राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 185 to 193
श्लोक ( Shlok ) 185
बाह्यस्थैर्यवचः श्रुत्वा भीत्वा तस्यास्त्वमागता । गजकर्णचला स्त्रीणां चित्तवृत्तिर्न वेत्सि किम् ॥ १८५ ॥
उसकी बाह्य धीरताके वचन सुनकर ही तू उससे डर गई और यहाँ वापिस चली आई। स्त्रियोंकी चित्तवृत्ति हाथीके कानके समान चञ्चल होती है यह क्या तू नहीं जानती ? ॥ १८५ ॥
“Merely hearing her words of outward fortitude (Dhirata), you became terrified of her and fled back here. Do you not know that the mental disposition of women is as fickle and unsteady as the flapping ears of an elephant?” (185)
श्लोक ( Shlok ) 186
नास्याश्चिप्तं त्वयाभेदि न जाने केन हेतुना । उपायकुशलाभासीत्यसौ तामभ्यतर्जयत् ॥ १८६ ॥
मैं नहीं जानता कि तूने इसका चित्त क्यों नहीं भेदन किया । तू उपायमें कुशल नहीं है किन्तु कुशल जैसी जान पड़ती है। ऐसा कह रावणने शूर्पणखाको खूब डॉट दिखाई ।। १८६ ।।
“I cannot fathom why you failed to pierce and win over her heart. You possess no true skill in executing strategies, yet you merely masquerade as one who is adept!’ Having spoken thus, Ravana severely reprimanded and scolded Shurpanakha.” (186)
श्लोक ( Shlok ) 187
भोगोपभोगद्वारेण रञ्जयेयं मनो यदि । तत्र यद्वस्तु नान्यत्र तत्स्वप्नेऽप्युपलभ्यते ॥ १८७ ॥
इसके उत्तरमें शूर्पणखा कहने लगी कि यदि मैं भोगोपभोगकी वस्तुओंके द्वारा उसका मन अनुरक्त करती तो जो वस्तु वहाँ रामचन्द्रके पास हैं वे अन्यत्र स्वप्नमें भी नहीं मिलती हैं ।। १८७ ।।
“In response to this, Shurpanakha said, ‘Had I attempted to captivate and allure her mind with the finest objects of worldly pleasure and luxury (Bhogopabhoga), [it would have been futile]; for the profound virtues and qualities that reside in Ramachandra cannot be found anywhere else, even in one’s wildest dreams.'” (187)
श्लोक ( Shlok ) 188 – 189
अथ शौयादिभी रामसदृशो न कचित्पुमान् । वीणादिभिश्चेत्सा सर्वकलागुणविशारदा ॥ १८८ ॥सुग्रहं तलहस्तेन भूमिष्टैर्भानुमण्डलम् । पातालादपि शेषाहिः सुहरो डिम्भकेन च ॥१८९ ॥
यदि शूर-वीरता आदिके द्वारा उसे अनुरक्त करती तो रामचन्द्रके समान शूर-वीर पुरुष कहीं नहीं है। यदि वीणा आदिके द्वारा उसे वश करना चाहती तो वह स्वयं समस्त कला और गुणोंमें विशारद है। भूमि पर खड़े हुए लोगोंके द्वारा अपनी हथेलीसे सूर्यमण्डलका पकड़ा जाना सरल है, एक बालकभी पाताल लोकसे शेषनागका हरण कर सकता है॥ १८८-१८९॥
“Had I tried to win her heart through a display of heroism and valor, [that too would have failed], for a heroic warrior matchless to Ramachandra does not exist anywhere. Had I sought to captivate her through the music of the lute (Veena) or similar arts, she herself is an absolute master of all arts and virtues. It might be simple for people standing on the ground to reach up and grasp the orb of the sun with their bare palms, or for even a mere child to pull the cosmic serpent Sheshanaga out of the underworld (Patala-loka), [but swaying her mind is harder still].” (188-189)
श्लोक ( Shlok ) 190 – 193
समुत्तानयितु शक्ता ससमुद्रा वसुन्धरा । भेत्तुं शीलवतीचित्तं न शक्यं मन्मथेन च ॥ १९० ॥इत्याख्यत्साप्यदः पापादवकर्ण्य स रावणः । निर्मलैः केतनैर्दूरात्पश्यतां जनयद्धृशम् ॥ १९१॥हंसावलीति सन्देहं नवनिर्मोकहासिभिः । दिशो मुखरयद्ध मघण्टाचटुलनिःस्वनैः ॥ १९२ ॥कुर्वद्धनैर्घनाश्लेषं बिश्लिष्टैरिव बन्धुभिः । ययौ पुष्पकमारुह्य गगने सह मन्त्रिणा ॥ १९३ ॥
और समुद्र सहित पृथिवी उठाई जा सकती है परन्तु शीलवती स्त्रीका चित्त कामसे भेदन नहीं किया जा सकता । शूर्पणखाके वचन सुनकर रावण पापकर्मके उद्यसे पुष्पक विमान पर सवार हो मन्त्रीके साथ आकाशमार्गसे चल पड़ा। पुष्पक विमान पर साँपकी नई काँचलीकी हँसी करनेवाली निर्मल पता-काएँ फहरा रही थीं उनसे वह लोगोंको ‘यह हंसोंकी पंक्ति है’ ऐसा सन्देह उत्पन्न कर रहा था । सुवर्णकी बनी छोटी-छोटी घण्टियोंके चञ्चल शब्दोंसे वह पुष्पक विमान दिशाओंको मुखरित कर रहा था और मेघोंके साथ ऐसा गाढ़ आलिङ्गन कर रहा था मानो बिछुड़े हुए बन्धुओंके साथ ही आलिङ्गन कर रहा हो । १९०-१९३ ॥
“Furthermore, the entire earth along with its massive oceans could be lifted bodily, but the mind of a woman of immaculate virtue (Shilavati) can never be pierced or corrupted by lust (Kama). Hearing these words of Shurpanakha, Ravana—impelled by the rising tide of his own past sins and demerit (Papakarma-udaya)—boarded his Pushpaka chariot (Vimana) and set forth through the aerial path accompanied by his minister. Gleaming, pristine banners were fluttering upon the Pushpaka chariot, completely mocking the translucent whiteness of a snake’s freshly shed skin; by their appearance, they cast an illusion in the minds of the onlookers below, making them mistake the flags for a soaring flock of white swans. With the resonant, rhythmic chiming of its small golden bells, that celestial chariot filled all directions with music, and it embraced the passing clouds so closely as if it were tightly hugging long-lost kinsmen.” (190-193)
श्लोक 194 से 203
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राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184
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