कुन्थुनाथ तीर्थकर तथा चक्रवर्ती का पुराण वर्णन पर्व 64 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 64- shlok 22 to 31
श्लोक ( Shlok ) 22
नवमे मासि वैशाखशुक्लपक्षादिमे दिने । साऽसूताग्नेययोगे वा विधुं तमपरा दिशा ॥ २२ ॥
जिस प्रकार पश्चिम दिशा चन्द्रमाको उदित करती है उसी प्रकार रानी श्रीकान्ताने नव मास व्यतीत होने पर वैशाख शुक्ल प्रतिपदाके दिन आग्नेय योगमें उस पुत्रको उदित किया- जन्म दिया ॥ २२ ॥
“Just as the western horizon allows the beautiful crescent moon to rise, even so, upon the completion of nine months, Queen Shrikanta gave rise—gave birth—to that divine son on the first day of the bright fortnight of the month of Vaishakha (Vaishakha Shukla Pratipada) under the Agneya planetary alignment.” 22
श्लोक ( Shlok ) 23 – 24
तुरासहं पुरोधाय समभ्येत्य सुरासुराः । सुमेरुमर्भकं नीत्वा क्षीरसैन्धववारिभिः ॥ २३ ॥अभिषिच्य विभूष्यैनं कुन्थुमाहूय संज्ञया । समानीय समर्थ्यायन् पित्रोरावासमात्मनः ॥ २४॥
उसी समय इन्द्रको आगे कर समस्त देव और धरणेन्द्र आये, उस बालकको सुमेरु पर्वत पर ले गये, क्षीर-सागरके जलसे उनका अभिषेक किया, अलंकारोंसे अलंकृत किया, कुन्थु नाम रखा, वापिस लाये, माता-पिताको समर्पण किया और अन्तमें सब अपने स्थान पर चले गये ।। २३-२४ ॥
“At that very moment, all the celestial deities and Dharanendra (the king of the underworld deities) arrived, led by Indra himself. They carried the infant to the summit of Mount Sumeru, performed his sacred birth-anointment (Abhisheka) using the pure waters of the Milk Ocean (Kshira-Sagara), adorned him with magnificent ornaments, and bestowed upon him the name ‘Kunthu’. They then brought him back, safely returned him to his mother and father, and finally, everyone departed for their respective celestial abodes.”23 – 24
श्लोक ( Shlok ) 25
शान्तीशतीर्थसन्तानकालेऽजनि जिनेश्वरः । पल्योपमार्खे पुण्याब्धिस्तदभ्यन्तरजीवितः ॥ २५ ॥
श्रीशान्तिनाथ तीर्थंकरके मोक्ष जानेके बाद जब आधा पल्य बीत गया तब पुण्यके सागर श्रीकुन्थु-नाथ भगवान् उत्पन्न हुए थे, उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें सम्मिलित थी ।। २५ ।।
“After the liberation (Moksha) of the Lord Shantinath—the 16th Tirthankara—and when half a Palya (a vast cosmic time unit) had elapsed, the ocean of merit, Lord Kunthunath, was born. His own lifespan was also included within this very interval.”25
श्लोक ( Shlok ) 26
समाः पञ्चसहस्त्रोनलक्षाः संवत्सरस्थितिः । पञ्चत्रिंशद्धनुः कायो निष्टप्ताष्टापदद्युतिः ॥ २६ ॥
पञ्चानवे हजार वर्षकी उनकी आयु थी, पैंतीस धनुष ऊँचा शरीर था और तपाये हुए सुवर्णके समान कान्ति थी ।। २६ ।।
“His lifespan was ninety-five thousand years, his body stood thirty-five dhanush (bow-lengths) tall, and his radiant complexion shone like molten gold.”26
श्लोक ( Shlok ) 27 – 28
खपञ्चमुनिवह्निद्विप्रमसंवत्सरान्तरे । नीत्वा कौमारमेतावत्येव काले च राजताम् ॥ २७ ॥निजजन्मदिने ‘चक्रिलक्ष्मी सम्प्राप्य सम्मदात् । दशाङ्गभोगाग्निविश्य निःप्रतीपं निरन्तरम् ॥२८॥
तेईस हजार सात सौ पचास वर्ष कुमारकालके बीत जानेपर उन्हें राज्य प्राप्त हुआ थाऔर इतना ही समय बीत जानेपर उन्हें अपनी जन्मतिथिके दिन चक्रवर्तीकी लक्ष्मी मिली थी । इसप्रकार वे बड़े हर्षसे बाधारहित, निरन्तर दश प्रकारके भोगोंका उपभोग करते थे ।। २७-२८ ।।
“After twenty-three thousand seven hundred and fifty years had passed in his youth as a prince (Kumarkala), he attained the kingdom. And after an equal amount of time had elapsed, he received the supreme wealth of a Chakravarti (universal monarch) on the very anniversary of his birth. In this manner, with immense joy and completely free from all obstacles, he continuously enjoyed the ten kinds of worldly pleasures.”27 – 28
श्लोक ( Shlok ) 29
षडङ्गबलसंयुक्तः कदाचित्क्रीडितुं वनम् । गत्वा रंत्वा चिरं स्वैरं निवृत्यायन्पुनः पुरम् ॥ २९ ॥
किसी समय वे षडङ्ग सेनासे संयुक्त होकर क्रीडा करनेके लिए वनमें गये थे वहाँ चिरकाल तक इच्छानुसार क्रीडाकर वे नगरको वापिस लौट रहे थे ॥ २९ ॥
“At one time, accompanied by his sixfold army (Shadanga Sena), he went into the forest to enjoy a leisurely excursion. Having amused himself there according to his heart’s desire for a long time, he was returning back to the city.”29
श्लोक ( Shlok ) 30 – 31
मुनिमातपयोगेन स्थितं कञ्चिन्निरूपयन् । मन्त्रिणं प्रति तर्जिन्या पश्य पश्येति चक्रभृत् ॥ ३० ॥स तं निरीक्ष्य तत्रैव भक्त्यावनतमस्तकः । देवैवं दुष्करं कुर्वस्तपः किं फलमाप्स्यति ॥ ३१ ॥
कि मार्गमें उन्होंने किसी मुनिको आतप योगसे स्थित देखा और देखते ही मन्त्रीके प्रति तर्जनी अंगुलीसे इशारा किया कि देखो, देखो। मन्त्री उन मुनिराजको देखकर वहींपर भक्तिसे नतमस्तक हो गया और पूछने लगा कि हे देव ! इस तरहका कठिन तप तपकर ये क्या फल प्राप्त करेंगे ? ॥ ३०-३१ ॥
“On the way back, he beheld a Jain monk absorbed in Aatapa Yoga (the ascetic practice of enduring the blazing heat of the sun). The moment he saw him, he pointed his index finger toward the monk and gestured to his minister, saying, ‘Look! Look!’
Upon seeing that great monk, the minister bowed his head in deep devotion right there and began to ask, ‘O Lord! By practicing such exceptionally severe penance, what fruit will this sage attain?'”30 – 31
श्लोक 32 से 41
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