चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 625 to 631
श्लोक ( Shlok ) 625
तेष्विष्टाः कृतपुण्यानां तानि पुण्यानि धर्मतः । निषिद्धविषयत्यागो धर्मः सन्निरुदाहृतः ॥ ६२५ ॥
इनमें जो इष्ट विषय हैं वे पुण्य करने-वालोंको प्राप्त होते हैं, धर्मसे पुण्य होता है और निषिद्ध विषयोंका त्याग करना ही सज्जनोंने धर्म कहा है ।। ६२५ ।।
“Among these, the desirable objects are obtained by those who perform meritorious deeds. Merit is acquired through righteousness (dharma), and virtuous people define righteousness as the renunciation of forbidden objects.” (625)
श्लोक ( Shlok ) 626
निषिद्धविषयांस्तस्मात्परिहृत्य विचक्षणाः । शेषाननुभवन्तोऽत्र कामशास्त्रविदो मताः ॥ ६२६ ॥
इसलिए जो बुद्धिमान् मनुष्य निषिद्ध विषयोंको छोड़कर शेष विषयोंका अनुभव करते हैं वे ही इस लोकमें कामशास्त्रके जाननेवाले कहे जाते हैं ।। ६२६ ॥
“Therefore, those wise men who renounce forbidden objects and enjoy the remaining ones are alone considered in this world to be the true knowers of the scriptures of pleasure (Kamashastra).” (626)
श्लोक ( Shlok ) 627 – 628
त्वयानुभूयमानेषु दोषाः सन्तीह केषुच्चित् । इति तेनोदितं श्रुत्वा तद्दोषविनिवृत्तये ॥ ६२७ ॥त्वयोपदेशः कर्तव्यो यास्यामि तव शिष्यताम् । इत्युदीर्णवतीं विग्रस्तां व्यनैषीत्कलादिषु ॥ ६२८ ॥
यह कहनेके बाद उस ब्राह्मणने गुणमालासे कहा कि तू जिन विषयोंका अनुभव करती है उनमेंसे कितनेमें ही अनेक दोष हैं। इस तरह ब्राह्मणका कहा सुनकर गुणमालाने उससे कहा कि आप उन दोषोंको दूर करनेके लिए उपदेश कीजिये मैं आपकी शिष्या हो जाऊँगी। ऐसा कहनेपर उस ब्राह्मणने गुणमालाको कला आदिकी शिक्षा देकर निपुण बना दिया ।। ६२७-६२८ ।।
After saying this, the Brahmin said to Gunamala, “Among the sensory objects that you experience, quite a few carry numerous defects.” Hearing these words of the Brahmin, Gunamala said to him, “Please instruct me on how to eliminate those defects, and I shall become your disciple.” Upon her saying this, the Brahmin educated Gunamala in the various arts and disciplines, making her highly proficient. (627-628)
श्लोक ( Shlok ) 629 – 631
सर्वे ते पुनरन्येधुविंहर्तुं वनमागमन् । स्थितस्तत्रायमेकान्तप्रदेशे गुणमालया ॥ ६२९ ॥सह स्वाभाविकं रूपमात्मनः समदर्शयत् । कन्या दृष्ट्वाथ तं जातसंशया सत्रपा सती ॥ ६३० ॥मौनेनावस्थिता बीक्ष्य तामेष प्राक्तनोक्तिभिः । चूर्णवासादिजाताभिः प्रत्याययदत्तिद्रुतम् ॥ ६३१ ॥
एक दिन वे सब लोग विहार करनेके लिए वनमें गये थे। वहाँ जब वह एकान्त स्थानमें गुणमालाके साथ बैठा था तब उसने अपना स्वाभाविक रूप दिखा दिया। उसे देखकर कन्याको संशय उत्पन्न हो गया और वह सती लज्जासहित चुप बैठ गई। यह देखकर ब्राह्मणने सुगन्धित चूर्णसे सम्बन्ध रखनेवाली प्राचीन कथाएँ कह कर बहुत ही शीघ्र उसे विश्वास दिला दिया ।। ६२९-६३१ ।।
One day, they had all gone to the forest for recreation. There, while he was sitting with Gunamala in a secluded spot, he revealed his natural, original form. Upon seeing him, the maiden was filled with doubt, and out of modest virtue, she sat there in silence. Seeing this, the Brahmin quickly won her trust by narrating ancient tales related to fragrant powders. (629-631)
श्लोक 632 से 643
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170 | अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 549
चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101 | श्लोक 102 से 113 | श्लोक 114 से 122 | श्लोक 123 से 135 | श्लोक 136 से 150 | श्लोक 151 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 193 | श्लोक 194 से 201 | श्लोक 202 से 212 | श्लोक 213 से 222 | श्लोक 223 से 241 | श्लोक 242 से 250 | श्लोक 251 से 261 | श्लोक 262 से 273 | श्लोक 274 से 290 | श्लोक 291 से 300 | श्लोक 301 से 313 | श्लोक 314 से 321 | श्लोक 322 से 330 | श्लोक 331से 350 | श्लोक 351से 365 | श्लोक 366 से 383 | श्लोक 384 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 412 | श्लोक 413 से 423 | श्लोक 424 से 440 | श्लोक 441 से 454 | श्लोक 455 से 472 | श्लोक 473 से 492 | श्लोक 493 से 501 | श्लोक 502 से 512 | श्लोक 513 से 524 | श्लोक 525 से 542 | श्लोक 543 से 552 | श्लोक 553 से 571 | श्लोक 572 से 583 | श्लोक 584 से 602 | श्लोक 603 से 613 | श्लोक 614 से 624
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