विमलनाथ तीर्थंकर, धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधरका वर्णन पर्व 59 – श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171
English translation of Uttar Puran parv 59- shlok 172 to 181
श्लोक ( Shlok ) 172
एतानि सन्ति मे नैव ममैतानीति शुद्धधीः । स्वरत्नान्येव सत्योक्तिर्जग्राहोत्काग्रणीः सताम् ॥ १७२ ॥
इनमें ये रत्न मेरे नहीं हैं और ये मेरे हैं इस तरह कहकर सच बोलने-वाले, शुद्धबुद्धिके धारक तथा सज्जनोंमें श्रेष्ठ भद्रमित्रने अपने ही रत्न ले लिये ।। १७२ ।।
“These gems are not mine, and these are,” said Bhadramitra. Thus, by speaking the absolute truth, the pure-minded and noble Bhadramitra took only what belonged to him. [172]
श्लोक ( Shlok ) 173
सन्तुष्य भूपतिस्तस्मै सत्यघोषाङ्कसङ्गतम् । ज्येष्ठं श्रेष्ठिपदं मद्रमित्रायादित वेदिता ॥ १७३ ॥
यह जानन कर राजा बहुत ही संतुष्ट हुए और उन्होंने भद्रमित्रके लिए सत्यघोष नामके साथ अत्यन्त उत्कृष्ट सेठका पद दे दिया- भद्रमित्रको राजश्रेष्ठी बना दिया और उसका ‘सत्यघोष’ उपनाम रख दिया ॥ १७३ ।।
Learning this, the King was deeply satisfied. He conferred upon Bhadramitra the prestigious position of Chief Merchant and bestowed upon him the title of “Satyaghosha” (one whose voice is truth), making him the official Royal Merchant. [173]
श्लोक ( Shlok ) 174
सत्यघोषो मृषावादी पापी पापं समाचरन् । धर्माधिकरणोक्तेन दण्ड्यतामिति भूभुजा ॥ १७४ ॥
सत्यघोष मंत्री झूठ बोलनेवाला है, पापी है तथा इसने बहुत पाप किये हैं इसलिए इसे दण्डित किया जावे इस प्रकार धर्माधिकारियोंके कहे अनुसार राजाने उसे दण्ड दिये जानेकी अनुमति दे दी ॥ १७४ ॥
“The minister Satyaghosha is a liar and a sinner who has committed many transgressions; therefore, he must be punished.” Following this counsel from the legal authorities, the King granted his permission for the minister to be penalized. [174]
श्लोक ( Shlok ) 175 – 176
प्रेरितास्तेन मार्गेण सर्वस्वहरणं तथा । चपेटा वज्रमुष्टाख्यमल्लस्य त्रिंशदूर्जिताः ॥ १७५ ॥कांस्यपात्रत्रयापूर्णनवगोमयभक्षणम् । इति त्रिविधदण्डेन न्यगृह्णन् पुररक्षकाः ॥ १७६ ॥
इस प्रकार राजाके द्वारा प्रेरित हुए नगरके रक्षकोंने श्रीभूति मंत्रीके लिए तीन दण्ड निश्चित किये – १ इसका सब धन छीन लिया जावे, २ वज्रमुष्टि पहलवानके मजबूत तीस घूंसे दिये जावें, और ३ कांसेकी तीन थालोंमें रखा हुआ नया गोबर खिलाया जावे, इस प्रकार नगर के रक्षकोंने उसे तीन प्रकारके दण्डोंसे दण्डित किया ।। १७५-१७६ ॥
“The city guards, acting on the King’s orders, determined three specific punishments for Minister Shribhuti: 1) all of his wealth shall be confiscated, 2) he shall be struck with thirty powerful punches by the wrestler Vajramushti, and 3) he shall be forced to eat fresh cow dung served in three bronze plates. In this manner, the guardians of the city penalized him with these three forms of punishment.” [175–176]
श्लोक ( Shlok ) 177
नृपेऽनुवन्धवैरः सन् मृत्वार्सध्यानदूषितः । द्विजिह्वोऽगन्धनो नाम भाण्डागारेऽजनिष्ट सः ॥ १७७॥
श्रीभूति राजाके साथ बैर बाँधकर आर्तध्यानसे दूषित होता हुआ मरा और मरकर राजाके भाण्डारमें अगन्धन नामका साँप हुआ ।। १७७ ।।
“Nursing a deep-seated enmity toward the King and with his mind corrupted by Artadhyana (anguished and vengeful meditation), Shribhuti died. Upon his death, he was reborn as a venomous serpent named Agandhana in the King’s treasury.” [177]
श्लोक ( Shlok ) 178
अन्यायेनान्यवित्तस्य स्वीकारश्चौर्यमुच्यते । नैसर्गिकं निमित्तोत्थं तदेवं द्विविधं स्मृतम् ॥ १७८ ॥
अन्यायसे दूसरेका धन ले लेना चोरी कहलाती है वह दो प्रकारकी मानी गई है एक जो स्वभाव से ही होती और दूसरी किसी निमित्तसे ॥ १७८ ॥
“Taking the wealth of another through unjust means is called theft. It is considered to be of two types: one that arises from one’s inherent nature, and the other which is prompted by some external cause or circumstance.” [178]
श्लोक ( Shlok ) 179 – 180
आद्यमाजन्मनो लोभनिकृष्टस्पर्द्धकोदयात् । सत्यप्यर्थे गृहे स्वस्य कोटीकोव्यादिसङ्ख्यया ॥ १७९ ॥न चौर्येण विना तोषः सत्याये सति च व्यये । तद्वतस्तादृशो भावः सर्वेषां वा क्षुधादितः ॥ १८० ॥
जो चोरी स्वभावसे होती है वह जन्मसे ही लोभ कषायके निकृष्ट स्पर्द्धकोंका उदय होनेसे होती है। जिस मनुष्यके नैसर्गिक चोरी करने-की आदत होती है उसके घरमें करोड़ोंका धन रहने पर भी तथा करोड़ोंका आय-व्यय होने पर भी चोरीके बिना उसे संतोष नहीं होता। जिस प्रकार सबको क्षुधा आदिकी बाधा होती है उसी प्रकार उसके चोरीका भाव होता है ।। १७९-१८० ।।
“The theft that arises from one’s inherent nature occurs due to the manifestation of the lowest degrees of greed-passions from birth. A person with an innate habit of stealing finds no contentment without theft, even if their home contains millions in wealth and their income and expenses run into the millions. Just as everyone experiences the urge of hunger, such a person experiences the constant impulse to steal.” [179–180]
श्लोक ( Shlok ) 181
‘स्त्रीसुतादिव्ययाशक्तेर्विनार्थादितरद्भवेत् । तच्च लोभोदयेनैव दुर्विपाकेन केनचित् १८१ ॥
जब घरमें स्त्री-पुत्र आदिका खर्च अधिक होताहै और घरमें धनका अभाव होता है तब दूसरी तरहकी चोरी करनी पड़ती है वह भी लोभ कषाय अथवा किसी अन्य दुष्कर्म के उदयसे होती है ।। १८१ ।।
“When the expenses for one’s wife, children, and household increase and there is a scarcity of wealth at home, one resorts to the second type of theft. This, too, occurs due to the rise of greed-passions or some other past demerit.” [181]
श्लोक 182 से 191
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