राजा श्वेतवाहनके मुनिपद , अन्तिम केवली जम्बू स्वामी, प्रीतिंकर मुनि , उत्सर्पिणी अवसर्पिणी काल का विशिष्ट वर्णन
करते हुए कल्कियों का वर्णन , कल्किके पुत्र अजितंजयका , प्रलय काल का वर्णन , आगामी तीर्थकर आदि शलाकापुरुषोंका
वर्णन , महावीर भगवान् की शिष्य परम्परा पर्व 76 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 76- shlok 12 to 20
श्लोक ( Shlok ) 12– 20
अद्य मासोपवासान्ते भिक्षार्थ प्राविशत्पुरम् । पुरुषाः संहतास्तत्र तत्समीपमितास्त्रयः ॥ १२ ॥नरलक्षणशास्त्रज्ञस्तेष्वेको वीक्ष्य तं मुनिम् । लक्षणान्यस्य साम्राज्यपदवीप्राप्तिहेतवः ॥ १३ ॥अटत्येष च भिक्षायै शास्त्रोक्तं तन्मृषेत्यसौ । वदन्नभिहितोऽन्येन न मृषा शास्त्रभाषितम् ॥ १४ ॥त्यक्तसाम्राज्यतन्त्रोऽयमृषिः केनापि हेतुना । निविण्णस्तनये बाले निधाय व्यापृतिं निजाम् ॥ १५ ॥एवं तपः करोतीति श्रुत्वा तद्वचनं परः । अवोचत्किमनेनास्य तपसा पापहेतुना ॥ १६ ॥दुरात्मनः कृपां हित्वा बालं तमसमर्थकम् । लोकसंव्यवहाराज्ञं स्थापयित्वा ‘धरातले ॥ १७ ॥स्वयं स्वार्थ समुद्दिश्य तपः कर्तुमिहागतः । मन्त्रिप्रभृतिभिः सर्वैः कृत्वा तं शृङ्खलावृतम् ॥ १८ ॥राज्यं विभज्य तत्स्वैरं पापैस्तदनुभूयते । इति तद्वचनं श्रुत्वा स्नेहमानप्रचोदितः ॥ १९ ॥अभुञ्जानः पुरादाशु निवृत्यैत्य वनान्तरे । वृक्षमूलं समाश्रित्य बाह्यकारणसन्निधौ ॥ २० ।
आज ये मुनि एक महीनेके उपवासके बाद नगरमें भिक्षाके लिए गये थे वहाँ तीन मनुष्य मिलकर इनके पास आये। उनमें एक मनुष्य मनुष्योंके लक्षण शास्त्रका जानकार था, उसने इन मुनिराजको देखकर कहा कि इनके लक्षण तो साम्राज्य पदवीके कारण हैं परन्तु ये भिक्षाके लिए भटकते फिरते हैं इसलिए शास्त्र में जो कहा है।झूठ मालूम होता है। इसके उत्तर में दूसरे मनुष्यने कहा कि शास्त्रमें जो कहा गया है वह झूठ नहीं है। ये साम्राज्य तन्त्रका त्यागकर ऋषि हो गये हैं। किसी कारणसे विरक्त होकर इन्होंने अपना राज्यका भार बालक-छोटे ही वयको धारण करनेवाले अपने पुत्रके लिए दे दिया है और स्वयं विरक्त होकर इस प्रकार तपश्चरण कर रहे हैं। इसके वचन सुनकर तीसरा मनुष्य बोला कि ‘इसका तप पापका कारण है अतः इससे क्या लाभ है ? यह बड़ा दुरात्मा है इसलिए दया छोड़कर लोक-व्यवहारसे अनभिज्ञ असमर्थ बालकको राज्यभार सौंपकर केवल अपना स्वार्थ सिद्ध करनेके लिए यहाँ तप करनेके लिए आया है। मन्त्री आदि सब लोगोंने उस बालकको सांकलसे बाँध रक्खा है और राज्यका विभागकर पापी लोग इच्छानुसार स्वयं उसका उपभोग करने लगे हैं’। तीसरे मनुष्य के उक्त वचन सुनकर इन मुनिका हृदय स्नेह और मानसे प्रेरित हो उठा जिससे वे भोजन किये बिना ही नगरसे लौटकर वनके मध्यमें वृक्षके नीचे आ बैठे हैं ।। १२-२० ॥
“Today, after completing a one-month fast, this sage entered the city to seek alms, where three men approached him together. One among them, an expert in the science of human traits (samudrika shastra), looked at the sage and remarked, ‘The physical signs of this monk indicate imperial status, yet he is wandering around begging for alms. Therefore, what is written in the scriptures appears to be false.’ In response, the second man said, ‘What has been stated in the scriptures is not false. He renounced his imperial rule to become a seer. Having detached himself for some reason, he handed over the burden of his kingdom to his young son of tender age, and being thus detached, he is practicing such severe austerities.’ Hearing his words, the third man interjected, ‘His penance is a source of sin, so what is the benefit of it? He is highly wicked; discarding all compassion, he handed over the kingdom to an incapable child who is ignorant of the ways of the world, just to serve his own selfish end of practicing penance here. The ministers and others have bound that child in chains, and those sinful people have divided the kingdom among themselves, enjoying it as they please.’ Upon hearing these words from the third man, the sage’s heart was suddenly stirred by affection and pride, due to which, without consuming any food, he returned from the city and sat down beneath a tree in the middle of the forest. || 12–20 ||”
श्लोक 21 से 30
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624 | श्लोक 625 से 631 | श्लोक 632 से 643 | श्लोक 644 से 651 | श्लोक 652 से 663 | श्लोक 664 से 671 | श्लोक 672 से 682 | श्लोक 683 से 691
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