नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 232 to 241
श्लोक ( Shlok ) 232 – 233
इत्यब्रवीदयं हेतुः कस्तपोग्रहणे तव । वदेत्युक्तः स तैश्छिन्न निजहस्ताङ्गु लिव्रणम् ॥ २३२ ॥ दर्शयित्वाऽवदत्सर्वमात्ममङ्गीविचेष्टितम् । तत्सुभानुः समाकर्ण्य स्त्रीनिन्दामकरोदिति ॥ २३३ ॥
उसकी बात सुनकर भाइयोंने कहा कि तेरे तप ग्रहण करनेका क्या कारण है ? सो कह । इस प्रकार भाइयोंके कहनेपर उसने अपने हाथकी कटी हुई अंगुलियोंका घाव दिखाकर मङ्गी तथा अपने बीचकी सब चेष्टाएँ कह सुनाई। उन्हें सुनकर सुभानु इस प्रकार स्त्रियोंकी निन्दा करने लगा ।। २३२-२३३ ॥
“Hearing his words, his brothers asked, ‘What is the reason behind your decision to practice penance? Tell us.’ At their request, he showed them the wounds of his severed fingers and related everything that had transpired between himself and Mangi. Upon hearing this, Subhanu began to condemn the nature of women in this manner. || 232-233 ||”
श्लोक ( Shlok ) 234 – 235
स्थानं ता एव निन्दायाः परत्रासक्तिमागताः । वर्णमात्रेण राजन्त्यो रज्जयन्त्योऽपरान् भृशम् ॥ २३४ ॥ आदाय कृत्रिमं रागं रागिणां नयनप्रियाः । बिभ्रतीह भृशं भापारस्याश्चित्राकृतीः स्त्रियः ॥ २३५ ॥
कि पर पुरुषमें आसक्तिको प्राप्त हुई स्त्रियाँ ही निन्दाका स्थान हैं। ये वर्ण मात्रसे सुन्दर दिखती हैं और दूसरे पुरुषोंको अत्यन्त राग युक्त कर लेती हैं। ये बनावटी प्रेमसे ही रागी मनुष्योंके नेत्रोंको प्रिय दिखती हैं और अनेक प्रकारके आभूषणोंसे रमणीय चित्र विचित्र वेष धारण करती हैं ।॥ २३४-२३५ ।।
“Indeed, women who fall into infatuation with other men become a source of utter condemnation. They appear beautiful merely by virtue of their outward form and incite intense, passionate attachment in other men. Through superficial affection, they appear pleasing to the eyes of lustful men, and they don colorful, exquisite attire adorned with various types of ornaments. || 234-235 ||”
श्लोक ( Shlok ) 236
सुखं विषयजं प्राप्तुं प्राप्तमाधुर्यमालिकाः । किंपाकफलमाला वा कान्न हन्युर्मनोरमाः २३६ ॥
ये विषय-सुख करनेके लिए तो बड़ी मधुर मालूम होती हैं परन्तु अन्तमें किंपाक फलके समूहके समान जान पड़ती हैं। आचार्य कहते हैं कि ये स्त्रियाँ किन्हें नहीं नष्ट कर सकती हैं अर्थात् सभीको नष्ट कर सकती हैं ।॥ २३६ ॥
“They seem exceedingly sweet when indulging in the pleasures of the senses, but in the end, they prove to be like a cluster of Kimpaka fruits. The Acharyas declare: whom can these women not ruin? That is to say, they can ruin anyone. || 236 ||”
श्लोक ( Shlok ) 237
मातरः केवलं नैताः प्रजानामेव योषितः । दोषाणामपि दुःशिक्षा दुविद्या इव दुःखदाः ॥ २३७ ॥
ये स्त्रियाँ केवल अपनेपुत्रोंकी ही माताएँ नहीं हैं किन्तु दोषोंकी भी माताएँ हैं और जिस प्रकार बुरी शिक्षासे प्राप्त हुई बुरी विद्याएँ दुःख देती हैं उसी प्रकार दुःख देती हैं ।॥ २३७ ॥
“These women are not only the mothers of their own sons, but they are also the very mothers of vices; they inflict suffering in the exact same manner as flawed knowledge acquired through poor instruction. || 237 ||”
श्लोक ( Shlok ) 238
मृदवः शीतलाः लक्ष्णाः प्रायः स्पर्शसुखप्रदाः । भुजङ्गयो वाङ्गनाः प्राणहारिण्यः पापरूपिकाः ॥ २३८ ॥
ये स्त्रियाँ यद्यपि कोमल हैं, शीतल हैं, चिकनी हैं और प्रायः स्पर्शका सुख देनेवाली हैं तो भी सर्पिणियोंके समान प्राण हरण करने-वाली तथा पाप रूप हैं ।॥ २३८ ॥
“Although these women are soft, cool, smooth, and generally offer the pleasure of touch, nevertheless, much like female serpents, they are takers of life and the very embodiment of sin. || 238 ||”
श्लोक ( Shlok ) 239
हन्याद्दन्तान्तसंक्रान्तं विषं विषभृतां न वा । ‘सर्वाङ्ग सहजाहार्य कान्तानां हन्ति सन्ततम् ॥ २३९ ॥
साँपोंका विष तो उनके दाँतोंके अन्त में ही रहता है फिर भी वह किसीको मारता है और किसीको नहीं मारता है किन्तु स्त्रीका विष उसके सर्व शरीरमें रहता है वह उनका सहभावी होनेके कारण दूर भी नहीं किया जा सकता और वह हमेशा मारता ही रहता है ॥ २३९ ॥
“The venom of snakes resides only at the tips of their fangs, and even then, it may kill some while sparing others. However, the venom of a woman permeates her entire body; because it is co-existent with her very nature, it can never be removed, and it continuously inflicts destruction. || 239 ||”
श्लोक ( Shlok ) 240
परेषां प्राणपर्यन्ताः पापिनामप्यपक्रियाः । हिंसानामिव कान्तानामन्तातीता दयाद्विषाम् ॥ २४० ॥
पापी मनुष्य दूसरे प्राणियोंका अपकार करते अवश्य हैं परन्तु उनके प्राण रहते पर्यन्त ही करते हैं मरनेके बाद नहीं करते पर दयाके साथ द्वेष रखनेवाली स्त्रियाँ हिंसाके समान मरणोत्तर कालमें भी अपकार करती रहती हैं ।॥ २४० ॥
“Sinful people certainly cause harm to other living beings, but they do so only as long as life endures, and never after death. However, women who harbor malice toward compassion—much like the act of violence itself—continue to inflict harm even in the period after death. || 240 ||”
श्लोक ( Shlok ) 241
जातिमात्रेण सर्वाश्च योषितो विषमूर्तयः । न ज्ञातमेतन्नीतिज्ञैः कुर्वद्भिविषकन्यकाः ॥ २४१ ॥
जिन नीतिकारोंने अलगसे विषकन्याओंकी रचना की है उन्हें यह मालूम नहीं रहा कि सभी स्त्रियाँ उत्पत्ति मात्रसे अथवा स्त्रीत्व जाति मात्रसे विषकन्याएँ होती हैं ।॥ २४१ ॥
“Those writers of political ethics (Nitikars) who created the separate category of poison-maidens (Vishakanyas) were clearly unaware that all such women are poison-maidens simply by virtue of their very birth or by the mere fact of belonging to the female archetype. || 241 ||”
श्लोक 242 से 257
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |