अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 284 to 292
श्लोक ( Shlok ) 284 – 285
तदागत्यासुरी देवी सती शीलवती स्वयम् । सुतारां द्रुतमानीय परिम्लानलतोपमाम् ॥ २८४॥मत्पुत्रस्य युवां क्षन्तुमपराधनमर्हतः । इत्युदीर्यार्पयत्सा श्रीविजयामिततेजसोः ॥ २८५ ॥
उसी समय शीलवती आसुरीदेवी मुरझाई हुई लताके समान सुतारा-को शीघ्र हीलाई और श्रीविजय तथा अमिततेजको समर्पित कर बोली कि आप दोनों हमारे पुत्रका अपराध क्षमा कर देनेके योग्य हैं ।। २८४-२८५ ।।
At that very moment, the virtuous goddess Asuri brought forward Sutara, who looked like a withered creeper. Presenting her to Shrivijaya and Amitateja, she said, “The two of you should kindly forgive the offense committed by our son.” [284-285]
श्लोक ( Shlok ) 286
तिरश्चामपि चेद्वैरमहार्य जातिहेतुकम् । विनश्यति जिनाभ्याशे मनुष्याणां किमुच्यते ॥ २८६ ॥
तिर्यञ्चों का जो जन्मजात बैर छूट नहीं सकता वह भी जब जिनेन्द्र भगवान्के समीप आकर छूट जाता है तब मनुष्योंकी तो बात ही क्या कहना है ? ॥ २८६ ।।
When even the innate, lifelong enmity of sub-human beings (Tiryanchas) disappears upon approaching Jinendra Bhagavan, then what need is there to speak of human beings? [286]
श्लोक ( Shlok ) 287
कर्माण्यनादिबद्धानि मुच्यन्ते यदि संस्मृतेः । जिनानां सन्निधौ तेषां नाश्चर्य वैरमोचनम् ॥ २८७ ॥
जब जिनेन्द्र भगवान्के स्मरणसे अनादि कालके बँधे हुए कर्म छूट जाते हैं तब उनके समीप बैर छूट जावे इसमें आश्चर्य ही क्या है ? ॥ २८७ ।।
When the karmas accumulated since time immemorial are shattered simply by remembering Jinendra Bhagavan, then what wonder is there that enmity disappears in His divine presence? [287]
श्लोक ( Shlok ) 288
अन्तको दुर्निवारोऽत्र वार्यते सोऽपि हेलया । जिनस्मरणमात्रेण न वार्योऽन्यः स को रिपुः ॥ २८८ ॥
जो बड़े दुःखसे निवारण किया जाता है ऐसा यमराज भी जब जिनेन्द्र भगवान्के स्मरण मात्रसे अनायास ही रोक दिया जाता है तब दूसरा ऐसा कौन शत्रु है जो रोका न जा सके ? ॥ २८८ ॥
When even Yamaraja (the Lord of Death), whose approach is averted only with the greatest difficulty, is effortlessly held at bay by the mere remembrance of Jinendra Bhagavan, then what other enemy could there possibly be who cannot be stopped? [288]
श्लोक ( Shlok ) 289
तदन्तकप्रतीकारे स्मरणीयो मनीषिभिः । ‘जगत्त्रयैकनाथोऽर्हन् पुरेह च हितावहः ॥ २८९ ॥
इसलिए बुद्धिमानोंको यमराजका प्रतिकार करनेके लिए तीनों लोकोंके नाथ अर्हन्त भगवान्का ही स्मरण करना चाहिये। वही इस लोक तथा परलोकमें हितके करनेवाले हैं ।। २८९ ।।
Therefore, to counter Yamaraja (the Lord of Death), the wise should ever remember Arhant Bhagavan, the Lord of the Three Worlds. He alone is the benefactor of welfare in this world as well as the next. [289]
श्लोक ( Shlok ) 290
विद्याधराधीशः प्रणम्य प्रान्जलिजिनम् । भक्त्या सद्धर्ममप्राक्षीत्स तत्त्वार्थबुभुत्सया ॥ २९० ॥
अथानन्तर विद्याधरोंके स्वामी अमिततेजने हाथ जोड़कर बड़ी भक्तिसे भगवान्को नमस्कार किया और तत्त्वार्थको जाननेकी इच्छासे सद्धर्मका स्वरूप पूछा ॥ २९० ॥
Thereafter, Amitateja, the lord of the Vidyadharas, folded his hands and bowed to the Lord with deep devotion. Desiring to know the true nature of reality (Tattvartha), he asked about the true essence of righteous religion (Saddharma). [290]
श्लोक ( Shlok ) 291 – 292
महादुः खोमिसङ्कीर्णदुः संसारपयोनिधेः । स्फुरत्कषायनक्रस्य पारः केनाप्यते जिनः ॥ २९१ ॥प्रष्टव्यो नापरः कोऽपि तीर्णसंसारसागरः । त्वमेवैको जगद्बन्धो विनेयाननुशाधि नः२ ॥ २९२ ॥
जिसमें कषायरूपी मगरमच्छ तैर रहे हैं और जो अनेक दुःखरूपी लहरोंसे भरा हुआ है ऐसे संसाररूपी विकराल सागरका पार कौन पा सकता है? यह बात जिनेन्द्र भगवान से ही पूछी जा सकती है किसी दूसरे से नहीं क्योंकि उन्होंने ही संसाररूपी सागरको पार कर पाया है। हे भगवन् ! एक आप ही जगत के बन्धु हैं अतः हम सब शिष्योंको आप सद्धर्मका स्वरूप बतलाइये ।। २९१-२९२ ॥
“Who can cross this terrifying ocean of worldly existence (Samsara), in which crocodiles of passions (Kashayas) swim and which is filled with countless waves of misery? This question can only be asked of Jinendra Bhagavan and no one else, because He alone has crossed this ocean of mundane existence. O Lord! You alone are the true kin of this universe; therefore, pray reveal the true nature of righteous religion (Saddharma) to all of us, Your disciples.” [291-292]
श्लोक 293 से 301
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