नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 352 to 362
श्लोक ( Shlok ) 352
दर्पिणा यशसा विश्वसपिंगा स्वायुरर्पिणा । शतं तेनापराधानां व्यधायि मधुविद्विषः ॥ ३५२ ॥
इस प्रकार अहंकारी, समस्त संसारमें फैलनेवाले यशसे उपलक्षित और अपनी आयुको समर्पण करनेवाले उस शिशुपालने श्रीकृष्णके सौ अपराध कर डाले ।। ३५२ ।।
In this manner, being utterly arrogant, distinguished by a fame that spread throughout the entire world, and practically surrendering his own life, Shishupal went on to commit one hundred offenses against Shri Krishna.[ 352]
श्लोक ( Shlok ) 353
स्वमूवींकृत्य मूर्धन्यः कृत्यपक्षोपलक्षितः । अधोक्षजमधिक्षिप्य लक्ष्मीमाक्षेतुमुद्ययो ॥ ३५३ ॥
वह अपने आपको ऊँचा-श्रेष्ठ बनाकर सबका शिरोमणि समझता था, सदा करने योग्य कार्योंकी पक्ष से सहित रहता था और श्रीकृष्णको भी ललकारकर उनकी लक्ष्मी छीननेका उद्यम करता था ।। ३५३ ।।
Exalting himself above all others, he considered himself the crown jewel of everyone. He always remained partisan toward his own actions, believing them to be right, and even dared to challenge Shri Krishna, making every effort to seize his wealth and fortune (Lakshmi).[353]
श्लोक ( Shlok ) 354
सङ्घः शान्तोऽपि शत्रूणां हन्त्येवेवाघसञ्चयः । विजिगीषुस्तमुत्क्षेप्तुं क्षेपकृन्न मुमुक्षुवत् ॥ ३५४ ॥
शान्त हुआ भी शत्रुओंका समूह पापोंके समूहके समान नष्ट कर ही देता है इसलिए विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको मुमुक्षके समान, शत्रुको नष्ट करनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिये ॥ ३५४ ॥
Even when pacified, a gathering of enemies will eventually bring about destruction, much like a mountain of accumulating sins. Therefore, a king desirous of victory must not delay in destroying his enemies, just as a seeker of liberation (mumukshu) does not delay in destroying his karmic bonds.[ 354]
श्लोक ( Shlok ) 355 – 358
एवं प्रयाति काले त्वां शिशुपालाय ते पिता । दातुं समुद्यतः प्रीत्या तच्छ्रुत्वा युद्धकाङ्क्षिणा ॥ ३५५॥नारदेन हरिः सर्व तत्कार्यमवबोधितः । षडङ्गबलसम्पन्नो गत्वा हत्वा तमूर्जितम् ॥ ३५६ ॥आदाय त्वां महादेवीपट्टबन्धे न्ययोजयत् । श्रुत्वा तद्वचनं तस्याः परितोषः परोऽजनि ॥ ३’५७ ॥इत्थं वृत्तकमाकर्ण्य कः करोति जुगुप्सनम् । मत्वा मलीमसान्नो चेद्यदि दुर्धीर्मुनीश्वरान् ॥ ३’५८ ॥
गणधर भगवान, महारानी रुक्मिणीसे कहते हैं कि इस प्रकार समय बीत रहा था कि इसी बीचमें तेरा पिता तुझे बड़ी प्रसन्नतासे शिशुपालको देनेके लिए उद्यत हो गया । जब युद्धकी चाह रखनेवाले नारदने यह बात सुनी तो वह श्रीकृष्णको सब समाचार बतला आया । श्रीकृष्णने छह प्रकारकी सेनाके साथ जाकर उस बलवान् शिशुपालको मारा और तुझे लेकर महादेवीके पट्टपर नियुक्त किया। गणधर भगवान के यह वचन सुनकर रुक्मिणीको बड़ा हर्ष हुआ । आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि इस तरह रुक्मिणीकी कथा सुनकर दुर्बुद्धिके सिवाय ऐसा कौन मनुष्य होगा जो कि महामुनियोंको मलिन देखकर उनसे घृणा करेगा ।। ३५५-३५८ ।।
“In this manner, as time passed, your father joyfully prepared to give your hand in marriage to Shishupal. When Narada, who always delights in conflict, heard of this, he went and narrated the entire news to Shri Krishna. Shri Krishna then marched out with his sixfold army, slew the powerful Shishupal, took you with him, and anointed you as his Chief Queen (Mahadevi).”
Upon hearing these words of the Ganadhar Bhagavan, Rukmini was filled with immense joy. Acharya Gunabhadra says, “After listening to this account of Rukmini, who indeed—except for a person of corrupted intellect—would ever look at great ascetics (mahamunis) in their unwashed state and feel disgust toward them?”[ 355-358]
श्लोक ( Shlok ) 359 – 360
अथ जाम्बवती नत्वा मुनि स्वभवसन्ततिम् । पृच्छति स्मादरादेवमुवाच भगवानपि ॥ ३५९ ॥द्वीपेऽस्मिन्प्राग्वि देहेऽस्ति विषयः पुष्कलावती । वीतशोकपुरं तत्र दमको वैश्यवंशजः ॥ ३६० ॥
अथानन्तर-रानी जाम्बवतीने भी बड़े आदरके साथ नमस्कार कर गणधर भगवान्से अपने पूर्वभव पूछे और गणधर भगवान् भी इस प्रकार कहने लगे कि इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलावती नामका देश है। उसके वीतशोक नगर में दमक नामका वैश्य रहता था ।॥३५९ -३६०।।
Thereafter, Queen Jambavati also bowed down with great reverence and asked the Ganadhar Bhagavan about her past births. The Ganadhar Bhagavan then began to narrate as follows:
“In the Purva-Videha region of this very Jambudvipa, there is a country named Pushkalavati. In its city of Vitashoka, there lived a merchant (vaishya) named Damaka.”[ 359-360]
श्लोक ( Shlok ) 361 – 362
पत्नी देवमतिस्तस्य सुतासीद्देविला तयोः । दत्ताऽसौ वसुमित्राय विधवाऽभूदनन्तरम् ॥ ३६१ ॥निविंण्णा जिनदेवाख्ययतिमेत्याहितव्रता । अगाद्वधन्तरदेवीत्वं मन्दरे नन्दने वने ॥ ३६२ ॥
उसकी स्त्रीका नाम देवमति था, और उन दोनोंके एक देविला नामकी पुत्री थी। वह पुत्री वसु-मित्रके लिए दी गई थी परन्तु कुछ समय बाद विधवा हो गई जिससे विरक्त होकर उसने जिनदेव नामक मुनिराजके पास जाकर व्रत ग्रहण कर लिये और आयुके अन्त में वह मरकर मेरु पर्वतके नन्दनवनमें व्यन्तर देवी हुई ॥ ३६१-३६२ ॥
His wife’s name was Devamati, and the two had a daughter named Devila. She was given in marriage to Vasumitra, but became a widow after some time. Filled with detachment from the world (vairagya), she went to a monk named Muniraj Jindeva and took vows. At the end of her lifespan, she passed away and was reborn as a Vyantara Devi (celestial nymph) in the Nandanvan of Mount Meru.[ 361-362]
श्लोक 363 से 372
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351
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