नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 442 to 455
श्लोक ( Shlok ) 442
सभयस्तानि दृष्ट्वाख्यद्वरुणं मधुरापतिः । प्रादुर्भवनमेतेषां किं फलं कथयेति तम् ॥४४२॥
मथुराका राजा कंस उन्हें देखकर डर गया और वरुण नामक निमित्तज्ञानीसे पूछने लगा कि इनकी उत्पत्तिका फल क्या है ? सो कहो ।। ४४२ ।।
“Seeing them, Kansa, the king of Mathura, became afraid and asked a foreteller (astrologer/seer) named Varuna, ‘What is the consequence of their birth? Please tell me.’ || 442 ||”
श्लोक ( Shlok ) 443
राजन्नेतानि शास्त्रोक्तविधिना साधयेत्स यः । राज्यं चक्रेण संरक्ष्यमाप्स्यतीत्यभ्यधादसौ ॥४४३॥
वरुणने कहा कि हे राजन् ! जो मनुष्य शास्त्रोक्त विधिसे इन्हें सिद्ध “कर लेगा वह चक्ररत्नसे सुरक्षित राज्य प्राप्त करेगा ।। ४४३ ॥
“Varuna said, ‘O King! The person who successfully masters (or accomplishes the rites for) them according to the methods prescribed in the scriptures will obtain a kingdom protected by the divine discus (Chakra-ratna).’ || 443 ||”
श्लोक ( Shlok ) 444
कंसस्तद्वचनं श्रुत्वा संक्षिसाधयिषुः स्वयम् । तान्यशक्तोऽमनाखिन्नो विरतः साधनोद्यमान् ॥४४४॥
कंसने वरुणके वचन सुनकर उन तीना रत्नोंको स्वयं सिद्ध करनेका प्रयत्न किया परन्तु वह असमर्थ रहा और बहुत भारी खिन्न होकर उनके सिद्ध करनेके प्रयत्नसे विरत हो गया- पीछे हट गया ॥ ४४४ ॥
“Upon hearing Varuna’s words, Kansa himself attempted to master (or activate) those three jewels. However, he was unsuccessful and, becoming deeply despondent, desisted—backed away—from his efforts to master them.” || 444 ||
श्लोक ( Shlok ) 445 – 446
अधिरुह्याहिजां शय्यां शङ्खमेककरेण यः । पूरयत्यपि यश्चापं चारोपयति हेलया ॥४४५॥परेण तस्मै भूभर्ता स्वसुतां दास्यतीति तम् । परिज्ञातुं स साशङ्को घोषणां पुर्यकारयत् ॥४४६॥
ऐसा कौन बलवान् है जो इस कार्यको सिद्ध कर सकेगा इसकी जाँच करनेके लिए भयभीत कंसने नगरमें यह घोषणा करा दी कि जो भी नागशय्या पर चढ़कर एक हाथसे शङ्ख बजावेगा और दूसरे हाथसे धनुषको अनायास ही चढ़ा देगा उसे राजा अपनी पुत्री देगा ॥ ४४५-४४६ ॥
“In order to test who was powerful enough to accomplish this task, the terrified Kansa had a proclamation made throughout the city: ‘Whosoever climbs upon the serpent-bed (Nagasahyya), effortlessly strings the bow with one hand, and blows the conch shell with the other hand, the King shall give him his daughter in marriage.'” || 445-446 ||
श्लोक ( Shlok ) 447 – 450
तद्वार्ताश्रवणाद्विश्वमहीशाः सहसागमन् । तथा राजगृहात्कंसमैथुनो भानुसन्निभः १ ॥४४७॥सुभानुर्भानुनामानं स्वसूनुं सर्वसम्पदा । समादाय समागच्छन्निवेष्टुमभिलाषवान् ॥५४८॥गोधावनमहानागनिवाससरसस्तटे । विना कृष्णेन वार्यस्मदानेतुं सरसः परैः ॥४४९॥अशक्यमिति गोपालकुमारोक्त्या महीपतिः । तमाहूय बलं तत्र यथास्थानं न्यवीविशत् ॥४५०॥
यह घोषणा सुनते ही अनेक राजा लोग मथुरापुरी आने लगे। राजगृहसे कंसका साला स्वर्भानु जो कि सूर्यके समान तेजस्वी था अपने भानु नामके पुत्रको साथ लेकर बड़े वैभवसे आ रहा था। वह मार्गमें गोधावनके उस सरोबरके किनारे जिसमें कि बड़े- बड़े सर्पोंका निवास था ठहरना चाहता था परन्तु जब उसे गोपाल बालकोंके कहनेसे मालूम हुआ कि इस सरोवरसे कृष्णके सिवाय किन्हीं अन्य लोगोंसे द्वारा पानी लिया जाना शक्य नहीं है तब उसने कृष्णको बुलाकर अपने पास रख लिया और सेनाको यथास्थान ठहरा दिया ।। ४४७-४५० ।।
“Upon hearing this proclamation, many kings began arriving in Mathurapuri. From Rajgriha, Kansa’s brother-in-law, Svarbhanu—who was as radiant as the sun—was coming with great grandeur, accompanied by his son named Bhanu. Along the way, he wished to halt near the Godhavan lake, which was inhabited by massive serpents. However, when he learned from the cowherd boys that it was impossible for anyone other than Krishna to fetch water from this lake, he summoned Krishna to stay by his side and ordered his army to camp at their designated places.” || 447-450 ||
श्लोक ( Shlok ) 451 – 455
क्क गम्यते त्वया राजनिति कृष्णेन भाषितः । स्वर्भानुर्मधुरायानप्रयोजनमबूबुधन् ॥४५१॥श्रुत्वैतत्कर्म किं कर्तुं स्यात्तदस्मद्विधैरपि । इति कृष्णपरिप्रश्ने वीक्ष्य पुण्याधिकः शिशुः ॥४५२॥न केवलोऽयमित्येहि शक्तश्चेत्तस्य कर्मणः । इत्यादाय स्वपुत्रं वा स्वर्भानुस्तं पुरीमगात् ॥४५३॥कंसं यथाईमालोक्य तत्कर्मघटकान्बहून् । भग्नमानांश्च संवीक्ष्य कृत्वा भानुं समीपगम् ॥४५४॥युगपत्त्रितयं कर्म समाप्तिमनयद्धरिः । ततः स्वर्भानुनादिष्टो दिष्ट्या कृष्णोऽगमद् ब्रजम् ॥४५५॥
अवसर पाकर कृष्णने राजा स्वर्भानुसे पूछा कि हे राजन् ! आप कहाँ जा रहे हैं ? तब उसने मथुरा जानेका सब प्रयोजन कृष्णको बतला दिया। यह सुनकर कृष्णने फिर पूछा- क्या यह कार्य हमारे जैसे लोग भी कर सकते हैं ? कृष्णका प्रश्न सुनकर स्वर्भानुने सोचा कि यह केवल बालक ही नहीं है इसका पुण्य भी अधिक मालूम होता है। ऐसा विचार कर उसने कृष्णको उत्तर दिया कि यदि तू यह कार्य करनेमें समर्थ है तो हमारे साथ चल । इतना कह कर स्वर्भानुने कृष्णको अपने पुत्रके समान साथ ले लिया। मथुरा जाकर उन्होंने कंसके यथायोग्य दर्शन किये और तदनन्तर उन समस्त लोगोंको भी देखा कि नागशय्या आदिको वश करनेका प्रयत्न कर रहे थे परन्तु सफलता नहीं मिलनेसे जिनका मान भङ्ग हो गया था। श्रीकृष्णने भानुको अपने समीप ही खड़ा कर उक्त तीनों कार्य समाप्त कर दिये और उसके बाद स्वर्भानुका संकेत पाकर शीघ्र ही वह कुशलता पूर्वक ब्रजमें वापिस आ गया ।॥ ४५१-४५५ ।।
“Seizing the opportunity, Krishna asked King Svarbhanu, ‘O King! Where are you heading?’ The king then explained the entire purpose of his journey to Mathura to Krishna.
Upon hearing this, Krishna asked again, ‘Can people like us also perform this task?’ Hearing Krishna’s question, Svarbhanu thought to himself, ‘He is not just an ordinary child; his merit (punya) also appears to be immense.’ With this thought, he replied to Krishna, ‘If you are capable of doing this task, then come along with us.’ Saying this, Svarbhanu took Krishna with him, treating him just like his own son.
Upon reaching Mathura, they paid their due respects to Kansa, and subsequently, they also observed all those people who were trying to master the serpent-bed (Nagasahyya) and the other challenges, but whose pride had been shattered due to their failure. Shri Krishna made Bhanu stand right next to him and completed all three tasks. Afterward, receiving a sign from Svarbhanu, he swiftly and safely returned to Braj.” || 451-455 ||
श्लोक 456 से 471
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 375 | श्लोक 376 से 392 | श्लोक 393 से 402 | श्लोक 403 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |