नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 94 to 101
श्लोक ( Shlok ) 94
ततः कृष्णेन निर्दिष्टाः प्रशास्तृपरिचारिणः । सैन्यं यथोक्तविन्यासं रचयन्ति स्म रागिणः ॥ ९४ ॥
तदनन्तर कृष्णकी आज्ञासे अनुराग रखनेवाले प्रशंसनीय परिचारकोंने यथायोग्य रीतिसे सेनाकी रचना की ॥ ९४ ॥
Then, by the command of Krishna, the praiseworthy and affectionate attendants arranged the army in the proper manner. || 94 ||
श्लोक ( Shlok ) 95
जरासन्धोऽपि संग्रामरङ्गमध्यमधिष्ठितः । स्वसैन्यं निष्ठुरारावैरध्यक्षैरन्वयोजयत् ॥ ९५ ॥
जरासन्ध भी संग्राम रूपी युद्धभूमिके बीचमें आ बैठा और कठोर सेनापतियोंके द्वारा सेनाकी योजना करवाने लगा ।। ९५ ।।
Jarasandha too came and sat in the middle of the battlefield, which was like a continuous sacrifice (Sangrama), and began having the army arranged by his harsh commanders. || 95 ||
श्लोक ( Shlok ) 96 – 100
इति विन्यासिते सैन्ये दध्वने समरानकैः । शूरधानुष्कनिर्मुक्तशरनाराचसङ्कुलम् ॥ ९६ ॥नभो न्यरुणदुष्णांशुप्रसरत्करसन्ततिम् । वियोगमगमन्मोहात्तदास्तमयशङ्कया ॥ ९७ ॥कोकयुग्मं विहङ्गाश्च रुवन्तो नीडमाश्रयन् । नेक्षन्ते स्म भटा योजुमन्योन्यं समराङ्गणे ॥ ९८ ॥ संक्रुद्धमत्तमातङ्गदन्तसङ्घट्टजन्मना । सप्तार्चिषा विधूतेऽन्धकारे दिगवलोकनात् ॥ ९९ ॥ पुनः प्रवृत्तसंग्रामाः सर्वशस्त्रविचक्षणाः । नदीं रक्तमयीं चक्रुविक्रमैकरसाः क्षणम् ॥ १०० ॥
इस प्रकार जब सेनाओंकी रचना ठीक-ठीक हो चुकी तब युद्धके नगाड़े बजने लगे । शूर-वीर धनुषधारियोंके द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे आकाश भर गया और उसने सूर्यकी फैलती हुई किरणोंकी सन्ततिको रोक दिया- ढक दिया। ‘सूर्य अस्त हो गया है’ इस भयकी आशङ्कासे मोहवश चकवा-चकवी परस्पर विद्युड़ गये। अन्य पक्षी भी शब्द करते हुए घोंसलोंकी ओर जाने लगे। उस समय युद्धके मैदानमें इतना अन्धकार हो गया था कि योद्धा परस्पर एक दूसरेको देख नहीं सकते थे परन्तु कुछ ही समय बाद क्रुद्ध हुए मदोन्मत्त हाथियोंके दाँतोंकी टक्कर से उत्पन्न हुई अग्निके द्वारा जब वह अन्धकार नष्ट हो जाता और सब दिशाएँ साफ-साफ दिखने लगतीं तब समस्त शस्त्र चलानेमें निपुण योद्धा फिरसे युद्ध करने लगते थे। विक्रम रस से भरे योद्धाओंने क्षण भर में खूनकी नदियाँ बहा दीं ॥ ९६ -१०० ॥
In this manner, when the disposition of the armies was perfectly arranged, the war drums began to beat. The sky became filled with arrows shot by heroic archers, blocking and veiling the spreading rays of the sun. Fearing that the sun had set, the Cakva and Cakvi birds, overcome by delusion, separated from one another. Other birds also flew toward their nests, chirping loudly. At that moment, the battlefield was enveloped in such darkness that the warriors could not see each other; however, moments later, when that darkness was shattered by the sparks of fire struck from the clashing tusks of furious, intoxicated elephants and all directions became clearly visible again, the warriors, expert in wielding all weapons, resumed fighting. Filled with heroic valor, the warriors caused rivers of blood to flow in an instant. || 96 – 100 ||
श्लोक ( Shlok ) 101
करालकरवालाग्र निकृत्तचरणद्वयाः । तुरङ्गमा गतिं प्रापुर्वने नष्टतपोधनाः ॥ १०१ ॥
भयङ्कर तलवारकी धारसे जिनके आगेके दो पैर कट गये हैं ऐसे घोड़े उन तपस्वियोंकी गतिको प्राप्त हो रहे थे जो कि तप धारण कर उसे छोड़ देते हैं ।॥ १०१ ॥
“Horses whose two front legs had been severed by the sharp edge of terrible swords were attaining the state (or fate) of those ascetics who, after adopting penance, abandon it.”
श्लोक 102 से 111
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