अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 363 to 372
श्लोक ( Shlok ) 363
संसारी निर्वृतश्चेति द्वैविध्येन निरूपितः । अनादिरस्य संसारः सादिनिर्वाणमिष्यते ।। ३६३ ।।
संसारी और मुक्तके भेदसे वह दो प्रकारका निरूपण किया जाता है। इसका संसार अनादि कालसे चला आ रहा है और मोक्ष सादि माना जाता है ॥ ३६३ ।।
“By the distinction of being either worldly (Samsari) or liberated (Mukta), it [the soul] is expounded to be of two distinct types. Its existence within the cycle of transmigration (Samsara) has been continuing since beginningless time, whereas its state of liberation (Moksha) is considered to have a definitive beginning. || 363 ||”
श्लोक ( Shlok ) 364 – 365
निर्वृतस्य संसारो नित्या कस्यापि संसृतिः । अनन्ताः संसृतौ मुक्तास्तदनन्ताः “सुलक्षिताः ॥३६४॥सति व्ययेऽपि बन्धानां हानिरेव न हि क्षयः । आनन्त्यमेव तद्धेतुः शक्तीनामिव वस्तुनः ॥ ३६५ ॥
जो जीव मोक्ष चला जाता है उसका फिर संसार नहीं होता अर्थात् वह लौटकर संसारमें नहीं आता। किसी-किसी जीवका संसार नित्य होता है अर्थात् वह अभव्य या दूराद्दूरभव्य होनेके कारण सदा संसारमें रहता है। इस संसारमें अनन्त जीव मोक्ष प्राप्त कर चुके हैं और अनन्त जीव ही अभी बाकी हैं। कर्मबन्धनमें बंधे हुए जीवोंमेंसेमुक्त हो जानेपर हानि अवश्य होती है परन्तु उनका क्षय नहीं होता और उसका कारण जीवोंका अनन्तपना ही है। जिस प्रकार पदार्थमें अनन्त शक्तियाँ रहती हैं अतः उनका कभी अन्त नहीं होता इसी प्रकार संसारमें अनन्त जीव रहते हैं अतः उनका कभी अन्त नहीं होता ।। ३६४-३६५ ।।
“The soul that departs for final liberation (Moksha) never returns to the cycle of transmigration (Samsara); that is to say, it does not wander back into worldly existence. However, for certain souls, the cycle of transmigration is eternal; due to being either incapable of liberation (Abhavya) or extremely distant from it (Duraddurabhavya), they remain in worldly bondage forever.
In this universe, while infinite souls have already attained liberation, an absolute infinity of souls still remains bound. Although a continuous reduction in the number of worldly souls occurs as they attain emancipation, their collective population is never entirely exhausted, and the reason for this lies solely in the boundless, inherent infinity of souls. Just as an object possesses infinite inherent potencies (shaktis) that are never exhausted, similarly, the universe contains an infinite number of souls, ensuring that their collective existence never comes to an end. || 364–365 ||”
श्लोक ( Shlok ) 366 – 370
इति जीवस्य याथात्म्यं युक्त्या व्यक्त’ न्यवेदयत् । द्रव्यहेतुं विधायास्य वचः कालादिसाधनः ॥३६६ ॥ विनेयोऽहं कृतश्राद्धो जीवतत्त्वत्विनिश्चये । सौधर्मपूजितः पञ्चशत ब्राह्मगसूनुभिः ॥ ३६७ ॥ श्रीवर्धमानमानम्य संयमं प्रतिपन्नवान् । तदैव मे समुत्पन्नाः परिणामविशेषतः ॥ ३६८ ॥ ऋद्धयः सप्तसर्वाङ्गानामप्यर्थपदान्यतः । भट्टारकोपदेशेन श्रावणे बहुले तिथौ ॥ ३६९ ॥ पक्षादावर्थरूपेण सद्यः पर्याणमन् स्फुटम् । पूर्वाह्न पश्चिमे भागे पूर्वाणामप्यनुक्रमात् ॥ ३७० ॥
इस प्रकार भगवान् ने युक्ति पूर्वक जीव तत्त्वका स्पष्ट स्वरूप कहा। भगवान्के वचनको द्रव्यहेतु मानकर तथा काललब्धि आदिकी कारण सामग्री मिलनेपर मुझे जीवतत्त्वका निश्चय हो गया और मैं उसकी श्रद्धाकर भगवान्का शिष्य बन गया। तदनन्तर सौधर्मेन्द्रने मेरी पूजा की और मैंने पाँच सौ ब्राह्मणपुत्रोंके साथ श्रीवर्धमान स्वामीको नमस्कारकर संयम धारण कर लिया। परिणामों-की विशेष शुद्धि होनेसे मुझे उसी समय सात ऋद्धियाँ प्राप्त हो गई । तदनन्तर भट्टारक वर्धमान स्वामीके उपदेशसे मुझे श्रावण वदी प्रतिपदाके दिन पूर्वाण कालमें समस्त अङ्गों के अर्थ और पद स्पष्ट जान पड़े । इसी तरह उसी दिन अपराह्ण कालमें अनुक्रमसे पूर्वोके अर्थ तथा पदोंका भी स्पष्ट बोध हो गया ॥ ३६६-३७० ॥
“In this manner, the Lord logically and systematically expounded the precise nature of the living soul element (Jiva-tattva). Adopting the words of the Lord as the objective instrument of truth (Dravya-hetu) and upon attaining the vital confluence of ripening time (Kala-labdhi) along with other auxiliary causes, absolute conviction regarding the soul element arose within me; establishing profound faith in it, I became a disciple of the Lord. Thereafter, the Indra of the Saudharma heaven performed my ritual worship, and alongside five hundred Brahmin youths, I bowed before the venerable Lord Vardhamana and adopted the vows of ascetic self-restraint (Sanyama). Due to the exceptional, sudden purification of my consciousness, I was instantly endowed with seven supernatural faculties (Riddhis).
Subsequently, through the profound discourse of the venerable Master Vardhamana, during the forenoon of the first day of the dark half of the month of Shravana (Shravana Vadi Pratipada), the inner meanings and textual verses of all the primary scriptures (Angas) became vividly clear to me. Similarly, during the afternoon of that very same day, a lucid and comprehensive understanding of the meanings and verses of the secondary scriptures (Purvas) dawned upon me in perfect, systematic succession. || 366–370 ||”
श्लोक ( Shlok ) 371 – 372
इत्यनुज्ञातसर्वाङ्गपूर्वार्थों धीचतुष्कवान् । अङ्गानां ग्रन्थसन्दर्भ पूर्वरात्रौ व्यधामहम् ॥ ३७१ ॥ पूर्वाणां पश्चिमे भागे ग्रन्थकर्ता ततोऽभतम् । इति श्रुतद्धिभिः पूर्णोऽभूवं गणभृदादिमः ॥ ३७२ ॥
इस प्रकार जिसे समस्त अंगों तथा पूर्वोका ज्ञान हुआ है और जो चार ज्ञानसे सम्पन्न है ऐसे मैंने रात्रिके पूर्व भागमें अङ्गोंकी और पिछले भागमें पूर्वोकी ग्रन्थ-रचना की। उसी समयसे मैं ग्रन्थकर्त्ता हुआ। इस तरह श्रुतज्ञान रूपी ऋद्धिसे पूर्ण हुआ मैं भगवान् महावीर स्वामीका प्रथम गणधर हो गया ।। ३७१-३७२ ॥
“In this manner, having acquired the complete knowledge of all the Angas and Purvas, and being fully endowed with four types of direct knowledge (Gyanas), I composed the structured textual compilations of the Angas during the early part of the night and the Purvas during the latter part of the night. From that very moment, I became the primary author of the scriptures (Granthakarta). Thus, entirely filled with the supreme supernatural faculty of scriptural knowledge (Shruta-jnana Riddhi), I became the first Ganadhara (chief disciple) of the Lord Mahavira Swami. || 371–372 ||”
श्लोक 373 से 385
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71 | पर्व 72