शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 382 to 393
श्लोक ( Shlok ) 382 – 383
तद्राजधानीनाथस्य काश्यपान्वयभास्वतः । भूपस्याजितसेनस्य चित्तनेत्रप्रियप्रदा ॥ ३८२ ॥’बालचन्द्रादिसुस्वप्नदर्शिनी प्रियदर्शना । ब्रह्मकल्पच्युतं सूनुं विश्वसेनमजीजनत् ॥ ३८३ ॥
उस हस्तिनापुर राजधानीमें काश्यपगोत्री देदीप्यमान राजा अजितसेन राज्य करते थे। उनके चित्त तथा नेत्रोंको आनन्द देनीवाली प्रियदर्शना नामकी स्त्री थी । उसने बालचन्द्रमा आदि शुभ स्वप्न देखकर ब्रह्मस्वर्गसे च्युत हुए विश्वसेन नामक पुत्रको उत्पन्न किया था ।। ३८२-३८३ ॥
In that capital city of Hastinapur ruled the radiant King Ajitsena of the Kashyapa lineage (Gotra). He had a deeply beloved queen named Priyadarshana, who brought immense joy to his heart and eyes. After witnessing highly auspicious dreams, including the crescent moon, she gave birth to a glorious son named Vishvasena, who had descended after completing his celestial lifespan in the Brahma-heaven (Brahma-Svarga). || 382-383 ||
श्लोक ( Shlok ) 384 – 386
गन्धारविषयख्यात गान्धारनगरेशिनः । अजितञ्जयभूभर्तुरजितायां सुता गता ॥ ३८४ ॥सनत्कुमारादैराख्या विश्वसेनप्रियाऽभवत् । श्रीह्रीधृत्यादिसंसेव्या नभस्ये कृष्ण सप्तमी ॥ ३८५ ॥दिने भरणिनक्षत्रे यामिनीतुर्यभागगा । स्वप्नान् षोडश साऽऽद्राक्षीत्साक्षात्पुत्र फलप्रदान् ॥ ३८६ ॥
गन्धार देशके गान्धार नगरके राजा अजितञ्जयके उनकी अजिता रानीसे सनत्कुमार स्वर्गसे आकर ऐरा नामकी पुत्री हुई थी और यही ऐरा राजा विश्वसेनकी प्रिय रानी हुई थी। श्री ह्री धृति आदि देवियाँ उसकी सेवा करती थीं। भादों बदी सप्तमीके दिन भरणी नक्षत्रमें रात्रिके चतुर्थ भागमें उसने साक्षात् पुत्र रूप फलको देनेवाले सोलह स्वप्न देखे ।। ३८४-३८६ ॥
In the city of Gandhar within the Gandhar country, King Ajitanjaya and his queen, Ajita, were blessed with a daughter named Aira, who had descended from the Sanatkumara heaven to be born to them; this very Aira became the beloved queen of King Vishvasena. The celestial goddesses—Shri, Hri, and Dhriti—personally attended to her. On the seventh day of the dark fortnight of the month of Bhadrapada (Bhadon Badi Saptami), under the Bhirani constellation (Bharani Nakshatra) during the fourth watch of the night, she witnessed the sixteen prophetic dreams that yield the direct fruit of giving birth to a supreme son. || 384-386 ||
श्लोक ( Shlok ) 387
दरनिद्रासमुद्भूतबोधा शुद्धसुवासना । तदनन्तरमैक्षिष्ट प्रविष्टं वदनं” गजम् ॥ ३८७ ॥
अल्पनिद्राके बीच जिसे कुछ-कुछ ज्ञान प्राप्त हो रहा है तथा जिसके मुखसे शुद्ध सुगन्धि प्रकट हो रही है ऐसी रानी ऐराने सोलह स्वप्न देखनेके बाद अपने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा ॥ ३८७ ॥
While in a state of light slumber, with her awareness partially awakened and a pure, divine fragrance emanating from her mouth, Queen Aira—after witnessing the sixteen dreams—beheld a magnificent elephant gracefully entering her mouth. || 387 ||
श्लोक ( Shlok ) 388
तदैवासौ दिवो देवस्ततो मेधरथाभिधः । तस्यामवतरद् गर्भे शुक्तौ मुक्तोदचिन्दुवत् ॥ ३८८ ॥
उसी समय मेघरथका जीव स्वर्गसे च्युत होकर रानी ऐराके गर्भमें आकर उस तरह अवतीर्ण हो गया जिस तरह कि शुक्तिमें मोती रूप परिणमन करनेवाली पानीकी बूँद अवतीर्ण होती है ।॥ ३८८ ॥
At that very moment, the soul of Megharatha descended from heaven and entered the womb of Queen Aira, incarnating there just as a pristine drop of rain enters a mother-of-pearl shell to transform into a precious pearl. || 388 ||
श्लोक ( Shlok ) 389
तदैव यामभेरी च तत्स्वनशुभसूचिनी । जजुम्भे मधुरं सुप्तां बोधयन्तीव सुन्दरीम् ॥ ३८९ ॥
उसी समय सोती हुई सुन्दरीको जगानेके लिए ही मानो उसके शुभ स्वप्नोंको सूचित करनेवाली अन्तिम पहरकी भेरी मधुर शब्द करने लगी ।॥ ३८९ ॥
At that very moment, as if to awaken the sleeping beautiful queen, the drum of the final watch of the night began to sound its melodious notes, heralding the arrival of her highly auspicious dreams. || 389 ||
श्लोक ( Shlok ) 390 – 393
पद्मिनीव तदाकर्ण्य विकसन्मुखपङ्कजा । शय्यागृहात्समुत्थाय कृतमङ्गलमज्जना ॥ ३९० ॥तत्कालोचितनेपथ्या कल्पवल्लीव जङ्गमा । सितातपत्रवित्रासितार्कबालांशुमालिका ॥ ३९१ ॥प्रकीर्णकपरिक्षेपप्रपञ्चितमहोदया । जनैः कतिपयैरेव प्रत्यासनैः परिष्कृता ॥ ३९२ ॥साऽविशच्चन्द्ररेखाभा सभामिव विभावरीम् । कृतोपचाविनयां ‘तामार्द्धासनमापयत् ॥ ३९३ ॥
उस भेरीको सुनकर रानी ऐराका मुख-कमल, कमलिनीके समान खिल उठा। उसने शय्याग्रहसे उठकर मङ्गल-स्नान किया, उस समयके योग्य वस्त्राभूषण पहने और चलती-फिरती कल्पलताके समान राजसभाको प्रस्थान किया। उस समय वह अपने ऊपर लगाये हुए सफेद छत्रसे बालसूर्यकी किरणोंके समूहको भयभीत कर रही थी, दुरते हुए चमरोंसे अपना बड़ा भारी अभ्युदय प्रकट कर रही थी, और पासमें रहनेवाले कुछ लोगोंसे सहित थी। जिस प्रकार रात्रिमें चन्द्रमाकी रेखा प्रवेश करती है उसी प्रकार उसने राजसभामें प्रवेश किया। औपचारिक विनय करनेवाली उस रानीको राजाने अपना आधा आसन दिया ॥ ३९०-३९३ ॥
Upon hearing the sound of that royal drum, Queen Aira’s lotus-face blossomed, just like a lotus flower opening at dawn. Rising from her bedchamber, she performed an auspicious ceremonial bath, adorned herself with garments and ornaments suited for the occasion, and set forth toward the royal court, resembling a walking celestial wish-fulfilling vine (Kalpalata).
At that moment, with the white royal umbrella held over her, she seemed to eclipse the blazing rays of the rising sun; with the waving fly-whisks (Chamaras), she manifested her immense, ascending fortune and majesty, accompanied by a select retinue of close attendants. Just as the crescent moon gracefully enters the night sky, she entered the royal assembly hall. King Vishvasena then offered half of his own throne to the queen, who greeted him with formal and modest reverence. || 390-393 ||
श्लोक 394 से 404
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201 | श्लोक 202 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 244 | श्लोक 245 से 254 | श्लोक 255 से 271 | श्लोक 272 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361 | श्लोक 362 से 371 | श्लोक 372 से 381
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |