धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन
श्लोक 1 से 11 : धर्मनाथ भगवान् के पूर्वभव एवं अहमिन्द्र पद
पूर्व धातकीखण्ड के पूर्वविदेह क्षेत्र में सुसीमा नगरी के राजा दशरथ चन्द्रग्रहण देखकर वैराग्य को प्राप्त हुए। उन्होंने राज्य अपने पुत्र महारथ को सौंपकर दीक्षा धारण की, सोलह कारण-भावनाओं का चिंतन किया और तीर्थंकर नामकर्म का बन्ध कर समाधिमरण से सर्वार्थसिद्धि विमान में अहमिन्द्र देव हुए। वहाँ उन्होंने महान दिव्य सुखों का उपभोग किया।
श्लोक 12 से 23 : धर्मनाथ भगवान् का गर्भ, जन्म एवं प्रारम्भिक जीवन
सर्वार्थसिद्धि से च्युत होकर वह जीव रत्नपुर के राजा भानु की रानी सुप्रभा के गर्भ में अवतीर्ण हुआ। रानी ने शुभ स्वप्न देखे और माघ शुक्ल त्रयोदशी को धर्मनाथ भगवान् का जन्म हुआ। इन्द्रों ने उनका जन्माभिषेक किया। उनका शरीर स्वर्ण के समान कान्तिमान, 180 हाथ ऊँचा तथा आयु दस लाख वर्ष की थी। कुमारकाल पूर्ण होने पर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ।
श्लोक 24 से 41 : राज्य, वैराग्य एवं दीक्षा
धर्मनाथ भगवान् गुण, दानशीलता, न्यायप्रियता और लोककल्याणकारी प्रवृत्ति से युक्त आदर्श शासक थे। पाँच लाख वर्ष राज्य करने के बाद उल्कापात देखकर उन्हें संसार की नश्वरता का बोध हुआ। उन्होंने आत्मस्वरूप का चिंतन किया और वैराग्य धारण किया। पुत्र सुधर्म को राज्य देकर एक हजार राजाओं के साथ दीक्षा ग्रहण की। दीक्षा के साथ ही उन्हें मनःपर्ययज्ञान प्राप्त हुआ तथा धन्यषेण राजा ने उन्हें प्रथम आहार प्रदान किया।
श्लोक 42 से 52 : केवलज्ञान, धर्मप्रवर्तन और मोक्ष
एक वर्ष की साधना के पश्चात् धर्मनाथ भगवान् ने सप्तच्छद वृक्ष के नीचे केवलज्ञान प्राप्त किया। उनके विशाल तीर्थ में असंख्य मुनि, आर्यिकाएँ, श्रावक-श्राविकाएँ तथा देव-देवी सम्मिलित थे। उन्होंने धर्म का व्यापक उपदेश दिया। अंत में सम्मेदशिखर पर आठ सौ नौ मुनियों सहित शुक्लध्यान द्वारा समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया।
श्लोक 53 से 61 : धर्मनाथ भगवान् की स्तुति एवं सुमित्र राजा का पराभव
देवों ने निर्वाणोत्सव मनाया और धर्मनाथ भगवान् की स्तुति की। तत्पश्चात् उनके तीर्थकाल में सुदर्शन बलभद्र और पुरुषसिंह नारायण का प्रसंग प्रारम्भ होता है। राजगृह के राजा सुमित्र अत्यन्त अभिमानी और बलवान थे, किन्तु राजसिंह नामक राजा से मल्लयुद्ध में पराजित होकर उनका अभिमान चूर हो गया। इस अपमान से व्यथित होकर उन्होंने राज्य त्याग दिया।
श्लोक 62 से 71 : सुमित्र और नरवृषभ के पूर्वभव
सुमित्र ने कृष्णाचार्य से दीक्षा ली और कठोर तप किया, किन्तु मन में पराजय का क्लेश बना रहा। उन्होंने अगले जन्म में महान बल प्राप्त करने की इच्छा रूप निदान बाँधा और माहेन्द्र स्वर्ग के देव बने। दूसरी ओर नरवृषभ राजा ने वैराग्य लेकर दिगम्बर दीक्षा धारण की और सहस्त्रार स्वर्ग में देव हुए। बाद में वही क्रमशः पुरुषसिंह नारायण और सुदर्शन बलभद्र के रूप में जन्मे।
श्लोक 72 से 81 : मधुक्रीड़ प्रतिनारायण के साथ युद्ध
सुदर्शन बलभद्र और पुरुषसिंह नारायण दोनों भाइयों ने परस्पर प्रेमपूर्वक राज्य किया। हस्तिनापुर के राजा मधुक्रीड़ ने उनसे कर की माँग की। इससे विवाद उत्पन्न हुआ और युद्ध छिड़ गया। दीर्घ संघर्ष के बाद पुरुषसिंह नारायण ने मधुक्रीड़ का वध कर दिया और दोनों भाइयों ने तीन खण्डों पर राज्य स्थापित किया।
श्लोक 82 से 90 : बलभद्र का मोक्ष और मघवा चक्रवर्ती का पूर्वभव
पुरुषसिंह नारायण मृत्यु के बाद सातवें नरक में गया। उसके वियोग से सुदर्शन बलभद्र ने धर्मनाथ भगवान् की शरण लेकर दीक्षा ग्रहण की और मोक्ष प्राप्त किया। इसके बाद तीसरे चक्रवर्ती मघवा का चरित्र आरम्भ होता है। पूर्व जन्म में वे नरपति नामक राजा थे, जिन्होंने तप करके मध्यम ग्रैवेयक में अहमिन्द्र पद प्राप्त किया।
श्लोक 91 से 101 : मघवा चक्रवर्ती का वैराग्य और केवलज्ञान
देवलोक से च्युत होकर नरपति का जीव अयोध्या में मघवा चक्रवर्ती के रूप में जन्मा। उन्होंने छह खण्डों पर राज्य किया और चक्रवर्ती वैभव का उपभोग किया। अभयघोष केवली के उपदेश से उन्हें वैराग्य उत्पन्न हुआ। पुत्र को राज्य देकर उन्होंने संयम धारण किया, घातिया कर्मों का नाश किया और केवलज्ञान प्राप्त कर धर्म का प्रचार किया।
श्लोक 102 से 112 : मघवा का मोक्ष और सनत्कुमार चक्रवर्ती का उदय
मघवा चक्रवर्ती ने अंततः समस्त कर्मों का क्षय कर मोक्ष प्राप्त किया। उनके पश्चात् अयोध्या के राजा अनन्तवीर्य के यहाँ सनत्कुमार चक्रवर्ती का जन्म हुआ। वे अनुपम सौन्दर्य, वैभव और साम्राज्य के स्वामी बने। उनकी रूप-सम्पदा की चर्चा स्वर्ग तक पहुँची और दो देव उनके दर्शन के लिए पृथ्वी पर आए।
श्लोक 113 से 121 : सनत्कुमार का वैराग्य और संयम जीवन
देवों ने सनत्कुमार को स्मरण कराया कि रूप, यौवन और सम्पत्ति नश्वर हैं तथा रोग, जरा और मृत्यु से कोई नहीं बच सकता। यह सुनकर उन्हें गहन वैराग्य हुआ। उन्होंने पुत्र देवकुमार को राज्य देकर शिवगुप्त जिनेन्द्र के समक्ष दीक्षा ग्रहण की। वे अट्ठाईस मूलगुणों और अनेक उत्तरगुणों से विभूषित आदर्श मुनि बने।
श्लोक 122 से 130 : सनत्कुमार की साधना, केवलज्ञान और मोक्ष
सनत्कुमार मुनि ने महान क्षमा, समता, वैराग्य और तप का पालन किया। उन्होंने परिषहों और उपसर्गों को जीतकर अनेक ऋद्धियाँ प्राप्त कीं तथा क्षपकश्रेणी पर आरूढ़ होकर केवलज्ञान प्राप्त किया। अनेक जीवों को मोक्षमार्ग का उपदेश देने के बाद उन्होंने समस्त कर्मों का क्षय कर अविनाशी मोक्ष प्राप्त किया। पर्व के अंत में धर्मनाथ तीर्थ के अन्तर्गत धर्मनाथ भगवान्, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के चरित्रों का समापन किया गया है।
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 1 to 11
श्लोक ( Shlok ) 1
धर्मे यस्मिन् समुद्भूता धर्मा दश सुनिर्मलाः । स धर्मः शर्म मे दद्यादधर्ममपहृत्य नः ॥ १ ॥
जिन धर्मनाथ भगवान् से अत्यन्त निर्मल उत्तमक्षमा आदि दश धर्म उत्पन्न हुए वे धर्मनाथ भगवान् हमलोगोंका अधर्म दूर कर हमारे लिए सुख प्रदान करें ॥ १ ॥
“May Lord Dharmanatha, from whom emerged the ten ultimate virtues of supreme forgiveness and others, destroy our unrighteousness and bestow true happiness upon us.”1
श्लोक ( Shlok ) 2
धातकीखण्डप्राग्भागे प्राग्विदेहे सरित्तटे । दक्षिणे वत्सविषये सुसीमानगरं महत् ॥ २ ॥
पूर्व धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वविदेह क्षेत्रमें नदीके दक्षिण तट पर एक वत्स नामका देश है। उसमें सुसीमा नामका महानगर है ।।२।।
“In the Purva-Videha region of the eastern Dhatakikhanda continent, on the southern bank of the river, lies a country named Vatsa. In that country, there is a great metropolis called Susima.”2
श्लोक ( Shlok ) 3
पतिर्दशरथस्तस्य प्रज्ञाविक्रमदैधवान् । स्ववशीकृतसर्वारिः निर्व्यायामः समे स्थितः ॥ ३ ॥
वहाँ राजा दशरथ राज्य करता था, वह बुद्धि, बल और भाग्य तीनोंसे सहित था। चूँकि उसने समस्त शत्रु अपने वश कर लिये थे इसलिए युद्ध आदिके उद्योगसे रहित होकर वह शान्तिसे रहता था ।। ३ ।।
“King Dasharatha ruled there, endowed with all three: wisdom, strength, and good fortune. Because he had subdued all his enemies, he lived in peace, free from the exertion of war and conflicts.”3
श्लोक ( Shlok ) 4
सुखानि धर्मसाराणि प्रजापालनलालसः । बन्धुभिश्च सुहृद्भिश्च सह विश्रब्धमन्वभूत् ॥ ४ ॥
प्रजाकी रक्षा करनेमें सदा उसकी इच्छा रहती थी और वह बन्धुओं तथा मित्रोंके साथ निश्चिन्ततापूर्वक धर्म-प्रधान सुखोंका उपभोग करता था ॥ ४ ॥
“He always desired the protection and welfare of his subjects, and he peacefully enjoyed the righteous pleasures of life alongside his kinsmen and friends, free from all anxiety.” 4
श्लोक ( Shlok ) 5
माधवे शुक्लपक्षान्ते सम्प्रवृत्तजनोत्सवे । चन्द्रोपरागमालोक्य सद्यो निर्विण्णमानसः ॥ ५ ॥
एक बार वैशाख शुक्ल पूर्णिमा के दिन सबलोग उत्सव मना रहे थे उसी समय चन्द्र ग्रहण पड़ा उसे देखकर राजा दशरथका मन भोगोंसे एकदम उदास हो गया ॥ ५ ॥
“Once, on the day of the full moon in the month of Vaishakha (Vaishakha Shukla Purnima), while everyone was celebrating a festival, a lunar eclipse occurred. Beholding it, King Dasharatha’s mind instantly became detached from worldly pleasures.”5
श्लोक ( Shlok ) 6
कान्तः कुवलयाह्लादी कलाभिः परिपूर्णवान् । ईदृशस्यापि चेदीहगवस्थाऽन्यस्य का गतिः ॥ ६ ॥
यह चन्द्रमा सुन्दर है, कुवलयों- नीलकमलों (पक्षमें-महीमण्डल) को आनन्दित करनेवाला है और कलाओंसे परिपूर्ण है। जब इसकी भी ऐसी अवस्था हुई है तब अन्य पुरुषकी क्या अवस्था होगी ॥ ६ ॥
“This moon is beautiful, a source of delight to the blue lotuses (or alternatively: a bringer of joy to the entire earth), and complete in all its phases (or alternatively: accomplished in all arts). When even such a moon falls into such a state of eclipse, what then will be the fate of an ordinary man?” 6
श्लोक ( Shlok ) 7
इति मत्वा सुते राज्यभारं कृत्वा महारथे । नैःसङ्गयाल्लाघवोपेतमङ्गीकृत्य स संयमम् ॥ ७ ॥
ऐसा मानकर उसने महारथ नामक पुत्रके लिए राज्यभार सौंपा और स्वयं परिग्रहरहित होनेसे भारहीन होकर संयम धारण कर लिया ।। ७ ।।
“Reflecting thus, he entrusted the burden of the kingdom to his son named Maharatha, and having become free from all burdens by shedding his worldly possessions, he embraced self-restraint (asceticism).”7
श्लोक ( Shlok ) 8
एकादशाङ्गधारी सन् भावितद्वयष्टकारणः । निबद्धतीर्थकृत्पुण्यः स्वाराध्यान्ते विशुद्धधीः ॥ ८ ॥
उसने ग्यारह अङ्गोंका अध्ययन कर सोलह कारण-भावनाओंका चिन्तवन किया, तीर्थंकर नामक पुण्य प्रकृतिका बन्ध किया और आयुके अन्तमें समाधिमरण कर अपनी बुद्धिको निर्मल बनाया ।॥ ८ ।।
“Having studied the eleven Angas (scriptures) and meditated upon the sixteen causes (Solah Karana Bhavanas), he bound the meritorious karma of a Tirthankara; at the end of his lifespan, he purified his intellect by practicing Samadhimarana (peaceful, meditative death).”8
श्लोक ( Shlok ) 9
त्रयविशत्समुद्रायुः एकहस्ततनूच्छितिः । पञ्चरन्ध्रचतुर्मानदिनै रुच्छ्वासवान् मनाक् ॥ ९ ॥
अब वह सर्वार्थसिद्धिमें अहमिन्द्र हुआ, तैंतीस सागर उसकी स्थिति थी, एक हाथ ऊँचा उसका शरीर था, चार सौ निन्यानवें दिन अथवा साढ़े सोलह माहमें एक बार कुछ श्वास लेता था ॥ ९ ॥
“Now, he was reborn as an Ahamindra in Sarvarthasiddhi, with a lifespan of thirty-three Sagaras. His body was one cubit tall, and he took a breath only once every four hundred and ninety-nine days, or approximately sixteen and a half months.”9
श्लोक ( Shlok ) 10
लोकनाल्यन्तरव्यापिविमलावधिबोधनः । तत्क्षेत्रविक्रियातेजोबलसम्पत्समन्वितः ॥ १० ॥
लोक नाड़ीके अन्त तक उसके निर्मल अवधिज्ञानका विषय था, उतनी ही दूर तक फलने-वाली विक्रिया तेज तथा बलरूप सम्पत्ति से सहित था ।॥ १० ॥
“His pure Avadhijnana (clairvoyance) could perceive everything up to the very edge of the universe (Loka-nadi). He was also endowed with magnificent divine powers (Vikriya), splendor, and strength that could extend to that same distance.””His pure Avadhijnana (clairvoyance) could perceive everything up to the very edge of the universe (Loka-nadi). He was also endowed with magnificent divine powers (Vikriya), splendor, and strength that could extend to that same distance.”10
श्लोक ( Shlok ) 11
त्रिसहस्त्राधिकत्रिंशत्सहस्त्राब्दैः समाहरन् । मुहूर्ते मानसाहारं शुक्ललेश्याद्वयश्विरम् ॥ ११ ॥
तीस हजार वर्षमें एक बार मानसिक आहार लेता था, द्रव्य और भाव सम्बन्धी दोनों शुक्ल लेश्याओंसे युक्त था ।।११।।
“He partook of mental sustenance (manasika ahar) once every thirty thousand years, and he was possessed of Shuklah Leshya (the white, ultimate pure aura) in terms of both substance (dravya) and internal state (bhava).”11
श्लोक 12 से 23
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