मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 32
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 33 to 42
श्लोक ( Shlok ) 33 – 34
तदामृताशिनः सर्वे सम्प्राप्य प्राप्तसम्मदाः । तेजःपिण्डं समादाय बालं बालार्कसन्निभम् ॥ ३३ ॥गत्वाऽचलेशे संस्थाप्य पञ्चमाब्धिपयोजलैः । अभिषिच्य विभूष्योच्चैर्मलिनामानमाजगुः ॥ ३४ ॥
उसी समय हर्षसे भरे हुए समस्त देव आ पहुँचे और प्रातःकाल के सूर्यके समान तेजके पिण्ड स्वरूप उस बालकको लेकर पर्वतराज सुमेरु पर्वत पर गये । वहाँ उन्होंने जिन-बालकको विराजमान कर क्षीरसागरके दुग्ध रूप जलसे उनका अभिषेक किया, उत्तम आभूषण पहिनाये और मल्लिनाथ नाम रखकर जोरसे स्तवन किया ॥ ३३-३४ ॥
“At that very moment, filled with immense joy, all the celestial gods arrived and took the child—who was a repository of radiant splendor like the morning sun—to Sumeru, the king of mountains. There, having reverently seated the Jina-infant, they performed his sacred birth-bath (Abhiṣeka) using the milk-pure waters of the Ocean of Milk (Kṣīra-sāgara), adorned him with exquisite ornaments, bestowed upon him the name Mallinātha, and chanted his praises with resounding voices.”33 – 34
श्लोक ( Shlok ) 35
ते पुनस्तं समानीय नामश्रावणपूर्वकम् । मातुरङ्गे व्यवस्थाप्य स्वन्निवासान् प्रपेदिरे ॥ ३५ ॥
वे देवलोग जिन-बालकको वहाँ से वापिस लाये और इनका ‘मल्लिनाथ नाम है’ ऐसा नाम सुनाते हुए उन्हें माताकी गोदमें विराजमान कर अपने-अपने स्थानों पर चले गये ॥ ३५ ॥
“Bringing the Jina-infant back from the mountain, those celestial deities announced to the mother that his name is ‘Mallinātha,’ and placing him reverently in her lap, they departed for their respective heavenly abodes.”35
श्लोक ( Shlok ) 36
अरेशतीर्थसन्तानकालस्यान्ते स पुण्यभाक् । सहस्रकोटिवर्षस्य तदभ्यन्तरजीव्यभूत् ॥ ३६ ॥
अरनाथ तीर्थंकरके बाद एक हजार करोड़ वर्ष बीत जानेपर पुण्यवान् मल्लिनाथ हुए थे। उनकी आयु भी इसीमें शामिल थी ।॥ ३६ ॥
“One thousand crore years after the time of Tīrthaṅkara Aranātha, the highly meritorious Lord Mallinātha was born; his own lifespan was also included within this vast duration.”36
श्लोक ( Shlok ) 37
समानां पञ्चपञ्चाशत् सहस्त्राण्यस्य जीवितम् । पञ्चविंशतिवाणासनोच्छ्रितेः कनक द्युतेः ॥ ३७ ॥
पचपन हजार वर्षकी उनकी आयु थी, पच्चीस धनुष ऊँचा शरीर था, सुवर्णके समान कान्ति थी ॥ ३७ ॥
“His lifespan spanned fifty-five thousand years, his body stood twenty-five Dhanuṣas (bow-lengths) tall, and his complexion possessed the radiant luster of pure gold.”37
श्लोक ( Shlok ) 38 – 42
शतसंवत्सरे याते कुमारसमये पुरम् । चलत्सितपताकाभिः सर्वत्रोद्बद्धतोरणैः ॥ ३८ ॥विचित्ररङ्ग वल्लीभिविंकीर्णकुसुमोत्करैः । निर्जिताम्भोनिधिध्वानैः प्रध्वनत्पढहादिभिः ॥ ३९ ॥ मल्लिनिजविवाहार्थ भूयो वीक्ष्य विभूषितम् । स्मृत्वापराजितं रम्यं विमानं पूर्वजन्मनः ॥ ४० ॥ सा वीतरागता प्रीतिरुर्जिता ‘महिमा च सा । कुतः कुतो विवाहोऽयं सतां लज्जाविधायकः ॥ ४१ ॥विडम्बनमिदं सर्वं प्रकृतं प्राकृतैर्जनैः । निन्दयन्निति निविंद्य सोऽभून्निष्क्रमणोद्यतः ॥ ४२ ॥
कुमारकालके सौ वर्ष बीत जाने पर एक दिन भगवान् मल्लिनाथने देखा कि समस्त नगर हमारे विवाहके लिए सजाया गया है, कहीं चञ्चल सफेद पताकाएँ फहराई गई हैं तो कहीं तोरण बाँधे गये हैं, कहीं चित्र-विचित्र रङ्गावलियाँ निकाली गई हैं तो कहीं फूलोंके समूह बिखेरे गये हैं और सब जगह समुद्रकी गर्जनाको जीतनेवाले नगाड़े आदि बाजे मनोहर शब्द कर रहे हैं। इस प्रकार सजाये हुए नगरको देखकर उन्हें पूर्वजन्मके सुन्दर अपराजित विमानका स्मरण आ गया । वे सोचने लगे कि कहाँ तो वीतरागतासे उत्पन्न हुआ प्रेम और उससे प्रकट हुई महिमा और कहाँ सज्जनोंको लज्जा उत्पन्न करनेवाला यह विवाह ? यह एक विडम्बना है, साधारण-पामर मनुष्य ही इसे प्रारम्भ करते हैं बुद्धिमान् नहीं। इस प्रकार विवाहकी निन्दा करते हुए वे विरक्त होकर दीक्षा धारण करनेके लिए उद्यत हो गये ॥ ३८-४२ ॥
“When one hundred years of his youth (Kumāra-kāla) had passed, Lord Mallinātha looked out one day and saw that the entire city had been magnificently decorated for his wedding. Flapping white banners were fluttering in some places, while grand ceremonial arches (Toraṇas) were erected in others; intricate, multicolored patterns (Raṅgāvalīs) were drawn on the grounds, and clusters of fresh flowers were strewn everywhere, while musical instruments like kettledrums—whose resonance overpowered the roar of the ocean—poured forth captivating melodies.
Beholding the city arrayed in this manner, he was suddenly reminded of his exceptionally beautiful celestial vehicle, Aparājita, from his previous birth. He began to reflect: ‘What a vast difference lies between the profound bliss born of absolute detachment (Vītarāgatā) and the divine majesty it manifests, versus this marriage ritual, which brings a sense of shame even to virtuous minds! This is a sheer mockery; only ordinary, worldly-minded individuals indulge in this, not the wise.’ Censuring marriage in this manner, he became deeply detached from worldly life and prepared himself to embrace monastic initiation (Dīkṣā) [38–42].”
श्लोक 43 से 52
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184 | श्लोक 185 से 192
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