विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 233 से 242 | श्लोक 243 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 271
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 272 to 281
श्लोक ( Shlok ) 272
प्राक्तनो नारकः पङ्कप्रभाया निर्गतश्चिरम् । नानायोनिषु सम्भ्रम्य नानादुःखानि निर्विशन् ॥ २७२ ॥
सत्यघोषका जीव जो पङ्कप्रभा नामक चौथे नरकमें गया था वहाँ से निकलकर चिरकाल तक नाना योनियोंमें भ्रमण करता हुआ अनेक दुःख भोगता रहा ।। २७२ ।।
“The soul of Satyaghosha, which had gone to the fourth hell named Pankaprabha, emerged from there and continued to wander through various life-forms for a vast period of time, enduring immense suffering.”272
श्लोक ( Shlok ) 273
इह क्षत्रपुरे दारुणाख्यस्य तनयोऽभवत् । मङ्गयां व्याधस्य पापेन प्राक्तनेनातिदारुणः ॥ २७३ ॥
एक बार वह पूर्वकृत पापके उदयसे इसी क्षत्रपुर नगरमें दारुण नामक व्याधकी मंगी नामक स्त्रीसे अतिदारुण नामका पुत्र हुआ ॥ २७३ ।।
“Once, due to the ripening of his past sins, he was born in this very city of Chhatrapur as a son named Atidaruna, to Mangi, the wife of a hunter named Daruna.”273
श्लोक ( Shlok ) 274
वने प्रियङ्गुखण्डाख्ये प्रतिमायोगधारिणम् । वज्रायुधं खलस्तस्मिल्लोकान्तरमजीगमत् ॥ २७४ ॥
किसी एक दिन प्रियङ्गुखण्ड नामके वनमें वज्रायुध मुनि प्रतिमायोग धारण कर बिराजमान थे उन्हें उस दुष्ट भीलके लड़केने परलोक भेज दिया- मार डाला ॥ २७४ ॥
“One day, in the forest named Priyangukhanda, the Monk Vajrayudha sat in the Pratimayoga posture. That wicked son of the Bhil (Atidaruna) sent him to the next world—he killed him.” 274
श्लोक ( Shlok ) 275
सोड्या व्याधकृतं तीव्रमुपसर्गमसौ मुनिः । धर्मध्यानेन सर्वार्थसिद्धिं संप्रापदिद्धधीः ॥ २७५ ॥
तीक्ष्ण बुद्धिके धारक वे मुनि व्याधके द्वारा किया हुआ तीव्र उपसर्ग सहकर धर्मध्यानसे सर्वार्थसिद्धिको प्राप्त हुए ।। २७५ ।।
“The Sage, possessor of keen intellect, endured the severe affliction (Upasarga) inflicted by the hunter with meditative focus (Dharmadhyana) and attained Sarvarthasiddhi.”275
श्लोक ( Shlok ) 276 – 279
सप्तमी पृथिवीं पापादध्युवासातिदारुणः । प्राग्भागे धातकीखण्डे विदेहे पश्चिमे महान् ॥ २७६ ॥देशोऽस्ति गन्धिलस्तस्मिन्नयोध्यानगरे नृपः । अर्हदासोऽभवत्तस्य सुव्रता सुखदायिनी ॥ २७७ ॥रत्नमाला तयोरासीत्सूनुर्वीतभयाह्नयः । तस्यैव जिनदसायामभूद्रत्नायुधः सुतः ॥ २७८ ॥नाम्ना विभीषणो जातो तावुभौ रामकेशवौ। अविभज्य श्रियं दीर्घकालं भुक्त्वा यथोचितम् ॥ २७९ ॥
पूर्व धातकीखण्डके पश्चिम विदेहक्षेत्रमें गन्धिल नामक देश है उसके अयोध्या नगर में राजा अर्हद्दास रहते थे, उनकी सुख देने वाली सुव्रता नामकी स्त्री थी। रत्नमालाका जीव उन दोनोंके वीतभय नामका पुत्र हुआ। और उसी राजाकी दूसरी रानी जिनदत्ताके रत्नायुधका जीव विभीषण नामका पुत्र हुआ। वे दोनों ही पुत्र बलभद्र तथा नारायण थे और दीर्घकाल तक विभाग किये बिना ही राजलक्ष्मीका यथायोग्य उपभोग करते रहे ।। २७६-२७९ ।।
“In the Gandhil country of West Videhakshetra, located in the Eastern Dhatakikhanda, there lived a King named Arhaddas in the city of Ayodhya; he had a wife named Suvrata who brought him great happiness. The soul of Ratnamala was reborn as their son, named Vitabhaya. From the King’s second queen, Jinadatta, the soul of Ratnayudha was reborn as a son named Vibhishana. Those two sons were Balabhadra and Narayana (respectively), and for a long time, they enjoyed the royal prosperity in a fitting manner without ever dividing it.”276 – 279
श्लोक ( Shlok ) 280
कालान्ते केशवोऽयासीद्वद्ध्वायुः शर्कराप्रभाम् । स हल्यपि निवृत्यन्तेवासित्वा लान्तवं ययौ ॥ २८० ॥
अन्त में नारायण तो नरकायुका बंध कर शर्कराप्रभामें गया और बलभद्र अन्तिम समयमें दीक्षा लेकर लान्तव स्वर्गमें उत्पन्न हुआ ।। २८० ।।
“In the end, Narayan, having bound the life-karma of hell, went to Sharkaraprabha, while Balabhadra took initiation (Diksha) in his final moments and was born in the Lantava heaven.”280
श्लोक ( Shlok ) 281
आदित्याभः स एवाहं द्वितीयपृथिवीस्थितम् । प्रविश्य नरकं स्नेहाद्विभीषणमबोधयत् ॥ २८१ ॥
मैं वही आदित्याभ नामका देव हूं, मैंने स्नेहवश दूसरे नरकमें जाकर वहाँरहनेवाले विभीषणको सम्बोधा था ।। २८१ ।।
“I am that very celestial being named Adityabha. Out of affection, I went to the second hell and gave spiritual guidance to Vibhishana, who was residing there.”281
श्लोक 282 से 291
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