राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 292 से 302 | श्लोक 303 से 317 | श्लोक 318 से 332 | श्लोक 333 से 353
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 354 to 364
श्लोक ( Shlok ) 354
जलं गद्गदकण्ठायाश्चक्षुर्थ्यां स्नेहसूचनम् । शोकानलपरिम्लानं वक्त्राब्जं चाभवत्तदा ॥ ३५४ ॥
उसका कण्ठ गद्गद हो गया, दोनों नेत्रोंसे स्नेहको सूचित करनेवाला जल गिरने लगा और उस समय उसका मुखकमल शोकरूपी अग्निसे मलिन हो गया ॥ ३५४ ॥
“Her throat choked with emotion, tears indicating deep affection began to flow from both her eyes, and at that moment, her lotus face grew downcast, obscured by the fire of grief. || 354 ||”
श्लोक ( Shlok ) 355
तद्वीक्ष्य जानकी सर्व प्राप्ता स्वामिव मातरम् । जायते स्मार्द्रहृदया वाष्पाविलविलोचना ॥ ३५५ ॥
यह सब देख सीताको ऐसा लगने लगा मानो मैं अपनी माताके पास ही आ गई हूं, उसका हृदय आर्द्र हो गया और नेत्र आँसुओंसे भर गये ।। ३५५ ।।
“Beholding all this, it began to feel to Sita as though she had returned to the presence of her very own mother; her heart melted with emotion, and her eyes welled up with tears. || 355 ||”
श्लोक ( Shlok ) 356 – 357
तदभिप्रायमाज्ञाय दशाननवधूत्तमा । यदि स्वकार्यसंसिद्धिमभिकामयसे भृशम् ॥ ३५६ ॥कृताञ्जलिरहं याचे गृहाणाहारमम्बिके । सर्वस्य साधनो देहस्तस्याहारः २ सुसाधनम् ॥ ३५७ ॥
उसका अभिप्राय जानकर रावणकी पट्टरानी मन्दोदरी कहने लगी कि यदि तू अपना कार्य अच्छी तरह सिद्ध करना चाहती है तो हे माँ ! मैं हाथ जोड़कर याचना करती हूँ, तू आहार ग्रहण कर, क्योंकि सबका साधन शरीर है और शरीरका साधन आहार है ।। ३५६-३५७ ॥
“Understanding her state of mind, Ravana’s chief queen, Mandodari, began to say, ‘If you wish to fully accomplish your purpose, then O Mother! I implore you with folded hands, please partake of food. For the body is the means to achieve everything, and food is the means to sustain the body.’ || 356-357 ||”
श्लोक ( Shlok ) 358
वदन्ति निपुणाः क्ष्माजे प्रसवादि कुतोऽसति । स्थिते वपुषि रामस्य स्वामिनस्तव वीक्षणम् ॥ ३५८ ॥
चतुर मनुष्य यही कहते हैं कि यदि वृक्ष नहीं होगा तो फूल आदि कहाँ से आवेंगे ? इसी प्रकार शरीरके रहते ही तुझे तेरे स्वामी रामचन्द्रका दर्शन हो सकेगा ।। ३५८ ॥
“Wise men say that if the tree itself does not exist, then from where will the flowers and fruits come? Similarly, only if your body is preserved will you be able to see your lord Ramachandra again. || 358 ||”
श्लोक ( Shlok ) 359 – 364
न चेत्तद्दर्शनं साध्यं वपुषैव महत्तपः । न चेन्मद्वचनं ग्राह्यं त्वयाहमपि भोजनम् ॥ ३५९ ॥स्यजामीत्यवदत्सीताप्येतछू त्वावधार्य च । ममामातापि मातेव मधुःखे दुःखिताऽजनि ॥ ३६० ॥ इति चित्ते विनम्यैतश्चरणौ स्निग्धमैक्षत । मञ्जूषास्थापनाकाले मत्सुताया इवेक्षितम् ॥ ३६१ ॥ एतन्मां मधुरं सत्याः सन्तापयति सर्वतः । इति प्रलयमापन्ना तदा रावणवल्लभा ॥ ३६२ ॥ आप्तैर्दुःखेन तद्दुःखाद् विनीता प्राविशत्पुरम् । शिशिपास्थस्ततोऽभ्येत्य दूतः प्लवगविद्यया ॥ ३६३ ॥ परावृत्या कपेर्मूर्त्या स्वयं निद्रात्यभिद्रुतान् । विधाय रक्षकान् देव्याः पुरस्तात्समवस्थितः ॥ ३६४॥
यदि उनका दर्शन साध्य न हो तो इस शरीरसे महान् तप ही करना चाहिये। यह सब कहनेके बाद मन्दोदरीने यह भी कहा कि यदि मेरे वचन नहीं मानती है तो मैं भी भोजन छोड़े देती हूं। मन्दोदरीके वचन सुनकर सीताने विचार किया कि यद्यपि यह मेरी माता नहीं है तथापि माताके समान ही मेरे दुःखसे दुःखी हो रही है। ऐसा विचारकर वह मन ही मन मन्दोदरीके चरणोंको नमस्कारकर उनकी ओर बड़े स्नेहसे देखने लगी। उसे ऐसी देख मन्दोदरी सोचने लगी कि मंजूषामें रखते समय जिस प्रकार मेरी पुत्री मेरी ओर देख रही थी उसी प्रकार आज यह सीता मेरी ओर देख रही है। इस पतिव्रताका यह मधुर दर्शन मुझे सब ओरसे सन्तप्त कर रहा है। इस प्रकार शोकको प्राप्त हुई मन्दोदरीने सीताके दुःखसे विनम्र हो आप्तजनोंके साथ साथ नगरमें बड़े दुःखसे प्रवेश किया । तदनन्तर उसी शिंशपा वृक्षपर बैठे हुए दूत अणुमान् ने प्लवेग नामक विद्याके द्वारा अपना बन्दर जैसा रूप बना लिया और वनकी रक्षा करनेवाले पुरुषोंको निद्रासे युक्तकर वह स्वयं सीतादेवीके आगे जा खड़ा हुआ ॥ ३५९-३६४ ॥
“‘If seeing him is not possible, then one should at least perform great penance with this body.’ After saying all this, Mandodari added, ‘If you do not heed my words, then I, too, shall renounce food.’
Hearing Mandodari’s words, Sita reflected, ‘Even though she is not my mother, she is grieving for my sorrow just like a mother would.’ Thinking thus, she mentally bowed at Mandodari’s feet and began to look at her with great affection. Seeing her like that, Mandodari thought, ‘Just as my daughter looked at me while being placed in the casket, so too is Sita looking at me today. This sweet sight of this faithful wife is distressing me from all sides.’
In this manner, Mandodari, overcome with grief and humbled by Sita’s suffering, entered the city in great sorrow along with her kinsmen. Subsequently, the messenger Anuman, who was perched upon that same shimshapa tree, assumed the form of a monkey using the Plavega supernatural power. After casting a deep sleep over the men guarding the forest, he went and stood directly before Lady Sita. || 359-364 ||”
श्लोक 365 से 382
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