चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 603 to 613
श्लोक ( Shlok ) 603 – 606
सापि स्वस्वामिनीमेतद्विप्रप्रोक्तमबोधयत् । ततः स्वानुमतायातं वृद्धविप्रं यथोचितम् ॥ ६०३ ॥प्रतिगृह्य ‘कुतो वेतो गमिष्यसि कुतोऽथवा । इति तस्याः परिप्रभे पश्चादिह समागतः ॥ ६०४ !पुनः पुरो गमिष्यामीत्याहासौ तच्छ्रुतेर्जनः । पार्श्ववर्ती व्यधाद्धासं दारिकाया द्विजोऽपि तम् ॥ ६०५ ॥न हास्यं कुरुतैवं भौ वार्धक्यं विपरीतताम् । उत्पादयति युष्माकं किं न भावीति सोऽवदत् ।। ६०६ ।।
दासीने भी अपनी मालकिनको ब्राह्मणकी कही हुई बात समझा दी। गुणमालाने अपनी अनुमतिसे आये हुए उस वृद्ध ब्राह्मणका यथायोग्य सत्कार कर पूछा कि ‘आप कहाँ से आये हैं और यहाँ से कहाँ जावेंगे? गुणमाला के इस प्रश्नके उत्तरमें उसने कहा कि ‘यहाँ पीछेसे आया हूँ और आगे जाऊँगा’ । ब्राह्मणकी बात सुनकर कन्या गुणमालाके समीपवर्ती लोग हँसने लगे। यह देख, ब्राह्मणने भी उनसे कहा कि इस तरह आप लोग हँसी न करें बुढ़ापा विपरीतता उत्पन्न कर देता है, क्या आप लोगोंका भी बुढ़ापा नहीं आवेगा ? ॥ ६०३-६०६ ॥
The maidservant conveyed the Brahmin’s words to her mistress. Receiving him with her permission, Gunamala extended appropriate hospitality to the elderly Brahmin and asked, “Where have you come from, and where will you go from here?” In response to Gunamala’s question, he said, “I have come from behind, and I shall go forward.”
Hearing the Brahmin’s reply, the people standing near the maiden Gunamala began to laugh. Seeing this, the Brahmin said to them, “Do not mock me in this manner. Old age brings about perversion and eccentricities; will you all not grow old as well?” (603-606)
श्लोक ( Shlok ) 607
पुनः पुरः क गन्तव्यमिति तत्प्रत्युदीरणे । कन्यातीर्थपरिप्राप्तेर्यावत्तावङ्गतिर्मम ॥ ६०७ ॥
तदनन्तर उन लोगोंने फिर पूछा कि आप आगे कहाँ जावेंगे ? ब्राह्मणने कहा कि जबतक कन्या तीर्थकी प्राप्ति नहीं हो जावेगी तबतक मेरा गमन होता रहेगा ।। ६०७ ॥
Thereafter, those people asked again, “Where will you go next?” The Brahmin replied, “My journey will continue until I attain the maiden-shrine (Kanya Tirtha).” (607)
श्लोक ( Shlok ) 608 – 609
इति द्विजोदितं श्रुत्वा कायेन वयसाप्ययम् । वृद्धो न चेतसेत्येवं नर्मप्रायोक्तिपूर्वकम् ॥ ६०८ ॥.अग्रासने विधायैनं स्वयमभ्यवहृत्य सा । इदानीं भवतो यन्त्र वाच्छा तत्राशु गम्यताम् ॥ ६०९ ॥
इस प्रकार ब्राह्मणका कहा उत्तर सुनकर सबने हँसते हुए कहा कि यह शरीर और अवस्थासे बूढ़ा है, मनसे बूढ़ा नहीं है। तदनन्तर गुणमालाने उसे अग्र आसन पर बैठाकर स्वयं भोजन कराया और फिर कहा कि अब आपकी जहाँ इच्छा हो वहाँ शीघ्र ही जाइये ॥ ६०८-६०९ ॥
Hearing the Brahmin’s reply, everyone laughed and said, “He is old only in body and age, not in mind.” Thereafter, Gunamala made him sit on the chief seat, served him food herself, and then said, “Now, please depart quickly wherever you wish to go.” (608-609)
श्लोक ( Shlok ) 610 – 613
इत्याह सोऽपि सुष्छूक्तं त्वयां भद्रे ममेति ताम् । प्रशंसन् प्रस्खलन् कृच्छादुत्थायालम्ब्य यष्टिकाम् ॥ ६१०॥तदीयशयनारोहं व्यधादुक्त इवैतया । चेटिकास्तद्विलोक्यास्य पश्य निर्लज्जतामिति ॥ ६११ ॥हस्तावलम्बनेनैनं निशकर्तुं समुद्यताः । युष्माभिः सम्यगेवोक्तं लज्जा स्त्रीविषयैव सा ॥ ६१२ ॥न पुंसु यदि तन्नास्ति लञ्जा साधारणी भवेत् । ततः स्नीभिः कथं पुंसां सङ्गमोऽनङ्गसंस्कृतः ॥ ६१३ ॥
इसके उत्तर में ब्राह्मणने कहा कि ‘हे भद्र ! तूने ठीक कहा’ इस तरह उसकी प्रशंसा करता और डगमगाता हुआ वह ब्राह्मण लाठी टेक कर बड़ी कठिनाईसे उठा और उसकी शय्यापर इस प्रकार चढ़ गया मानो उसने इसे चढ़नेकी आज्ञा ही दे दी हो। यह देख, दासियाँ कहने लगीं कि इसकी निर्लज्जता देखो । वे हाथ पकड़ कर उसे शय्यासे दूर करनेके लिए उद्यत हो गईं। तव ब्राह्मणने कहा कि आप लोगोंने ठीक ही तो कहा है, यथार्थमें लज्जा स्त्रियोंमें ही होती है पुरुषोंमें नहीं, यदि उनमें भी स्त्रियोंके समान ही लज्जा होने लगे तो फिर स्त्रियोंके साथ कामसे संस्कृत किया हुआ उनका समागम कैसे हो सकता है ? ।। ६१०-६१३ ।।
In response, the Brahmin said, “O noble lady! You speak the truth.” Praising her in this manner, the trembling Brahmin stood up with great difficulty, leaning on his staff, and climbed onto her bed as if she had given him permission to do so. Seeing this, the maidservants exclaimed, “Look at his shamelessness!” and prepared to grab his hands to pull him away from the bed.
The Brahmin then remarked, “What you all say is quite true; in reality, modesty belongs only to women, not to men. If men were to possess the same modesty as women, how could they ever passionately unite with them?” (610-613)
श्लोक 614 से 624
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602
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