Hindi Translation of Uttar puran Parv 58
श्लोक 1 से 11 — पद्मोत्तर राजा का वैराग्य और दीक्षा
जो वासु अर्थात् इन्द्रके पूज्य हैं अथवा महाराज वसुपूज्यके पुत्र हैं और सज्जन लोग जिनकी पूजा करते हैं ऐसे वासुपूज्य भगवान् अपने ज्ञानसे हम सबको पवित्र करें ।॥ १ ॥ पुष्करार्ध द्वीपके पूर्व मेरुकी ओर सीता नदीके दक्षिण तट पर वत्सकावती नामका एक देश है। उसके अतिशय प्रसिद्ध रत्नपुर नगरमें पद्मोत्तर नामका राजा राज्य करता था ॥ २ ॥ उस राजाकी गुणमयी कीर्ति सबके वचनोंमें रहती थी, पुण्यमयी मूर्ति सबके नेत्रोंमें रहती थी, और धर्ममयी वृत्ति सबके चित्तमें रहती थी ॥ ३॥ उसके वचनोंमें शान्ति थी, चित्तमें दया थी, शरीरमें तेज था, बुद्धिमें नीति थी, दानमें धन था, जिनेन्द्र भगवान्में भक्ति थी और शत्रुओंमें प्रताप था अर्थात् अपने प्रतापसे शत्रुओंको नष्ट करता था ॥४॥ जिस प्रकार न्यायमार्गसे चलनेवाले मुनिमें समितियाँ बढ़ती रहती हैं उसी प्रकार न्यायमार्गसे चलनेवाले उस राजाके पृथिवीका पालन करते समय प्रजा खूब बढ़ रही थी ।॥ ५ ॥ उसके गुण ही धन था तथा उसकी लक्ष्मी भी गुणोंसे प्रेम करनेवाली थी इसलिए वह उस लक्ष्मीके साथ बिना किसी प्रतिबन्ध-के विशाल सुख प्राप्त करता रहता था ।॥ ६ ॥ किसी एक दिन मनोहर नामके पर्वत पर युगन्धर जिनराज विराजमान थे। पद्मोत्तर राजाने वहाँ जाकर भक्तिपूर्वक अनेक स्तोत्रोंसे उनकी उपासना की ॥ ७ ॥ विनयपूर्वक धर्म सुना और अनुप्रेक्षाओंका चिन्तवन किया । अनुप्रेक्षाओंके चिन्तवनसे उसे संसार, शरीर और भोगोसे तीन प्रकारका वैराग्य उत्पन्न हो गया। वैराग्य होने पर वह इस प्रकार पुनः चिन्तवन करने लगा ॥ ८ ॥ कि यह लक्ष्मी माया रूप है, सुख दुःखरूप है, जीवन मरण पर्यन्त है, संयोग-वियोग होने तक है और यह दुष्ट शरीर रोगोंसे सहित है ॥ ६ ॥ अतः इन सबमें क्या प्रेम करना है ? अब तो मैं उपस्थित हुई इस काललब्धिका अवलम्बन लेकर अत्यन्त भयानक इस संसार रूपी पञ्च परावर्तनोंसे बाहर निकलता हूँ ॥ १० ॥ ऐसा विचार कर उसने राज्यका भार धनमित्र नामक पुत्रके लिए सौंपा और स्वयं आत्म-शुद्धिके लिए अनेक राजाओंके साथ दीक्षा ले ली ।। ११ ।।
श्लोक 12 से 22 — महाशुक्र इन्द्र से वासुपूज्य भगवान के जन्म तक
निर्मल बुद्धिके धारक पद्मोत्तर मुनिने ग्यारह अंगोंका अध्ययन किया, दर्शनविशुद्धि आदि भावनाओं रूप सम्पत्तिके प्रभावसे तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध किया और अन्तमें संन्यास धारण किया ।। १२ ।। जिससे महाशुक्र विमानमें महाशुक्र नामका इन्द्र हुआ। सोलह सागर प्रमाण उसकी आयु थी और चार हाथ ऊँचा शरीर था ।। १३ ।। पद्मलेश्या थी, आठ माहमें एक बार श्वास लेता था, सदा संतुष्टचित्त रहता था और सोलह हजार वर्ष बीतने पर एक बार मानसिक आहार लेता था ।। १४ ॥ सदा शब्दसे ही प्रवीचार करता था अर्थात् देवाङ्गनाओंके मधुर शब्द सुनने मात्रसे उसकी कामबाधा शान्त हो जाती थी, चतुर्थ पृथिवी तक उसके अवधिज्ञानका विषय था, और चतुर्थ पृथिवी तक ही उसकी विक्रिया बल और तेजकी अवधि थी ॥ १५ ॥ वहाँ देवियोंके मधुर वचन, गीत, बाजे आदिसे वह सदा प्रसन्न रहता था। अन्त में काल द्रव्यकी पर्यायोंसे प्रेरित होकर जब वह यहाँ आनेवाला हुआ ॥ १६ ।।
तब इस जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरत क्षेत्रके चम्पा नगरमें वसुपूज्य नामका अङ्गदेशका राजा रहता था । वह इक्ष्वाकुवंशी तथा काश्यपगोत्री था। उसकी प्रिय स्त्रीका नाम जयावती था, । जया-वतीने रत्नवृष्टि आदि सम्मान प्राप्त किया था। तदनन्तर उसने आषाढ़कृष्ण षष्ठीके दिन चौबीसवें शतभिषा नक्षत्रमें सोलह स्वप्न देखे और पतिसे उनका फल जानकर बहुत ही सन्तोष प्राप्त किया । क्रम-क्रमसे आठ माह बीत जानेपर जब नौवाँ फाल्गुन माह आया तब उसने कृष्णपक्षकी चतुर्दशीके दिन वारुण योगमें सब प्राणियोंका हित करनेवाले उस इन्द्ररूप पुत्रको सुखसे उत्पन्न किया ।। १७-२० ।। सौधर्म आदि देवोंने उसे सुमेरु पर्वत पर ले जाकर घड़ों द्वारा क्षीरसागरसे लाये हुए जलके द्वारा उसका जन्माभिषेक किया, आभूषण पहिनाये, वासुपूज्य नाम रक्खा, घर वापिस लाये और अनेक महोत्सव कर अपने अपने निवास स्थानोंकी ओर गमन किया ।। २१-२२ ।।
श्लोक 23 से 32 — वासुपूज्य भगवान का कुमारकाल और वैराग्य
श्री श्रेयांम-नाथ तीर्थंकरके तीर्थसे जब चौवन सागर प्रमाण अन्तर बीत चुका था और अन्तिम पल्यके तृतीय भागमें जब धर्मकी सन्ततिका विच्छेद हो गया था तब वासुपूज्य भगवान्का जन्म हुआ था। इनकी आयु भी इसी अन्तरमें सम्मिलित थी, वे सत्तर धनुष ऊँचे थे, बहत्तर लाख वर्षकी उनकी आयु थी और कुङ्कुमके समान उनके शरीरकी कान्ति थी ।। २३-२४ ॥ जिस प्रकार मेंडकोंके द्वारा आस्वादन करने योग्य अर्थात् सजल क्षेत्र अठारह प्रकारके इष्ट धान्योंके बीजोंकी वृद्धिका कारण होता है उसी प्रकार यह राजा गुणोंकी वृद्धिका कारण था ।। २५ ।। जिस प्रकार संसारका हित करनेवाले सब प्रकार-के धान्य, समा नामकी इच्छित वर्षाको पाकर श्रेष्ठ फल देनेवाले होते हैं उसी प्रकार समस्त गुण इस राजाकी बुद्धिको पाकर श्रेष्ठ फल देनेवाले हो गये थे ।। २६ ।। सात दिन तक मेघोंका बरसना त्रय कहलाता है, अस्सी दिन तक बरसना कणशीकर कहलाता है और बीच-बीच में आतप-धूप प्रकट करनेवाले मेघोंका साठ दिन तक वरसना समावृष्टि कहलाती है ॥ २७ ॥ गुण, अन्य हरि-हरादिकमें जाकर अप्रधान हो गये थे परन्तु इन वासुपूज्य भगवान्में वही गुण मुख्यताको प्राप्त हुए थे सो ठीक ही है क्योंकि विशिष्ट आश्रय किसकी विशेषताको नहीं करते ? ॥ २८ ॥ चूँकि सब पदार्थ गुणमय हैं- गुणोंसे तन्मय हैं अतः गुणका नाश होनेसे गुणी पदार्थका भी नाश हो जावेगा यह विचार कर ही बुद्धिमान् बासुपूज्य भगवान् समस्त गुणोंका अच्छी तरह पालन करते थे ॥२९॥ जब कुमारकालके अठारह लाख वर्ष बीत गये तब संसारसे विरक्त होकर बुद्धिमान् भगवान् अपने मनमें पदार्थ के यथार्थ स्वरूपका इस प्रकार विचार करने लगे ॥ ३० ॥ यह निर्बुद्धि प्राणी विषयोंमें आसक्त होकर अपनी आत्माको अपने ही द्वारा बाँध लेता है तथा चार प्रकारके बन्धसे चार प्रकार-का दुःख भोगता हुआ इस अनादि संसार-वनमें भ्रमण कर रहा है। अब मैं कालादि लब्धियोंसे उत्तम गुणको प्रकट करनेवाले सन्मार्गको प्राप्त हुआ हूँ अतः मुझे मोक्ष रूप सद्गति ही प्राप्त करना चाहिए ॥ ३१-३२ ॥
श्लोक 33 से 41 — दीक्षा और केवलज्ञान की तैयारी
शरीर भला ही पवित्र हो, स्थायी हो, दर्शनीय-सुन्दर हो, नीरोग हो, आयु चिरकाल तक बाधासे रहित हो, और सुखके साधन निरन्तर मिलते रहें परन्तु यह निश्चित है कि इन सबका वियोग अवश्यंभावी है, यह इन्द्रियजन्य सुख रागरूप है, रागी जीव कर्मोंको बाँधता है, बन्ध संसारका कारण है, संसार चतुर्गति रूप है और चारों गतियाँ दुःख तथा सुखको देनेवाली हैं अतः मुझे इस संसारसे क्या प्रयोजन है ? यह तो बुद्धिमानोंके द्वारा छोड़ने योग्य ही है ॥ ३३-३५॥ इधर भगवान् ऐसा चिन्तवन कर रहे थे उधर लौकान्तिक देवोंने आकर उनकी स्तुति करमा प्रारम्भकर दी । देवोंने दीक्षा-कल्याणकके समय होनेवाला अभिषेक किया, आभूषण पहिनाये तथा अनेक उत्सव किये ।। ३६ ।। महाराज वासुपूज्य देवोंके द्वारा उठाई गई पालकी पर सवार होकर मनोहरो-द्यान नामक वनमें गये और वहाँ दो दिनके उपवासका नियम लेकर फाल्गुनकृष्ण चतुर्दशीके दिन सायंकालके समय विशाखा नक्षत्रमें सामायिक नामका चारित्र ग्रहण कर साथ ही साथ मनःपर्यय-ज्ञानके धारक भी हो गये ।। ३७-३८ ॥ उनके साथ परमार्थको जाननेवाले छह सौ छिहत्तर राजाओंने भी बड़े हर्षसे दीक्षा प्राप्त की थी ॥ ३९ ॥ दूसरे दिन उन्होंने आहारके लिए महानगर में प्रवेश किया । वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले सुन्दर नामके राजाने उन्हें आहार दिया ।। ४० ।। और पञ्चाश्चर्य प्राप्त फिये । तदनन्तर छद्मस्थ अवस्थाका एक वर्ष बीत जानेपर किसी दिन वासुपूज्य स्वामी अपने दीक्षा-वनमें आये ।। ४१ ।।
श्लोक 42 से 53 — केवलज्ञान, धर्मप्रभावना और निर्वाण
वहाँ उन्होंने कदम्ब वृक्षके नीचे बैठकर उपवासका नियम लिया और माघशुक्ल द्वितीयाके दिन सायकालके समय विशाखा नक्षत्रमें चार घातिया कर्मोंको नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त किया । अब वे जिनराज हो गये ॥ ४२ ॥ सौधर्म आदि इन्द्रोंने उसी समय आकर उनकी पूजा की। चूँकि भगवान्का वह दीक्षा-कल्याणक नामकर्मके उद्यसे हुआ था अतः उसका विस्तारके साथ वर्णन नहीं किया जा सकता ॥ ४३ ॥ वे धर्मको आदि लेकर छयासठ गदाधरोंके समूहसे वन्दित थे, बारह सौ पूर्वधारियोंसे घिरे रहते थे, उनतालीस हजार दो सौ शिक्षक उनके चरणोंकी स्तुति करते थे, पाँच हजार चार सौ अवधिज्ञानी उनकी सेवा करते थे, छह हजार केवलज्ञानी उनके साथ थे, दश हजार विक्रिया ऋद्धिको धारण करनेवाले मुनि उनकी शोभा बढ़ा रहे थे, छह हजार मनःपर्ययज्ञानी उनके चरण-कमलोंका आदर करते थे और चार हजार दो सौ वादी उनकी उत्तम प्रसिद्धिको बढ़ा रहे थे। इस प्रकार सब मिलकर बहत्तर हजार मुनियोंसे वे सुशोभित थे, एक लाख छह हजार सेना आदि आर्यिकाओंको धारण करते थे, दो लाख श्रावकोंसे सहित थे, चार लाख श्राविकाओंसे युक्त थे, असंख्यात देव-देवियोंसे स्तुत्य थे और संख्यात तिर्यश्वोंसे स्तुत थे ।॥ ४४-४९ ।। भगवान्ने इन सब-के साथ समस्त आर्यक्षेत्रोंमें विहार कर उन्हें धर्मवृष्टिसे संतृप्त किया और क्रम-क्रमसे चम्पा नगरीमें आकर एक हजार वर्ष तक रहे। जब आयुमें एक मास शेष रह गया तब योग-निरोधकर रजत-मालिका नामक नदीके किनारेकी भूमि पर वर्तमान, मन्द्रागिरिकी शिखरको सुशोभित करनेवाले मनोहरोद्यान में पर्यङ्कासनसे स्थित हुए तथा भाद्रपदशुक्ला चतुर्दशीके दिन सायंकालके समय विशाखा नक्षत्रमें चौरानवे मुनियोंके साथ मुक्तिको प्राप्त हुए ॥ ५०-५३ ॥
श्लोक 54 से 61— वासुपूज्य भगवान की महिमा और द्विपृष्ठ नारायण का प्रारम्भिक वर्णन
सेवा करनेमें अत्यन्त निपुण देवोंने निर्वाणकल्याणककी पूजाके बाद बड़े उत्सवसे भगवान्की वन्दना की ॥ ५४ ॥ जब कि विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको, अच्छी तरह प्रयोगमें लाये हुए सन्धि-विग्रह आदि छह गुणोंसे ही सिद्धि (विजय) मिल जाती है तब मोक्षाभिलाषी भगवान्को चौरासी लाख गुणोंसे सिद्धि (मुक्ति) क्यों नहीं मिलती ? अवश्य मिलती ।। ५५ ।। पदार्थ कथंचित् सत् है, कथंचित् असत् है, कथंचित् सत्-असत् उभयरूप है, कथंचित् अवक्तव्य है, कथंचित् सत् अवक्तव्य है, कथंचित् असत् अवक्तव्य है, और कथंचित् सदसद्-वक्तव्य है, इस प्रकार हे भगवन्, आपने प्रत्येक पदार्थके प्रति सप्तभङ्गीका निरूपण किया है और इसीलिए आप सत्यवादी रूपसे प्रसिद्ध हैं फिर हे वासुपूज्य देव ! आप पूज्य क्यों न हों ? अवश्य हों ।। ५६ ।। धर्म दया रूप है, परन्तु वह दयारूप धर्म परिग्रह सहित पुरुषके कैसे हो सकता है ? वर्षा पृथिवीतलका कल्याण करनेवाली है परन्तु प्रतिबन्धके रहते हुए कैसे हो सकती है ? इसीलिए आपने अन्तरङ्ग-बहिरङ्ग – दोनों परिग्रहोंके त्यागका उपदेश दिया है। हे वासुपूज्य जिनेन्द्र ! आप इसी परिग्रह-त्यागकी वासनासे पूजित हैं ।॥ ५७ ॥ जो पहले जन्ममें पद्मोत्तर राजा हुए, फिर महा-शुक्र स्वर्गमें इन्द्र हुए, वह इन्द्र, जिनके कि चरण, देवरूपी भ्रमरोंके लिए कमलके समान थे और फिर त्रिजगत्पूज्य वासुपूज्य जिनेन्द्र हुए, वह जिनेन्द्र, जिन्होंने कि बालब्रह्मचारी रह कर ही राज्य किया था, वे बारहवें तीर्थंकर तुम सबके लिए अतुल्य सुख प्रदान करें ।॥ ५८ ॥
अथानन्तर- श्री वासुपूज्य स्वामी के तीर्थमें द्विपृष्ठ नामका राजा हुआ जो तीन खण्डका स्वामी था और दूसरा अर्धचक्री (नारायण) था ॥ ५९ ॥ यहाँ उसका तीन जन्म सम्बन्धी चरित्र कहता हूँ जिसके सुननेसे भव्य-जीवोंको संसारसे बहुत भारी भय उत्पन्न होगा ॥ ६० ॥ इसी जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें एक कनकपुर नामका नगर है। उसके राजाका नाम सुषेण था। सुषेणके एक गुणमंजरी नामकी नृत्यकारिणी थी ॥ ६१ ॥
श्लोक 62 से 71— गुणमंजरी के कारण उत्पन्न वैर और युद्ध की भूमिका
वह नृत्यकारिणी रूपवती थी, सौभाग्यवती थी, गीत नृत्य तथा बाजे बजाने आदि कलाओंमें प्रसिद्ध थी, और दूसरी सरस्वतीके समान जान पड़ती थी, इसीलिए सब राजा उसे चाहते थे ॥ ६२ ॥ उसी भरतक्षेत्रमें एक मलय नामका मनोहर देश था, उसके विन्ध्य-पुर नगरमें विन्ध्यशक्ति नामका राजा रहता था ॥ ६३ ॥ जिस प्रकार मधुरताके रसते अनुरक्त हुआ भ्रमर आम्रमञ्जरीके देखनेमें आसक्त होता है उसी प्रकार वह राजा गुणमञ्जरीके देखनेमें आसक्त था ।। ६४ ।। उसने नृत्यकारिणीको प्राप्त करनेकी इच्छासे सुषेण राजाका सन्मान कर उसके पास रत्न आदिकी भेंट लेकर चित्तको हरण करनेवाला एक दूत भेजा ॥ ६५ ॥ उस दूतने भी शीघ्र जाकर सुषेण महाराजके दर्शन किये, यथायोग्य भेंट दी और निम्न प्रकार समाचार कहा ।। ६६ ।। उसने कहा कि आपके घरमें जो अत्यन्त प्रसिद्ध नर्तकीरूपी महारत्न है, उसे आपका भाई विन्ध्यशक्ति देखना चाहता है ।। ६७ ।। हे राजन् ! इसी प्रयोजनको लेकर मैं यहाँ भेजा गया हूँ। आप भी उस नृत्य-कारिणीको भेज दीजिए। मैं उसे वापिस लाकर आपको सौंप दूँगा ॥ ६८ ॥ दूतके ऐसे वचन सुन-कर सुषेण क्रोधसे अत्यन्त काँपने लगा और कहने लगा कि जा, जा, नहीं सुनने योग्य तथा अहंकार-से भरे हुए इन वचनोंसे क्या लाभ है ? इस प्रकार सुषेण राजाने खोटे शब्दों द्वारा दूतकी बहुत भारी भर्त्सना की । दूतने वापिस आकर यह सब समाचार राजा विन्ध्यशक्तिसे कह दिए ॥ ६९ -७० ।। दूतके वचन सुननेसे वह भी बहुत भारी क्रोधरूपी ग्रहसे आविष्ट हो गया – अत्यन्त कुपित हो गया और कहने लगा कि रहने दो, क्या दोष है ? तदनन्तर मंत्रियोंके साथ उसने कुछ गुप्त विचार किया ।॥ ७१ ॥
श्लोक 72 से 81 — सुषेण का पराभव, वैराग्य और स्वर्गगमन
कूट युद्ध करनेमें चतुर, श्रेष्ठ योद्धाओंके आगे चलनेवाला और शूरवीर वह राजा अपनी सेना लेकर शीघ्र ही चला ॥ ७२ ॥ विन्ध्यशक्तिने युद्धमें राजा सुषेणको पराजित किया और उसकी कीर्तिके समान नृत्यकारिणीको जबरदस्ती छीन लिया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके चले जाने पर कौन किसकी क्या वस्तु नहीं हर लेता ? ॥ ७३ ॥ जिस प्रकार दाँतका टूट जाना हाथीकी महिमाको छिपा लेता है, और दाढ़का टूट जाना सिंहकी महिमाको तिरोहित कर देता है उसी प्रकार मान-भङ्ग राजाकी महिमाको छिपा देता है ।॥ ७४ ॥ उस मान-भङ्गसे राजा सुषेणका दिल टूट गया अतः जिस प्रकार पीठ टूट जानेसे सर्प एक पद भी नहीं चल पाता है उसी प्रकार वह भी अपने स्थानसे एक पद भी नहीं चल सका ।॥ ७५ ॥ किसी एक दिन उसने विरक्त होकर धर्मके स्वरूपको जाननेवाले गृह-त्यागी सुव्रत जिनेन्द्रसे धर्मोपदेश सुना और निर्मल चित्तसे इस प्रकार विचार किया कि वह हमारे किसी पापका ही उदय था जिससे विन्ध्यशक्तिने मुझे हरा दिया। ऐसा विचार कर उसने पाप-रूपी शत्रुको नष्ट करनेकी इच्छा की ।। ७६-७७ ॥ और उन्हीं जिनेन्द्रसे दीक्षा ले ली। बहुत दिन तक तपरूपी अग्निके संतापसे उसका शरीर कृश हो गया था। अन्तमें शत्रुपर क्रोध रखता हुआ वह निदान बन्ध सहित संन्यास धारण कर प्राणत स्वर्गके अनुपम नामक विमानमें बीस सागरकी आयुवाला तथा आठ ऋद्धियोंसे हर्षित देव हुआ ।। ७८-७९ ।।
अथानन्तर इसी भरतक्षेत्रके महापुर नगरमें श्रीमान् वायुरथ नामका राजा रहता था। चिर-काल तक राज्यलक्ष्मीका उपभोग कर उसने सुव्रत नामक जिनेन्द्रके पास धर्मका उपदेश सुना, तत्त्व-ज्ञानी वह पहलेसे ही था अतः विरक्त होकर घनरथ नामक पुत्रको राज्य देकर तपके लिए चला गया ।। ८०-८१ ॥
श्लोक 82 से 91 — द्विपृष्ठ नारायण और अचल बलभद्र का जन्म
समस्त शास्त्रोंका अध्ययन कर तथा उत्कृष्ट तप कर वह उसी प्राणत स्वर्गके अनुत्तर नामक विमानमें इन्द्र हुआ ।॥ ८२ ॥ वहाँ से चय कर इसी भरतक्षेत्रकी द्वारावती नगरीके राजा ब्रह्मके उनकी रानी सुभद्राके अचलस्तोक नामका पुत्र हुआ ॥ ८३ ॥ तथा सुषेणका जीव भी वहाँ से चय कर उसी ब्रह्म राजाकी दूसरी रानी उषाके द्विष्पृष्ठ नामका पुत्र हुआ । उस द्विष्टष्ठका शरीर सत्तर धनुष ऊँचा था और आयु बहत्तर लाख वर्षकी थी। इस प्रकार इक्ष्वाकु वंशका अग्रेसर वह द्विष्पृष्ठ, राजाओंके उत्कृष्ट भोगोंका उपभोग करता था ।। ८४-८५ ॥ कुन्द पुष्प तथा इन्द्रनीलमणिके समान कान्तिवाले वे बलभद्र और नारायण जब परस्परमें मिलते थे तब गङ्गा और यमुनाके प्रवाहके समान जान पड़ते थे ।॥ ८६ ॥ जिस प्रकार समान दो श्रावक गुरुके द्वारा दी हुई सरस्वतीका बिना विभाग किये ही उपभोग करते हैं उसी प्रकार पुण्यके स्वामी वे दोनों भाई बिना विभाग किये ही पृथिवीका उपभोग करते थे ॥ ८७॥ समस्त शास्त्रोंका अध्ययन करनेवाले उन दोनों भाइयोंमें अभेद था-किसी प्रकारका भेदभाव नहीं था सो ठीक ही है क्योंकि उसी अभेदकी प्रशंसा होती है जो कि लक्ष्मी और स्त्रीका संयोग होनेपर भी बना रहता है ।॥ ८८ ॥ वे दोनों स्थिर थे, बहुत ही ऊँचे थे, तथा सफेद और नील रङ्गके थे इसलिए ऐसे अच्छे जान पड़ते थे मानो कैलास और अञ्जनगिरि ही एक जगह आ मिले हों ॥ ८९ ॥
इधर राजा विन्ध्यशक्ति, घटी यन्त्रके समान चिरकाल तक संसार-सागरमें भ्रमण करता रहा । अन्तमें जब थोडेसे पुण्यके साधन प्राप्त हुए तब इसी भरतक्षेत्रके भोगवर्धन नगरके राजा श्रीधरके सर्व प्रसिद्ध तारक नामका पुत्र हुआ ।। ९०- ९१ ॥
श्लोक 92 से 101 तारक प्रतिनारायण का उदय और शत्रुता
अपने चक्रके आक्रमण सम्बन्धी भयसे जिसने समस्त विद्याधर तथा भूमि-गोचरियोंको अपना दास बना लिया है ऐसा वह तारक आधे भरतक्षेत्रमें रहनेवाली देदीप्यमान लक्ष्मीको धारण कर रहा था ।॥ ९२ ॥ अन्य जगहकी बात रहने दीजिए, मैं तो ऐसा मानता हूँ कि – उसके डरसे सूर्यकी प्रभा भी मन्द पड़ गई थी इसलिए लक्ष्मी कमलोंमें भी कभी प्रसन्न नहीं दिखती थी ॥ ९३ ॥ जिस प्रकार उग्र राहु पूर्णिमाके चन्द्रमाका विरोधी होता है उसी प्रकार उम्र प्रकृति वाला तारक भी प्राचीन राजाओंके मार्गका विरोधी था ॥ ९४ ॥ जिस प्रकार किसी क्रूर ग्रहके विकारसे मेघमालाके गर्भ गिर जाते हैं उसी प्रकार तारकका नाम लेते ही भय उत्पन्न होनेसे गर्भिणी स्त्रियोंके गर्भ गिर जाते थे ॥ ९५ ॥ स्याहीके समान श्याम वर्णवाला वह तारक सदा शत्रुओंको ढूँढ़ता रहता था और जब किसी शत्रुको नहीं पाता था तब ऐसा जान पड़ता था मानो अपने प्रतापरूपी अग्निके धुएँसे ही काला पड़ गया हो ॥ ९६ ॥ जिसने समस्त क्षत्रियोंको संतप्त कर रक्खा है और जो ग्रीष्म ऋतुके सूर्यके समान दुःखसे सहन करने योग्य है ऐसा वह तारक अन्तमें पतनके सम्मुख हुआ सो ठीक ही है क्योंकि ऐसे लोगोंकी लक्ष्मी क्या स्थिर रह सकती है ? ॥ ९७ ॥ जो अखण्ड तीन खण्डोंका स्वामित्व धारण करता था ऐसा तारक जन्मान्तरसे आये हुए तीव्र विरोधसे प्रेरित होकर द्विष्पृष्ठनारायण और अचल बलभद्रकी वृद्धिको नहीं सह सका। वह सोचने लगा कि मैंने समस्त राजाओं और किसानोंको कर देनेवाला बना लिया है परन्तु ये दोनों भाई ब्राह्मणके समान कर नहीं देते। इतना ही नहीं, दुष्ट गर्वसे युक्त भी हैं। अपने घरमें बढ़ते हुए दुष्ट साँपको कौन सहन करेगा ? ॥ ९८-१०० ॥ ये दोनों ही मेरे द्वारा नष्ट किये जाने योग्य शत्रुओंकी श्रेणीमें स्थित हैं तथा अपने स्वभावले दूषित भी हैं अतः जिस किसी तरह दोष लगाकर इन्हें अवश्य ही नष्ट करूँगा ।॥ १०१ ॥
श्लोक 102 से 111 — दूत का अपमान और युद्ध का प्रारम्भ
इस प्रकार अपायका विचार कर उसने दुर्वचन कहनेवाला एक कलह-प्रेमी दूत भेजा और वह दुष्ट दूत भी सहसा उन दोनों भाइयोंके पास जाकर इस प्रकार कहने लगा कि शत्रुओंको मारनेवाले तारक महाराजने आज्ञा दी है कि तुम्हारे घरमें जो एक बड़ा भारी प्रसिद्ध गन्धहस्ती है वह हमारे लिए शीघ्र ही भेजो अन्यथा तुम दोनोंके शिर खण्डित कर अपनी विजयी सेनाके द्वारा उस हाथीको जबरदस्ती मँगा लूँगा ॥ १०२-१०४ ।। इस प्रकार उस कलहकारी दूतके द्वारा कहे हुए असभ्य तथा सहन करनेके अयोग्य वचन सुनकर पर्वतके समान अचल, उदार तथा धीरोदात्त प्रकृतिके धारक अचल बलभद्र इस तरह कहने लगे ।। १०५ ।। कि हाथी क्या चीज है ? तारक महाराज ही अपनी सेनाके साथ शीघ्र आवें । हम उनके लिए वह हाथी तथा अन्य वस्तुएँ देंगे जिससे कि वे स्वस्थता-कुशलता (पक्ष में स्वः स्वर्गे तिष्ठ-तीति स्वस्थः ‘शर्परि खरि विसर्गलोपो वा वक्तव्यः’ इति वार्तिकेन सकारस्य लोपः । स्वस्थस्य भावः स्वास्थ्यम् ) मृत्युको प्राप्त कर सकेंगे ॥ १०६ ॥ इस प्रकार गम्भीर वचन कह कर अचल बलभद्रने उस दूतको विदा कर दिया और उसने भी जाकर हवाकी तरह उसकी कोपानिको प्रदीप्त कर दिया ।। १०७ ।। यह सुनकर कोपाग्निसे प्रदीप्त हुआ तारक अग्निके समान प्रज्वलित हो गया और कहने लगा कि इस प्रकार वे दोनों भाई मेरी क्रोधामिके पतंगे बन रहे हैं ॥ १०८ ॥ उसने मंत्रियोंके साथ बैठकर किसी कार्यका विचार नहीं किया और अपने आपको सर्वशक्ति-सम्पन्न मान कर मृत्यु प्राप्त करनेके लिए प्रस्थान कर दिया ॥ १०९ ॥ अन्याय करनेके सम्मुख हुआ वह मूर्ख षडङ्ग सेनासे समस्त पृथिवीको कँपाता हुआ उदय होनेके सम्मुख हुए उन दोनों भाइयोंके पास जा पहुँचा। उसने सब मर्यादाका उलंघन कर दिया था इसलिए प्रलयकालके समुद्रको भी जीत रहा था। इस प्रकार अतिशय दुष्ट तारकने शीघ्र ही जाकर अपनी सेनारूपी वेला (ज्वारभाटा) के द्वारा अचल और द्विपृष्ठके नगरको घेर लिया ।। ११०-१११ ।।
श्लोक 112 से 121 — तारक का वध, दिग्विजय और दोनों भाइयों का भिन्न परिणाम
जिस प्रकार कोई पर्वत जलकी लहर-को अनायास ही रोक देता है उसी प्रकार पर्वतके समान स्थिर रहनेवाले अचलने अपनी सेनाके द्वारा उसकी निःसार सेनाको अनायास ही रोक दिया था ॥ ११२ ॥ जिस प्रकार सिंहका बच्चा मत्त हाथीके ऊपर आक्रमण करता है उसी प्रकार उद्धत प्रकृतिवाले द्विपृष्ठने भी एक पराक्रमकी सहायता-से ही बलवान् शत्रु पर आक्रमण कर दिया ॥ ११३ ॥ तारकने यद्यपि चिरकाल तक युद्ध किया पर तो भी वह द्विष्पृष्ठको पराजित करनेमें समर्थ नहीं हो सका। अन्तमें उसने यमराज के चक्रके समान अपना चक्र घुमाकर फेंका ॥ ११४ ॥ वह चक्र द्विपृष्ठकी प्रदक्षिणा देकर उस लक्ष्मीपतिकी दाहिनी भुजा पर स्थिर हो गया और उसने उसी चक्रसे तारकको नरक भेज दिया ।। ११५ ॥ उसी समय द्विपृष्ठ, सात उत्तम रत्नोंका तथा तीन खण्ड पृथिवीका स्वामी हो गया और अचल बलभद्र बन गया तथा चार रत्न उसे प्राप्त हो गये ॥ ११६ ॥ दोनों भाइयोंने शत्रु राजाओंको जीतकर दिग्विजय किया और श्री वासुपूज्य स्वामीको नमस्कार कर अपने नगरमें प्रवेश किया ।॥ ११७ ॥ चिरकाल तक तीन खण्डका राज्य कर अनेक सुख भोगे । आयुके अन्त में मरकर द्विपृष्ठ सातवें नरक गया ॥ ११८ ॥ भाईके वियोगसे अचलको बहुत शोक हुआ जिससे उसने श्रीवासुपूज्य स्वामीका आश्रय लेकर संयम धारण कर लिया तथा मोक्ष-लक्ष्मीके साथ समागम प्राप्त किया ।॥ ११६ ॥ उन दोनों भाइयोंने किसी पुण्यका बीज पाकर तीन खण्डकी पृथिवी पाई, अनेक विभूतियाँ पाईं और साथ ही साथ उत्तम पद प्राप्त किया परन्तु उनमेंसे एक तो अंकुरके समान फल प्राप्त करनेके लिए ऊपरकी ओर (मोक्ष) गया और दूसरा पापसे युक्त होनेके कारण फलरहित जड़के समान नीचेकी ओर (नरक) गया ॥ १२० ॥ इस प्रकार द्विपृष्ठ तथा अचलका जो भी जीवन-वृत्त घटित हुआ है वह सब क्रर्मो-दयसे ही घटित हुआ है ऐसा विचार कर विशाल बुद्धिके धारक आर्य पुरुषोंको पाप छोड़कर उसके विपरीत समस्त सुखोंका भंडार जो पुण्य है वही करना चाहिए ॥ १२१ ॥
श्लोक 122 से 124— तीनों महापुरुषों के पूर्वभव और निष्कर्ष
राजा द्विपृष्ठ पहले इसी भरतक्षेत्रके कनकपुर नगरमें सुषेण नामका प्रसिद्ध राजा हुआ, फिर तपश्चरण कर चौदहवें स्वर्गमें देव हुआ, तदनन्तर तीन खण्डकी रक्षा करनेवाला द्विष्पृष्ठ नामका अर्धचक्री हुआ और इसके बाद परिग्रहके महान् भारसे मरकर सातवें नरक गया ।। १२२ ।। बलभद्र, पहले महापुर नगरमें वायुरथ राजा हुआ, फिर उत्कृष्ट चारित्र प्राप्त कर उसी प्राणत स्वर्गके अनुत्तरविमानमें उत्पन्न हुआ, तद-नन्तर द्वारावती नगरी में अचल नामका बलभद्र हुआ और अन्तमें निर्वाण प्राप्त कर त्रिभुवनके द्वारा पूज्य हुआ ।। १२३ ॥ प्रतिनारायण तारक, पहले प्रसिद्ध विन्ध्यनगर में विन्ध्यशक्ति नामका राजा हुआ, फिर चिरकाल तक संसार-वनमें भ्रमण करता रहा। कदाचित् थोड़ा पुण्यका संचय कर श्री भोगवर्द्धन नगरका राजा तारक हुआ और अन्तमें द्विपृष्ठनारायणका शत्रु होकर – उनके हाथसे मारा जाकर महापापके उदयसे अन्तिम पृथिवीमें नारकी उत्पन्न हुआ ॥ १२४ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायणका वर्णन करनेवाला अट्ठावनवाँ पर्व पूर्ण हुआ ।
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena