नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 70- shlok 332 to 341
श्लोक ( Shlok ) 332 – 334
अथान्येद्युर्विलोक्यैनमुग्रसेनमहीपतिः । भक्त्या ‘मन्नेह एवायं भिक्षां गृह्णातु नान्यतः ॥ ३३२ ॥चकार घोषणां पुर्यामिति सर्वनिषेधिनीम् । स्वपारणादिने सोऽपि भिक्षार्थ प्राविशत्पुरीम् ॥ ३३३ ॥उदतिष्ठत्तदैवान्झी राजगेहे निरीक्ष्य तम् । मुनीश्वरो निवर्त्यायान्निराहारस्तपोवनम् ॥ ३३४ ॥
तदनन्तर दूसरे दिन मथुराके राजा उग्रसेनने बड़ी भक्तिसे उन मुनिके दर्शन किये और नगर में घोषणा करा दी कि यह मुनिराज हमारे ही घर भिक्षा ग्रहण करेंगे, अन्यत्र नहीं। इस घोषणासे उन्होंने अन्य सब लोगोंको आहार देनेका निषेध कर दिया। अपनी पारणाके दिन मुनि-राजने भिक्षाके लिए नगरीमें प्रवेश किया परन्तु उसी समय राजमन्दिर में अग्नि लग गई उसे देख मुनिराज निराहार ही लौटकर तपोवनमें चले गये ।। ३३२-३३४ ॥
Thereafter, on the following day, King Ugrasena of Mathura visualised and paid homage to the sage with deep devotion. He then had a royal proclamation made throughout the city: “This holy monk shall accept alms only at our palace and nowhere else.” With this decree, he forbade all other citizens from offering food to the sage.
On the scheduled day for breaking his month-long fast (Parana), the king of monks entered the city to seek alms. However, at that very moment, a fire broke out in the royal palace. Witnessing this mishap, the holy sage returned to the ascetic grove entirely without food. || 332-334 ||
श्लोक ( Shlok ) 335 – 337
ततः पुनर्गते मासे बुभुक्षुः क्षीणदेहकः । प्रविश्य नगरीं वीक्ष्य क्षोभणं ‘यागहस्तिनः ॥ ३३५ ॥ सद्यो निवर्तते स्मास्मान्मासमात्राशनव्रतः । मासान्ते पुनरन्येद्युः शरीरस्थितये गतः ॥ ३३६ ॥ राजगेहं जरासन्धमहीट्ङ्ग्रहितपत्रकम् । समाकर्ण्य महीपाले व्याकुलीकृतचेतसि ॥ ३३७ ॥
मुनिराजने एक मासके उपवास का नियम फिरसे ले लिया। तदनन्तर एक माह बीत जानेपर क्षीण शरीरके धारक मुनिराजने जब आहारकी इच्छासे पुनः नगरीमें प्रवेश किया तब वहाँ पर हाथीका क्षोभ हो रहा था उसे देख वे शीघ्र ही नगरीसे वापिस लौट गये और एक माहका फिर उपवास लेकर तप करने लगे । एक माह समाप्त होनेपर जब वे फिर आहार के लिए राजमन्दिरकी ओर गये तब महाराज जरासन्धका भेजा हुआ पत्र सुनकर राजा उग्रसेनका चित्त व्याकुल हो रहा था अतः उसने मुनिकी ओर ध्यान नहीं दिया ।। ३३५-३३७ ॥
“The Muniraj (venerable monk) once again took a vow of a one-month fast. Thereafter, when the month had passed, the Muniraj—whose body had become immensely emaciated—re-entered the city with the intention of accepting food (Aahara). However, upon seeing a commotion caused by an agitated elephant there, he immediately turned back from the city and began practicing austerities by taking yet another one-month fast.
When that month also came to an end, he went toward the royal palace once more for his meal. At that very moment, King Ugrasen’s mind was deeply anxious and disturbed upon hearing a letter sent by King Jarasandha; consequently, he failed to notice the arrival of the holy monk.” 335 – 337
श्लोक ( Shlok ) 338 – 340
ततो निवर्तमानोऽसौ क्षीणाङ्गो जनजल्पितम् । न ददाति स्वयं भिक्षां निषिध्यति परानपि ॥३३८॥कोऽभिप्रायो महीशस्य न विग्नो वयमित्यदः । श्रुत्वा पापोदयात्क्रुध्वा निदानमकरोन्मुनिः ॥३३९॥पुत्रो भूत्वाऽस्य भूपस्य मदुग्रतपसः फलात् । निगृह्येनमिदं राज्यं गृह्यासमिति दुर्मतिः ॥ ३४०॥
क्षीण शरीरके धारी वशिष्ठ मुनि जब वहाँ से लौट रहे थे तब उन्होंने लोगोंको यह कहते हुए सुना कि ‘राजा न तो स्वयं भिक्षा देता है और न दूसरोंको देने देता है। इसका क्याअभिप्राय है सो जान नहीं पड़ता।’ लोगोंका कहना सुनकर पाप कर्मसे उदयसे मुनिराजको क्रोध आ गया जिससे उनकी बुद्धि जाती रही। उसी समय उन्होंने निदान किया कि ‘मैंने जो उग्र तप किया है उसके फलसे मैं पुत्र होकर इस राजाका निग्रह करूँ तथा इसका राज छीन लूँ’ ।। ३३८-३४०।।
“When the emaciated Sage Vashistha was returning from there, he overheard the townspeople saying, ‘The King neither offers alms himself nor allows others to do so. What his true intention behind this is, remains completely incomprehensible.’
Upon hearing the people’s words, and due to the fruition of his past sinful karma (Paap-Karma), anger arose within the holy monk, causing him to lose his wisdom and discernment. At that very moment, he formed a Nidaan (a solemn binding wish for worldly retribution), thinking: ‘By the fruits of the fierce austerities I have performed, may I be reborn as a son to this King, overthrow him, and seize his kingdom.'”338 – 340
श्लोक ( Shlok ) 341
एवं दुष्परिणामेन मुनिः प्राप्य ‘परासुताम् । जातः पद्मावतीगर्भे भूरिवैरानुबन्धतः ॥३४१॥
इस प्रकारके खोटे परिणामोंसे मुनिराजकी मृत्यु हो गई और वे तीव्र वैरके कारण राजा उग्रसेनकी पद्मावती रानीके गर्भ में जा उत्पन्न हुए ॥३४१।।
“With such foul and corrupted thoughts, the holy monk passed away, and driven by intense animosity, he was conceived in the womb of Queen Padmavati, the consort of King Ugrasen.”341
श्लोक 342 से 351
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92
नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 43 | श्लोक 44 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 94 | श्लोक 95 से 111 | श्लोक 112 से 124 | श्लोक 125 से 131 | श्लोक 132 से 144 | श्लोक 145 से 153 | श्लोक 154 से 164 | श्लोक 165 से 181 | श्लोक 182 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 243 | श्लोक 244 से 252 | श्लोक 253 से 273 | श्लोक 274 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |