पर्व 49 – श्लोक 42 से 54 | श्लोक 55 से 59
श्री अभिनन्दनस्वामी का पुराण वर्णन पर्व 50 – श्लोक 1 से 11
English translation of Uttar Puran parv 50- shlok 12 to 22
श्लोक ( Shlok ) 12
तीर्थकृन्नाम सम्प्रापत् फलं कल्याणपञ्चकम् । येन तीर्थकरोऽयं स्यात् किं नाप्स्यन्ति मनस्विनः ॥ १२ ॥
सोलह कारण भावनाओंका चिन्तवन करनेसे उससे पञ्चकल्याणकरूपी फलको देनेवाले तीर्थंकर नामकर्म-बन्ध किया जिससे यह तीर्थकर होगा। सो ठीक ही है क्योंकि मनस्वी मनुष्योंको क्या नहीं प्राप्त होता ? ।। १२ ।।
By deeply contemplating the sixteen kāraṇa-bhāvanās, he bound the Tīrthaṅkara-nāma-karma—the cause that yields the fruit of the five auspicious events (pañca-kalyāṇakas)—whereby he was destined to become a Tīrthaṅkara. And rightly so; for what indeed is unattainable to resolute and high-minded souls? ॥ 12 ॥
श्लोक ( Shlok ) 13
आयुषोऽन्ते स संन्यस्य विजयेऽनुत्तरादिमे । त्रयस्त्रिशत्समुद्रायुरहमिन्द्रत्वमाययौ ॥ १३ ॥
आयुके अन्त में समाधिमरण कर वह विजय नाम के पहले अनुत्तर में तैंतीस सागरकी आयुवाला अहमिन्द्र हुआ ।। १३ ।।
At the end of his lifespan, having embraced samādhi-maraṇa, he was reborn as an Ahamindra in the first Anuttara heaven named Vijaya Heaven, endowed with a lifespan of thirty-three sāgaras. ॥ 13 ॥
श्लोक ( Shlok ) 14 –15
तत्रोक्तदेहलेश्याविद् गुण्योच्छ्वासादिसंयुतः । पञ्चशातसुखास्वादी भवान्ते शान्तमानसः ॥ १४ ॥ध्यायन् वैराग्यसम्पत्त्या तत्रास्थाद्भक्तितोऽर्हतः । कृत्स्नकर्मक्षयं कतु तस्मिन्नत्रागमिष्यति ॥ १५ ॥
विजय विमानमें जो शरीरकी ऊंचाई, लेश्या, अवधिज्ञानका क्षेत्र तथा श्वासोच्छ्वासादिका प्रमाण बतलाया है वह उन सबसे सहित था, पांचो इन्द्रियोंके सुखका अनुभव करता था, चित्त शान्त था, वैराग्यरूपी सम्पत्तिसे उपलक्षित हो भक्ति-पूर्वक अर्हन्त भगवान्का ध्यान करता हुआ वहां रहता था और आयुके अन्तमें समस्त कर्मों-का क्षय करनेके लिए इस पृथिवीतल पर अवतार लेगा ।। १४-१५ ।।
In that Vijaya-vimāna, he possessed in full measure the stature of body, the purity of leśyā, the range of avadhi-jñāna, and the regulation of breath as there described. Experiencing the pleasure of all five senses, with a tranquil mind and adorned by the wealth of detachment, he dwelt there absorbed in devout meditation upon the Arhant Lord.
And at the end of his lifespan, he would descend upon this earthly realm for the complete annihilation of all karmas ॥ 14–15 ॥
श्लोक ( Shlok ) 16 – 18
द्वीपेऽस्मिन् भारते वर्षे साकेतनगराधिपः । इक्ष्वाकुः काश्यपो वंशगोत्राभ्यामजुतोदयः ॥ १६ ॥राजा स्वयंवरो नान्ना सिद्धार्थाऽस्याग्रवल्लभा । षड्मासान् वसुधारादि-पूजामाप्नुवती सती ॥ १७ ॥वैशाखस्य सिते पक्षे षष्ठयां भे सप्तमे शुभे । स्वप्मेक्षानन्तर’ वक्त्रं विशन्तं वीक्ष्य सा गजम् ॥ १८ ॥
जब अवतार लेनेका समय हुआ तब इस जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्रमें अयोध्या नगरीका स्वामी इक्ष्वाकु वंशी काश्यपगोत्री तथा आश्चर्यकारी वैभवको धारण करनेवाला एक स्वयंवर नामका राजा था। सिद्धार्था उसकी पटरानी का नाम था। अहमिन्द्रके अवतार लेनेके छह माह पूर्वसे सिद्धार्थाने रत्नवृष्टि आदि पूजाको प्राप्त किया और वैशाख मासके शुक्लपक्षकी षष्ठी तिथिके दिन सातवें शुभ नक्षत्र (पुनर्वसु) में सोलह स्वप्न देखनेके बाद अपने मुखमें प्रवेश करता हुआ एक हाथी देखा। उसी समय वह अहमिन्द्र उसके गर्भमें आया ।। १६-१८ ।।
When the time for descent arrived, in the Bharata region of Jambudvipa there ruled at Ayodhya a king named Svayaṃvara, of the Ikṣvāku lineage and the Kāśyapa gotra, endowed with wondrous splendour. His chief queen was named Siddhārthā.
From six months prior to the descent of that Ahamindra, Siddhārthā began to receive divine honours such as showers of jewels. Then, on the sixth day of the bright fortnight of the month of Vaiśākha, under the auspicious seventh constellation Punarvasu Nakshatra, after beholding the sixteen dreams, she saw an elephant entering her mouth. At that very moment, the Ahamindra descended into her womb. ॥ 16–18 ॥
श्लोक ( Shlok ) 19
नृपात्स्वप्नफलैस्तुष्टा दिष्टथासूत तमुत्तमम् । माघे मास्यदितौ योगे धवलद्वादशीदिने ॥ १९ ॥
राजासे स्वप्नोंका फल सुनकर वह बहुत सन्तुष्ट हुई और माघ मासके शुक्ल पक्षकी द्वादशीके दिन अदिति योगमें उसने पुण्योदयसे उत्तम पुत्र उत्पन्न किया ।॥ १९ ॥
Having heard the auspicious interpretation of her dreams from the king, she became greatly delighted; and on the twelfth day of the bright fortnight of the month of Māgha, under the propitious Aditi Yoga, through the rise of merit, she gave birth to a noble son. ॥ 19 ॥
श्लोक ( Shlok ) 20 – 21
तत्प्रभावविशेषेण प्रकम्पितनिजासनः । त्रैलोक्येशसमुद्भूतिमवबुद्धयावधेः सुधीः ॥ २० ॥
उस पुत्रके प्रभावसे इन्द्रका ‘आसन कम्पायमान हो गया जिससे उस बुद्धिमान्ने अवधिज्ञानके द्वारा त्रिलोकीनाथका जन्म जान लिया ।। २० ।।
“By the extraordinary influence of that son, the throne of Indra trembled, whereby that wise being, through his clairvoyant knowledge (avadhi-jñāna), came to know of the birth of the Lord of the Three Worlds.”
श्लोक ( Shlok ) 21 -22
तं तदावाप्य देवेन्द्रः स्वदेव्या दिव्यमानवम् । देवावृतो द्रुतद्भावी देवाद्रौ दिव्यविष्टरे ॥ २१ ॥बालार्कसग्निभं बालं जलैः क्षीरापगापतेः । स्नापयित्वा विभूष्याख्यां प्रख्याप्यास्याभिनन्दनम् ॥ २२ ॥
इन्द्रने अपनी शचीदेवी द्वारा उस दिव्य मानवको प्राप्त किया और उसे लेकर देवोंसे आवृत हो शीघ्रतासे सुमेरु पर्वत पर पहुँचा। वहां दिव्य सिंहासनपर विराजमानकर बाल सूर्यके समान प्रभावाले बालकका क्षीरसागरके जलसे अभिषेक किया, आभूषण पहनाये और अभिनन्दन नाम रक्खा ।। २१-२२ ।।
“Indra received that divine being through his consort, Shachidevi, and accompanied by the gods, swiftly reached Mount Sumeru. There, having seated the child—who possessed a radiance like that of the rising sun—upon a divine throne, he performed the ceremonial bath (Abhisheka) using the waters of the Ocean of Milk, adorned him with ornaments, and gave him the name Abhinandan.” — [ 21-22]
श्लोक 23 से 31
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