अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431 | श्लोक 432 से 440 | श्लोक 441 से 453 | श्लोक 454 से 463 | श्लोक 464 से 475
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 476 to 485
श्लोक ( Shlok ) 476
सहासो विद्यते नान्यद्विधा तु सुखदुःखयोः । प्राणिनां प्राक्तनं कर्म मुक्त्वास्मिन्मूल कारणम् ॥ ४७६ ॥
ब्राह्मण-पुत्रकी बात सुन, श्रावक हँसता हुआ कहने लगा कि जीवोंको जो सुख-दुःख होता है उसमें उनके पूर्वकृत कर्मको छोड़कर और कुछ मूल कारण नहीं है ॥ ४७६ ॥
“Hearing the words of the Brahmin’s son, the Shravak replied with a smile, ‘Except for the past karmas bound by living beings, there is no other root cause for the happiness or misery they experience.'” [476]
श्लोक ( Shlok ) 477 – 478
श्रेयोऽवाप्तुं ततो यत्नं तपोदानादिकर्मभिः । कुरु त्वं मतिमन्मौख्यं हित्वा दैवनिबन्धनम् ॥ ४७७ ॥ देवाः खलु सहायत्वं यान्ति पुण्यवतां नृणाम् । अन ते किञ्चित्कराः पुण्यविलये भृत्यसन्निभाः ॥४७८॥
इसलिए तू तप दान आदि सत्कार्योंके द्वारा पुण्य प्राप्त करनेका प्रयत्न कर और हे बुद्धिमन् ! इस देवविषयक मूढ़ताको छोड़ दे। निश्चयसे देवता पुण्यात्मा मनुष्योंकी ही सहायता करते हैं वे भृत्यके समान हैं और पुण्य क्षीण हो जानेपर किसीका कुछ भी नहीं कर सकते हैं ।॥ ४७७-४७८ ॥
“‘Therefore, strive to accumulate merit (Punya) through righteous deeds such as austerities (Tapa) and charity (Dana), and O wise one, abandon this delusion regarding false deities (Deva-mudhata).
In truth, deities assist only those human beings who are meritorious; they are like servants and can do nothing for anyone once their merit is exhausted.’” [477-478]
श्लोक ( Shlok ) 479
इत्युक्त्वास्तद्विजोद्भूतदैवमूख्यस्ततः क्रमात् । श्रावकस्तेन विप्रेण गङ्गातीरं समागमत् ॥ ४७९ ॥
इस प्रकार कहकर श्रावकने उस ब्राह्मणकी देवभूढता दूर कर दी। तदनन्तर अनुक्रमसे उस ब्राह्मणके साथ चलता हुआ श्रावक गङ्गा नदी के किनारे पहुँचा ॥ ४७९ ॥
“Saying this, the Shravak dispelled that Brahmin’s delusion regarding false deities (Deva-mudhata). Thereafter, continuing to walk alongside the Brahmin in due course, the Shravak reached the banks of the river Ganges.” [479]
श्लोक ( Shlok ) 480
बुभुक्षुस्तन्त्र विप्रौऽसौ मणिगङ्गाख्यमुत्तमम् । तीर्थमेतदिति स्नात्वा तीर्थमूढं समागमत् ॥ ४८० ॥
भूख लगनेपर उस ब्राह्मणने ‘यह मणिगङ्गा नामका उत्तम तीर्थ है’ यह समझकर वहाँ स्नान किया और इस तरह वह तीर्थमूढताको प्राप्त हुआ ॥ ४८० ॥
“Feeling hungry, that Brahmin, thinking, ‘This is the supreme holy pilgrimage site named Mani-Ganga,’ took a bath there, and in this manner, he fell into the delusion regarding false places of pilgrimage (Teertha-mudhata).” [480]
श्लोक ( Shlok ) 481 – 485
तदनन्तर जब वह ब्राह्मण भोजन करनेकी इच्छा करने लगा तब उस श्रावकने पहले स्वयं भोजनकर अपनी जूठनमें गङ्गाका जल मिला दिया और हितका उपदेश देनेके लिए यह कहते हुए उसे दिया कि ‘यह पवित्र है तुम खाओ’। यह देख ब्राह्मणने कहा कि ‘मैं तुम्हारी जूठन कैसे खाऊँ’ ? क्या तुम मेरी विशेषता नहीं जानते ? ब्राह्मणकी बात सुनकर श्रावक कहने लगा कि तीर्थजल यदि आज जूठनका दोष दूर करनेमें समर्थ नहीं है तो फिर पाप रूप मलको दूर हटानेमें समर्थ कैसे हो सकता है ? इसलिए तू अकारण तथा मूर्ख जनोंके द्वारा विश्वास करने योग्य इस मिथ्या वासनाको छोड़ दे कि जलके द्वारा पाप धोया जा सकता है। यदि जलके द्वारा पाप धोये जाने लगे तो फिर व्यर्थ ही तप तथा दान आदिके करनेसे क्या लाभ है ? ।।४८१-४८५।।
“Thereafter, when the Brahmin desired to have his meal, the Shravak ate his own food first, mixed the water of the Ganges into his leftovers, and offered it to him to impart a beneficial lesson, saying, ‘This is pure; eat it.’
Seeing this, the Brahmin replied, ‘How can I eat your leftovers? Do you not know my high status?’
Hearing the Brahmin’s words, the Shravak began to say, ‘If the holy water of this pilgrimage site is not capable of removing the impurity of leftovers today, then how can it be capable of removing the stain of sin? Therefore, abandon this false belief—which is baseless and trusted only by foolish people—that sin can be washed away by water. If sins could indeed be washed away by water, then what would be the benefit of performing austerities (Tapa) and charity (Dana) in vain?'” [481-485]
श्लोक 486 से 502
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