नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 459
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 460 to 462
श्लोक ( Shlok ) 460
इत्युच्चेर्गणनायको गुणनिधिः प्रस्पष्टमृष्टाक्षरैः साक्षात्कृत्य भवावलीविलसितं व्यावर्णयन्निर्णयम् । “साध्वाकर्ण्य चिरं सुखासुखमयीः स्वेष्टाष्टदेवीकथाः सन्तुष्टि स मुरारिरार” सुतरां प्रान्ते प्रवृद्धिप्रदाः ॥ ४६० ॥
इस प्रकार गुणोंके भाण्डार गणधर देवने स्पष्ट और मिष्ट अक्षरोंके द्वारा पूर्व भवावलीसे सुशोभित निर्णयका साक्षात् वर्णन कर दिखाया और श्रीकृष्ण भी अपनी प्यारी आठों रानियोंकी सुख-दुःखभरी कथाएँ अच्छी तरह सुनकर अन्त में प्रवृत्ति प्रदान करनेवाले संतोषको प्राप्त हुए ।। ४६० ॥
In this manner, Lord Ganadhara, the treasure trove of virtues, vividly narrated the conclusive accounts adorned with the lineages of past lives using clear and sweet words. Shri Krishna, too, having listened intently to the tales of joys and sorrows of his eight beloved queens, ultimately attained a profound and fulfilling sense of satisfaction. || 460 ||
श्लोक ( Shlok ) 461
देव्योऽपि दिव्यवचनं मुनिपुङ्गवस्य भङ्गावहं बहुभवात्तनिजांहसां तत् ।कृत्वा हृदि प्रमुदिताः पृथुशर्मसारे धर्मेऽर्हतो हिततमे स्वमतिं प्रतेनुः ॥ ४६१ ॥
वे देवियाँ भी अनेक जन्ममें कमाये हुए अपने पापोंका नाश करनेवाले श्री गणधर भगवान्के दिव्य वचन हृदयमें धारण कर बहुत प्रसन्न हुई और सबने कल्याणकारी तथा बहुत भारी सुख प्रदान करनेवाले अर्हन्त भगवान्के धर्ममें अपनी बुद्धि लगाई ॥ ४६१ ।।
Those queens, too, were immensely delighted to enshrine in their hearts the divine words of Lord Ganadhara, which destroy the sins accumulated over numerous past lives. Subsequently, all of them devoted their minds to the auspicious Dharma of Lord Arihant, which bestows profound and immense happiness. || 461 ||
श्लोक ( Shlok ) 462
नहि हितमिह किञ्चिद्धर्ममेकं विहाय व्यवसितमसुमद्भ्यो धिग्विमुग्धात्मवृशम् ।इति विहितवितर्काः सर्वसभ्याश्च धर्म समुपययुरपापाः स्वामिना नेमिनोक्तम् ॥ ४६२ ॥
‘इस संसार में एक धर्मको छोड़कर दूसरा कार्य प्राणियोंका कल्याण करनेवाला नहीं है, धर्म रहित मूर्ख जीवोंका जो चरित्र है उसे धिक्कार है’ इस प्रकार विचार करते हुए सब सभासदोंने पाप रहित होकर, श्री नेमिनाथ भगवान्का कहा हुआ धर्म स्वीकार किया ।। ४६२ ।।
“In this world, except for Dharma, no other action can bring about the true welfare of living beings; a curse upon the conduct of those foolish souls who live devoid of Dharma!” Reflecting deeply in this manner, all the members of the assembly, freeing themselves from sin, accepted the path of Dharma as proclaimed by Lord Neminatha. || 462 ||
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे नेमिचरिते भवान्तर-व्यावर्णनं नामैकसप्ततितमं पर्व ॥ ७१ ।।
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके नेमि-चरित्र प्रकरणमें भवान्तरोंका वर्णन करनेवाला इकहत्तरवां पर्व समाप्त हुआ ।॥ ७१ ॥
Thus concludes the seventy-first chapter, which describes the past lives of the soul, in the Nemi-Charitra section of the Trishashti-Lakshana-Mahapurana-Sangraha composed by Acharya Gunabhadra, widely renowned as the sacred scripture (Arsha). || 71 ||
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म नामक बलभद्र, कृष्ण नामक अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 21
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421 | श्लोक 422 से 431 | श्लोक 432 से 441 | श्लोक 442 से 459
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