अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 23 to 31
श्लोक ( Shlok ) 23
द्वीपेऽस्मिन्भारते देशः कोसलाख्योऽस्ति विश्रुतः । आर्यक्षेत्रस्य मध्यस्थः सौस्थित्यं सर्वदा भजन् ॥२३॥
इसी जम्बूद्वीपके भरत-क्षेत्र सम्बन्धी आर्यक्षेत्रके मध्यभागमें स्थित तथा सदा अच्छी स्थितिको धारण करनेवाला एक कोसल नामका प्रसिद्ध देश है ।। २३ ।।
“Located in the central part of the Arya-kshetra (noble region) within the Bharata-kshetra of this very Jambudvipa, there is a famous country named Kosala, which is always well-established and prosperous.” || 23 ||
श्लोक ( Shlok ) 24
बाधाभावादरक्षात्र रक्षकेभ्यो विना न सा । अदातारो न ‘कैनाश्यात्ते तृप्त्या ग्राहकैर्विना ॥ २४ ॥
उस देशमें कभी किसीको बाधा नहीं होती थी इसलिए अरक्षा थी परन्तु वह अरक्षा रक्षकों के अभावसे नहीं थी। इसी तरह वहाँपर कोई दातार नहीं थे, दातारोंका अभाव कृपणतासे नहीं था परन्तु संतुष्ट रहने के कारण कोई लेनेवाले नहीं थे इसलिए था ।। २४ ।।
“In that country, no one ever faced any hindrance or harm, hence there was a lack of protection—but this lack of protection was not due to an absence of guardians (rather, because there was no danger to protect anyone from). Similarly, there were no donors there—but this lack of donors was not due to miserliness, rather because everyone was so content that there was no one left to receive charity.” || 24 ||
श्लोक ( Shlok ) 25
काठिन्यं कुत्रयोरेव नैव चेतसि कस्यचित् । देहि पाहीति सम्प्रेषो नाथित्वेन भयेन वा ॥ २५ ॥
वहाँ कठोरता स्त्रियोंके स्तनोंमें ही थी, वहाँ रहनेवाले किसी मनुष्यके चित्तमें कठोरता क्रूरता नहीं थी। इसी तरह मुझे कुछ देओ, यह शब्द माँगनेके लिए नहीं निकलता था । और हमारी रक्षा करो यह शब्द भयसे निकलता था ॥ २५ ॥
“In that land, hardness was found only in the breasts of women; none of the men living there possessed a hard or cruel heart. Similarly, the words ‘give me something’ were never uttered to beg, nor were the words ‘protect us’ ever spoken out of fear.” || 25 ||
श्लोक ( Shlok ) 26
कलङ्कक्षीणते राज्ञि चन्द्र एव परत्र न । स्थितिस्तपोधनेष्वेव विनाहारात्परेषु न ॥ २६ ॥
इसी प्रकार कलङ्कऔर क्षीणता ये दो शब्द चन्द्रमाके वाचक राजामें ही पाये जाते थे अन्य किसी राजामें नहीं पाये जाते थे । निराहार रहना तपस्वियोंमें ही था अन्यमें नहीं ।। २६ ।।
“Similarly, the words ‘blemish’ (kalanka) and ‘waning’ (ksheenata) were used only to describe the moon, and were never associated with any of the kings. Likewise, the state of ‘going without food’ (nirahaar) was found only among the ascetics practicing penance, and never among the common people.” || 26 ||
श्लोक ( Shlok ) 27 – 31
पीडा तिलातसीभ्रूणां नान्यप्राणिषु केषुचित् । मान्यत्र शिरसश्छेदः प्रवृद्धेष्वेव शालिषु ॥ २७ ॥बन्धो मोक्षश्च राद्धान्ते श्रूयते नापराधिषु । विना विमुक्तरागेभ्यो नान्यत्रेन्द्रियनिग्रहः ॥ २८ ॥जाक्यं जलेषु नान्येषु सूच्यादिष्वेव तीक्ष्णता । नान्यत्र कुञ्चिकास्वेव कृत्ये नान्यत्र वक्रता ॥ २९ ॥नाविदग्धाश्च गोपाला न स्त्रीबालाश्च ३ भीलुकाः । शठा न वामनाश्चोक्ताश्चण्डालाश्च न दुश्चराः ॥ ३० ॥नानिनुशालिका भूमिर्न क्षमाभृदचन्दनः । नानम्भोजं जलस्थानं नैवास्वादुफलं वनम् ॥ ३१ ॥
पीड़ा अर्थात् पेला जाना तिल अलसी तथा ईखमें ही था अन्य किसी प्राणी में पीड़ा अर्थात् कष्ट नहीं था। शिरका काटना बढ़ी हुई धानके पौधोंमें ही था किसी दूसरेमें नहीं। बन्ध और मोक्षकी चर्चा आगममें ही सुनाई देती थी किसी अपराधी में नहीं। इन्द्रियोंका निग्रह विरागी लोगोंमें ही था किन्हीं दूसरे लोगोंमें नहीं । जड़ता जलमें ही थी किन्हीं अन्य मनुष्योंमें जड़ता – मूर्खता नहीं थी, तीक्ष्णता सुई आदिमें ही थी वहांके मनुष्योंमें उग्रता नहीं थी, वक्रता तालियोंमें ही थी किसी अन्य कार्यमें कुटिलता-मायाचारिता नहीं थी। वहांके गोपाल भी अचतुर नहीं थे, स्त्रियाँ तथा बालक भी डरपोंक नहीं थे, बौने भी धूर्त नहीं थे, चाण्डाल भी दुराचारी नहीं थे ।। वहां ऐसी कोई भूमि नहीं थी जो कि ईखोंसे सुशोभित नहीं हो, ऐसा कोई पर्वत नहीं था जिसपर चन्दन न हों, ऐसा कोई सरोवर नहीं था जिसमें कमल न हों और ऐसा कोई वन नहीं था जिसमें मीठे फल न हों ।॥ २७-३१ ।।
“In that land, ‘pressing’ (peeda—which also means pain) was done only to sesame, flaxseed, and sugarcane; no other living being ever experienced peeda (pain or suffering). ‘Cutting off the head’ was done only to the overgrown stalks of paddy, and to no one else. Talk of ‘bondage and liberation’ (bandha and moksha) was heard only in the sacred scriptures (Agamas), and never in reference to any criminal.
The ‘restraint of senses’ was practiced only by the detached ascetics, and not by others (as ordinary people lived in natural harmony). ‘Coldness’ or ‘inactivity’ (jadata—which also means foolishness) was found only in water, and no human possessed jadata (foolishness). ‘Sharpness’ (teekshnata—which also means harshness) was found only in needles and similar objects, but never in the temperament of the people. ‘Crookedness’ (vakrata) existed only in keyways, and no deceit or hypocrisy (mayachari) existed in any action.
The cowherds there were not unintelligent, the women and children were not cowardly, the dwarfs were not cunning, and even the outcastes (chandalas) were not wicked. There was no land there that was not adorned with sugarcane fields, no mountain that did not have sandalwood trees, no lake that was not filled with lotuses, and no forest that did not bear sweet fruits.” || 27–31 ||
श्लोक 32 से 41
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
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