श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 72 to 81
श्लोक ( Shlok ) 72
शूरो लघुसमुत्थानः कूटयुद्धविशारदः । अवस्कन्देन सम्प्राप्य सारसांग्रामिकाग्रणीः ॥ ७२ ॥
कूट युद्ध करनेमें चतुर, श्रेष्ठ योद्धाओंके आगे चलनेवाला और शूरवीर वह राजा अपनी सेना लेकर शीघ्र ही चला ॥ ७२ ॥
“That king—highly skilled in deceptive warfare, a leader of the finest warriors, and a true hero—departed immediately at the head of his army.”72
श्लोक ( Shlok ) 73
विधाय सङ्गरे भङ्ग तत्कीर्तिमिव नर्तकीम् । तामाहरद् गते पुण्ये कस्य किं कोऽत्र नाहरत् ॥ ७३ ॥
विन्ध्यशक्तिने युद्धमें राजा सुषेणको पराजित किया और उसकी कीर्तिके समान नृत्यकारिणीको जबरदस्ती छीन लिया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके चले जाने पर कौन किसकी क्या वस्तु नहीं हर लेता ? ॥ ७३ ॥
“Vindhyashakti defeated King Sushena in battle and forcibly seized the danseuse, who was like the personification of the King’s own fame. This is only natural; for when one’s merit (Punya) is exhausted, who is there that will not snatch away another’s possessions?”73
श्लोक ( Shlok ) 74
दन्तभङ्गो गजेन्द्रस्य दंष्ट्भङ्गो गजद्विषः । मानभङ्गो महीभर्तुर्महिमानमपहुते ॥ ७४ ॥
जिस प्रकार दाँतका टूट जाना हाथीकी महिमाको छिपा लेता है, और दाढ़का टूट जाना सिंहकी महिमाको तिरोहित कर देता है उसी प्रकार मान-भङ्ग राजाकी महिमाको छिपा देता है ।॥ ७४ ॥
“Just as the breaking of a tusk conceals the majesty of an elephant, and the loss of a fang diminishes the glory of a lion, so too does the loss of honor eclipse the majesty of a king.”74
श्लोक ( Shlok ) 75
स तेन मानभङ्गेन स्वगृहाद्भन्नमानसः । पृष्ठभङ्गेन नागो वा न प्रतस्थे पदात्पदम् ॥ ७५ ॥
उस मान-भङ्गसे राजा सुषेणका दिल टूट गया अतः जिस प्रकार पीठ टूट जानेसे सर्प एक पद भी नहीं चल पाता है उसी प्रकार वह भी अपने स्थानसे एक पद भी नहीं चल सका ।॥ ७५ ॥
“King Sushena’s heart was shattered by that loss of honor; therefore, just as a serpent with a broken back cannot move even a single step, he too was unable to move a single step from his place.”75
श्लोक ( Shlok ) 76 – 77
स कदाचित्सनिर्वेदः सुव्रताख्यजिनाधिपात् । अनगारात्परिज्ञातधर्मान्निर्मलचेतसा ॥ ७६ ॥स कोऽपि पापपाको मे येन तेनाप्यहं जितः । इति सञ्चित्य पापारिं निहन्तुं मतिमात्तनोत् ॥ ७७ ॥
किसी एक दिन उसने विरक्त होकर धर्मके स्वरूपको जाननेवाले गृह-त्यागी सुव्रत जिनेन्द्रसे धर्मोपदेश सुना और निर्मल चित्तसे इस प्रकार विचार किया कि वह हमारे किसी पापका ही उदय था जिससे विन्ध्यशक्तिने मुझे हरा दिया। ऐसा विचार कर उसने पाप-रूपी शत्रुको नष्ट करनेकी इच्छा की ।। ७६-७७ ॥
One day, having grown dispassionate toward worldly life, he listened to the discourse on dharam from the renunciant Suvrata Jina, who was a knower of the true nature of righteousness. With a mind rendered pure, he reflected thus: “Surely it was the fruition of some sin of mine that caused Vindhyaśakti to defeat me.” Thinking in this manner, he resolved to destroy the enemy in the form of sin itself. ॥ 76–77 ॥
श्लोक ( Shlok ) 78 – 79
तपस्तनूनपात्तापतनुकृततनुश्चिरम् । सारिकोपः स संन्यस्य सनिदानः सुरोऽमवत् ॥ ७८ ॥विमानेऽनुपमे नाम्ना कल्पे प्राणतनामनि । विंशत्यब्ध्युपमायुः सन् स्वष्टद्धिंकृतसम्मदः ॥ ७९ ॥
और उन्हीं जिनेन्द्रसे दीक्षा ले ली। बहुत दिन तक तपरूपी अग्निके संतापसे उसका शरीर कृश हो गया था। अन्तमें शत्रुपर क्रोध रखता हुआ वह निदान बन्ध सहित संन्यास धारण कर प्राणत स्वर्गके अनुपम नामक विमानमें बीस सागरकी आयुवाला तथा आठ ऋद्धियोंसे हर्षित देव हुआ ।। ७८-७९ ।।
Thereafter, he received initiation into ascetic life from that very Suvrata Jina. For a long time, his body became emaciated through the torment of the fire of austerities. At the end, still harbouring wrath against his enemy, he embraced renunciation accompanied by the bondage of nidāna-karma; and, upon death, he was reborn as a celestial being in the peerless Anupama vimāna of the Prāṇata heaven, endowed with a lifespan of twenty sāgaras and rejoicing in the possession of the eight supernatural prosperities. ॥ 78–79 ॥
श्लोक ( Shlok ) 80 – 81
अत्रैव ‘भारते श्रीमान् महापुरमधिष्ठितः । नृपो वायुरथो नाम भुक्त्वा राज्यश्रियं चिरम् ॥ ८० ॥श्रुत्वा सुव्रतनामार्हत्पार्श्वे धर्म स तत्त्ववित् । सुतं घनरथं राज्ये स्थापयित्वाऽगमत्तपः ॥ ८१ ॥
अथानन्तर इसी भरतक्षेत्रके महापुर नगरमें श्रीमान् वायुरथ नामका राजा रहता था। चिर-काल तक राज्यलक्ष्मीका उपभोग कर उसने सुव्रत नामक जिनेन्द्रके पास धर्मका उपदेश सुना, तत्त्व-ज्ञानी वह पहलेसे ही था अतः विरक्त होकर घनरथ नामक पुत्रको राज्य देकर तपके लिए चला गया ।। ८०-८१ ॥
Thereafter, in this very Bharata-kṣetra, there lived in the great city of Mahāpura a glorious king named Vāyuratha. After enjoying the splendour of royal sovereignty for a long time, he listened to the discourse on धर्म delivered by Suvrata Jina. Being already a knower of the true principles of reality, he at once became detached from worldly existence; and, entrusting the kingdom to his son Ghanaratha, departed to practise austerities. ॥ 80–81 ॥
श्लोक 82 से 91
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