( Shlok ) 59
यत्रामोदितदिग्भागैः मरुद्भिः पुष्पजं रजः । नभसि श्रियमाधत्ते वितानस्याभितो हृतम् ।।59।।
जहाँ दशों दिशाओं में वायु के द्वारा उड़-उड़कर आकाश में इकट्ठा हुआ पुष्पपराग सब ओर से तने हुए चंदोवा की शोभा धारण करता है ।।59।।
In all ten directions, the flower pollen carried by the wind gathers in the sky, creating a beautiful canopy-like appearance stretched across the heavens. ||59||
श्लोक ( Shlok ) 60
यत्र नातपसंबाधा न वृष्टिर्न हिमादयः । नेतयो दन्दशूका वा प्राणिनां भयहेतवः ।।६०।।
जहाँ न गरमी का क्लेश होता है, न पानी बरसता है, न तुषार आदि पड़ता है, न अतिवृष्टि आदि ईतियाँ हैं और न प्राणियों को भय उत्पन्न करने वाले साँप, बिच्छू, खटमल आदि दुष्ट जंतु ही हुआ करते हैं ।।60।।
There is neither the discomfort of heat, nor rainfall, nor frost. There are no calamities like heavy downpours, nor are there harmful creatures such as snakes, scorpions, or bedbugs that cause fear to living beings. ||60||
श्लोक ( Shlok ) 61
न ज्योत्स्ना नाप्यहोरात्रविभागो नर्तुसंक्रमः । निस्यैकवृत्तयो भावा यत्रैषां सुखहेतवः ।।६१।।
जहाँ न चाँदनी है, न रात-दिन का विभाग और न ऋतुओं का परिवर्तन ही है, जहाँ सुख देने वाले सब पदार्थ सदा एक से रहते हैं ।।61।।
There is neither moonlight, nor division between day and night, nor any change of seasons. All pleasurable elements remain constant and unchanging forever. ||61||
श्लोक 62 से 71
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 257
आदिपुराण पर्व 9– श्रीमती और वज्रजंघ आर्य को सम्यग्दर्शन की उत्पत्ति का वर्णन पर्व 9 श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51