राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 20 | श्लोक 21 से 30
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 31 to 42
श्लोक ( Shlok ) 31 – 42
भरते कोऽत्र पाश्चात्यः स्तुत्यः केवलवीक्षणः । इत्यप्राक्षीङ्गणी चैवं विवक्षुरभवत्तदा ॥ ३१ ॥ब्रह्मकल्पाधिपो ब्रह्महृदयाख्यविमानजः । विद्युन्माली ज्वलन्मौलिः प्रियस्वाद्युक्तिदर्शने ॥ ३२ ॥विद्युदादिप्रभावेगे देव्योऽन्याश्चास्य तद्रुतः । जिनमागत्य वन्दित्वा यथास्थानमुपाविशत् ॥ ३३ ॥तं निरूप्य परिच्छेदोऽनेन स्यात्केवलद्युतेः । तत्कथञ्चेद्वदिष्यामि दिनेऽस्मात्सप्तमे दिनात् ॥ ३४ ॥ब्रह्मेन्द्रोऽयं दिवोऽभ्येत्य पुरेऽस्मिन्नेव वारणम् । सरः शालिवनं निर्धूमानलं प्रज्वलच्छिखम् ॥ ३५ ॥धुकुमारसमानीयमानजम्बूफलानि च । स्वप्नानेतान् पुरः कुर्वनर्हद्दासाभिधानकात् ॥ ३६ ॥इभ्यात्कृती सुतो भावी जिनदास्यां महाद्युतिः । जम्ब्वाख्योऽनावृताद्देवादाप्त पूजोऽतिविश्रुतः ॥ ३७ ॥विनीतो यौवनारम्भेऽप्यनाविष्कृतविक्रियः । वीरः पावापुरे तस्मिन् काले प्राप्स्यति निर्वृतिम् ॥ ३८ ॥तदैवाहमपि प्राप्य बोधं केवलसन्ज्ञकम् । सुधर्माख्यगणेशेन सार्ध संसारवह्निना ॥ ३९ ॥करिष्यन्नतितप्तानां ह्लादं धर्मामृताम्बुना । इदमेव पुरं भूयः सम्प्राप्यात्रैव भूधरे ॥ ४० ॥स्थास्याम्येतत्समाकर्ण्य कुणिकश्चेलिनीसुतः । तत्पुराधिपतिः सर्वपरिवारपरिष्कृतः ॥ ४१ ॥आगत्याभ्यर्च्य वन्दित्वा श्रुत्वा धर्म ग्रहीष्यति । दानशीलोपवासादि साधनं स्वर्गमोक्षयोः ॥ ४२ ॥
आते ही उसने गणधर स्वामीसे पूछा कि हे प्रभो ! इस भरतक्षेत्रमें सबसे पीछे स्तुति करने योग्य केवलज्ञानी कौन होगा ? इसके उत्तर में गणधर कुछ कहना ही चाहते थे कि उसी समय वहाँ देदीप्यमान मुकुटका धारक विद्युन्मालो नामका ब्रह्मस्वर्गका इन्द्र आ पहुँचा, वह इन्द्र ब्रह्म हृदय नामक विमानमें उत्पन्न हुआ था, प्रियदर्शना, सुदर्शना, विद्युद्वेगा और प्रभावेगा ये चार उसकी देवियाँ थीं, उन सभीके साथ वह वहाँ आया था। आकर उसने जिनेन्द्र भगवान्की वन्दना की। तदनन्तर यथास्थान बैठ गया । उसकी ओर दृष्टिपातकर गणधर स्वामी राजा श्रेणिकसे कहने लगे कि इसके द्वारा ही केवल-ज्ञानका विच्छेद हो जायगा अर्थात् इसके बाद फिर कोई केवलज्ञानी नहीं होगा। वह किस प्रकार होगा यदि यह जानना चाहते हो तो मैं इसे भी कहता हूँ, सुन। आजसे सातवें दिन यह ब्रह्मेन्द्र, स्वर्गसे च्युत होकर इसी नगरके सेठ अर्हद्दासकी स्त्री जिनदासीके गर्भमें आवेगा । गर्भमें आनेके पहले जिनदासी पाँच स्वप्न देखेगी- हाथी, सरोवर, चावलोंका खेत, जिसकी शिखा ऊपर को जा रही है ऐसी धूम रहित अग्नि और देव-कुमारोंके द्वारा लाये हुए जामुनके फल। यह पुत्र बड़ा ही भाग्यशाली और कान्तिमान् होगा, जम्बूकुमार इसका नाम होगा, अनावृत देव उसकी पूजा करेगा, वह अत्यन्त प्रसिद्ध तथा विनीत होगा, और यौवनके प्रारम्भसे ही वह विकारसे रहित होगा। जिस समय भगवान् महावीर स्वामी मोक्ष प्राप्त करेंगे उसी समय मुझे भी केवलज्ञान प्राप्त होगा । तदनन्तर सुधर्माचार्य गणधरके साथ संसार रूपी अग्निसे संतप्त हुए पुरुषोंको धर्मामृत रूपी जलसे आनन्दित करता हुआ मैं फिर भी इसी नगरमें आकर विपुलाचल पर्वत पर स्थित होऊँगा। मेरे आनेका समाचार सुनकर इस नगरका राजा चेलिनीका पुत्र कुणिक सब परिवारके साथ आवेगा और पूजा वन्दना कर तथा धर्मका स्वरूप सुनकर स्वर्ग और मोक्षका साधनभूत दान, शीलोपवास आदि धारण करेगा ।। ३१-४२ ॥
“As soon as he arrived, he asked Lord Gandhara, ‘O Master! Who will be the very last omniscient being (Kevali) worthy of praise in this Bharata-kshetra?’ Lord Gandhara was just about to respond when a radiant, crown-wearing Indra named Vidyunmali arrived there from the Brahma-heaven (Brahma-svarga). That Indra had manifested in a celestial vehicle (vimana) named Brahma-hridaya and came accompanied by his four goddesses: Priyadarshana, Sudarshana, Vidyudvega, and Prabhavega. Upon arrival, he paid his obeisances to Lord Jinendra and sat down in his designated place.
Looking toward him, Lord Gandhara spoke to King Shrenika, saying, ‘Through him alone shall the lineage of absolute omniscience (Kevalajnana) come to a close; that is to say, after him, there will be no other omniscient being. If you wish to know how this will happen, listen as I narrate it to you. On the seventh day from today, this Brahma-Indra will descend from heaven and enter the womb of Jindasi, the wife of Seth Arhaddasa of this very city. Before his conception, Jindasi will behold five auspicious dreams: an elephant, a lake, a field of ripe rice, a smokeless fire with its flames rising upward, and jamun fruits brought by celestial youths. This son will be immensely fortunate and radiant, and he shall be named Jambukumar. Anavrita-deva will worship him; he will be highly renowned and humble, and right from the onset of his youth, he will remain entirely free from worldly desires.
At the exact moment when Lord Mahavira Swami attains liberation (moksha), I too shall attain omniscience. Thereafter, moving along with Acharya Sudharma, I will soothe souls scorched by the fires of this transmigratory world with the nectar-like water of Dharma, and eventually return to this very city to reside upon Mount Vipulachala. Upon hearing the news of my arrival, Kunika, the king of this city and son of Queen Chelini, will come with his entire family. After offering worship and obeisances and hearing the true nature of Dharma, he will embrace the means to heaven and liberation, such as charity (dana), right conduct (sheela), and fasting (upavasa).’ || 31–42 ||”
श्लोक 43 से 64
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