विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 92 to 101
श्लोक ( Shlok ) 92
आकर्ण्य नारदाद् दूतमृत्युमावेशितक्रुधा । ययावभिमुखं योद्धुं रामकेशवयोर्मधुः ॥ ९२ ॥
जब मधुने नारदसे दूतके मरनेका समाचार सुना तो वह क्रोधित होकर युद्ध करने-के लिए बलभद्र और नारायणके सन्मुख चला ॥ ९२ ॥
When Madhu heard the news of his messenger’s death from Narada, he became incensed and marched forth to face the Balabhadra and the Narayana in battle. [92]
श्लोक ( Shlok ) 93
तौ च संग्रामसनद्धौ क्रुद्धौ युद्धविशारदौ । प्रापतुः सहसा हन्तुं तं यमानलसश्चिभौ ॥ ९३ ॥
इधर युद्ध करनेमें चतुर तथा कुपित बलभद्र और नारायण युद्धके लिए पहलेसे ही तैयार बैठे थे अतः यमराज और अग्निकी समानता रखनेवाले वे दोनों राजा मधुको मारनेके लिए सहसा उसके पास पहुँचे ।। ९३ ।।
Meanwhile, the Balabhadra and Narayana, who were skilled in warfare and already incensed, sat ready for battle. Equal in prowess to Yamaraja (the God of Death) and Agni (Fire), the two kings suddenly reached King Madhu to slay him. [93]
श्लोक ( Shlok ) 94
सैन्ययोरुभयोरासीत् संग्रामः संहरन्निव । परस्परं चिरं घोरः शूरयोर्भीरुभीप्रदः ॥ ९४ ॥
दोनों शूरकी सेनाओंमें परस्परका संहार करनेवाला तथा कायर मनुष्योंको भय उत्पन्न करनेवाला चिरकाल तक घमासान् युद्ध हुआ ।। ९४ ।।
A fierce, prolonged battle ensued between the armies of the two heroes, causing mutual destruction and striking terror into the hearts of the cowardly. [94]
श्लोक ( Shlok ) 95
स्वयम्भुर्व समुद्दिश्य तदा सोढा मधुः क्रुधा । ज्वलष्वक्रं विवर्त्याशु न्यक्षिपत्तजिघांसया ॥ ९५ ॥
अन्तमें राजा मधुने कुपित होकर स्वयंभूको मारनेके उद्देश्यसे शीघ्र ही जलत हुआ चक्र घुमा कर फेंका ॥ ९५ ॥
In the end, King Madhu, filled with rage, whirled and hurled a blazing discus (Chakra) with the intent to swiftly strike down Svayambhu. [95]
श्लोक ( Shlok ) 96
तद्गत्वाऽऽशु परीत्यैनं भुजाभ्रे दक्षिणे स्थितम् । अवतीर्य मरुग्मार्गाद्भास्करस्येव मण्डलम् ॥ ९६ ॥
वह चक्र शीघ्रताके साथ जाकर तथा प्रदक्षिणा देकर स्वयंभूकी दाहिनी भुजाके अग्रभाग पर ठहर गया। उस समय वह ऐसा जान पड़ता था मानो आकाशसे उतरकर सूर्यका बिम्ब ही नीचे आ गया हो ॥९६॥
Moving swiftly, the discus circled Svayambhu in a clockwise direction and came to rest upon his right forearm. At that moment, it appeared as though the very orb of the sun had descended from the heavens and landed there. [96]
श्लोक ( Shlok ) 97
तदेवादाय सक्रोधः स्वयम्भूविंद्विषं प्रति । प्रहित्यादादसुंस्तस्य किं न स्यात् सुकृतोदयात् ॥ ९७ ॥
उसी समय राजा स्वयंभू ने कुपित होकर वह चक्र शत्रुके प्रति फेंका सो ठीक ही है क्योंकि पुण्योदयसे क्या नहीं होता ? ॥ ९७ ॥
At that very moment, the enraged King Svayambhu hurled that same discus back at the enemy; and truly, this is only fitting, for what is impossible when one’s merit (Punya) is on the rise? [97]
श्लोक ( Shlok ) 98
आधिपत्यं तदावाप्य भरतार्द्धस्य केशवः । वासवो वोऽन्वभूद्भोगानिर्विघ्नं स्वाग्रजान्वितः ॥ ९८ ॥
उसी समय स्वयंभू-नारायण, आधे भरतक्षेत्रका राज्य प्राप्त कर इन्द्रके समान अपने बड़े भाईके साथ उसका निर्विघ्न्न उपभोग करने लगा ॥ ९८ ॥
At that time, Svayambhu-Narayana, having acquired the sovereignty of half of Bharatkshetra, began to enjoy it without any obstacles alongside his elder brother, just like Indra. [98]
श्लोक ( Shlok ) 99
मधुः सत्त्वं समुत्सृज्य भूयः संश्रितवान् रजः । बद्ध्वायुर्नारकं प्रपश्चिरयं स तमस्तमः ॥ ९९ ॥
राजा मधुने प्राण छोड़कर बहुत भारी पापका संचय किया जिससे नर-कायु बाँध कर तमस्तम नामक सातवें नरकमें गया ॥ ९९ ॥
King Madhu, having abandoned his life, accumulated an immense burden of sin; consequently, after binding the life-span of a hellish being, he descended into Tamastama, the seventh hell. [99]
श्लोक ( Shlok ) 100
केशवोऽपि तमन्वेष्टुमिव वैरानुबन्धनात् । तदेव नरकं पश्चात्याविक्षत् पापपाकतः ॥ १०० ॥
और नारायण स्वयंभू भी वैरके संस्कार-से उसे खोजनेके लिए ही मानो अपने पापोदयके कारण पीछेसे उसी नरकमें प्रविष्ट हुआ ॥ १०० ॥
And the Narayana Svayambhu, as if driven by the deep-seated impressions of his enmity to seek him out, subsequently entered that very same hell due to the ripening of his own demerit (Papodaya). [100]
श्लोक ( Shlok ) 101
यूतेन मोहविहितेन विधीः स्वयम्भूः यातो मधुश्च नरकं दुरिती दुरन्तम् ।बलोऽपि तद्वियोगोत्थशोकसन्तप्तमानसः । निविंद्य संसृतेः प्राप्य जिनं विमलवाहनम् ॥ १०१ ॥
स्वयंभूके वियोगसे उत्पन्न हुए शोकके द्वारा जिसका हृदय संतप्त हो रहा था ऐसा बलभद्र धर्म भी संसारसे विरक्त होकर भगवान् विमलनाथके समीप पहुँचा ।। १०१ ।।
His heart deeply tormented by the grief arising from the separation from Svayambhu, Balabhadra Dharma also became detached from the world and approached Lord Vimalnath. [101]
श्लोक 102 से 111
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