अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 65- shlok 185 to 192
श्लोक ( Shlok ) 185
तावुभाविव चन्द्राकौं संयुक्तौ लोकपालकौ । स्वप्रभाक्रान्तदिक्चक्रौ पालयित्वा चिरं धराम् ॥ १८५ ॥
सूर्य चन्द्रमाके समान अथवा मिले हुए दो लोकपालोंके समान वे दोनों अपनी प्रभासे दिङ्मण्डलको व्याप्त करते हुए चिरकाल तक पृथिवीका पालन करते रहे ।। १८५ ॥
“Like the sun and the moon, or like two Guardians of the Quarters united, those two, illuminating all directions with their brilliance, protected the Earth for a very long time.”185
श्लोक ( Shlok ) 186
अविभक्तश्रियौ प्रीतिं परमां प्रापतुः पृथक् । व्याप्तचक्षुर्विशेषौ वा रम्यैकविषयेप्सणौ ॥ १८६ ॥
वे दोनों ही भाई बिना बाँटी हुई लक्ष्मीका उपभोग करते थे, परस्परमें परम प्रीतिको प्राप्त थे और ऐसे जान पड़ते थे मानो किसी एक मनोहर विषयको देखते हुए अलग-अलग रहनेवाले दो नेत्र ही हों ।। १८६ ॥
“Both the brothers enjoyed their undivided fortune together, sharing the highest mutual affection; they appeared just like two eyes that, while looking at a single beautiful object, remain distinct from each other.” 186
श्लोक ( Shlok ) 187
तयोर्भवत्रयायात परस्परसमुद्भवात् । प्रेम्णस्तृप्तेरयान्नांशमपि तृप्तिर्नृपत्वजा४ ॥ १८७ ॥
उन दोनोंकी राज्यसे उत्पन्न हुई तृप्ति, तीन भवसे चले आये पारस्परिक प्रेमसे उत्पन्न होनेवाली तृप्तिके एक अंशको भी नहीं प्राप्त कर सकी थी। भावार्थ -उन दोनोंका पारस्परिक प्रेम राज्य-प्रेमसे कहीं अधिक था ।।१८७॥
“The satisfaction they derived from ruling the kingdom could not match even a fraction of the fulfillment born from their mutual love, which had continuously flowed across three lifetimes.”
Purport (भावार्थ): Their mutual affection for each other was vastly superior to their love for power or the kingdom.187
श्लोक ( Shlok ) 188 – 189
पुण्डरीकने चिरकाल तक भोग भोगे और उनमें अत्यन्त आसक्तिके कारण नरककी भयंकर आयुका बन्ध कर लिया। वह बहुत आरम्भऔर परिग्रहका धारक था, अन्तमें रौद्र ध्यानके कारण उसकी मिथ्यात्व रूप भावना भी जागृत हो उठी जिससे मर कर वह पापोदयसे तमःप्रभा नामक छठवें नरकमें प्रविष्ट हुआ ॥ १८८-१८९ ॥
“Pundarika enjoyed worldly pleasures for a very long time, and owing to his intense attachment to them, he bound himself to a dreadful lifespan in hell. He possessed vast undertakings and worldly attachments; ultimately, due to wrathful contemplation (Raudra Dhyana), his deluded worldview (Mithyatva) was also awakened. Consequently, upon his death, the fruition of his sins led him into the sixth hell, named Tamahprabha.”) 188 – 189
श्लोक ( Shlok ) 190
हलभृत्तद्वियोगेन जातनिर्वेग ‘सारथिः । शिवघोषयतिं प्राप्य संयमं प्रत्यपद्यत ॥ १९० ॥
उसके वियोगसे नन्दिक्षेण बलभद्रको बहुत ही वैराग्य उत्पन्न हुआ उससे प्रेरित हो उसने शिवघोष नामक मुनिराजके पास जाकर संयम धारण कर लिया ॥ १९० ॥
“Deeply grieved by his separation, Balabhadra Nandishena was filled with profound detachment from the world (Vairagya). Driven by this detachment, he approached the great ascetic Shivaghosha and embraced self-restraint (Sanyama).”190
श्लोक ( Shlok ) 191
स बाह्याभ्यन्तरं शुद्धं तपः कृत्वा निराकुलः । मूलोत्तराणि कर्माणि निर्मूल्यावाप निर्वृतिम् ॥ १९१ ॥
उसने निर्द्वन्द्व होकर बाह्य और आभ्यन्तर दोनों प्रकारका शुद्ध तपञ्चरण किया और कर्मोंकी मूलोत्तर प्रकृतियोंका नाश कर मोक्ष प्राप्त किया ॥ १९१ ॥
“Free from all dualities and conflicts, he practiced pure austerities—both external and internal—and by completely destroying the primary and secondary natures of karmas, he attained liberation (Moksha).”191
श्लोक ( Shlok ) 192
जातौ तृतीयजनने धरणीशपुत्रौ पश्चात्सुरौ प्रथमकल्पगतावभूताम् । श्रीनन्दिषेणहलभृत्सुनिशुम्भशत्रुःषष्ठस्त्रिखण्डधरणीट्सु च पुण्डरीकः ॥ १९२ ॥
ये दोनों ही तीसरे भवमें राजपुत्र थे, फिर पहले स्वर्गमें देव हुए, तदनन्तर एक तो नन्दिषेण बलभद्र हुआ और दूसरा निशुम्भ प्रतिनारायणका शत्रु पुण्डरीक हुआ । यह तीन खण्डके राजाओं- नारायणोंमें छठवाँ नारायण था ॥ १९२ ॥
“In their third previous birth, both of them were princes; subsequently, they were born as celestial beings in the first heaven. Thereafter, one of them became Balabhadra Nandishena, while the other became Pundarika, the enemy of the Pratinarayana Nishumbha. This Pundarika was the sixth Narayana among the Narayanas who rule over the three realms.” 192
इत्यार्षे त्रिषष्टिलक्षणमहापुराणसंग्रहे भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीतेऽरतीर्थंकरचक्रधर-सुभौम चक्रवर्तिनन्दि-घेणबलदेव-पुण्डरीकार्द्धचक्रवतिनिशुम्भनामप्रतिशत्रुपुराणं परिसमाप्तं पञ्चषष्टितनं पर्व ॥ ६५ ॥
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध भगवद्गुणभद्राचार्यप्रणीत त्रिषष्टि लक्षण महापुराण संग्रह में अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायणके पुराणका वर्णन करनेवाला पैंसठवाँ पर्व समाप्त हुआ ।।
“Thus concludes the sixty-fifth chapter, which describes the puranas (venerable accounts) of Tirthankara-Chakravarti Aranath, Chakravarti Subhauma, Balabhadra Nandishena, Narayana Pundarika, and Pratinarayana Nishumbha, in the ‘Trishashti-Lakshana-Mahapurana-Sangraha’ composed by the venerable Acharya Gunabhadra and celebrated by the name Arsha.”
मल्लिनाथ तीर्थकर, पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण के पुराण का वर्णन
पर्व 66 – श्लोक 1 से 13
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अरनाथ तीर्थकर चक्रवर्ती, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 65 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 21 | श्लोक 22 से 34 | श्लोक 35 से 50 | श्लोक 51 से 64 | श्लोक 65 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 117 | श्लोक 118 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 184
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