विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 312
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English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 313 to 319
श्लोक ( Shlok ) 313 – 315
श्रीभूतिसचिवो नागश्चमरः कुक्कुटाहिकः । तृतीये नरके दुःखी शयुः पक्क्प्रभोद्भवः ॥ ३१३ ॥त्रसस्थावरसम्भ्रान्तः पश्चाज्जातोऽतिदारुणः । ततस्तमस्तमस्यासीत्सर्पस्तस्माच नारकः ॥ ३१४ ॥बहुयोनिपरिभ्रान्तो मृगश्टङ्गो मृतस्ततः । ‘विद्युहंष्टः खगाधीशः पापी पश्चात् प्रसन्नवान् ॥ ३१५ ॥
श्रीभूति (सत्यघोष) मंत्रीका जीवसर्प, चमर, कुर्कुट सर्प, तीसरे नरकका दुःखी नारकी, अजगर, चौथे नरकका नारकी, त्रस और स्थावरोंके वहुत भव अति दारुण, सातवें नरकका नारकी, सर्प, नारकी, अनेक योनियोंमें भ्रमण कर मृगशृङ्ग और फिर मरकर पापी विद्युदंष्ट्र विद्याधर हुआ एवं पीछेसे वैररहित प्रसन्न भी हो गया था ।। ३१३-३१५ ।।
The soul of Minister Shribhuti (Satyaghosh) transmigrated through the following forms: a snake, a yak (Chamar), a cock-serpent, and a suffering inhabitant of the third hell.
He then became a python, followed by an inhabitant of the fourth hell, and underwent many extremely painful births among mobile (Tras) and immobile (Sthavar) beings. Subsequently, he was born in the seventh hell, then as a snake, and again as a hell-being.
After wandering through numerous species (yonis), he became a deer (Mrigashringa). Upon death, he was reborn as the sinful Vidyutdanshtra Vidyadhara, though he eventually became free from enmity and attained a peaceful, enlightened state. [313–315]
श्लोक ( Shlok ) 316
भद्रमित्रवणिक् सिंहचन्द्रः प्रीतिङ्करः सुरः । चक्रायुधो विधूताष्टकर्मा निर्वाणमापिवान् ॥ ३१६ ॥
भद्रमित्र सेठका जीव सिंहचन्द्र, प्रीतिंकरदेव और चक्रायुधका भव धारण कर आठों कर्मोंको नष्ट करता हुआ निर्वाणको प्राप्त हुआ था ।। ३१६ ।।
The soul of Seth Bhadramitra, after passing through the incarnations of Sinhachandra, Preetinkardeva, and Chakrayudha, destroyed all eight types of Karmas and attained Nirvana (liberation). [316]
श्लोक ( Shlok ) 317
एवं चतुर्गतिषु ते चिरमुच्चनीच-स्थानानि कर्मपरिपाकवशात् प्रपद्य । सौख्यं कचित् क्वचिदयाचितमुग्रदुःख-मापंस्त्रयोऽत्र परमात्मपदं प्रसन्नाः ॥ ३१७ ॥
इस प्रकार कहे हुए तीनों ही जीव अपने-अपने कर्मोदयके वश चिरकाल तक उच्च-नीच स्थान पाकर कहीं तो सुखका अनुभव करते रहे और कहीं बिना माँगे हुए तीव्र दुःख भोगते रहे परन्तु अन्तमें तीनों ही निष्पाप होकर परमपदको प्राप्त हुए ।। ३१७ ॥
In this manner, these three souls, governed by the rise of their respective Karmas (Karmodaya), wandered for an immense period of time through various high and low states of existence. In some births, they experienced happiness, while in others, they endured intense, unbidden suffering; however, in the end, all three became sinless and attained the Supreme State (Parampada—Liberation). [317]
श्लोक ( Shlok ) 318
खलखगमकृतोग्रोपद्रवं कस्यचिद्वा मनसि शमरसत्वान्मन्यमानो महेच्छः । शुचितरवरशुक्लध्यानमध्यास्य शुद्धिं समगमदमलो यः सञ्जयन्तः स वोऽव्यात् ॥ ३१८ ॥
जिन महानुभावने हृदयमें समता रस के विद्यमान रहनेसे दुष्ट विद्याधरके द्वारा किये हुए भयंकर उपसर्गको ‘यह किसी विरले ही भाग्यवान्को प्राप्त होता है’ इस प्रकार विचार कर बहुत अच्छा माना और अत्यन्त निर्मल शुक्ल-ध्यानको धारण कर शुद्धता प्राप्त की वे कर्ममल रहित संजयन्त स्वामी तुम सबकी रक्षा करें ॥३१८।।
May Lord Sanjayant, who has been purged of the filth of Karmas, protect you all. Even when subjected to a terrifying ordeal (Upasarga) by a wicked Vidyadhara, he remained possessed of the essence of equanimity (Samata-rasa); he looked upon the hardship as a rare blessing, thinking, “Such a trial is attained only by a fortunate few,” and by embracing the purest form of luminous meditation (Shukla-dhyana), he attained absolute purity. [318]
श्लोक ( Shlok ) 319
मेरुमन्दरमहाभिधानकौ स्तामिनेन्दुविजयाद्धृतौजसौ । पूजितौ मुनिगणाधिनायकौ नायकौ नयमयागमस्य वः ॥ ३१९ ॥
जिन्होंने सूर्य और चन्द्रमाको जीतकर उत्कृष्ट तेज प्राप्त किया है, जो मुनियोंके समूहके स्वामी हैं, तथा नयोंसे परिपूर्ण जैनागमके नायक हैं ऐसे मेरु और मंदर नामके गणधर सदा आपलोगोंसे पूजित रहें- आपलोग सदा उनकी पूजा करते रहें ।। ३१९ ।।
May the Ganadharas named Meru and Mandar—who have attained supreme brilliance having surpassed the splendor of the sun and the moon, who are the lords of the assembly of monks, and the leaders of the Jain Agamas (scriptures) which are replete with Nayas (perspectives of truth)—be forever worshipped by you all; may you always continue to offer them your adoration. [319]
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षगमहापुराणसंग्रहे विमलतीर्थकर-धर्म-स्वयम्भू-मधु-सन्जयन्त-मेरुमन्दरपुराणं परिसमाप्तम् एकोनषष्टितमं पर्व ॥ ५९ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुण भद्राचार्य प्रणीत त्रिपष्टिलक्षण महापुराणके संग्रहमें विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन करनेवाला उन सठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।
Thus concludes the Sixty-sixth Chapter of the Mahapurana (also known as the Trishashti-Lakshana Mahapurana), composed by the venerable Acharya Jinasena (or Gunabhadra). This chapter, which belongs to the esteemed lineage of the Arsha (the ancient wisdom of the Rishis), contains the narrative of Tirthankara Vimalnath, along with the accounts of Dharma, Svayambhu, Madhu, Sanjayant, and the Ganadharas Meru and Mandar.
अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन
पर्व 60 – श्लोक 1 से 11
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श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 124
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 13 | श्लोक 14 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 125 | श्लोक 126 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 232 | श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 291 | श्लोक 292 से 301 | श्लोक 302 से 312
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