नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 65 to 71
श्लोक ( Shlok ) 65
श्रुत्वा तद्वचनं ३ क्रोधेनान्धीभूतोग्रवीक्षणः । जरासन्धो धियाप्यन्धो दपीं दैवातिसन्धितः ॥ ६५ ॥
जब दैवसे छले गये अहङ्कारी जरासन्धने वैश्य-पुत्रोंके उक्त वचन सुने तो वह क्रोधसे अन्धा हो गया, उसकी दृष्टि भयङ्कर हो गई, यही नहीं, बुद्धिसे भी अन्धा हो गया ॥ ६५ ॥
When the arrogant Jarasandha, deceived by destiny, heard these words of the merchant sons, he became blind with rage; his gaze turned ferocious, and what is more, he grew completely blinded in his intellect as well. (65)
श्लोक ( Shlok ) 66
चचालाकालकालान्तचलितात्मबलाम्बुधिः । कतु यादवलोकस्य विलयं वाविलम्बितम् ॥ ६६ ॥
जिसकी सेना, असमयमें प्रकट हुए प्रलयकालके लहराते समुद्रके समान चञ्चल है ऐसा वह जरासन्ध यादव लोगोंका शीघ्र ही नाश करनेके लिए तत्काल चल पड़ा ॥ ६६ ॥
With an army as volatile as the surging ocean during an untimely doomsday, that Jarasandha set forth immediately to swiftly destroy the Yadava people. (66)
श्लोक ( Shlok ) 67
नारदस्तत्तदा ज्ञात्वा निर्हेतुसमरप्रियः । हरिं सत्वरमभ्येत्य तद्विकारं न्यवेदयत् ॥ ६७ ॥
बिना कारण ही युद्धसे प्रेम रखनेवाले नारदजीको जब इस बातका पता चला तो उन्होंने शीघ्र ही जाकर श्रीकृष्णसे जरासन्धके कोपका समाचार कह दिया ॥ ६७ ॥
When Narada, who is naturally fond of instigating conflicts without any personal cause, came to know of this development, he hurried over to Shri Krishna and informed him of Jarasandha’s mounting wrath. (67)
श्लोक ( Shlok ) 68 – 72
श्रत्वा शाङ्गधरः शत्रुसमुत्थानमनाकुलम् । कुमारं नेमिमभ्येत्य प्रशाधि त्वमिदं पुरः ॥ ६८ ॥विजिगीषुः किलाद्याभूत्प्रत्यस्मान्मगधाधिपः । भनज्मि तमहं जीर्ण द्रुमं वा घुणभक्षितम् ॥ ६९ ॥तूर्णं भवत्प्रभावेन गत्वेत्यवददूर्जितम् । प्रसन्नचेतास्तच्छ्रुत्वा सस्मितो मधुरेक्षणः ॥ ७० ॥सावधिर्धावंजयं तेन विनिश्चित्य विरोधिनाम् । स्फुरद्दन्तरुचिविष्णु नेमिरोमित्यभाषत ॥ ७१ ॥स्मिताद्यैः स्वं जयं सोऽपि निश्चिचाय जगत्प्रभोः । जैनो वादीव पक्षाद्यैरेकलक्षणभूषणैः ॥ ७२ ॥
‘शत्रु चढ़कर आ रहा है’ यह समाचार सुनकर श्रीकृष्णको कुछ भी आकुलता नहीं हुई । उन्होंने नेमिकुमारके पास जाकर कहा कि आप इस नगरकी रक्षा कीजिए। सुना है कि मगधका राजा जरासन्ध हम लोगोंको जीतना चाहता है सो मैं उसे आपके प्रभावसे घुणके द्वारा खाये हुए जीर्ण वृक्षके समान शीघ्र ही नष्ट किये देता हूं। श्रीकृष्णके वीरता पूर्ण वचन सुनकर जिनका चिन्त प्रसन्नतासे भर गया है जो कुछ-कुछ मुसकरा रहे हैं और जिनके नेत्र मधुरतासे ओत-प्रोत हैं ऐसे भगवान् नेमिनाथको अवधिज्ञान था अतः उन्होंने निश्चय कर लिया कि विरोधियोंके ऊपर हम लोगोंकी विजय निश्चित रहेगी। उन्होंने दाँतोंकी देदीप्यमान कान्तिको प्रकट करते हुए ‘ओम्’ शब्द कह दिया अर्थात् द्वारावतीका शासन स्वीकृत कर लिया। जिस प्रकार जैनवादी अन्यथा-नुपपत्ति रूप लक्षणसे सुशोभित पक्ष आदिके द्वारा ही अपनी नयका निश्चय कर लेता है उसी प्रकार श्रीकृष्णने भी नेमिनाथ भगवान्की मुसकान आदिसे ही अपनी विजयका निश्चय कर लिया था ।। ६८-७२ ।।
Hearing the news that the enemy was advancing, Shri Krishna felt no anxiety whatsoever. He approached Nemi Kumar (Lord Neminath) and said, “Please protect this city. I have heard that Jarasandha, the king of Magadha, desires to conquer us. Therefore, by your grace, I shall soon destroy him like an old, decayed tree eaten away by woodworms.”
Hearing these heroic words of Shri Krishna, Lord Neminath—whose heart was filled with joy, who was smiling gently, and whose eyes were overflowing with sweetness—possessed Avadhijnana (clairvoyance). Thus, he knew with absolute certainty that their victory over the opponents was assured. Displaying the brilliant luster of his teeth, he uttered the word “Om,” thereby accepting the governance and protection of Dwaravati (Dwarka).
Just as a Jain philosopher determines the validity of their standpoint (Naya) through a well-reasoned proposition (Paksha) adorned with the characteristic of logical indispensability (Anyatha-nupapatti), Shri Krishna, too, became certain of his victory solely through the gentle smile and gestures of Lord Neminath. (68–72)
श्लोक ( Shlok ) 73 – 76
अथ शत्र न् समुज्जेतु ं जयेन विजयेन च । सारणेनाङ्गदाख्येन दवाह्वेनोद्धवेन च ॥ ७३ ॥सुमुखाक्षरपश्चैश्च जराख्येन सुदृष्टिना । पाण्डवैः पञ्चभिः सत्यकेनाथ द्रुपदेन च ॥ ७४ ॥यादवैः सविराटाख्यैरप्रमेयैर्महाबलैः । दृष्टार्जुनोऽग्रसेनाभ्या चमरेण रणेप्धुना ॥ ७५ ॥विदुरेण नृपैरन्यैश्चान्वितौ बलकेशवौ । सन्नद्धावुद्धतौ योद्ध’ कुरुक्षेत्रमुपागतौ ॥ ७६ ॥
अथानन्तर कृष्ण और बलदेव, शत्रुओंको जीतनेके लिए जय, विजय, सारण, अङ्गद, दव, उद्धव, सुमुख, पद्म, जरा, सुदृष्टि, पाँचों पाण्डव, सत्यक, द्रुपद, समस्त यादव, विराट्, अपरिमित सेनाओंसे युक्त धृष्टार्जुन, उग्रसेन, युद्धका अभिलाषी चमर, विदुर तथा अन्य राजाओंके साथ उद्धत होकर युद्धके लिए तैयार हुए और वहाँ से चलकर कुरुक्षेत्र में जा पहुँचे ।। ७३-७६ ।।
Thereafter, Krishna and Baladeva—accompanied by Jaya, Vijaya, Sarana, Angada, Dava, Uddhava, Sumukha, Padma, Jara, Sudrishti, the five Pandavas, Satyaka, Drupada, the entire Yadava clan, Virata, Dhrishtajuna (Dhrishtadyumna) leading boundless armies, Ugrasena, Chamara who was eager for battle, Vidura, and various other kings—rose up with fierce determination, prepared themselves for war, and marching from there, arrived at Kurukshetra. (73–76)
श्लोक ( Shlok ) 77 – 80
जरासन्धोऽपि युद्धेच्छुर्भीष्मेणाविष्कृतोष्मणा । सद्रोणेन सकर्णेन साश्वत्थामेन रुग्मिणा ॥ ७७ ॥शल्येन वृषसेनेन कृपेण कृपवर्मणा । रुदिरेणेन्द्रसेनेन जयद्रथमहीभृता ॥ ७८ ॥हेमप्रभेण भूभर्त्रा दुर्योधनधरेशिना । दुश्शासनेन दुर्मर्षणेन दुर्धर्षणेन च ॥ ७९ ॥दुर्जयेन कलिङ्गेशा भगदत्तेन भूभुजा । परैश्च भूरिभूपालैराजगाम स केशवम् ॥ ८० ॥
उधर युद्धकी इच्छा रखनेवाला जरासन्ध भी अपनी गर्मी (अहङ्कार) प्रकट करनेवाले भीष्म, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, रुक्म, शल्य, वृषसेन, कृप, कृपवर्मा, रुदिर, इन्द्रसेन, राजा जयद्रथ, हेमप्रभ, पृथिवीका नाथ दुर्योधन, दुःशासन, दुर्मर्पण, दुर्धर्षण, दुर्जय, राजा कलिङ्ग, भगदत्त, तथा अन्य अनेक राजाओंके साथ कृष्णके सामने आ पहुंचा ।। ७७-८० ॥
On the other side, Jarasandha—who was eager for battle and accompanied by Bhishma, Karna, Drona, Ashwatthama, Rukmi, Shalya, Vrishasena, Kripa, Kritavarma, Rudira, Indrasen, King Jayadratha, Hemaprabha, the lord of the earth Duryodhana, Duhshasana, Durmarshana, Durdharshana, Durjaya, the King of Kalinga, Bhagadatta, and many other kings who were displaying their pride (arrogance)—marched forward and came face-to-face with Krishna. (77–80)
श्लोक ( Shlok ) 81
तदा हरिबले युद्धदुन्दुभिध्वनिरुध्वरन् । शूरचेतो रसो वासः कौसुम्भो वान्वरञ्जयत् ॥ ८१ ॥
उस समय श्री कृष्णकी सेनामें युद्धकी भेरियाँ बज रही थीं सो जिस प्रकार कुसुम्भ रङ्ग वस्त्रको रङ्ग देता है उसी प्रकार उन भेरियोंके उठते हुए शब्दने भी शूरवीरोंके चित्तको रङ्ग दिया था ।॥ ८१ ॥
At that moment, the battle drums were resounding in Shri Krishna’s army. Just as safflower (kusumbha) dye vividly colors a garment, the rising sound of those war drums intensely colored the hearts of the brave warriors with courage and passion. (81)
श्लोक 82 से 93
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