शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 | श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 361
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 362 to 371
श्लोक ( Shlok ) 362
नित्योत्सवाः निरातङ्का निर्बन्धा धनिकाः प्रजाः। निर्मला नित्यकर्माणो नियुक्ताः स्वासु वृतिषु ॥३६२॥
वहाँकी प्रजा नित्योत्सव थी अर्थात् उसमें निरन्तर उत्सव होते रहते थे, निरातङ्क थी उसमें किसी प्रकारकी बीमारी नहीं होती थी, निर्बन्ध थी हठ रहित थी, धनिक थी, निर्मल थी, निरन्तर उद्योग करती थी और अपने अपने कर्मोंमें लगी रहती थी ।। ३६२ ।।
The subjects of that place were constantly celebrating, meaning that festivities were continuously happening there; they were free from fear and anxiety, meaning they suffered from no illnesses or diseases; they were unrestrained yet free from stubbornness or obstinacy; they were wealthy, pure-hearted, continuously industrious, and always remained dedicated to their respective duties. || 362 ||
श्लोक ( Shlok ) 363
हास्तिनाख्या पुरी तस्य शुभा नाभिरिवाबभौ । भृशं देशस्य देहस्य महती मध्यवर्तिनी ॥ ३६३॥
जिस प्रकार शरीरके मध्यमें बड़ी भारी नाभि होती है उसी प्रकार उस कुरुजाङ्गल देशके मध्यमें एक हस्तिनापुर नामकी नगरी है ॥ ३६३ ॥
Just as there is a prominent navel at the center of the body, in the exact same manner, at the heart of that Kurujangala country, lies a magnificent city named Hastinapur. || 363 ||
श्लोक ( Shlok ) 364
भूरिनीरभवानेकप्रसू नोदितभूतिभिः । तिसृभिः परिखाभिस्तन्नगरं परिवेष्टितम् ॥ ३६४ ॥
अगाध जलमें उत्पन्न हुए अनेक पुष्पों-द्वारा जिनकी शोभा बढ़ रही है ऐसी तीन परिखाओंसे वह नगर घिरा हुआ था ।। ३६४ ॥
The city was encircled by three moats, whose beauty was enhanced by countless flowers blooming in their deep, boundless waters. || 364 ||
श्लोक ( Shlok ) 365
विभाति गोपुरोपेतद्वाराट्टालकपक्तिभिः । वप्रप्राकारदुर्लक्ष्यं मुरजैः कपिशीर्षकैः ॥ ३६५ ॥
धुलिके ढेर और कोटकी दीवारोंसे दुर्लङ्घय वह नगर गोपुरोंसे युक्त दरवाजों, अट्टालिकाओंकी पंक्तियों तथा बन्दरोंके शिर जैसे आकारवाले बुरजोंसे बहुत ही अधिक सुशोभित हो रहा था ।। ३६५ ।।
Rendered impassable by massive ramparts of earth and fortified city walls, that city looked extraordinarily magnificent with its grand gateway towers, long rows of palaces, and bastions shaped like the heads of monkeys. || 365 ||
श्लोक ( Shlok ) 366
इन्द्रको शैर्वृहद्यन्त्रैयुक्तं देवपथादिभिः । ‘महाक्षुद्राग्रिमद्वारैवींथिभिर्बहुभिश्च तत् ॥ ३६६ ॥
वह नगर, राज-मार्गमें ही मिलने वाले डरानेके लिए बनाये हुए हाथी, घोड़े आदिके चित्रों तथा बहुत छोटे दरवाजों वाली बहुत-सी गलियोंसे युक्त था ॥ ३६६ ॥
That city was filled with numerous narrow lanes featuring very small doors, as well as terrifying images of elephants, horses, and other creatures placed right along the main highways to strike fear into invaders. || 366 ||
श्लोक ( Shlok ) 367
राजमार्गा विराजन्ते सारवस्तुसमन्विताः । स्वर्गापवर्गमार्गाभाः सञ्चरच्चारुवृत्तयः ॥ ३६७ ॥
जो सार वस्तुओंसे सहित हैं तथा जिनमें सदाचारी मनुष्य इधरसे उधर टहला करते हैं ऐसे वहाँ के राजमार्ग स्वर्ग और मोक्षके मार्गके समान सुशोभित होते थे ।। ३६७ ।।
Abounding in valuable goods and continuously traversed by righteous, virtuous people, the main highways of that city shone with a splendor equal to the pathways leading to heaven and liberation. || 367 ||
श्लोक ( Shlok ) 368
न नेपथ्यादिभिर्भेदस्तद्भुवां सारवस्तुजैः । कुलजातिवयोवर्णवचोबोधादिभिभिदा ॥ ३६८ ॥
वहाँ उत्पन्न होनेवाले मनुष्योंमें श्रेष्ठ वस्तुओंसे उत्पन्न हुए नेपथ्य-वस्त्राभूषणादि से कुछ भी भेद नहीं था केवल कुल, जाति, अवस्था, वर्णं, वचन और ज्ञानकी अपेक्षा भेद था ।।३६८।।
Among the people born there, no distinction could be made based on their attire, ornaments, or dress, all of which were crafted from the finest and most excellent materials; the only distinctions that existed among them were with respect to their lineage, caste, age, community, speech, and wisdom. || 368 ||
श्लोक ( Shlok ) 369
तत्पुर्या सौधकूटाग्रबद्धध्वजनिरोधनात् । नातपस्य प्रवेशोऽस्ति विघनार्कदिनेष्वपि ॥ ॥ ३६९ ॥
उस नगरमें राजभवनों के शिखरोंके अग्रभाग पर जो ध्वजाएँ फहरा रही थीं उनसे रुक जानेके कारण जब सूर्यपर बादलोंका आवरण नहीं रहता उन दिनोंमें भी धूपका प्रवेश नहीं हो पाता या ।। ३६९ ॥
In that city, the flags fluttering atop the pinnacles of the royal palaces so completely obstructed the sky that even on days when there was no cloud cover over the sun, the sunbeams were unable to penetrate below. || 369 ||
श्लोक ( Shlok ) 370
पुष्पाङ्गरागधूपादिसौगन्ध्यान्धीकृतालिभिः । भ्रमन्द्भिस्तत्र खे प्रावृशङ्का गृहशिखण्डिनाम् ॥ ३७० ॥
पुष्प, अङ्गराग तथा धूप आदिकी सुगन्धिसे अन्धे होकर जो भ्रमर आकाशमें इधर-उधर उड़ रहे थे उनसे घरके मयूरोंको वर्षाऋतुकी शङ्का हो रही थी ।। ३७० ॥
Blinded by the intoxicating fragrance of flowers, scented body pastes, and incense, the swarms of bees flying here and there across the sky made the domestic peacocks mistake the scene for the arrival of the monsoon season. || 370 ||
श्लोक ( Shlok ) 371
रूपलावण्यकान्त्यादिगुणैर्युवतिभिर्युताः । युवानस्तैश्च तास्तत्र तदन्योन्यसुखावहाः ॥ ३७१ ॥
वहाँ रूप, लावण्य तथा कान्ति आदि गुणोंसे युक्त युवक युवतियोंके साथ और युवतियों युवकों के साथ रहती थीं तथा परस्पर एक दूसरेको सुख पहुँचाती थीं ।॥ ३७१ ॥
There, endowed with exceptional beauty, charm, and radiance, young men lived in the company of young women, and young women in the company of young men, bringing mutual happiness and joy to one another. || 371 ||
श्लोक 372 से 381
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