अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 83 to 92
श्लोक ( Shlok ) 83 – 84
तदेवानुमतं सर्वैस्ततः सम्पूज्य मन्त्रिणः । विसर्ज्य खेचराधीशः सम्भिन्नश्रोतृसंज्ञकम् ॥ ८३ ॥स्वयम्प्रभायाः कच्चेतोवलभो भवतेति तम् । अपृच्छत् स पुराणार्थवेदीत्थं प्रत्युवाच तम् ॥ ८४ ॥
सब लोगोंने यही बात स्वीकृत कर ली, इसलिए विद्याधर राजाने सब मन्त्रियोंको विदा कर दिया और संभिन्नश्रोतृ नामक निमित्तज्ञानीसे पूछा कि स्वयंप्रभाका हृदयवल्लभ कौन होगा ? पुराणोंके अर्थको जाननेवाले निमित्त-ज्ञानीने राजाके लिए निम्नप्रकार उत्तर दिया ॥ ८३-८४ ॥
Everyone accepted this advice. Therefore, the Vidyadhar king dismissed all the ministers and asked the Nimittajnani (an expert in omens and prognostication) named Sambhinnashrotru, “Who will be the beloved of Swayamprabha’s heart?” The Nimittajnani, who was well-versed in the meaning and wisdom of the Puranas, replied to the king in the following manner. || 83-84 ||
श्लोक ( Shlok ) 85 – 90
गुरुः प्रथमचक्रेशं प्राक्पुराणनिरूपणे । आदिकेशवसम्बद्ध मित्यवोचत्कथान्तरम् ॥ ८५ ॥द्वीपेऽस्मिन् पुष्कलावत्यां विषये प्राग्विदेहजे । समीपे पुण्डरीकिण्या नगर्या मधुके वने ॥ ८६ ॥पुरूरवा वनाधीशो मार्गभ्रष्टस्य दर्शनात् । मुनेः सागरसेनस्य पथः सञ्चितपुण्यकः ॥ ८७ ॥मद्यमांसनिवृत्तेश्च कृतसौधर्मसम्भवः । ततः प्रच्युत्य तेऽनन्तसेनायाश्च सुतोऽभवत् ॥ ८८ ॥मरीचिरेष दुर्मार्गदेशनानिरतश्विरम् । भ्रान्त्वा संसारचक्रेऽस्मिन् सुरम्यविषये पुरम् ॥ ८९ ॥पोदनाख्यं पतिस्तस्य प्रजापतिमहानृपः । स तनूजो मृगावत्यां त्रिपृष्टोऽस्य भविष्यति ॥ ९० ॥
इसी जम्बूद्वीपके पूर्वविदेह क्षेत्रमें एक पुष्कलावती नामका देश है उसकी पुण्डरीकिणी नगरीके समीप ही मधुक नामके वनमें पुरूरवा नामका भीलोंका राजा रहता था। किसी एक दिन मार्ग भूल जानेसे इधर-उधर घूमते हुए सागरसेन मुनिराजके दर्शन कर उसने मार्गमें ही पुण्यका संचय किया तथा मद्य मांस मधुका त्याग कर दिया। इस पुण्यके प्रभावप्ते वह सौधर्म स्वर्गमें उत्पन्न हुआ और वहांसे च्युत होकर तुम्हारी अनन्तसेना नामकी स्त्रीके मरीचि नामका पुत्र हुआ है। यह मिथ्या मार्गके उपदेश देनेमें तत्पर है इसलिए चिरकाल तक इस संसाररूपी चक्रमें भ्रमण कर सुरम्यदेशके पोदनपुर नगरके स्वामी प्रजापति महाराजकी मृगावती रानीसे त्रिष्पृष्ठ नामका पुत्र होगा ।। ८५-९० ।।
“In the East Videha (Purva-Videha) region of this very Jambudvipa, there is a country named Pushkalavati. Near its city of Pundarikini, in a forest named Madhuka, there lived a king of the Bhils (tribal forest-dwellers) named Pururava. One day, having lost his way and wandering here and there, he caught sight of the great monk Sagarasen (Sagarasen Muniraj). Right there on the path, he accumulated spiritual merit (punya) and renounced the consumption of liquor, meat, and honey.
By the influence of this merit, he was reborn in the Saudharma Heaven. Having descended from that celestial realm, he has now been born to your wife, Anantasena, as your son named Marichi.
He is currently intent on preaching a false path (heretical doctrines); therefore, after wandering through this cycle of worldly existence (samsara) for a very long time, he will eventually be born in the beautiful land of Suramya, in the city of Podanpur, as a son named Trishprishta to King Prajapati and his queen, Mrigavati.” || 85-90 ||
श्लोक ( Shlok ) 91 – 92
अग्रजोऽस्यैव भद्राया विजयो भविता सुतः । तावेतौ श्रेयसस्तीर्थे हत्वाऽश्वग्रीवविद्विषम् ॥ ९१ ॥त्रिखण्डराज्यभागेशौ प्रथमौ बलकेशवौ । त्रिपृष्टः संसृतौ भ्रान्त्वा भावी तीर्थकरोऽन्तिमः ॥ ९२ ॥
उन्हीं प्रजापति महाराजकी दूसरी रानी भद्राके एक विजय नामका पुत्र होगा जो कि त्रिपृष्ठका बड़ा भाई होगा। ये दोनों भाई श्रेयान्सनाथ तीर्थंकरके तीर्थमें अश्वमीव नामक शत्रुको मार कर तीन खण्डके स्वामी होंगे और पहले बलभद्र नारायण कहलायेंगे। त्रिपृष्ठ संसारमें भ्रमण कर अन्तिम तीर्थंकर होगा ॥ ९१-९२ ॥
“A son named Vijaya will be born to Queen Bhadra, the other queen of that same King Prajapati, and he will be the elder brother of Trishprishta. During the spiritual reign (tirtha) of Tirthankara Shreyanshanatha, these two brothers will slay their enemy named Ashvagreeva, become the sovereigns of three realms (three khandas), and will be known as the first Balabhadra and Narayana (Vasudeva). After wandering through the cycle of worldly existence (samsara), Trishprishta will ultimately become the final Tirthankara.” || 91-92 ||
श्लोक 93 से 101
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ तीर्थंकर, सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायणके पुराणका वर्णन पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ तीर्थकर, सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |