नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 242 to 257
श्लोक ( Shlok ) 242
कौटिल्यकोटयः क्रौर्यपर्यन्ताः पञ्चपातकाः । नार्योऽनार्या कथं न स्युरस्युद्यत विचेष्टिताः ॥ २४२ ॥
ये स्त्रियाँ कुटिलताकी अन्तिम सीमा हैं, इनकी क्रूरताका पार नहीं है ये सदा पाँच पाप रूप रहती हैं और इनकी चेष्टाएँ सदा तलवार उठाये रखनेवाले पुरुषके समान दुष्टता पूर्ण रहती हैं फिर ये अनार्य अर्थात् म्लेच्छ क्यों न कही जावें ॥ २४२ ।।
“These women represent the ultimate boundary of deceit, and there is no end to their cruelty. They perpetually exist in the form of the five great sins, and their actions are always as full of wickedness as a man who constantly holds up a raised sword. Why, then, should they not be called Anarya—that is, Mlechha? || 242 ||”
श्लोक ( Shlok ) 243
ततो निविंद्य संसारात्सानुजः स निजार्जितम् । धनं दत्वा स्वकान्ताभ्योव रधर्मात्तपोऽगमत् ॥ २४३ ॥
इस प्रकार सुभानुने अपने भाइयोंके साथ संसारसे विरक्त होकर अपना सब कमाया हुआ धन स्त्रियोंके लिए दे दिया और उन्हीं वरधर्म मुनिराजसे दीक्षा धारण कर ली ॥ २४३ ॥
“In this manner, Subhanu, along with his brothers, became thoroughly detached from the cycle of worldly existence (Samsara). They surrendered all of their hard-earned wealth to the women, and under that very same Muniraj Vardharma, they initiated themselves into the ascetic life. || 243 ||”
श्लोक ( Shlok ) 244
जिनदत्तायिकाभ्याशे तद्भार्याश्च तपो ययुः । हेतुरासनभव्यानां को वा न स्यात्तपोग्रहे ॥ २४४ ॥
उनकी स्त्रियोंने भी जिनदत्ता नामक आर्यिकाके समीप तप ले लिया सो ठीक ही है क्योंकि निकट भव्य जीवोंके तप ग्रहण करनेमें कौन-सा हेतु नहीं हो जाता अर्थात् वे अनायास ही तप ग्रहण कर लेते हैं ।॥ २४४ ॥
“Their wives too accepted vows of penance under an Aryika named Jindatta. This was only fitting, for what cause cannot serve as a catalyst for near-liberated souls (Nikata-Bhavya) to embrace asceticism? That is to say, they accept penance effortlessly. || 244 ||”
श्लोक ( Shlok ) 245 – 248
सप्तापि काननेऽन्येद्युरुज्जयिन्याः प्रतिष्ठितान् । वज्रमुष्टिः समासाद्य प्रणम्य विधिपूर्वकम् ॥ २४५ ॥ हेतुना केन दीक्षेयं भवतामित्यसौ जगौ । तेऽपि निर्वर्णयामासुर्दीक्षाहेतुं यथागतम् ॥ २४६ ॥ आयिकाणाञ्च दीक्षायाः पृष्ट्वा मङ्गयपि कारणम् । उपाददे तमभ्यर्णे प्रबज्यामाप्त बोधिका ॥ २४७ ॥वरधर्भयतेर्वज्रमुष्टिः शिष्यत्वमेयिवान् । प्रान्ते सन्न्यस्य सप्तासंस्त्रायश्विशाः स्वरादिमे ॥ २४८ ॥
दूसरे दिन ये सातों ही भाई उज्जयिनी नगरीके उपवनमें पधारे तब वज्रमुष्टि पास जाकर उन्हें विधि पूर्वक प्रणाम किया और पूछा कि आप लोगोंने यह दीक्षा किस कारणसे ली है ? उन्होंने दीक्षा लेनेका जो यथार्थ कारण था वह बतला दिया । इसी प्रकार वज्रमुष्टिकी स्त्री मंगीने भी उन आर्यिकाओंसे दीक्षाका कारण पूछा और यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर उन्हींके समीप दीक्षा धारण कर ली। वज्रमुष्टि वरधर्म मुनिराजका शिष्य बन गया । सुभानु आदि सातों मुनिराज आयुके अन्तमें संन्यासमरण कर प्रथम स्वर्गमें त्रायस्त्रिंश जातिके देव हुए ॥ २४५-२४८।।
“The following day, all seven brothers arrived at the garden of Ujjayini city. Then, Vajramushti approached them, bowed with due rituals, and asked, ‘For what reason have you taken this initiation?’ They related the true cause behind their initiation. In the exact same manner, Vajramushti’s wife, Mangi, also asked those Aryikas (nuns) about the reason for their initiation; upon attaining true knowledge, she embraced initiation right in their presence. Vajramushti became a disciple of Muniraj Vardharma. At the end of their lifespans, the seven monks, including Subhanu, embraced Sannyasa-marana (ritual peaceful death) and were reborn as Trayastrimsha class deities in the First Heaven. || 245-248 ||”
श्लोक ( Shlok ) 249 – 250
द्विसागरोपमायुष्कास्ततश्च्युत्वा स्वपुण्यतः । “भरते धातकीखण्डे प्राच्यवाक्छ्रेणिविश्रुते ॥ २४९ ॥ नित्यालोकपुरे श्रीमच्चन्द्र’ चूलमहीपतेः । ज्यायान्देव्यां मनोहर्या सूनुश्चित्राङ्गदोऽभवत् ॥ २५० ॥
वहाँ दो सागर प्रमाण उनकी आयु थी। वहाँ से चयकर, अपने पुण्य प्रभावसे धातकीखण्ड द्वीपमें भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी में जो नित्यालोक नामका नगर है उसके राजा चन्द्रचूलकी मनोहरी रानीसे सुभानुका जीव चित्राङ्गद नामका पुत्र हुआ॥ २४९ -२५० ।।
“There, their lifespan measured two Sagaras (cosmic ocean-span of years). After descending from that celestial realm, through the power of his accumulated merits (Punya), the soul of Subhanu was reborn in Dhatakikhanda Continent, within Bharatakshetra, on the southern range of Mount Vijayardha in the city named Nityaloka. He was born as a son named Chitrangada to Manohari, the queen of King Chandrachula. || 249-250 ||”
श्लोक ( Shlok ) 251 – 257
इतरेऽपि तयोरेव श्रयस्ते जज्ञिरे यमाः । ध्वजवाहनशब्दान्तगरुडौ मणिचूलकः ॥ २५१ ॥ पुष्पचूलाह्वयो नन्दनचरो गगनादिकौ । तत्रैव दक्षिणश्रेण्यां नृपो मेघपुराधिपः ॥ २५२ ॥ धनञ्जयोऽस्य सर्वश्रीर्जाया तस्याः सुताऽभवत् । धनश्रीः श्रीरिवान्यैषा तत्रैवान्यो महीपतिः ॥ २५३ ॥ ख्यातो नन्दपुराधीशो हरिषेणो हरिद्विषाम् । श्रीकान्ताऽस्य प्रिया तस्यां सुतोऽभूद्धरिवाहनः ॥ २५४ ॥ धनश्रियोऽयं बन्धेन मैथुनः प्रथितो गुणैः । तत्रैव भरतेऽयोध्यायां स्वयंवरकर्मणि ॥ २५’५ ॥ मालां सम्प्रापयत्प्रीत्या धनश्रीर्हरिवाहनम् । चक्रवांस्तदयोध्यायां पुष्पदन्तमहीपतिः ॥ २५६ ॥ तस्य प्रीतिङ्करी देवी तत्सूनुः पापपण्डितः । धनश्रियं सुदत्तोऽलाग्निहत्य हरिवाहनम् ॥ २५७ ॥
बाकी छह भाइयोंके जीव भी इन्हीं चन्द्रचूल राजा और मनोहरी रानीके दो-दो करके तीन बार में छह पुत्र हुए। गरुड़ध्वज, गरुड़वाहन, मणिचूल, पुष्पचूल, गगननन्दन और गगनचर ये उनके नाम थे। उसी धातकीखण्डद्वीपके पूर्व भरत क्षेत्रमें विजयार्धं पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें एक मेघपुर नामका नगर है। उसमें धनञ्जय राजा राज्य करता था। उसकी रानीका नाम सर्वश्री था, उन दोनोंके धनश्री नामकी पुत्री थी जो सुन्दरतामें मानो दूसरी लक्ष्मी ही थी। उसी विजयार्धकी दक्षिण श्रेणीमें एक नन्दपुर नामका नगर है उसमें शत्रुओंके लिए सिंहके समान राजा हरिषेण राज्य करता था। उसकी स्त्रीका नाम श्रीकान्ता था और उन दोनोंके हरिवाहन नामका पुत्र उत्पन्न हुआ था। वह गुणोंसे प्रसिद्ध हरिवाहन नातेमें धनश्रीके भाईका साला था। उसी भस्तक्षेत्र के अयोध्यानगरमें धनश्रीका स्वयंवर हुआ उसमें धनश्रीने बड़े प्रेमसे हरिवाहनके गलेमें वरमाला डाल दी। उसी अयोध्या में पुष्पदन्त नामका चक्रवर्ती राजा था। उसकी प्रीतिंकरी स्त्री थी और उन दोनोंके पापकार्यमें पण्डित सुदत्त नामका पुत्र था। सुदत्तने हरिवाहनको मार कर धनश्रीको स्वयं ग्रहण कर लिया ।। २५१-२५७।
“The souls of the remaining six brothers were also born to the same King Chandrachula and Queen Manohari, emerging in pairs over three successive births to make six sons. Their names were Garudadhvaja, Garudavahana, Manichula, Pushpachula, Gaganandana, and Gaganachara.
Now, in the Eastern Bharatakshetra of that very same Dhatakikhanda Continent, on the southern range of Mount Vijayardha, there was a city named Meghapura. King Dhananjaya ruled there. His queen was named Sarvashri, and they had a daughter named Dhanashri, who was so beautiful she seemed like a second Goddess Lakshmi personified.
On that same southern range of Vijayardha, there was another city named Nandapura, where King Harishena, who was like a lion to his enemies, held reign. His wife was named Shrikanta, and to them was born a son named Harivahana. Renowned for his virtues, Harivahana was, by relation, the brother-in-law of Dhanashri’s brother.
In the city of Ayodhya of that same Bharatakshetra, Dhanashri’s Svayamvara (marriage championship/bride-choice assembly) was held, where she affectionately placed the wedding garland around Harivahana’s neck.
In that very same Ayodhya, there lived a sovereign Emperor (Chakravarti) named Pushpadanta. His wife was Pritinkari, and they had a son named Sudatta, who was highly expert in sinful deeds. Sudatta slew Harivahana and forcefully claimed Dhanashri for himself. || 251-257 ||”
श्लोक 258 से 272
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241
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