मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन पर्व 66 – श्लोक 43 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 66- shlok 93 to 101
श्लोक ( Shlok ) 93 – 95
इहलोकादिपर्यन्तवीक्षणैर्जन्मिनां सताम् । बुद्धिकारणकार्यों स्तां चैतन्यान्मद्यधीरिव ॥ ९३ ॥इत्यादि युक्तिवादेन चक्री तं शून्यवादिनम् । श्रद्धाप्यात्मास्तितां ‘सम्यक् कृतबन्धुविसर्जनः ॥ ९४ ॥ नियोज्य स्वात्मजे राज्यं सुकेत्वादिमहीभुजैः । जिनात्समाधिगुप्ताख्यात्समं संयममाददौ ॥ ९५ ॥
जिस प्रकार मदिरापान करनेसे बुद्धिमें जो विकार होता है वह कहाँ से आता है ? पूर्ववर्ती चैतन्यसे ही उत्पन्न होता है इसी प्रकार संसारके समस्त जीवोंके जो कारण और कार्यरूप बुद्धि उत्पन्न होती है वह कहाँ से आती है ? पूर्ववर्ती चैतन्यसे ही उत्पन्न होती है इसलिए जीवोंका यद्यपि जन्म-मरणकी अपेक्षा आदि-अन्त देखा जाता है परन्तु चैतन्य सामान्यकी अपेक्षा उनका अस्तित्व अनादि सिद्ध है। इत्यादि युक्तिवादके द्वारा चक्रवर्तीने उस शून्यवादी मन्त्रीको आत्माके अस्तित्वका अच्छी तरह श्रद्धान कराया, परिवारको विदा किया, अपने पुत्रके लिए राज्य सौंपा और समाधिगुप्त नामक जिनराजके पास जाकर सुकेतु आदि राजाओंके साथ संयम ग्रहण कर लिया-जिन-दीक्षा ले ली ।। ९३-९५ ॥
“Just as the intoxication that arises from drinking liquor—where does that impairment of intelligence come from? It arises only from the preceding state of consciousness. Similarly, where does the cause-and-effect-based intelligence found in all living beings of the world come from? It arises only from the preceding state of consciousness. Therefore, although living beings appear to have a beginning and an end from the perspective of birth and death, their existence is proven to be beginningless (eternal) from the perspective of pure, general consciousness. Through these and other such logical arguments, the emperor firmly established the belief in the existence of the soul in the mind of that nihilistic minister. He then bid farewell to his family, handed over the kingdom to his son, and went to the Jinendra (Jain ascetic/Tirthankara) named Samadhigupta, where he embraced self-restraint and took the Jina-diksha (monastic vows) along with Suketu and the other kings.” || 93-95 ||
श्लोक ( Shlok ) 96
विशुद्धिपरिणामानामुत्तरोत्तरभाविनाम् । प्राप्य क्रमेण पर्यन्तं पर्यन्तं प्राप घातिनाम् ॥ ९६ ॥
उन्होंने अनुक्रमसे आगे-आगे होनेवाले विशुद्धि रूप परिणामोंकी पराकाष्ठाको पाकर घातिया कर्मोंका अन्त प्राप्त किया – घातिया कर्मोंका क्षय किया ॥ ९६ ।।
“By progressively attaining the absolute pinnacle of increasingly pure thought-activity (vishuddhi), he brought an end to the Ghatiya Karmas—completely destroying them.” || 96 ||
श्लोक ( Shlok ) 97
नवकेवललब्धीद्धविशुद्धव्याहृतीश्वरः । काले कायत्रयं हित्वा पदेऽभूत्पारमेश्वरे ॥ ९७ ॥
अब वे नव केवल-लब्धियोंसे देदीप्यमान हो उठा और विशुद्ध दिव्यध्वनिके स्वामी हो गये। जब अन्तिम समय आया तब औदारिक, तैजस और कार्मण इन तीन शरीरोंको छोड़कर परमेश्वर सम्बन्धी पदमें -सिद्ध क्षेत्रमें अधिष्ठित हो गये ॥ ९७ ॥
“Now, he shone radiantly with the nine supreme attainments of omniscience (Nava Kevala-Labdhi) and became the master of the pure, divine discourse (Divyadhvani). When his final moment arrived, he cast away the three bodies—the physical (Audarika), the luminous (Taijasa), and the karmic (Karmana)—and became established in the supreme, divine state at the realm of the liberated souls (Siddha Kshetra).” || 97 ||
श्लोक ( Shlok ) 98
उदयानोदयादस्य धरणीधरणीमुदः । तानवं तानवं किञ्चित्सम्पदं सम्पदं श्रितः ॥ ९८ ॥
अनेक मुकुटबद्ध राजाओसे हर्षित होनेवाले एवं उत्कृष्ट पद तथा सातिशय सम्पत्तिको प्राप्त हुए चक्रवर्ती पद्मके पुण्योदयसे शरीर सम्बन्धी कुछ भी कृशता उत्पन्न नहीं हुई थी ॥ ९८ ॥
“By virtue of the rise of his merit (punyodaya), Emperor Padma—who was surrounded and joyfully served by numerous crowned kings, and who had attained the highest sovereign status and extraordinary wealth—did not experience even the slightest physical emaciation or weakness.” || 98 ||
श्लोक ( Shlok ) 99
नापन्नापन्नभोगेन मामतो मामतोदयाः । सपद्माख्यः सपद्माख्यः सङ्गमः सङ्गमः सताम् ॥ ९९ ॥
“जिन्हें अनेक भोगोपभोग प्राप्त हैं ऐसे पद्म चक्रवर्तीको केवल लक्ष्मी ही प्राप्त नहीं हुई थी किन्तु कीर्तिके साथ-साथ अनेक अभ्युदय भी प्राप्त हुए थे। इस तरह लक्ष्मी सहित वे पद्म चक्रवर्ती सज्जनोंके लिए सत् पदार्थोंका समागम प्राप्त करानेवाले हौं ।॥ ९९ ॥
“Emperor Padma, who was endowed with endless objects of enjoyment and consumption, did not merely attain wealth and prosperity (Lakshmi); along with fame, he also achieved numerous spiritual and worldly elevations. May Emperor Padma, thus accompanied by prosperity, bring about the association with and attainment of pure, virtuous things for all righteous souls.” || 99 ||
श्लोक ( Shlok ) 100
मन्दराग इवोत्तुङ्गो मन्दरागोऽरिधारिणाम् । राजते राजतेजोभिर्नवमोऽनवमो मुदा ॥ १०० ॥
‘जो मन्दराचलके समान उन्नत थे- उदार थे, मन्दरागके धारक थे, राजाओंके योग्य तेजप्ते श्रेष्ठ थे, और चक्रवर्तियोंमें नौवें चक्रवर्ती थे ऐसे पद्म बड़े हर्षसे सुशोभित होते थे ।। १०० ।।
“Emperor Padma—who was as lofty and noble as Mount Mandarachala, who possessed immense detachment (or gentle passion), who excelled in the supreme, radiant splendor fitting for a king, and who was the ninth among the Chakravartis—shone brilliantly with great joy.” || 100 ||
श्लोक ( Shlok ) 101
प्रथममजनि राजा यः प्रजापालनामाशमितकरणवृत्त्या प्रान्तकल्पेश्वरोऽभूत् ।सवलभरतनाथः शर्मणः सद्म पद्मःपरमपदमवापत्सोऽमलं शं क्रियान्नः ॥ १०१ ॥
जो पहले प्रजापाल नामका राजा हुआ था, फिर इन्द्रियोंको दमन कर अच्युत स्वर्गका इन्द्र हुआ, तदनन्तर समस्त भरत क्षेत्रका स्वामी और अनेक कल्याणोंका घर पद्म नामका चक्रवर्ती हुआ, फिर परमपदको प्राप्त हुआ ऐसा चक्रवर्ती पद्म हम सबके लिए निर्मल सुख प्रदान करे ।। १०१ ।।
“May Emperor Padma—who in a previous life was the king named Prajapal, who then mastered his senses and became the Indra (celestial ruler) of the Achyuta heaven, who subsequently became the sovereign lord of the entire Bharat-Kshetra and the abode of countless blessings as the Chakravarti named Padma, and who finally attained the ultimate, supreme state of liberation (Moksha)—grant pure, unblemished bliss to us all.” || 101 ||
श्लोक 102 से 111
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