विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212 – 214
माता ते दान्तमत्यन्ते दीक्षिता क्षान्तिरद्य ते। सिंहसेनोऽहिना दष्टः करीन्द्रोऽशनिघोषकः ॥ २१२ ॥भूत्वा वने भ्रमन्मत्तो मामालोक्य जिघांसया । धावति स्म मयाऽऽकाशे स्थित्वाऽसौ प्रतिबोधितः ॥२१३॥ पूर्वसम्बन्धमाख्याय सर्व सम्यक् प्रबुद्धवान् । संयमासंयमं भव्यः स्वयं सद्यः समग्रहीत् ॥ २१४ ॥
तेरी माताने दान्तमतीके समीप दीक्षा धारण की थी और फिर हिरण्यवती मातासे तूने दीक्षा धारण की है। आज तुझे सब प्रकारकी शान्ति है। राजा सिंहसेनको सांप ने डस लिथा था जिससे मर कर वह वनमें अशनिघोष नामका हाथी हुआ । एक दिन वह मदोन्मत्प्त्त हाथी वनमें घूम रहा था, वहीं मैं था, मुझे देखकर वह मारनेकी इच्छासे दौड़ा, मुझे आकाशचारण ऋद्धि थी अतः मैंने आकाशमें स्थित हो पूर्वभवका सम्बन्ध बताकर उसे समझाया। वह ठीक-ठीक सब समझ गया जिससे उस भव्यने शीघ्र ही संयमासंयम -देशव्रत ग्रहण कर लिया ।। २१२-२१४ ।।
“Your mother took initiation from Dantamati, and then you, in turn, took initiation from your mother, Hiranyavati. Today, you possess every form of peace. King Singhsen died from a snake bite and was reborn in the forest as an elephant named Ashanighosha. One day, while that elephant was roaming the forest in a state of rut, he encountered me. Seeing me, he charged with the intent to kill; however, since I possessed the supernatural power of Akashacharana, I rose into the sky. From there, I explained his connection to his previous birth. He understood everything perfectly, and that noble soul immediately accepted Sanyamasanyama (the partial vows of a layman).” [212–214]
श्लोक ( Shlok ) 215
शान्तचित्तः स निर्वेदो ध्यायन् कायाद्यसारताम् । कृत्वा मासोपवासादीन् शुष्कपत्राणि पारथन् ॥२१५॥
अब उसका चित्त बिलकुल शान्त है, वह सदा विरक्त रहता हुआ शरीर आदि की निःसारताका विचार करता रहता है, लगातार एक-एक माह के उपवास कर सूखे पत्तोंकी पारणा करता है ।। २१५ ।।
“Now, his mind is perfectly calm; remaining perpetually detached, he constantly contemplates the worthlessness of the physical body and worldly existence. He observes continuous month-long fasts, breaking them only with dry leaves.” [215]
श्लोक ( Shlok ) 216 – 221
कुर्वन्नेवं महासत्त्वश्चिरं घोरतरं तपः । ‘यूपकेसरिणीनामसरितीर्थे कृशो जलम् ॥ २१६ ॥पातुं प्रविष्टस्तं वीश्य स सर्पभ्रमरः पुनः । जातः कुक्कुटसर्पोऽत्र तदास्यारुद्ध मस्तकम् ॥ २१७ ॥ दशति स्म गजोऽप्येतद्विषेण विगतासुकः । समाधिमरणाजशे सहस्त्रारे रविप्रिये ॥ २१८ ॥ विमाने श्रीधरो देवो धर्मिलश्चायुषः क्षये । तत्रैव वानरः सोऽभूत्सख्या तेन गजेशिनः ॥ २१९ ॥ हतः “कुक्कुटसर्पोऽपि तृतीयनरकेऽभवत् । गजस्य रदनौ मुक्ताश्चादायाधिकतेजसः ॥ २२० ॥ व्याधः शृगालवश्नाम धनमित्राय दत्तवान् । राजश्रेष्ठी च तौ ताश्च पूर्णचन्द्रमहीभुजे ॥ २२१ ॥
इस प्रकार महान् धैर्यका धारक वह हाथी चिरकाल तक कठिन तपञ्चरण कर अत्यन्त दुर्बल हो गया। एक दिन वह यूपकेसरिणी नामकी नदीके किनारे पानी पीनेके लिए घुसा। उसे देखकर श्रीभूति – सत्यघोषके जीवने जो मरकर चमरी मृग और बादमें कुर्कुट सर्प हुआ था उस हाथीके मस्तक पर चढ़कर उसे डस लिया। उसके विषसे हाथी मर गया, वह चूँकि समाधिमरणसे मरा था अतः सहस्त्रार स्वर्गके रविप्रिय नामक विमानमें श्रीधर नामका देव हुआ। धर्मिल ब्राह्मण, जिसे कि राजा सिंहसेनने श्रीभूतिके बाद अपना मन्त्री बनाया था आयुके अन्तमें मर कर उसी वनमें वानर हुआ था। उस वानरकी पूर्वोक्त हाथीके साथ मित्रता थी अतः उसने उस कुर्कुट सर्पको मार डाला जिससे वह मरकर तीसरे नरकमें उत्पन्न हुआ । इधर शृगालवान् नामके व्याधने उस हाथीके दोनों दाँत तोड़े और अत्यन्त चमकीले मोती निकाले तथा धनमित्र नामक सेठके लिए दिये। राजश्रेष्ठी धनमित्रने वे दोनों दाँत तथा मोती राजा पूर्णचन्द्रके लिए दिये ।। २१६-२२१ ॥
Possessing great fortitude, that elephant practiced rigorous penance for a long time and became extremely weak. One day, he entered the Yupakesarini river to drink water. Seeing him, the soul of Shribhuti-Satyaghosha—who had died to become a Chamar deer and later a Kurkuta serpent—climbed onto the elephant’s head and bit him. The elephant died from the venom; however, because he died in a state of Samadhimaran (meditative death), he was reborn as a celestial being named Shridhar in the Ravipriya celestial vehicle of the Sahasrara heaven.
Dharmila, the Brahmin whom King Singhsen had appointed as his minister after Shribhuti, died at the end of his life and was reborn as a monkey in that same forest. That monkey shared a friendship with the aforementioned elephant; therefore, he killed the Kurkuta serpent, causing it to die and be reborn in the third hell. Meanwhile, a hunter named Shrigalvan broke off both tusks of the elephant, extracted the exceptionally brilliant pearls from them, and gave them to a merchant named Dhanamitra. The royal merchant Dhanamitra then presented both tusks and the pearls to King Purnachandra. [216–221]
श्लोक 222 से 232
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