भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211
श्लोक 212 से 221 मंत्रियों के पूर्वभव
सेनापति, मंत्री, पुरोहित ने दान की अनुमोदना की, उत्तरकुरु में आर्य हुए, फिर स्वर्ग में देव बने—कनकाभ, प्रभंजन, प्रभाकर। ये ललितांगदेव के परिवार में थे। सिंह का जीव मतिवर, प्रभाकर का अकंपन, कनकप्रभ का आनंद, और प्रभंजन का धनमित्र बना। वज्रजंघ और श्रीमती धर्म से प्रभावित हुए। वज्रजंघ ने चार जानवरों के निर्भय होने का कारण पूछा।
English translation of Ādi purāṇa parv 8- Shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212
नृपदानानुमोदेन कुरुष्वार्यास्ततोऽभवन् । कालान्ते ते ततो गत्वा श्रीमदैशानकल्पजाः ॥ २१२॥
इन सभी ने राजा के द्वारा दिये हुए पात्रदान की अनुमोदना की थी इसलिए आयु समाप्त होने पर वे उत्तरकुरु भोगभूमि में आर्य हुए ।।212।।
“Since all of them had approved the king’s act of offering alms, upon the completion of their lifespans, they were reborn as Aryas in the Uttarakuru land of enjoyment.” ( 212)
श्लोक ( Shlok ) 213 – 214
सुरा जाता विमानेशा मन्त्री काञ्चनसंज्ञके। विमाने कनकाभोऽभूत् रुषिताख्ये पुरोहितः ॥२१३॥
प्रभञ्जनोऽभूत् सेनानीः प्रभानाम्नि प्रभाकरः । ललिताङ्ग भवे युष्मत्परिवारामरा इमे ॥२१४॥
और आयु के अस्त में ऐशान स्वयं में लक्ष्मीमान् देव हुए । उनमें से मंत्री, कांचन नामक विमान में कनकाभ नाम का देव हुआ, पुरोहित रुषित नाम के विमान में प्रभंजन नाम का देव हुआ और सेनापति प्रभानामक विमान में प्रभाकर नाम का देव हुआ । आपकी ललितांगदेव की पर्याय में ये सब आपके ही परिवार के देव थे ।।213-214।।
“At the end of their lifespan, they were reborn as prosperous gods in the Aishana celestial plane. Among them, the minister became a god named Kanakabh in the Kanchana plane, the priest became a god named Prabhanjana in the Rushita plane, and the commander became a god named Prabhakara in the Prabha plane. During your incarnation as Lalitanga Deva, all of them were part of your divine family.” (213-214)
श्लोक ( Shlok ) 215
ततः प्रच्युत्य शार्दूलचरो देवोऽभवत् स ते । मन्त्री मतिवरः सूनुः श्रीमत्यां मतिसागरात् ॥२१५॥
सिंह का जीव वहाँ से च्युत हो मतिसागर और श्रीमती का पुत्र होकर आपका मतिवर नाम का मंत्री हुआ है ।।215।।
“The soul of the tiger, after descending from there, was reborn as the son of Matisagara and Shrimati, becoming your minister named Mativar.” ( 215)
श्लोक ( Shlok ) 216
अपराजितसेनान्यः च्युतः स्वर्गात् प्रमाकरः । आर्जवायाश्च पुत्रोऽभूदकम्पनसमाह्वयः ॥२१६॥
प्रभाकर का जीव स्वर्ग से च्युत होकर अपराजित सेनानी और आर्जवा का पुत्र होकर आपका अकंपन नाम का सेनापति हुआ है ।।216।।
“The soul of Prabhakara, after descending from heaven, was born as the son of the warrior Aparajita and Arjava, becoming your commander named Akampan.” ( 216)
श्लोक ( Shlok ) 217
श्रुतकीर्ते रथानन्तमत्याश्च कनकप्रभः । सुतोऽभूदयमानन्दः पुरोधास्तव संमतः ॥ २१७॥
कनकप्रभ का जीव श्रुतकीर्ति और अनंतमती का पुत्र होकर आपका आनंद नाम का प्रिय पुरोहित हुआ है ।।217।।
“The soul of Kanakaprabha was reborn as the son of Shrutakirti and Anantamati, becoming your beloved priest named Anand.” ( 217)
श्लोक ( Shlok ) 218
प्रभञ्जनश्ध्युतस्तस्मात् श्रेष्ठ्यभूद् धनमित्रकः । धनदत्तोदरे जातो धनदत्ताद् धनर्द्धिमान् ॥२१८॥
तथा प्रभंजन देव वहाँ से च्युत होकर धनदत्त और धनदत्ता का पुत्र होकर आपका धनमित्र नाम का संपत्तिशाली सेठ हुआ है ।।218।।
“The soul of Prabhanjana Deva, after descending from there, was born as the son of Dhanadatta and Dhanadatta, becoming your wealthy merchant named Dhanmitra.” ( 218)
श्लोक ( Shlok ) 219
इति तस्य मुनीन्द्रस्य वचः श्रुत्वा नराधिपः । श्रीमती च तदा धर्मे परं संवेगमापतुः ॥२१९॥
इस प्रकार मुनिराज के वचन सुनकर राजा वज्रजंघ और श्रीमती―दोनों ही धर्म के विषय में अतिशय प्रीति को प्राप्त हुए ।।219।।
“Hearing these words of the monk, King Vajrajangha and Shrimati both developed profound devotion toward Dharma.” ( 219)
श्लोक ( Shlok ) 220 – 221
राजा सविस्मयं भूयोऽप्यपृच्छत् तं मुनीश्वरम् । अमी नकुलशार्दूलगोलाङ्गुलाः ससूकराः ॥२२०॥
कस्मादस्मिञ्जकीर्णे देशे तिष्ठन्त्यनाकुलाः । भवम्मुखारविन्दावलोकने दत्तदृष्टयः ॥२२१॥
राजा वज्रजंघ ने फिर भी बड़े आश्चर्य के साथ उन मुनिराज से पूछा कि ये नकुल, सिंह, वानर और शूकर चारों जीव आपके मुख-कमल को देखने में दृष्टि लगाये हुए इन मनुष्यों से भरे हुए स्थान में भी निर्भय होकर क्यों बैठे हैं ? ।।220-221।।
“King Vajrajangha, still filled with great wonder, asked the monk, ‘Why are these four creatures — a mongoose, a lion, a monkey, and a boar — fearlessly sitting here, gazing intently at your lotus-like face, even in this place crowded with humans?'” ( 220-221)
श्लोक 222 से 231
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 318
आदिपुराण पर्व 8 – श्रीमती और वज्रजंघ के पात्रदान का वर्णन पर्व 8 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 104 | श्लोक 105 से 118 | श्लोक 119 से 135 | श्लोक 136 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 201 | श्लोक 202 से 211