अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 192 to 201
श्लोक ( Shlok ) 192
तत्र तन्मातुलः सोमशर्मा चन्द्राननां ‘सुताम् । हिरण्यलोमासम्भूतां प्रीत्या मह्यं प्रदत्तवान् ॥ १९२ ॥
वहाँ सोमशर्मा नामके मेरे मामा रहते थे। उनके हिरण्यलोमा नामकी स्त्रीसे उत्पन्न चन्द्रमाके समान मुख वाली एक चन्द्रानना नामकी पुत्री थी। वह उन्होंने मुझे दी ॥ १९२ ॥
“My maternal uncle, named Somasharma, lived there. He had a daughter named Chandranana, whose face was as beautiful as the moon, born to his wife Hiranyaloma. He gave her hand in marriage to me.” 192
श्लोक ( Shlok ) 193
द्रव्यार्जनं परित्यज्य निमित्ताभ्यासतत्परम् । सा मां निरीक्ष्य निर्विण्णा पितृदत्तधनक्षयात् ॥ १९३ ॥
मैं धन कमाना छोड़कर निरन्तर निमित्तशास्त्रके अध्ययनमें लगा रहता था अतः धीरे-धीरे चन्द्राननाके पिताके द्वारा दिया हुआ धन समाप्त हो गया। मुझे निर्धन देख वह बहुत विरक्त अथवा खिन्न हुई ॥ १९३ ॥
“Forsaking the earning of wealth, I remained constantly engrossed in the study of the scriptures of omenology (Nimitta-Shastra); consequently, the wealth given by Chandranana’s father gradually ran out. Seeing me impoverished, she became deeply detached and distressed.”193
श्लोक ( Shlok ) 194
भोजनावसरेऽन्येद्युर्धनमेतत्त्वदर्जितम् । इति पात्रेऽक्षिपद्भोषान्मद्वराटकसञ्चयम् ॥ १९४ ॥
मैंने कुछ कौंड़ियां इकट्ठी कर रक्खी थीं। सरे दिन भोजनके समय ‘यह तुम्हारा दिया हुआ धन है’ ऐसा कह कर उसने क्रोधवश वे सब कौड़ियां हमारे पात्रमें डाल दीं ।। १९४ ॥
“I had gathered and kept a few cowrie shells. At mealtime the next day, saying, ‘This is the wealth you have provided!’ she angrily threw all those cowrie shells into my serving bowl.”194
श्लोक ( Shlok ) 195 – 198
रञ्जितस्फटिके तत्र तपन्नाभीषुसन्निधिम् (१) । कान्ताक्षिप्तकरक्षालनाम्बुधारां च पश्यता ॥ १९५ ॥मयाऽर्थलाभं निश्चित्य तोषाभिषवपूर्वकम् । अमोघजिह्ननान्नाऽऽपमादेशस्तेऽधुना कृतः ॥१९६ ॥इत्यन्वाख्यत् स तच्छ्रुत्वा सयुक्तिकमसौ नृपः । चिन्ताकुलो विसज्यैनमुक्तवानिति मन्त्रिणः ॥ १९७ ॥इदं प्रत्येयमस्योक्त’ विचिन्त्येत्प्रतिक्रियाः । अभ्यर्णे मूलनारो कः कुर्यात् कालविलम्बनम् ॥ १९८ ॥
उनमें से एक अच्छी कौड़ी स्फटिक-मणिके बने हुए सुन्दर थालमें जा गिरी, उसपर जलाई हुई अग्निके फुलिङ्ग पड़ रहे थे उसी समय मेरी स्त्री मेरे हाथ धुलाने के लिए जलकी धारा छोड़ रही थी उसे देख कर मैंने निश्चय कर लिया कि मुझे संतोष पूर्वक अवश्य ही धनका लाभ होगा। आपके लिए यह आदेश इस समय अमोघजिह्व नामक मुनिराजने किया है। इसप्रकार निमित्तज्ञानीने कहा। उसके युक्तिपूर्ण वचन सुन कर राजा चिन्तासे व्यग्र हो गया। उसने निमित्तज्ञानीको तो विदा किया और मन्त्रियोंसे इस प्रकार कहा-कि इस निमित्तज्ञानीकी बात पर विश्वास करो और इसका शीघ्र ही प्रतिकार करो क्योंकि मूलका नाश उपस्थित होने पर विलम्ब कौन करता है ? ॥ १९५-१९८ ।।
“Out of those, one fine cowrie shell bounced and fell into a beautiful platter made of rock-crystal, upon which sparks of a lit fire were scattering. At that very moment, my wife was pouring a stream of water to wash my hands. Observing this combination of signs, I became certain that I would definitely acquire wealth in a satisfying manner. ‘This prophecy concerning you has been made at this time by the great sage named Amoghajihva’—thus spoke the seer of omens. Hearing his logical and well-reasoned words, the King became anxious and uneasy with worry. He dismissed the seer, and addressed his ministers, saying: ‘Trust the words of this omen-reader and take countermeasures against this immediately; for when the destruction of one’s very root or foundation is imminent, who would delay?'” 195 – 198
श्लोक ( Shlok ) 199
तच्छ्रुत्वा सुमतिः प्राह त्वामम्भोधिजलान्तरे । लोहमञ्जूषिकान्तस्थं स्थापयामेति रक्षितुम् ॥ १९९ ॥
यह सुनकर सुमति मन्त्री बोला कि आपकी रक्षा करनेके लिए आपको लोहेकी सन्दूकके भीतर रखकर समुद्रके जलके भीतर बैठाये देते हैं ।। १९९ ।।
“Hearing this, the minister named Sumati said, ‘To ensure your safety, we shall place you inside an iron chest and station you deep within the waters of the ocean.'”199
श्लोक ( Shlok ) 200
मकरादिभयं तत्र विजयार्द्धगुहान्तरे । निदधाम इति श्रुत्वा स सुबुद्धिरभाषत ॥ २०० ॥
यह सुनकर सुबुद्धि नामका मंत्री बोला कि नहीं, वहाँ तो मगरमच्छ आदिका भय रहेगा इसलिए विजयार्ध पर्वतकी गुफामें रख देते हैं ।॥ २०० ॥
“Hearing this, the minister named Subuddhi said, ‘No, there we will face the danger of crocodiles and other aquatic monsters; therefore, let us place him inside a cave of Mount Vijayardha.'” 200
श्लोक ( Shlok ) 201
तद्वचोऽवसितौ प्राज्ञः पुरावित्तकवित्तदा । अथाख्यानकमित्याख्यत्प्रसिद्धं बुद्धिसागरः ॥ २०१ ॥
सुबुद्धिकी बात पूरी होते ही बुद्धिमान् तथा प्राचीन वृत्तान्तको जानने वाला बुद्धिसागर नामका मन्त्री यह प्रसिद्ध कथानक कहने लगा ।। २०१ ।।
“As soon as Subuddhi finished speaking, the wise minister named Buddhisagara, who was well-versed in ancient history and lore, began to narrate this famous legend.”201
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