राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 163 | श्लोक 164 से 174 | श्लोक 175 से 184 | श्लोक 185 से 193 | श्लोक 194 से 203 | श्लोक 204 से 211
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 68- shlok 212 to 221
श्लोक ( Shlok ) 212
भयेन उज्जया रामविरहोत्थशुचा च सा । अगाद्राजसुता मूर्च्छामतिकृच्छ्रप्रतिक्रियाम् ॥ २१२ ॥
उसे देखते ही राजपुत्री सीता, भयसे, लज्जासे, और रामचन्द्रके विरहसे उत्पन्न शोकसे तीव्र दुःखका प्रतिकार करनेवाली मूर्च्छाको प्राप्त हो गई ॥ २१२ ॥
“The moment she beheld him, the princess Sita—overwhelmed by profound terror, acute shame, and the intense grief born of her separation from Ramachandra—fell into a deep swoon, which acted as a sudden antidote to her unbearable agony.” (212)
श्लोक ( Shlok ) 213
सद्यः शीलवतीस्पर्शाद्विद्या गनगगामिनी । विनश्यतीति भीत्वाऽसौ जानकीं स्वयमस्पृशन् ॥ २१३ ॥
शीलवती पतिव्रता स्त्रीके स्पर्शसे मेरी आकाशगामिनी विद्या शीघ्र ही नष्ट हो जावेगी इस भयसे उसने सीताका स्वयं स्पर्श नहीं किया ॥ २१३ ॥
“Ravana refrained from touching Sita with his own hands, for he was gripped by a singular fear: that the moment he laid hands upon a woman of such absolute virtue and devotion to her husband, his occult power of aerial flight (Akashagamini Vidya) would instantly perish.” (213)
श्लोक ( Shlok ) 214
विद्याधरीः समाहूय शीताम्बुपवनादिभिः । मूर्च्छामस्या निराकुर्युरिति दक्षा न्ययोजयत् ॥२१४ ॥
किन्तु चतुर विद्याधरियोंको बुलाकर यह आदेश दिया कि तुमलोग शीतल जल तथा हवा आदिसे इसकी मूर्च्छा दूर करो ॥२१४॥
“Instead, summoning his clever and skillful Vidyadhari attendants, he commanded them: ‘Use cooling waters, gentle fanning, and other remedies to revive her from this swoon.'” (214)
श्लोक ( Shlok ) 215
उपायैस्ताभिरुद्धतमूर्च्छाऽवोचद्धरासुता । यूयं काः कः प्रदेशोऽयमिति शङ्काकुलाशया ॥ २१५ ॥
जब उन विद्याधरियोंके अनेक उपायों से सीताकी मूर्च्छा दूर हुई तब शङ्कासे व्याकुल-हृदय होती हुई वह उनसे पूछने लगी कि आप लोग कौन हैं ? और यह प्रदेश कौन है ? ।। २१५ ।।
“When, through the numerous remedies applied by those Vidyadhari maidens, Sita finally regained consciousness, her heart grew instantly restless with deep suspicion and anxiety; she began questioning them, saying, ‘Who are you all? And what region is this?'” (215)
श्लोक ( Shlok ) 216 – 218
विद्याधर्यो वयं लङ्कापुरमेतन्मनोहरम् । वनं रावणराजस्य त्रिखण्डाधिपतेरिदम् ॥ २१६ ॥त्वादृशी वनिता लोके न काचित्पुण्यभागिनी । महेन्द्रमिव पौलोमी सुभद्रेवादिभूपतिम् ॥ २१७ ॥श्रीमती बज्रजहुं वा त्वमेनं कुरु ते पतिम् । स्वामिनी भव सौभाग्याद्रावणस्य महाश्रियः ॥ २१८ ॥
इसके उत्तर में विद्याधरियाँ कहने लगीं कि हम लोग विद्याधरियाँ हैं, यह मनोहर लङ्कापुरी है, और यह तीन खण्डके स्वामी राजा रावणका वन है। इस संसारमें आपके समान कोई दूसरी स्त्री पुण्यशालिनी नहीं है क्योंकि जिस प्रकार इन्द्राणीने इन्द्रको, सुभद्राने भरत चक्रवर्ती को और श्रीमतीने वज्रजङ्घ को अपना पति बनाया था उसी प्रकार आप भी इस रावणको अपना पति बना रही हैं। आप सौभाग्यसे महालक्ष्मीके धारक रावणकी स्वामिनी होओ ।। २१६-२१८ ।।
“In response, the Vidyadhari maidens said, ‘We are women of the celestial Vidyadhara race, this is the enchanting city of Lanka, and this forest belongs to King Ravana, the sovereign lord of three realms (Three Khandas). In this entire world, there is no other woman as extraordinarily meritorious and fortunate as you. For just as Indrani chose Indra, as Subhadra wed the Chakravartin Bharata, and as Shrimati accepted Vajrajangha as her husband, you too are destined to accept this Ravana as your lord. By your immense good fortune, may you reign as the supreme mistress over Ravana, the very bearer of great fortune and prosperity (Mahalaxmi).'” (216-218)
श्लोक ( Shlok ) 219
जानकी ताभिरित्युक्ता सुदूना दीनमानसा । किं पौलोम्यादयः शीलभङ्गेन ताः पतीन् स्वयम् ॥ २१९ ॥
इस प्रकार विद्याधरियोंके कहनेपर सीता बहुत ही दुःखी हुई, उसका मन दीन हो गया। वह कहने लगी कि क्या इन्द्राणी आदि स्त्रियाँ अपना शील भङ्गकर इन्द्र आदि पतियोंको प्राप्त हुई थीं ? ॥ २१९ ॥
“Hearing these calculated words from the Vidyadhari maidens, Sita was plunged into even deeper sorrow, and her heart grew utterly despondent. She looked at them and said, ‘Tell me, did Indrani and those other exemplary women break their vows of chastity and ruin their character (Sheel) to obtain Indra and their other husbands?'” (219)
श्लोक ( Shlok ) 220
प्राणेभ्योऽप्यधिकान् का वा विक्रीणन्ति गुणान् श्रिया । त्रिखण्डस्याधिपोऽस्त्वस्तु षट्खण्डस्याखिलस्य वा ॥२२०॥
ऐसी कौनसी स्त्रियाँ हैं जो प्राणोंसे भी अधिक अपने गुणोंको लक्ष्मीके बदले बेच देती हों। रावण तीन खण्डका स्वामी हो, चाहे छह खण्डका स्वामी हो और चाहे समस्त लोकका स्वामी हो ।॥ २२० ॥
“What kind of women are they who would barter away their virtue and noble character—which are dearer to them than life itself—in exchange for mere material wealth (Laxmi)? Let Ravana be the master of three realms, or six realms, or indeed the sovereign ruler of the entire universe!” (220)
श्लोक ( Shlok ) 221
किं तेन यदि शीलस्य खण्डनं मण्डनस्य मे । प्राणाः सतां न हि प्राणाः गुणाः प्राणाः प्रियास्ततः ॥२२१॥
यदि वह मेरे आभूषण स्वरूप शीलका खण्डन करनेवाला है तो मुझे उससे क्या प्रयोजन है ? सज्जनोंको प्राण प्यारे नहीं, किन्तु गुण प्राणोंसे भी अधिक प्रिय होते हैं ।॥ २२१ ॥
“If he is intent on shattering my virtue (Sheel)—which is my true and ultimate ornament—then what possible worth or purpose can he hold for me? For noble souls, it is not physical life that is precious; rather, it is their character and virtues that are held far dearer than life itself.” (221)
श्लोक 222 से 235
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