नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 71- shlok 422 to 431
श्लोक ( Shlok ) 422
विनीतचारणास्येन्दुस्रतं धर्ममिवामृतम् । पीत्वा श्रवणयुग्मेन परां तृप्तिमवापतुः ॥४२२॥
वहां पर विराजमान किन्ही चारणऋद्धिधारी मुनिके मुखरूपी चन्द्रमासे झरे हुए अमृतके समान धर्मका दोनों कानोंसे पानकर वे दोनों ही परमतृप्तिको प्राप्त हुए ॥ ४२२ ॥
There, drinking with both ears the nectar-like discourse on Dharma flowing from the moon-like face of a revered monk (Muni) possessing the supernatural power of space-travel (Charan-riddhi), both of them achieved supreme spiritual satisfaction. || 422 ||
श्लोक ( Shlok ) 423
तयोर्नरपतिर्दीक्षामादात्तच्चारणान्तिके । सुभद्रापादमासाद्य सापि संयममाददे ॥४२३॥
उन दोनोंमेंसे राजा महेन्द्रविक्रमने तो उन्हीं चारण मुनिराजके समीप दीक्षा ले ली और रानी सुरूपाने सुभद्रा नामक आर्यिका के चरणमूल में जाकर संयम धारण कर लिया ।। ४२३ ॥
Between the two of them, King Mahendra-vikrama took initiation (Diksha) right there under that very same space-traveling monk (Charan Muniraj), while Queen Surupa approached the feet of the female ascetic (Aryika) Subhadra and embraced a life of self-restraint (Sanyam). || 423 ||
श्लोक ( Shlok ) 424 – 428
सौधर्मकल्पे देवी त्वमुपगम्योपसञ्चित । स्वायुःपल्योपमप्रान्ते क्रमान्निष्क्रम्य तद्गतेः ॥४२४॥ गान्धारविषये पुष्कलावतीनगरेशितुः । नृपस्येन्द्रगिरेर्मेरुमत्याश्च तनयाऽभवत् ॥४२५॥ गान्धारीत्याख्यया ख्याता प्रदातुर्मैथुनाय ताम् । पितुः पापमतिः श्रुत्वा प्रारम्भं नारदस्तदा ॥४२६॥ सद्यस्तामेत्य तत्कर्म न्यगदज्जगदप्रियः । तदुक्तानन्तरं प्रेमवशः सन्नद्धसैन्यकः ॥४२७॥युद्धे भङ्ग विधायेन्द्रगिरेश्चान्यमहीभुजाम् । आदाय तां महादेवीपट्टश्चैवं त्वया कृतः ॥४२८॥
आयु पूरीकर सौधर्म स्वर्गमें देवी हुई, जब वहांकी एक पल्य प्रमाण आयु पूरी हुई तो वहांसे चयकर गान्धार देशकी पुष्करावती नगरीके राजा इन्द्रगिरि-की मेरुमती रानीसे गान्धारी नामकी पुत्री हुई है। राजा इन्द्रगिरि इसे अपनी बूआके लड़केको देना चाहता था, जब यह बात जगत्को अप्रिय पापबुद्धि नारदने सुनी तब शीघ्र ही उसने तुम्हें इसकी खबर दी। सुनते ही तू भी प्रेमके वश हो गया और सेना सजाकर युद्धके लिए चल पड़ा । युद्धमें राजा इन्द्रगिरि और उसके सहायक अन्य राजाओंको पराजितकर इस गान्धारीको ले आया और फिर इसे महादेवीका पट्टबन्ध प्रदान कर दिया – पट्टरानी बना लिया ।। ४२४-४२८ ।।
Completing her lifespan, she was reborn as a goddess in the Saudharma heaven. When her lifespan of one Palya (a celestial measure of time) concluded there, she departed from that realm and was born as Gandhari, the daughter of Queen Merumati and King Indragiri of Pushkaravati city in the Gandhara country.
King Indragiri wished to give her hand in marriage to his paternal aunt’s son. When Narada, whose mind is naturally inclined towards causing mischief unpleasant to the world, heard about this, he immediately informed you. Upon hearing the news, you too were overcome by love, mobilized your army, and marched to war. Defeating King Indragiri and his allied kings in battle, you brought this Gandhari back and subsequently bestowed upon her the crown of the chief queen (Mahadevi), making her your principal consort (Pattrani). || 424-428 ||
श्लोक ( Shlok ) 429 – 431
अथ गौरीभवं चैवं वदामि श्रणु माधव । अस्ति द्वीपेऽत्र विख्यातं पुन्नागाख्यपुरं पुरु ॥४२९॥पालकस्तस्य हेमाभो देवी तस्य यशस्वती । साऽन्येद्युश्चारणं दृष्ट्वा यशोधरमुनीश्वरम् ॥४३०॥स्मृतपूर्वभवा राज्ञा पृष्टैवं प्रत्यभाषत । स्वभवं दशनोद्दीप्त्या स्नापयन्ती (स्नपयन्ती) मनोरमम् ॥४३१॥
अथानन्तर – गणधर भगवान् कहने लगे कि अब मैं गौरीके भव कहता हूं सो हे कृष्ण तू सुन ! इसी जम्बू द्वीप में एक पुन्नागपुर नामका अतिशय प्रसिद्ध बड़ा भारी नगर है। उसकी रक्षा करनेवाला राजा हेमाभ था और उसकी रानी यशस्वती थी। किसी एक दिन यशोधर नामके चारण ऋद्धिधारी मुनिराजको देखकर उसे अपने पूर्व भवोंका स्मरण हो आया। राजाके पूछनेपर वह अपने दांतोंकी कान्तिसे उन्हें नहलाती हुई इस प्रकार अपने पूर्वभव कहने लगी ।। ४२९ -४३१ ।।
Thereafter, the Lord Ganadhara began to speak, saying, “O Krishna, listen now as I narrate the past lives of Gauri! In this very Jambudvipa, there is an immensely famous and grand city named Punnagapura. It was ruled and protected by King Hemabha, and his queen was Yashasvati.
One day, upon seeing a revered monk (Muniraj) named Yashodhara who possessed the supernatural power of space-travel (Charan-riddhi), she gained recollection of her past lives (Jati-smarana). When the King questioned her, she began to narrate her past lives as follows, bathing them, as it were, in the radiant splendor of her smile.” || 429-431 ||
श्लोक 432 से 441
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497
नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 32 | श्लोक 33 से 51 | श्लोक 52 से 64 | श्लोक 65 से 81 | श्लोक 82 से 93 | श्लोक 94 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121 | श्लोक 122 से 130 | श्लोक 131 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 162 | श्लोक 163 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 190 | श्लोक 191 से 200 | श्लोक 201 से 213 | श्लोक 214 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 241 | श्लोक 242 से 257 | श्लोक 258 से 272 | श्लोक 273 से 282 | श्लोक 283 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 315 | श्लोक 316 से 324 | श्लोक 325 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 382 | श्लोक 383 से 391 | श्लोक 392 से 403 | श्लोक 404 से 413 | श्लोक 414 से 421
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