नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 82 to 91
श्लोक ( Shlok ) 82 – 88
दृष्ट्वा द्विगुणिताकारशोभं तं कामकातरा । प्रार्थयन्ती बहूपायैरनिच्छन्तं महामतिम् ॥ ८२ ॥पुरुषव्रतसम्पन्नमतिद्वेषादबूबुधत् । कुमारः सहवासस्य योग्यो नायं कुचेष्टितः ॥ ८३ ॥जानाम्यनभिजातत्वमस्येति खचराधिपम् । विचारविकलः सोऽपि तदुक्त ं तत्प्रतीतवान् ॥ ८४ ॥विद्युदंष्ट्रादिकान्पञ्चशतानि तनुजान्मिथः । । आहूय देवदत्तोऽयं दौष्टयोपांशुवधोचितः ॥ ८५ ॥ततः केनाप्युपायेन भवद्भिः क्रियतां व्यसुः । इत्याह खचराधीशो” लब्धाज्ञास्तेऽपि कोपिनः ॥ ८६ ॥स्वयं प्रागपि तं हन्तुं कृतमन्त्राः परस्परम् । तथेति प्रतिपद्यातो निर्ययुस्तश्चिकीर्षवः ॥ ८७ ॥हिंसा प्रधानशाखाद्वा राज्याद्वा नयवर्जितात् । तपसो ‘वापमार्गस्थाद्दुष्कलत्राद् ध्रुवं क्षतिः ॥ ८८ ॥
विद्या सिद्ध होनेसे उसके शरीरकी शोभा दूनी हो गई थी अतः उसे देखकर रानी काञ्चनमाला कामसे कातर हो उठी। उसने अनेक उपायोंके द्वारा कुमारसे प्रार्थना की परन्तु महाबुद्धिमान् कुमारने उसकी इच्छा नहीं की। जब उसे इस बातका पता चला कि यह कुमार पुरुषव्रत सम्पन्न है और हमारे सहवासके योग्य नहीं है तब उसने अपने पति कालसंवरसे कहा कि यह कुमार कुचेष्टा युक्त है अतः जान पड़ता है कि यह कुलीन नहीं है – उच्चकुलमें उत्पन्न हुआ नहीं है। विचार रहित कालसंवरने स्त्रीकी बातका विश्वास. कर लिया । उसने उसी समय विद्युदंष्ट्र आदि अपने पाँच सौ पुत्रोंको बुलाकर एकान्तमें आज्ञा दी कि ‘यह देवदत्त अपनी दुष्टताके कारण एकान्तमें बध करनेके योग्य है अतः आप लोग इसे किसी उपायसे प्राणरहित कर डालिये’। इस प्रकार विद्याधरोंके राजा कालसंवरसे आज्ञा पाकर वे पाँच सौ कुमार अत्यन्त कुपित हो उठे। वे पहले ही उसे मारनेके लिए परस्पर सलाह कर चुके थे फिर राजाकी आज्ञा प्राप्त हो गई। ‘ऐसा ही करूँगा’ यह कहकर उन्होंने पिताकी आज्ञा शिरोधार्य की और सबकेसब उसे पूरा करनेकी इच्छा करते हुए नगरसे बाहर निकल पड़े। यही आचार्य कहते हैं कि जिस प्रकार हिंसा प्रधान शास्त्रसे, नीति रहित राज्यसे और मिथ्या मार्गमें स्थित तपसे निश्चित हानि होती है उसी प्रकार दुष्ट स्त्रीसे निश्चित ही हानि होती है ।। ८२-८८ ॥
Because he had perfected the lore, the beauty of his body had doubled; seeing him thus, Queen Kanchanamala became completely overwhelmed and desperate with lust. She implored the prince through various means, but the highly intelligent prince did not entertain her desires. When she realized that this prince was firmly established in his vow of chastity and would not succumb to her advances, she said to her husband Kalasamvara, “This prince is harboring wicked and improper intentions; therefore, it appears he is not of noble birth—he is not born of a high lineage.”
Without any deliberation, Kalasamvara believed the words of his wife. He immediately summoned his five hundred sons, including Vidyuddanshtra, and commanded them in secrecy, “This Devadatta, because of his wickedness, deserves to be executed in secret. Therefore, find a way to deprive him of his life.” Receiving this order from Kalasamvara, the king of the Vidyadharas, those five hundred princes became utterly infuriated. They had already been conspiring among themselves to kill him, and now they had received the king’s command. Saying, “We shall do exactly as you order,” they respectfully accepted their father’s command and set out of the city together, intent on fulfilling it.
Regarding this, the acharyas (teachers) say: Just as certain ruin comes from scriptures centered on violence, from a kingdom devoid of justice, and from austerities rooted in false paths, in that very same manner, certain ruin is guaranteed from a wicked woman. ॥ 82-88 ॥
श्लोक ( Shlok ) 89
चालयन्ति स्थिरामृज्वी नयन्ति विपरीतताम् । छादयन्ति मतिं दीप्तां स्त्रियो वा दोषविक्रियाः ॥ ८९ ॥
दोषोंके विकारों से युक्त स्त्रियाँ मनुष्यकी स्थिर बुद्धिको चञ्चल बना देती हैं, सीधीको कुटिल बना देती है और देदीप्यमान बुद्धिको ढक लेती हैं ।॥ ८९ ॥
Women possessed of corrupted flaws render a man’s steady intellect fickle, twist that which is straight into crookedness, and obscure the most brilliant of minds. ॥ 89 ॥
श्लोक ( Shlok ) 90
तदैव तोषो रोषश्च पापिनीनां प्रियान्प्रति । न हेतुस्तत्र कोऽप्यन्यो लाभालाभद्वयाद्विना ॥ ९० ॥
ये पापिनी स्त्रियाँ अपने पतियोंके प्रति उसी समय सन्तुष्ट हो जाती हैं और उसी समय क्रोध करने लगती हैं और इनके ऐसा करनेमें लाभ वा हानि इन दो के सिवाय अन्य कुछ भी कारण नहीं है ॥ ९० ॥
These sinful women become pleased with their husbands one moment and filled with anger the next; and in doing so, there is no reason other than self-interest or loss. ॥ 90 ॥
श्लोक ( Shlok ) 91
अकार्यमवशिष्टं यत्तत्नास्तीह कुयोषिताम् । मुक्त्वा पुत्राभिलाषित्वमेतदप्येतया कृतम् ॥ ९१ ॥
संसारमें ऐसा कोई कार्य बाकी नहीं जिसे खोटी स्त्रियाँ नहीं कर सकती हों। हाँ, पुत्रके साथ व्यभिचारकी इच्छा करना यह एक कार्य बाकी था परन्तु काञ्चनमालाने वह भी कर लिया ॥ ९१ ॥
There is no deed left in this world that wicked women are incapable of committing. Indeed, desiring an incestuous union with one’s own son was the only deed left untouched, but Kanchanamala committed even that. ॥ 91 ॥
श्लोक 92 से 101
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81
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