राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 485 to 493
श्लोक ( Shlok ) 485 – 491
विस्तरेण किमुक्तेन नेष्यत्येनो महातमः । आस्तां तावददो भावि शापैः शीलालयस्त्रियः ॥ ४८५ ॥अलमामूलतो दग्धुं कुलं क्रोधविधायिनाम् । नानिच्छन्तीं प्रतीच्छामीत्येकमेव तव व्रतम् ॥ ४८६ ॥पोतभूतं भवाब्धि ‘तत्तरितुं किं विनाशयेः । प्राणैरपि यशः क्रेयं सतां प्राणैश्च तेन च ॥ ४८७ ॥पापं कल्पान्तरस्थायि क्रीणास्यज्ञोऽयशश्च धिक । कस्येयं दुहिता सीता किं तन्न ज्ञायते त्वया ॥४८८ ॥सुज्ञानमप्यविज्ञेयं कामव्यामुग्धमानसैः । अत्यौत्सुक्यमनाप्तेषु प्राप्तेषु परितोषणम् ॥ ४८९ ॥ भुज्यमानेषु वैरस्यं विषयेषु न वेत्सि किम् । अयोग्यायामनाथायां नाशहेतौ वृथा रतिम् ॥ ४९० ॥मा कृथाः पापटुःखापलेपभाक् परयोषिति । आदेशः कीदृशः सोऽपि स्मार्यो वा भाविवेदिनाम् ॥४९१॥
अधिक विस्तारके साथ कहनेमें क्या लाभ है ? यह पाप आपको सातवें नरक ले जावेगा। अथवा इसे जाने दो, यह पाप पर भवमें दुःख देगा परन्तु शीलकी भाण्डारभूत स्त्रियाँ अपने प्रति क्रोध करनेवालोंके कुलको शापके द्वारा इसी भवमें आमूल नष्ट करनेके लिए समर्थ रहती हैं। आपने व्रत लिया था कि जो स्त्री मुझे नहीं चाहेगी मैं उसे नहीं चाहूंगा। आपका यह एक व्रत ही आपको संसाररूपी समुद्रसे पार करनेके लिए जहाजके समान है इसे क्यों नष्ट कर रहे हो? सज्जन पुरुषोंको प्राण देकर यश खरीदना चाहिए परन्तु आप ऐसे अज्ञानी हैं कि प्राण और यश देकर दूसरे कल्प काल तक टिकनेवाला पाप तथा अपयश खरीद रहे हैं अतः आपके लिए धिक्कार है। यह सीता किसकी पुत्री है यह क्या आप नहीं जानते ? ठीक ही है जिनका चित्त कामसे मोहित रहता है उनके लिए जानी हुई बात भी नहीं जानीके समान होती है। क्या आप यह नहीं जानते कि ये पश्चेन्द्रियोंके विषय जबतक प्राप्त नहीं हो जाते तब तक इनमें उत्सुकता रहती है, प्राप्त हो जानेपर सन्तोष होने लगता है, और जब इनका उपभोग कर चुकते हैं तब नीरसता आ जाती है। इसलिए अयोग्य, अनाथ, विनाशका कारण, पाप और दुःखका सञ्चय करनेवाली परस्त्री में व्यर्थका प्रेम मत कीजिए । भविष्यत्की बात जाननेवाले निमित्तज्ञानियोंने कैसा आदेश दिया था- क्या कहा था इसका भी आपको स्मरण करना चाहिए ।। ४८५-४९१ ।।
“What is the use of speaking at greater length? This sin will drag you down to the seventh hell. Or let that be—this sin will bring misery in the next life, but women who are storehouses of chastity (sheel) possess the power to utterly destroy, by their curse, the entire lineage of those who offend them in this very life. You had taken a vow that you would not desire a woman who does not desire you. This single vow of yours is like a ship to carry you across the ocean of worldly existence; why are you destroying it? Righteous men should purchase fame even at the cost of their lives, yet you are so ignorant that you are sacrificing both life and honor to purchase sin and infamy that will endure until the next cosmic cycle (kalpa); therefore, shame upon you!
Do you not know whose daughter this Sita is? It is only true that for those whose minds are infatuated with lust, even a known fact becomes as though unknown. Do you not know that these pleasures of the five senses evoke eagerness only until they are acquired, bring a sense of satisfaction upon being acquired, and turn completely flavorless once they have been consumed? Therefore, do not harbor futile love for another man’s wife—an act which is improper, leaves one helpless, causes destruction, and accumulates sin and sorrow. You must also recall what the astrologers (nimittajnanis), who foresee the future, had prophesied and warned you about.” [485-491]
श्लोक ( Shlok ) 492 – 493
चक्रस्य परिपाकं च प्रादुर्भूतं च भावय । बलानामष्टमं रामं लक्ष्मणं चार्द्धचक्रिणाम् ॥ ४९२ ॥ आमनन्ति पुराणज्ञाः प्राज्ञ तच्च विचिन्तय । यादृग्नार्पयतो दोषस्तादृगर्पयतस्तथा ॥ ४९३ ॥
तथा चक्र उत्पन्नके फलका भी विचार कीजिए। पुराणोंके जाननेवाले रामको आठवाँ बलभद्र और लक्ष्मणको नौवाँ नारायण कहते हैं। हे विद्वन् ! आप इसका भी विचार कीजिए । सीताको नहीं सौंपनेमें जैसा दोष है वैसा दोष उसके सौंपनेमें नहीं है ।। ४९२-४९३ ॥
“Furthermore, reflect upon the consequence of the appearance of the discus (Chakra). Those well-versed in the Puranas declare Rama to be the eighth Balabhadra and Lakshmana to be the ninth Narayana. O wise one! Ponder over this as well. There is no such fault in surrendering Sita as there is in refusing to hand her over.” [492-493]
श्लोक 494 से 501
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473
राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 16 | श्लोक 17 से 30 | श्लोक 31 से 42 | श्लोक 43 से 50 | श्लोक 51 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 92 | श्लोक 93 से 104 | श्लोक 105 से 123 | श्लोक 124 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 235 | श्लोक 236 से 252 | श्लोक 253 से 262 | श्लोक 263 से 276 | श्लोक 277 से 291 | श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353 | श्लोक 354 से 364 | श्लोक 365 से 382 | श्लोक 383 से 401 | श्लोक 402 से 412 | श्लोक 413 से 422 | श्लोक 423 से 435 | श्लोक 436 से 452 | श्लोक 453 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 484
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