भगवज्जिनसेनाचार्य विरचित आदिपुराण Ādi purāṇa by Acharya Jinasena
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
श्लोक 242 से 251 पाणिग्रहण और उत्सव
नगाड़े बजे, वारांगनाएँ गीत-नृत्य करती थीं। वज्रदंत ने शृंगार धारण किया। वज्रजंघ ने श्रीमती का पाणिग्रहण किया; दोनों के स्पर्श से संताप दूर हुआ। श्रीमती कल्प-लता समान शोभायमान हुई।
English translation of Ādi purāṇa parv 7- Shlok 242 to 251
श्लोक ( Shlok ) 242
ततो मधुरगम्भीरमानकाः कोणताडिताः । दध्वनुर्ध्वनदम्भोधि गभीरध्वनयस्तदा ॥२४२॥
उस समय समुद्र के समान गंभीर शब्द करते हुए, डंडों से बजाये गये नगाड़े बड़ा ही मधुर शब्द कर रहे थे ।।242।।
At that time, the drums, beaten with sticks, produced a deep, resonant sound, similar to the ocean, and their sweet sound filled the air. ||242||
श्लोक ( Shlok ) 243
मङ्गलोद्गानमातेनुर्वारवध्वः कलं तदा । “उत्साहान् पेठुरभितो वन्दिनः सह “मागधाः ।।२४३।।
वारांगनाएँ मधुर मंगल गीत गा रही थीं और बंदीजन मागध जनों के साथ मिलकर चारों ओर उत्साहवर्धक मंगल पाठ पढ़ रहे थे ।।243।।
The courtesans were singing sweet auspicious songs, and the prisoners, along with the Magadha people, were chanting uplifting auspicious prayers all around. ||243||
श्लोक ( Shlok ) 244
बर्द्धमानलयैनृप्तमारेभे ललितं तदा । वाराङ्गनाभिरुद् भ्रूभि रणन्नूपुरमेखलम् ।।२४४।।
जिनकी भौं: कुछ-कुछ ऊपर को उठी हुई हैं ऐसी वारांगनाएँ लय-तान आदि से सुशोभित तथा रुन-झुन शब्द करते हुए नूपुर और मेखलाओं से मनोहर नृत्य कर रही थीं ।।244।।
The courtesans, with their brows slightly raised, were performing graceful dances adorned with anklets and waistbands, creating enchanting sounds with the jingling of their ornaments, and were beautifully embellished with rhythm and melody. ||244||
श्लोक ( Shlok ) 245
ततो वधूवरं सिद्ध स्नानाम्भःपूतमस्तकम् । निवेशितं महाभासि सच्चामीकरपट्ट के ।।२४५।।
तदनंतर जिनके मस्तक सिद्ध प्रतिमा के जल से पवित्र किये गये हैं ऐसे वधू-वर अतिशय शोभायमान सुवर्ण के पाटे पर बैठाये गये ।।245।।
Afterward, the bride and groom, whose heads had been sanctified with the water of a perfected idol, were seated on a splendid golden platform, radiating immense beauty. ||245||
श्लोक ( Shlok ) 246
स्वयं स्म करकं धते चक्रवतीं महाकरः । हिरण्मयं महारत्नखचितं मौक्तिकोज्ज्वलम् ।।२४६॥
घुटनों तक लंबी भुजाओं के धारक चक्रवर्ती ने स्वयं अपने हाथ में शृंगार धारण किया । वह शृंगार सुवर्ण से बना हुआ था, बड़े-बड़े रत्नों से खचित था तथा मोतियों से अतिशय उज्ज्वल था ।।246।।
The emperor, who had long arms reaching down to his knees, personally adorned himself with jewelry. This jewelry was made of gold, encrusted with large gems, and gleamed brightly with pearls. ||246||
श्लोक ( Shlok ) 247
अशोकपल्लवैर्वक्त्रनिहितैः करको बभौ । करपल्लवसध्छायामनुकुर्वन्निवानयोः ॥२४७॥
मुख पर रखे हुए अशोक वृक्ष के पल्लवों से वह शृंगार ऐसा शोभायमान हो रहा था मानो इन दोनों वर-वधूओं के हस्तपल्लव की उत्तम कांति का अनुकरण ही कर रहा हो ।।247।।
The jewelry placed on his face, made from the leaves of the Ashoka tree, appeared so radiant that it seemed to imitate the exquisite brilliance of the hands of the bride and groom. ||247||
श्लोक ( Shlok ) 248
ततो न्यपाति करकादधारा तस्करपल्लवे । दूरमावर्जिता दीर्घ भवन्तौ जीवतामिति ॥२४८॥
तदनंतर आप दोनों दीर्घकाल तक जीवित रहें, मानो यह सूचित करने के लिए ही ऊँचे लगार से छोड़ी गयी जलधारा वज्रजंघ के हस्त पर पड़ी ।।248।।
Afterward, a stream of water, released with a high splash, fell upon Vajrajangha’s hand, seemingly to convey the message that both of you should live for a long time. ||248||
श्लोक ( Shlok ) 249
ततः पाणौ महाबाहुर्वज्रजङ्घोग्रहीन्मुदा । श्रीमती तन्मृदुस्पर्शसुखामीलितलोचनः ।।२४९।।
तत्पश्चात् बड़ी-बड़ी भुजाओं को धारण करनेवाले वज्रजंघ ने हर्ष के साथ श्रीमती का पाणिग्रहण किया । उस समय उसके कोमल स्पर्श के सुख से वज्रजंघ के दोनों नेत्र बंद हो गये थे ।।249।।
Afterward, Vajrajangha, with his strong arms, joyfully took the hand of Shrimati in marriage. At that moment, the bliss of her gentle touch caused his eyes to close in contentment. ||249||
श्लोक ( Shlok ) 250
‘श्रीमती तत्करस्पर्शाद् धर्मबिन्दूनधारयत् । चन्द्रकान्तशिलापुत्री चन्द्रांशु स्पर्शनादिव ॥२५०
वज्रजंघ के हाथ के स्पर्श से श्रीमती के शरीर में भी पसीना आ गया था जैसे कि चंद्रमा की किरणों के स्पर्श से चंद्रकांत मणि की बनी हुई पुतली में जलबिंदु उत्पन्न हो जाते हैं ।।250।।
At the touch of Vajrajangha’s hand, perspiration appeared on Shrimati’s body, just as drops of water form on a moonstone when touched by the moon’s rays. ||250||
श्लोक ( Shlok ) 251
वज्रजङ्घ करस्पर्शात् तनुतोऽस्याश्चिरं । संतापः क्वापि याति स्म भूमेरिव घनागमे ।।२५१।।
जिस प्रकार मेघों की वृष्टि से पृथ्वी का संताप नष्ट हो जाता है उसी प्रकार वज्रजंघ के हाथ के स्पर्श से श्रीमती के शरीर का चिरकालीन संताप भी नष्ट हो गया था ।।251।।
Just as the earth’s distress is alleviated by the rain of clouds, similarly, the long-standing sorrow of Shrimati’s body was also erased by the touch of Vajrajangha’s hand. ||251||
श्लोक 252 से 261
पर्व 1 – श्लोक 1 | 2 से 15 | 16 से 25 | 26 से 35 | 36 to 45 | 46 से 55 | 56 से 65 | 66 से 75 | 76 से 85 | 86 से 95 | 96 से 105 | 106 से 116 | 117 से 126 | 127 से 136 | 137 से 146 | 147 से 156 | 157 से 166 | 167 से 171 | 172 से 180 | 181 से 190 | 191 से 200 | 201 से 210
पर्व 2 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 50 | श्लोक 51 से 60 | श्लोक 61 से 70 | श्लोक 71 से 80 | श्लोक 81 से 95 | श्लोक 96 से 105 | श्लोक 106 से 115 | श्लोक 116 से 125 | श्लोक 126 से 135 | श्लोक 136 से 145 | श्लोक 146 से 155
पीठिकावर्णन पर्व 3 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 20 | श्लोक 21 से 30 | श्लोक 31 से 40 | श्लोक 41 से 51 | श्लोक 52 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 138 | श्लोक 139 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 171 | श्लोक 172से 183 | श्लोक 184 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 221 | श्लोक 222 से 239
श्रीमहाबलाभ्युदयवर्णन पर्व 4 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 198
ललितांग स्वर्गभोग वर्णन पर्व 5 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 175 | श्लोक 176 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 251 | श्लोक 252 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 292 | श्लोक 293 से 296
ललितांगदेव का स्वर्ग से च्युत होने आदि का वर्णन पर्व 6 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 208
श्रीमती और वज्रजंघ के समागम का वर्णन पर्व 7 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 71 | श्लोक 72 से 82 | श्लोक 83 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 173 | श्लोक 174 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
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