धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112
English translation of Uttar Puran parv 61- shlok 113 to 121
श्लोक ( Shlok ) 113 – 114
सनत्कुमारचक्रेशं निजागमनकारणम् । बोधयित्वा सुधीश्चक्रिन् शृणु चित्तं समादधन् ॥ ११३ ॥यदि रोगजरादुःखमृत्यवो न स्युरत्र ते । सौन्दर्येण २त्वमत्रैवमतिशेषे जिनानपि ॥ ११४ ॥
उन देवोंने सनत्कुमार चक्रवर्तीको अपने आनेका कारण बतलाकर कहा कि हे बुद्धिमन् ! चक्रवर्तिन् ! चित्तको सावधानकर सुनिये – यदि इस संसारमें आपके लिए रोग, बुढ़ापा, दुःख तथा मरणकी सम्भावना नहोतो आप अपने सौन्दर्यसे तीर्थङ्करको भी जीत सकते हैं-११३-११४ ॥
Revealing the purpose of their arrival to Sanatkumāra Cakravartī, those celestial beings said, “O wise Cakravartī! Listen with an attentive mind—if there were no possibility of disease, old age, suffering, and death for you in this worldly existence, you could surpass even a Tīrthaṅkara with your supreme beauty.” || 113-114 ||
श्लोक ( Shlok ) 115
इत्युक्त्वा तौ सुरौ सूक्तं स्वधाम सहसा गतौ । काललब्ध्येव तद्वाचा प्रबुद्धो भूभुजां पतिः ॥११५॥
ऐसा कहकर वे दोनों देव शीघ्र ही अपने स्थानपर चले गये । राजा सनत्कुमार उन देवोंके वचनों से ऐसा प्रतिबुद्ध हुआ मानो काललब्धिने ही आकर उसे प्रतिबुद्ध कर दिया हो ।॥ ११५ ॥
Having spoken thus, both celestial beings promptly returned to their abode. King Sanatkumāra was so deeply awakened by the words of those devas, it was as if Time’s Auspicious Dawn (Kālalabdhi—the ripe moment for spiritual awakening) itself had manifested to enlighten him. || 115 ||
श्लोक ( Shlok ) 116
रूपयौवनसौन्दर्यसम्पत्सौख्यादयो नृणाम् । विद्युल्लतावितानाच्च मन्ये प्रागेव नश्वराः ॥ ११६ ॥
वह चिन्तवन करने लगा कि मनुष्योंके रूप, यौवन, सौन्दर्य, सम्पत्ति और सुख आदि बिजलीरूप लताके विस्तारसे पहले ही नष्ट हो जानेवाले हैं ।॥ ११६ ॥
He began to reflect: “The youth, beauty, wealth, pleasures, and physical form of mortals perish even swifter than the momentary flash of a streak of lightning.” || 116 ||
श्लोक ( Shlok ) 117
इत्वरीः सम्पदस्त्यक्त्वा जित्वरोऽहमिहैनसाम् । सत्वरं तनुमुन्झित्वा गत्वरोऽस्मीत्यकायताम् ॥ ११७ ॥
मैं इन नश्वर सम्पत्तियोंको छोड़कर पापोंका जीतनेवाला बनूँगा और शीघ्र ही इस शरीरको छोड़कर अशरीर अवस्थाको प्राप्त होऊँगा ॥ ११७ ॥
“Renouncing these transient and fleeting fortunes, I shall become a conqueror of sins, and soon, casting aside this physical vesture, I shall attain the bodiless state of supreme liberation (Aśarīra avasthā).” || 117 ||
श्लोक ( Shlok ) 118
स्मरन् देवकुमाराख्ये सुते राज्यं नियोज्य सः । शिवगुप्तजिनोपान्ते दीक्षां बहुभिराददे ॥ ११८ ॥
ऐसा विचारकर उन्होंने देवकुमार नामक पुत्रके लिए राज्य देकर शिवगुप्त जिनेन्द्रके समीप अनेक राजाओंके साथ दीक्षा ले ली ।। ११८ ।।
Reflecting thus, he bestowed the kingdom upon his son, Devakumāra, and along with numerous other kings, embraced initiation into the ascetic order (Dīkṣā) under the guidance of Lord Śivagupta Jinendra. || 118 ||
श्लोक ( Shlok ) 119 – 120
पञ्चभिः सव्रतैः पूज्यः पालितेर्यादिपञ्चकः । षडावश्यकवश्यात्मानिरुद्धेन्द्रियसन्ततिः ॥ ११९ ॥निश्चेलः कृतभूवासो दन्तधावनवर्जितः । उत्थायैवैकदाभोजी स्फुरन्मूलगुणैरलम् ॥ १२० ॥
वे अहिंसा आदि पाँच महाव्रतोंसे पूज्य थे, ईर्या आदि पाँच समितियोंका पालन करते थे, छह आवश्यकोंसे उन्होंने अपने आपको वश कर लिया था, इन्द्रियोंकी सन्ततिको रोक लिया था, वस्त्रका त्यागकर रखा था, वे पृथिवीपर शयन करते थे, कभी दातौन नहीं करते थे; खड़े-खड़े एक बार भोजन करते थे। इस प्रकार अट्ठाईस मूलगुणों से अत्यन्त शोभायमान थे ॥११९-१२०।।
He was venerable due to his adherence to the five great vows (Mahāvratas) such as non-violence (Ahiṃsā), and diligently observed the five regulations of conduct (Samitis) including care in walking (Īryā). He kept himself self-controlled through the six essential daily duties (Āvaśyakas), restrained the continuous impulses of the senses, and had completely renounced clothing. He slept on the bare earth, never brushed his teeth, and partook of food only once a day while standing. In this manner, he shone sublimely, adorned with the twenty-eight primary virtues (Mūlaguṇas) of an ascetic. || 119-120 ||
श्लोक ( Shlok ) 121
त्रिकालयोगवीरासनैकपार्थादिभाषितैः । उत्तरैश्च गुणैर्नित्यं यथायोग्यं समाचरन् ॥ १२१ ॥
तीन कालमें योगधारण करना, वीरासन आदि आसन लगाना तथा एक करवट से सोना आदि शास्त्रोंमें कहे हुए उत्तरगुणोंका निरन्तर यथायोग्य आचरण करते थे ॥ १२१ ॥
He continuously and fittingly practiced the secondary virtues (Uttarguṇas) prescribed in the scriptures, such as performing meditation and spiritual communion (Yoga) during the three periods of the day, adopting meditative postures like the heroic posture (Vīrāsana), and sleeping on only one side of the body. || 121 ||
श्लोक 122 से 130
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