नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 163 to 171
श्लोक ( Shlok ) 163
देवैतद्वासुदेवेन त्वद्विवाहमहोत्सवे । व्ययीकर्तुमिहानीतमित्यभाषन्त तेऽपि तम् ॥ १६३ ॥
उत्तरमें रक्षकोंने कहा कि ‘हे देव ! आपके विवाहोत्सवमें व्यय करनेके लिए महाराज श्रीकृष्णने इन्हें बुलाया है’ ।। १६३ ।।
“In response, the guards said, ‘O Lord! Emperor Shri Krishna has gathered these animals to be slaughtered for your wedding feast.’ || 163 ||”
श्लोक ( Shlok ) 164 – 168
वसन्त्यरण्ये खादन्ति तृणान्यनपराधकाः । किलैतांश्च स्वभोगार्थ पीडयन्ति धिगीदृशान् ॥ १६४ ॥किं न कुर्वन्त्यमी मूढाः प्रौढमिथ्यात्वचेतसः । प्राणिनः प्राणितु प्राणैर्निर्वृणाः स्वैविनश्वरैः ॥ १६५ ॥स्वराज्यग्रहणे शङ्कां विधाय मयि दुर्मतिः । व्यधात्कपटमीदृक्षं कष्टं दुष्टविचेष्टितम् ॥ १६६ ॥इति निर्ध्याय निविंद्य निर्वृत्त्य निजमन्दिरम् । प्रविश्याविर्भवद्बोधिस्तत्कालोपगतामरैः ॥ १६७ ॥बोधितः समतीतात्मभवानुस्मृतिवेपितः । तदैवागत्य देवेन्द्रैः कृतनिष्क्रमणोत्सवः ॥ १६८ ॥
यह सुनते ही भगवान् नेमिनाथ विचार करने लगे ‘कि ये पशु जङ्गलमें रहते हैं, तृण खाते हैं और कभी किसीका कुछ अपराध नहीं करते हैं फिर भी लोग इन्हे अपने भोगके लिए पीडा पहुँचाते हैं । ऐसे लोगोंको धिक्कार है। अथवा जिनके चित्तमें गाढ़ मिथ्यात्व भरा हुआ है ऐसे मूर्ख तथा दयाहीन प्राणी अपने नश्वर प्राणोंके द्वारा जीवित रहनेके लिए क्या नहीं करते हैं ? देखो, दुर्बुद्धि कृष्णने मुझपर अपने राज्य-ग्रहणकी आशङ्काकर ऐसा कपट किया है। यथार्थमें दुष्ट मनुष्योंकी चेष्टा कष्ट देनेवाली होती है’। ऐसा विचारकर वे विरक्त हुए और लौटकर अपने घर आ गये.। रत्नत्रय प्रकट होनेसे उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर उन्हें समझाया, अपने पूर्व भवोंका स्मरण कर वे भयसे काँप उठे। उसी समय इन्होंने आकर दीक्षा कल्याणकका उत्सव किया ।। १६४-१६८ ।।
“Upon hearing this, Lord Neminatha began to reflect, ‘These animals dwell in the forest, eat grass, and never commit any offense against anyone. Yet, people inflict suffering upon them for their own sensory pleasures. Fie upon such individuals! Or rather, what will these foolish and merciless beings—whose minds are filled with deep delusion (mithyatva)—not do just to sustain their own transient lives? Look, the evil-minded Krishna has practiced such deceit out of fear that I might seize his kingdom. Truly, the actions of wicked men are always full of torment.’
Reflecting thus, He became detached from the world and returned to His palace. At that very moment, as the three jewels of right faith, knowledge, and conduct (Ratnatraya) manifested within Him, the Laukantika gods arrived to offer their praise and counsel. Remembering His past lifetimes, He shuddered with awe at the cycle of existence. Right then, the gods performed the celebrations for His Diksha Kalyanaka (the auspicious ceremony of renunciation). || 164-168 ||”
श्लोक ( Shlok ) 169 – 171
शिबिकां देवकुर्वाख्यामारुह्यामरवेष्टितः ३ । सहस्राम्रवणे षष्ठानशनः श्रावणे सिते ॥ १६९ ॥ पक्षे चित्राख्यनक्षत्रे षष्ठयां सायाह्नमाश्रितः । शतत्रयकुमाराब्दव्यतीतौ सह भूभुजाम् ॥ १७० ॥सहस्त्रेण समादाय संयमं प्रत्यपद्यत । चतुर्थज्ञानधारी च बभूवासनकेवलः ॥ १७१ ॥
तदनन्तर देवकुरु नामक पालकीपर सवार होकर वे देवोंके साथ चल पड़े। सहस्राम्रवनमें जाकर तेलाका नियम लिया और श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन सायंकाल के समय, कुमार-कालके तीन सौ वर्ष बीत जानेपर एक हजार राजाओंके साथ-साथ संयम धारण कर लिया। उसी समय उन्हें चौथा-मनः-पर्यय ज्ञान हो गया और केवलज्ञान भी निकट कालमें हो जावेगा ॥ १६९ -१७१ ।।
“Subsequently, mounted upon a palanquin named Devakuru, He set forth accompanied by the gods. Upon arriving at the Sahasramravana (the grove of a thousand mango trees), He took the vow of a three-day fast (tela-niyama). Then, in the evening of the sixth day of the bright half of the month of Shravana (Shravana Shukla Shasthi), after three hundred years of His youth (kumara-kala) had passed, He embraced ascetic restraint (sanyama) along with one thousand kings. At that very moment, He attained the fourth kind of knowledge—telepathy (Manah-paryaya Gyana)—and His omniscience (Kevalagyana) too was to be attained in the near future. || 169-171 ||”
श्लोक 172 से 181
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नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162
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