चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 75- shlok 102 to 113
श्लोक ( Shlok ) 102
नानालङ्काररम्योक्तिसुप्रसन्नसुभाषितैः । विशिष्टननचेतस्सु प्रह्लादमुदपादयत् ॥ १०२ ॥
वह नाना अलंकारोंसे मनोहर वचनों तथा प्रसादगुण पूर्ण सुभाषितोंसे विशिष्टमनुष्योंके हृदयों में आह्लाद उत्पन्न कर देता था ।॥ १०२ ॥
With words made captivating by various figures of speech (alankaras) and excellent sayings full of clarity and lucidity (prasada-guna), he used to generate immense delight in the hearts of distinguished men. [102]
श्लोक ( Shlok ) 103 – 104
तत्रैवारक्षिपुत्रेण दृढरक्षेण संगतिम् । कृत्वा तत्पुरशिष्टानां शास्त्रव्याख्यानकर्मणा ॥ १०३ ॥उपाध्यायत्वमध्यास्य तत्राप्तवसुना निजाम् । जननीं स्वस्वसारञ्च स्वयञ्च ‘परिपोषयन् ॥ १०४ ॥
वहाँ के कोटपालके पुत्र दृढरक्षके साथ मित्रताकर उसने उस नगरके शिष्ट मनुष्योंको शास्त्रोंकी व्याख्या सुनाई जिससे उपाध्याय पद प्राप्तकर बहुत-सा धन कमाया तथा अपनी माता, बहिन और अपने आपको पोषण किया ॥ १०३-१०४ ॥
Forming a friendship with Dridharaksha, the son of the city’s chief guard (Kotwal), he recited expositions of the scriptures to the distinguished citizens of that city. Through this, he attained the rank of a preceptor (Upadhyaya), earned a vast amount of wealth, and supported his mother, his sister, and himself. [103-104]
श्लोक ( Shlok ) 105
स्वमातुलानीपुत्राय नन्दिग्रामनिवासिने । कुलवाणिजनान्ने स्वामनुजामदितादात् ॥ १०५ ॥
नन्दी नामक गाँवमें रहने वाले कुलवाणिज नामके अपनी मामीके पुत्रके साथ उसने बड़े आदरसे अपनी छोटी बहिनका विवाह कर दिया ॥ १०५ ॥
With great respect, he married off his younger sister to his maternal aunt’s son, a man named Kulavanija, who lived in a village called Nandi. [105]
श्लोक ( Shlok ) 106
स कदाचिदुपश्लोकपूर्वकं क्षितिनायकम् । विलोक्य तत्प्रसादाप्त सम्मानधनसम्मदः ॥ १०६ ॥
किसी एक दिन उसने बहुतसे श्लोक सुनाकर राजाके दर्शन किये और राजाकी प्रसन्नतासे बहुत भारी सम्मान, धन तथा हर्ष प्राप्त किया ॥ १०६ ॥
One day, he visited the king and recited numerous verses before him, receiving immense honor, wealth, and joy as a result of the king’s pleasure. [106]
श्लोक ( Shlok ) 107 – 108
कृतमातृपरिप्रश्नः पितुरागत्य सन्निधिम् । प्रणमत्तत्पदाम्भोजं धनदेवः समीक्ष्य तम् ॥ १०७ ॥जीव पुत्रात्र तिष्ठेति प्रियैः प्रीणयति स्म सः । सोऽपि रत्नादितद्वस्तुभागं देहीत्ययाचत ॥ १०८॥
किसी एक दिन मातासे पूछकर वह अपने पिताके पास आया और उनके चरण-कमलोंको प्रणामकर खड़ा हो गया। सेठ धनदेवने उसे देखकर ‘हे पुत्र चिरंजीव रहो, यहाँ बैठो’ इत्यादि प्रिय वचन कहकर उसे सन्तुष्ट किया। तदनन्तर नागदत्तने अपने भागकी रत्नादि वस्तुएं माँगी ॥ १०७-१०८।।
One day, after asking his mother for permission, he went to his father, bowed down at his lotus-like feet, and stood before him. Upon seeing him, the merchant Dhandeva pleased him with affectionate words, saying, “O son, may you live long, please sit here,” and so forth. Thereafter, Nagadatta demanded his rightful share of the ancestral wealth, including gems and other valuables. [107-108]
श्लोक ( Shlok ) 109 – 113
पिता तु पुत्र मद्वस्तु पलाशद्वीपमध्यगे । ‘स्थितं पुरे पलाशाख्ये तत्त्वयानीय गृह्यताम् ॥ १०९ ॥इत्याख्यन्नकुलेनामा भ्रात्रा दायादकेन सः । सहदेवेन चाप्तेष्टसिद्धिर्यदि भवेदहम् ॥ ११० ॥प्रत्यागत्य करिष्यामि पूजां जैनेश्वरीमिति । आशास्यानु जिनानुत्वा कृतात्मगुरुवन्दनः ४ ॥ १११ ॥आरुह्य नावमम्भोधिमवगाह्य ब्रजन् द्रुतम् । पलाशपुरमासाद्य तत्र स्थापितपोतकः ॥ ११२ ॥पुरं “विनरसञ्चारं किमेतदिति विस्मयात् । ततः प्रसारितायामिरज्जुभिस्तदवाप्तवान् ॥ ११३ ॥
इसके उत्तर में पिताने कहा कि ‘हे पुत्र मेरी सब वस्तुएं पलाशद्वीपके मध्यमें स्थित पलाश नामक नगर में रखी हैं सो तू लाकर ले ले’। पिताके ऐसा कहनेपर वह अपने हिस्सेदार नकुल और सहदेव नामक भाइयोंके साथ नावपर बैठकर समुद्रके भीतर चला। चलते समय उसने यह आकांक्षा प्रकट की कि यदि मेरी इष्टसिद्धि हो गई तो मैं लौटकर जिनेन्द्रदेवकी पूजा करूँगा। ऐसी इच्छाकर उसने बार-बार जिनेन्द्र भगवान्की स्तुति की और पिताको नमस्कारकर चला। वह चलकर शीघ्र ही पलाशपुर नगरमें जा पहुँचा। वहाँ उसने अपना जहाज खड़ाकर देखा कि यह नगर मनुष्यों के संचारसे रहित है। यह देख वह आश्चर्य करने लगा कि यह नगर ऐसा क्यों है ? तदनन्तर लम्बी रस्सी फेंककर उनके आशयसे वह उस नगरके भीतर पहुँचा ।। १०९-११३ ॥
In response, the father said, “O son, all my valuables are kept in the city called Palasha, located in the middle of Palashadvipa. Go there, retrieve them, and take them.” Upon hearing his father’s words, he boarded a boat and set out into the ocean along with his brothers named Nakula and Sahadeva, who were his partners. At the time of departure, he made a solemn vow: “If my desired goal is successfully accomplished, I shall return and worship Lord Jinendra.” With this desire in mind, he repeatedly offered praises to Lord Jinendra, bowed down to his father, and departed.
Traveling swiftly, he soon reached the city of Palashapura. After anchoring his ship there, he observed that the city was completely devoid of human movement. Seeing this, he began to wonder in astonishment as to why the city was in such a state. Thereafter, by throwing a long rope, he used it according to his plan to enter inside that city. [109-113]
श्लोक 114 से 122
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चन्दना आर्यिका और जीवन्धर स्वामीका चरित वर्णन पर्व 75 – श्लोक 1 से 12 | श्लोक 13 से 25 | श्लोक 26 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 63 | श्लोक 64 से 72 | श्लोक 73 से 81 | श्लोक 82 से 94 | श्लोक 95 से 101
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