श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
English translation of Uttar Puran parv 58- shlok 122 to 124
श्लोक ( Shlok ) 122
पुरेऽत्र कनकादिके प्रथितवान् सुषेणो नृपः ततोऽनु तपसि स्थितोऽजनि चतुर्दशस्वर्गभाक् । त्रिखण्डपरिपालकोऽभवदतो द्विपृष्ठाख्यया परिग्रहमहाभरादुपगतः क्षितिं सप्तमीम् ॥ १२२ ॥
राजा द्विपृष्ठ पहले इसी भरतक्षेत्रके कनकपुर नगरमें सुषेण नामका प्रसिद्ध राजा हुआ, फिर तपश्चरण कर चौदहवें स्वर्गमें देव हुआ, तदनन्तर तीन खण्डकी रक्षा करनेवाला द्विष्पृष्ठ नामका अर्धचक्री हुआ और इसके बाद परिग्रहके महान् भारसे मरकर सातवें नरक गया ।। १२२ ।।
King Dviṣpṛṣṭha Nārāyaṇa had formerly been the renowned King Suṣeṇa in the city of Kanakapura in this very Bharata-kṣetra. Thereafter, through the practice of austerities, he was reborn as a celestial in the fourteenth heaven; then again he became the half-Cakrin named Dviṣpṛṣṭha, protector of the three divisions of the earth; and after that, weighed down by the immense burden of worldly possessions, he died and descended into the seventh hell. ॥ 122 ॥
श्लोक ( Shlok ) 123
महापुरे वायुरथो महीपतिः प्रपद्य प्चारित्रमनुत्तरं ययौ । ततो बलो द्वारवतीपुरेऽचलस्त्रिलोकपूज्यत्वमवाप्य निर्वृतः ॥ १२३ ॥
बलभद्र, पहले महापुर नगरमें वायुरथ राजा हुआ, फिर उत्कृष्ट चारित्र प्राप्त कर उसी प्राणत स्वर्गके अनुत्तरविमानमें उत्पन्न हुआ, तद-नन्तर द्वारावती नगरी में अचल नामका बलभद्र हुआ और अन्तमें निर्वाण प्राप्त कर त्रिभुवनके द्वारा पूज्य हुआ ।। १२३ ॥
Balabhadra had formerly been King Vāyuratha in the city of Mahāpura; thereafter, having attained exalted conduct, he was reborn in the Anuttara vimāna of that very Prāṇata heaven. Subsequently, he became the Balabhadra named Acala in the city of Dvārāvatī; and in the end, attaining निर्वाण, he became worthy of reverence throughout the three worlds. ॥ 123 ॥
श्लोक ( Shlok ) 124
विख्यातविन्ध्यनगरेऽजनि विन्ध्यशक्ति-र्भान्त्वा चिरं भववने चितपुण्यलेशः । श्रीभोगवर्द्धनपुराधिपतारकाख्यः प्राप द्विष्टष्टरिपुरन्त्यमहीं ‘महांहाः ॥ १२४ ॥
प्रतिनारायण तारक, पहले प्रसिद्ध विन्ध्यनगर में विन्ध्यशक्ति नामका राजा हुआ, फिर चिरकाल तक संसार-वनमें भ्रमण करता रहा। कदाचित् थोड़ा पुण्यका संचय कर श्री भोगवर्द्धन नगरका राजा तारक हुआ और अन्तमें द्विपृष्ठनारायणका शत्रु होकर – उनके हाथसे मारा जाकर महापापके उदयसे अन्तिम पृथिवीमें नारकी उत्पन्न हुआ ॥ १२४ ॥
The Pratinārāyaṇa Tāraka had formerly been a king named Vindhyaśakti in the renowned city of Vindhyanagara. Thereafter, he wandered for a long time through the forest of saṃsāra. At length, having by chance accumulated a small measure of merit, he was born as King Tāraka of the illustrious city of Bhogavardhana; and finally, becoming the enemy of Dviṣpṛṣṭha Nārāyaṇa, he was slain by his hand and, through the fruition of immense sin, was reborn as a hell-being in the lowest earth. ॥ 124 ॥
इत्यार्षे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीते त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे वासुपूज्यजिनपतिद्विपृष्ठाचल-तारकपुराणं परिसमाप्तम् अष्टपञ्चाशत्तमं पर्व ॥ ५८ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहमें श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायणका वर्णन करनेवाला अट्ठावनवाँ पर्व पूर्ण हुआ ।
Thus ends the fifty-eighth parva, describing the venerable Vāsupūjya Jinendra, Dviṣpṛṣṭha Nārāyaṇa, Acala Balabhadra, and Tāraka Pratinārāyaṇa, in the illustrious Triṣaṣṭi-lakṣaṇa Mahāpurāṇa-saṃgraha, composed by the revered Ācārya Guṇabhadrācārya and renowned under the title “Ārṣa.”
विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन
पर्व 59 – श्लोक 1 से 13
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अजितनाथ तीर्थंकर तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ तीर्थकर पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ तीर्थंकर पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ भगवान् पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पुराण का वर्णन पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पुराण का वर्णन पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पुराण का वर्णन पर्व 56 – श्लोक 1 से 96
श्रेयांसनाथ तीर्थकर त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 57 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 62 | श्लोक 63 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 100
श्री वासुपूज्य जिनेन्द्र, द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण का वर्णन पर्व 58 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 32 | श्लोक 33 से 41 | श्लोक 42 से 53 | श्लोक 54 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 121
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