पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 115 to 124
श्लोक ( Shlok ) 115 – 124
इत्येतदुक्त’ ज्ञात्वापि पूर्ववैरानुबन्धनात् । निजपक्षानुरागित्वाद् दुःसंसारादिहागतेः ॥ ११५ ॥प्रकृत्यैवातिदुष्टत्वादनादाय विरुद्धधीः । सुभौमको भवानत्र सस्मयोऽयं कुमारकः ॥ ११६ ॥पराभवति मामेवमिति तस्मिन् प्रकोपवान् । सशल्यो मृतिमासाद्य शम्बरो ज्योतिषामरः ॥ ११७ ॥नान्नाभवत्सकोपानां तपसाऽपीदृशी गतिः । नागी नागश्च सम्प्राप्तशमभावौ कुमारतः ॥ ११८॥बभूवतुरहीन्द्रश्च तत्पत्नी च पृथुश्रियौ । ततस्त्रिशत्समामानकुमारसमये १ गते ॥ ११९ ॥साकेत नगराधीशो ‘जयसेनो महीपतिः । भगलीदेशसञ्जतहयादिप्राभृतान्वितम् ॥ १२० ॥अन्यदासौ निसृष्टार्थ प्राहिणोत्पार्श्वसन्निधिम् । गृहीत्वोपायनं पूजयित्वा दूतोत्तमं मुदा ॥ १२१ ॥साकेतस्य विभूतिं तं कुमारः परिपृष्टवान् । सोऽपि भट्टारकं पूर्व वर्णयित्वा पुरुं पुरम् ॥ १२२ ॥पश्चाद्वयावर्णयामास प्राज्ञा हि क्रमवेदिनः । श्रुत्वा तत्तत्र किञ्जतस्तीर्थकृष्नामबन्धनात् ॥ १२३ ॥एष एव ‘पुरुर्मुक्तिमापदित्युपयोगवान् । ‘साक्षात्कृतनिजातीतसर्वप्रभवसन्ततिः ॥ १२४ ॥
इस प्रकार सुभौमकुमारके कहे वचन, विपरीत बुद्धिवाले उस तापसने समझ तो लिये परन्तु पूर्व वैरका संस्कार होनेसे, अथवा अपने पक्षका अनुराग होनेसे अथवा दुःखमय संसारसे आनेके कारण अथवा स्वभावसे ही अत्यन्त दुष्ट होनेके कारण उसने स्वीकार नहीं किये प्रत्युत, यह सुभौम-कुमार अहंकारी होकर मेरा इस तरह तिरस्कार कर रहा है, यह सोचकर वह भगवान् पार्श्वनाथ पर अधिक क्रोध करने लगा। इसी शल्यसे वह मरकर शम्बर नामका ज्योतिषी देव हुआ सो ठीक ही है क्योंकि क्रोधी मनुष्योंकी तपसे ऐसी ही गति होती है। इधर सर्प और सर्पिणी कुमारके उपदेशसे शान्ति भावको प्राप्त हुए और मरकर बहुत भारी लक्ष्मीको धारण करनेवाले धरणेन्द्र और पद्मावती हुए। तदनन्तर भगवान् पार्श्वनाथका जब तीस वर्ष प्रमाण कुमारकाल बीत गया तब एक दिन अयोध्या के राजा जयसेनने भगली देशमें उत्पन्न हुए घोड़े आदिकी भेंटके साथ अपना दूत्त भगवान् पार्श्वनाथ के समीप भेजा। भगवान् पार्श्वनाथने भेंट लेकर उस श्रेष्ठ दूतका हर्षपूर्वक बड़ा सम्मान किया और उससे अयोध्याकी विभूति पूछी। इसके उत्तरमें दूतने सबसे पहले भगवान वृषभदेवका वर्णन किया और उसके पश्चात् अयोध्या नगरका हाल कहा सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धिमान् लोग अनुक्रमको जानते ही हैं। दूतके वचन सुनकर भगवान् विचारने लगे कि मुझे तीर्थंकर नामकर्मका बन्ध हुआ है इससे क्या लाभ हुआ ? भगवान् वृषभदेवको ही धन्य है कि जिन्होंने मोक्ष प्राप्त कर लिया। ऐसा विचार करते ही उन्होंने अपने अतीत भवोंकी परम्पराका साक्षात्कार कर लिया- पिछले सब देख लिये ॥ ११५-१२४ ॥
“Although that ascetic of inverted intellect understood the words spoken by Prince Shubhauma, he did not accept them. This was either due to the deep impressions of past animosity, his stubborn attachment to his own dogmas, the momentum of his journey from a miserable hellish realm, or simply because he was inherently wicked by nature. Instead, thinking, ‘This arrogant Prince is insulting me in this manner,’ he grew even more furious with Lord Parshvanatha.
With this very thorn of inner agony (shalya), he died and was reborn as a stellar deity (Jyotishi Deva) named Shambara. And it is only fitting, for such is the destiny achieved by angry men through misguided penances.
On the other hand, through the Prince’s compassionate discourse, the serpent and the she-serpent attained a state of inner peace and serenity. Upon their death, they were reborn as Dharanendra and Padmavati, endowed with immense celestial opulence.
Thereafter, when thirty years of Lord Parshvanatha’s life as a prince had passed, King Jayasena of Ayodhya sent his envoy to the Lord with gifts of horses and other treasures bred in the Vahli country. Lord Parshvanatha accepted the offerings, joyfully received the noble envoy with great respect, and inquired about the splendor of Ayodhya. In response, the envoy first detailed the glory of Lord Vrishabhadeva and only then described the city of Ayodhya—which is quite natural, for the wise understand the proper order of things.
Hearing the envoy’s words, the Lord began to reflect: ‘What is the ultimate benefit of me binding the Tirthankara name-karma? Blessed indeed is Lord Vrishabhadeva, who has already attained absolute liberation (Moksha).’ The moment He thought this, He directly perceived the entire lineage of His past births—witnessing everything that had transpired before.” (115-124)
श्लोक 125 से 133
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पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114
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