Hindi Translation of Uttar puran Parv 71
श्लोक 1 से 11 : कंस-वध के बाद जरासन्ध का प्रतिशोध और कालयवन का प्रस्थान
अथानन्तर- कंसकी स्त्रियों द्वारा छोड़े हुए अश्रुजलका पान कर पृथ्वी रूपी वृत्तसे चारों ओर उत्सव रूपी अङ्कुर प्रकट होने लगे ।। १ ।। ‘यह शूरवीर, पुण्यात्मा वसुदेव राजाका पुत्र है, कंसके भयप्ते छिप कर व्रजमें वृद्धिको प्राप्त हो रहा था, अनुक्रमसे होनेवाली वृद्धि, न केवल इनके पक्षकी ही वृद्धिके लिए है अपितु चन्द्रमाके समान समस्त संसारकी वृद्धिके लिए है’ इस प्रकार नगरवासी तथा देशवासी लोग जिनकी स्तुति करते थे, जिन्होंने राजा उग्रसेनको बन्धन-मुक्त कर दिया था, नो महात्मा थे, जिन्होंने उत्तम धनके द्वारा नन्द आदि गोपालोंकी पूजा कर उन्हें विदा किया था, और जो भाई-बन्धुओंके साथ मिलकर शौर्यपुर नगर में प्रविष्ट हुए थे ऐसे श्रीकृष्णका समय सुखसे बीत रहा था कि एक दिन कंसकी रानी जीवद्यशा पतिकी मृत्युसे दुःखी होकर जरासंधके पास गई । उसने मथुरापुरीमें जो वृत्तान्त हुआ था वह सब जरासन्धको बतला दिया ॥ २-६ ॥ उस वृत्तान्तको सुनकर जरासंधने क्रोधवश पुत्रोंको यादवोंके प्रति चढ़ाई करनेकी आज्ञा दी ॥ ७ ॥ वे पुत्र अपनी सेना सजाकर गये और युद्धके आंगनमें पराजित हो गये सो ठीक ही है क्योंकि भाग्यके प्रतिकूल होनेपर कौन पराजयको प्राप्त नहीं होते ? ॥ ८ ॥ अबकी बार जरासंधने कुपित होकर अपना अपराजित नामका पुत्र भेजा क्योंकि वह उसे सार्थक नामवाला तथा शत्रुओंके लिए यमराजके समान समझता था ॥ ९ ॥ बड़ी भारी सेना लेकर अपराजित गया और चिरकाल तक उसने तीन-सौ छयालीस बार युद्ध किया परन्तु पुण्य क्षीण हो जानेसे उसे भी पराङ्मुख होना पड़ा ।। १० ।। तदनन्तर ‘मैं पिताकी आज्ञासे यादवोंको अवश्य जीतूंगा’ ऐसा संकल्प कर उसके उद्यमी कालयवन नामक पुत्रने प्रस्थान किया ।। ११ ।।
श्लोक 12 से 21 : कालयवन का भ्रम और द्वारावती की स्थापना की भूमिका
कालयवनकी आज्ञा सुनकर अग्रशोची यादवोंने शौर्यपुर, हस्तिनापुर और मथुरा तीनों ही स्थान छोड़ दिये ।। १२ ।। कालयवन उनका पीछा कर रहा था, तब यादवोंकी कुल-देवता बहुत-सा ईन्धन इकट्ठा कर तथा ऊँची लौवाली अग्नि जलाकर और स्वयं एक बुढ़ियाका रूप बना कर मार्गमें बैठ गई। उसे देख कर युवा कालयवनने उससे पूछा कि यहक्या है ? उत्तर में बुढ़िया कहने लगी कि हे राजन् ! सुन, आपके भयसे मेरे सब पुत्र यादवोंके साथ-साथ इस ज्वालाओंसे भयंकर अग्निमें गिरकर मर गये हैं ।। १३-१५ ।। बुढ़ियाके वचन सुनकर काल-यवन कहने लगा कि अहो, मेरे भयसे समस्त शत्रु मेरी प्रतापाग्निके समान इस अग्निमें प्रविष्ट हो गये हैं ।॥ १६ ॥ ऐसा विचार कर वह शीघ्र ही लौट पड़ा और झूठा अहंकार धारण करता हुआ पिताके पास पहुँच गया। आचार्य कहते हैं कि इस बिना विचारी चेष्टाको धिक्कार है ॥ १७ ।। इधर चलते-चलते यादवोंकी सेना अपना स्थान बनानेके लिए समुद्रके किनारे ठहर गई ।॥ १८ ॥ वहाँ कृष्णने शुद्ध भावोंसे दर्भके आसन पर बैठकर विधि-पूर्वक मन्त्रका जाप करते हुए अष्टोपवास का नियम लिया। उसी समय नैगम नामके देवने कहा कि मैं घोड़ाका रूप रखकर आऊँगा सो मुझपर सवार होकर तुम समुद्रके भीतर बारह योजन तक चले जाना । वहाँ तुम्हारे लिए नगर बन जायगा । नैगम देवकी बात सुन कर श्रीकृष्णने निश्चयानुसार वैसा ही किया सो ठीक ही है क्योंकि पुण्यके रहते हुए कौन मित्र नहीं हो जाता ? ॥ १९ -२१ ॥
श्लोक 22 से 32: द्वारावती नगरी की रचना और नेमिनाथ के गर्भकल्याणक
जो प्राप्त हुए वेगसे उद्धत है, जिसपर श्रीकृष्ण बैठे हुए हैं, और जिसके कानोंके चमर निश्चल हैं ऐसा घोड़ा जब दौड़ने लगा तब मानो श्रीकृष्णके भयसे ही समुद्र दो भेदोंको प्राप्त हो गया सो ठीक ही है क्योंकि बुद्धि और शक्तिसे युक्त मनुष्योंके द्वारा जलका (पक्षमें मूर्ख लोगोंका) समूह भेदको प्राप्त हो ही जाता है ।। २२-२३ ।। उसी समय वहाँ श्रीकृष्ण तथा होनहार नेमिनाथ तीर्थंकरके पुण्यसे इन्द्रकी आज्ञा पाकर कुबेरने एक सुन्दर नगरीकी रचना की। जिसमें सबसे पहले उसने विधिपूर्वक मंगलोंका मांगलिक स्थान और एक हजार शिखरोंसे सुशोभित देदीप्यमान एक बड़ा जिनमन्द्रि बनाया फिर वप्र, कोट, परिखा, गोपुर तथा अट्टालिका आदिसे सुशोभित, पुण्यात्मा जीवोंसे युक्त मनोहर नगरी बनाई। समुद्र अपनी बड़ी-बड़ी तरङ्ग रूपी भुजाओंसे उस नगरीके गोपुरका आलिङ्गन करता था, वह नगरी अपनी दीप्तिसे देवपुरीकी हँसी करती थी और द्वारावती उसका नाम था ॥ २४-२७ ।। जिन्हें लक्ष्मी कटाक्ष उठा कर देख रही है ऐसे श्रीकृष्णने पिता वसुदेव तथा बड़े भाई बलदेवके साथ उस नगरीमें प्रवेश किया और यादवोंके साथ सुखसे रहने लगे ।। २८ ।।
अथानन्तर- जो आगे चल कर तीन लोकका स्वामी होनेवाला है ऐसा अहमिन्द्रका जीवजब छह माह बाद जयन्त विमानसे चलकर इस पृथिवीपर आनेके लिए उद्यत हुआ तब काश्यप-गोत्री, हरिवंशके शिखामणि राजा समुद्रविजयकी रानी शिवदेवी रत्नोंकी धारा आदिसे पूजित हुई और देवियाँ उसके चरणोंकी सेवा करने लगीं। छह माह समाप्त होने पर रानीने कार्तिक शुक्ल षष्ठीके दिन उत्तराषाढ नक्षत्रमें रात्रिके पिछले समय सोलह स्वप्न देखे ओर उनके बाद ही मुख-कमलमें प्रवेश करता हुआ एक उत्तम हाथी भी देखा ॥ २९ -३२ ॥
श्लोक 33 से 51 : नेमिनाथ भगवान् का जन्म और अभिषेक महोत्सव
८. दनन्तर – बन्दीजनोंके शब्द और प्रातःकालके समय बजनेवाली भेरियोंकी ध्वनि सुनकर जागी हुई रानी शिवदेवीने मङ्गलमय स्नान किया, पुण्य रूप वस्त्राभरण धारण किये और फिर बड़ी नम्रताले राजाके पास जाकर वह उनके अर्धासन पर बैठ गई। पञ्चात् उसने अपने देखे हुए स्वप्नोंका फल पूछा। सूक्ष्म बुद्धिवाले राजा समुद्रविजयने भी सुने हुए आगमका विचार कर उन स्वप्नोंका फल कहा कि तुम्हारे गर्भमें तीन लोकके स्वामी तीर्थंकर अवतीर्ण हुए हैं ॥ ३३-३५ ॥ उस समय रानी शिवदेवी स्वप्नोंका फल सुनकर एसी सन्तुष्ट हुई मानो उसने तीर्थंकरको प्राप्त ही कर लिया हो। उसी समय इन्द्रोंने भी अपने-अपने चिह्नोंसे जान लिया। वे सब बड़े हर्षसे मिलकर आये और स्वर्गावतरण कल्याण (गर्भकल्याणक) का महोत्सव करने लगे। उत्सव द्वारा पुण्योपार्जन कर वे अपने-अपने स्थान पर चले गये ॥ ३६-३७॥ फिर श्रावण शुक्ला षष्ठीके दिन चित्रा नक्षत्रमें ब्रह्मयोगके समय तीन ज्ञानके धारक भगवान्का जन्म हुआ ॥ ३८ ॥ तदनन्तर अपने आसन कम्पित होनेसे जिन्हें अवधिज्ञान उत्पन्न हुआ है ऐसे सौधर्म आदि इन्द्र हर्षित होकर आये और नगरीको घेर कर खड़े गये । तदनन्तर जो नील कमलके समान कान्तिके धारक हैं, ईशानेन्द्रने जिनपर छत्र लगाया है, तथा नमस्कार करते हुए चमर और वैरोचन नामके इन्द्र जिनपर चमर ढोर रहे हैं ऐसे जिनेन्द्र बालकको सौधर्मेन्द्रने बड़ी भक्तिसे उठाया और कुबेर-निर्मित तीन प्रकारकी मणिमय सीढ़ियोंके मार्गसे चलकर उन्हें ऐरावत हाथीके स्कन्ध पर विराजमान किया । अब इन्द्र आकाश-मार्गसे चलकर सुमेरु पर पहुँचा वहाँ उसने सुमेरु पर्वतकी ईशान दिशा में पाण्डुक शिलाके अग्रभाग पर जो अनादि-निधन मणिमय सिंहासन रक्खा है उसपर सूर्यसे भी अधिक तेजस्वी जिन-बालकको विराजमान कर दिया। वहीं उसने अनुक्रमसे हाथों हाथ लाकर इन्द्रोंके द्वारासौंपे हुए एवं और सागरके जलसे भरे, सुवर्णमय एक हजार आठ देदीप्यमान कलशोंके द्वारा उनका अभिषेक किया, उन्हें इच्छानुसार यथायोग्य आभूषणे पहिनाये और ये समीचीन धर्मरूपी चक्रकी नेमि हैं – चक्रधारा हैं’ इसलिए उन्हें नेमि नामसे सम्बोधित किया। फिर सौधर्मेन्द्रने मुकुट-बद्ध इन्द्रोंके द्वारा माननीय महाभ्युदयके धारक भगवान्को सुमेरु पर्वतसे लाकर माता-पिताको सौंपा, विक्रिया द्वारा अनेक भुजाएँ बनाकर रस और भावसे भरा हुआ आनन्द नामका नाटक किया और यह सब करनेके बाद वह समस्त देवोंके साथ अपने स्थान पर चला गया ॥ ३९ -४८ ॥ भगवान् नमिनाथकी तीर्थपरम्पराके बाद पाँच लाख वर्ष बीत जानेपर नेमि जिनेन्द्र उत्पन्न हुए थे, उनकी आयु भी इसी अन्तरालमें शामिल थी, उनकी आयु एक हजार वर्षकी थी, शरीर दश धनुष ऊँचा था, उनके संस्थान और संहनन उत्तम थे, तीनों लोकोंके इन्द्र उनकी पूजा करते थे, और मोक्ष उनके समीप था। इस प्रकार वे दिव्य मुखोंका अनुभव करते हुए चिरकाल तक द्वारावतीमें रहे ।। ४९ -५१ ॥
श्लोक 52 से 64 : वैश्य-पुत्रों द्वारा द्वारावती का वैभव वर्णन
इस तरह सुखोपभोग करते हुए उनका बहुत भारी समय एक क्षणके समान बीत गया । किसी एक दिन मगध देशके रहनेवाले ऐसे कितने ही वैश्य पुत्र, जो कि जलमार्गले व्यापार करते थे, पुण्योदयसे मार्ग भूल कर द्वारावती नगरीमें आ पहुँचे। वहाँकी राजलीला और विभूति देखकर आश्चर्यमें पड़ गये। वहाँ जाकर उन्होंने बहुतसे श्रेष्ठ रत्न खरीदे । तदनन्तर राजगृह नगर जाकर उन वैश्य-पुत्रोंने अपने सेठको आगे किया और उन रत्नोंको भेंट देकर चक्ररत्नके धारक राजा जरासन्धके दर्शन किये । राजा जरासन्धने उन सबका सन्मान कर उनसे पूछा कि ‘अहो वैश्य-पुत्रो ! आप लोगोंने यह रत्नोंका समूह कहाँ से प्राप्त किया है ? यह अपनी उठती हुई किरणों से ऐसा जान पड़ता है मानो कौतुकवश इसने नेत्र ही खोल रक्खे हों’ ।। ५२-५६ ॥ उत्तरमें वे वैश्य-पुत्र कहने लगे कि हे राजन् ! सुनिये, हमलोगोंने एक बड़ा आश्चर्य देखा है और ऐसा आश्चर्य, जिसे कि पहले कभी नहीं देखा है। समुद्रके बीचमें एक द्वारावती नगरी है जो ऐसी जान पड़ती है मानो पातालसे ही निकल कर पृथिवी पर आई हो। वहाँ चूनासे पुते हुए बड़े-बड़े भवन सघनता से विद्यमान हैं जिससे ऐसा जान पड़ता है मानो समुद्रके फेनका समूह ही नगरीके आकार परिणत हो गया हो। वह शत्रुओंके द्वारा अलङ्घनीय है अतः ऐसी जान पड़ती है मानो भरत चक्रवर्तीका दूसरा पुण्य ही हो । भगवान् नेमिनाथकी उत्पत्तिका कारण होनेसे वह नगरी सब नगरियोंमें उत्तम है, कोई भी उसका विघात नहीं कर सकता है, वह याचकोंसे रहित है, यह उसके महलों पर बहुत-सी पताकाएँ फहराती रहती हैं जिससे ऐसा जान पड़ता है कि ‘यह गौरव रहित शरद् ऋतुके बादलोंका समूह मेरे ऊपर रहता है’ इस ईष्र्याके कारण ही वह मानो महलोंके अग्रभाग पर फहराती हुई चञ्चल पताकाओं रूपी बहुत-सी भुजाओंसे आकाशमें ऊँचाई पर स्थित शरद् ऋतुके बादलोंको वहाँ से दूर हटा रही हो। वह नगरी ठीक समुद्रके जलके समान है क्योंकि जिस प्रकार समुद्रके जल में बहुतसे रत्न रहते हैं उसी प्रकार उस नगरी में भी बहुतसे रत्न विद्यमान हैं, जिस प्रकार समुद्रका जल कृष्ण तेज अर्थात् काले वर्णसे सुशोभित रहता है उसी प्रकार वह नगरी भी कृष्ण तेज अर्थात् वसुदेवके पुत्र श्री कृष्णके प्रतापसे सुशोभित है, और जिस प्रकार समुद्रके जलमें सदा गम्भीर शब्द होता रहता है उसी प्रकार उस नगरीमें भी सदा गम्भीर शब्द होता रहता है। वह नौ योजन चौड़ी तथा बारह योजन लम्बी है, समुद्रके बीचमें है तथा यादवोंकी नगरी कहलाती है। हम लोगोंने ये रत्न वहीं प्राप्त किये हैं’ ऐसा वैश्य-पुत्रोंने कहा ।। ५७-६४ ॥
श्लोक 65 से 81 : जरासन्ध का आक्रमण और महायुद्ध की तैयारी
जब दैवसे छले गये अहङ्कारी जरासन्धने वैश्य-पुत्रोंके उक्त वचन सुने तो वह क्रोधसे अन्धा हो गया, उसकी दृष्टि भयङ्कर हो गई, यही नहीं, बुद्धिसे भी अन्धा हो गया ॥ ६५ ॥ जिसकी सेना, असमयमें प्रकट हुए प्रलयकालके लहराते समुद्रके समान चञ्चल है ऐसा वह जरासन्ध यादव लोगोंका शीघ्र ही नाश करनेके लिए तत्काल चल पड़ा ॥ ६६ ॥ बिना कारण ही युद्धसे प्रेम रखनेवाले नारदजीको जब इस बातका पता चला तो उन्होंने शीघ्र ही जाकर श्रीकृष्णसे जरासन्धके कोपका समाचार कह दिया ॥ ६७ ॥ ‘शत्रु चढ़कर आ रहा है’ यह समाचार सुनकर श्रीकृष्णको कुछ भी आकुलता नहीं हुई । उन्होंने नेमिकुमारके पास जाकर कहा कि आप इस नगरकी रक्षा कीजिए। सुना है कि मगधका राजा जरासन्ध हम लोगोंको जीतना चाहता है सो मैं उसे आपके प्रभावसे घुणके द्वारा खाये हुए जीर्ण वृक्षके समान शीघ्र ही नष्ट किये देता हूं। श्रीकृष्णके बीरता पूर्ण वचन सुनकर जिनका चिन्त प्रसन्नतासे भर गया है जो कुछ-कुछ मुसकरा रहे हैं और जिनके नेत्र मधुरतासे ओत-प्रोत हैं ऐसे भगवान् नेमिनाथको अवधिज्ञान था अतः उन्होंने निश्चय कर लिया कि विरोधियोंके ऊपर हम लोगोंकी विजय निश्चित रहेगी। उन्होंने दाँतोंकी देदीप्यमान कान्तिको प्रकट करते हुए ‘ओम्’ शब्द कह दिया अर्थात् द्वारावतीका शासन स्वीकृत कर लिया। जिस प्रकार जैनवादी अन्यथा-नुपपत्ति रूप लक्षणसे सुशोभित पक्ष आदिके द्वारा ही अपनी नयका निश्चय कर लेता है उसी प्रकार श्रीकृष्णने भी नेमिनाथ भगवान्की मुसकान आदिसे ही अपनी विजयका निश्चय कर लिया था ।। ६८-७२ ।। अथानन्तर कृष्ण और बलदेव, शत्रुओंको जीतनेके लिए जय, विजय, सारण, अङ्गद, दव, उद्धव, सुमुख, पद्म, जरा, सुदृष्टि, पाँचों पाण्डव, सत्यक, द्रुपद, समस्त यादव, विराट्, अपरिमित सेनाओंसे युक्त धृष्टार्जुन, उग्रसेन, युद्धका अभिलाषी चमर, विदुर तथा अन्य राजाओंके साथ उद्धत होकर युद्धके लिए तैयार हुए और वहाँ से चलकर कुरुक्षेत्र में जा पहुँचे ।। ७३-७६ ।। उधर युद्धकी इच्छा रखनेवाला जरासन्ध भी अपनी गर्मी (अहङ्कार) प्रकट करनेवाले भीष्म, कर्ण, द्रोण, अश्वत्थामा, रुक्म, शल्य, वृषसेन, कृप, कृपवर्मा, रुदिर, इन्द्रसेन, राजा जयद्रथ, हेमप्रभ, पृथिवीका नाथ दुर्योधन, दुःशासन, दुर्मर्पण, दुर्धर्षण, दुर्जय, राजा कलिङ्ग, भगदत्त, तथा अन्य अनेक राजाओंके साथ कृष्णके सामने आ पहुंचा ।। ७७-८० ॥ उस समय श्री कृष्णकी सेनामें युद्धकी भेरियाँ बज रही थीं सो जिस प्रकार कुसुम्भ रङ्ग वस्त्रको रङ्ग देता है उसी प्रकार उन भेरियोंके उठते हुए शब्दने भी शूरवीरोंके चित्तको रङ्ग दिया था ।॥ ८१ ॥
श्लोक 82 से 93 : युद्धपूर्व वातावरण और श्रीकृष्ण की जिनपूजा
उन भेरियोंका शब्द सुनकर कितने ही राजा लोग देवताओंकी पूजा करने लगे और कितने ही गुरुओंके पास जाकर अहिंसा आदि व्रत ग्रहण करने लगे ।। ८२ ॥ युद्धके सम्मुख हुए कितने ही राजा अपने भृत्योंसे कह रहे थे कि ‘तुम लोग कवच धारण करो, पैनी तलवार लो, धनुष चढ़ाओ और हाथी तैयार करो । घोड़ों पर जीन कस कर तैयार करो, स्त्रियाँ अधिकारियोंके लिए सौंपो, रथोंमें घोड़े जोत दो, निरन्तर भोग-उपभोग की वस्तुओंका सेवन किया जाय और बन्दी तथा मागध लोग अपने पराक्रमकी वन्दना करें -स्तुति करें’ ।। ८३-८६ ॥ उस समय कितने ही राजा, स्वामीकी भक्तिसे, कितने ही स्वाभाविक पराक्रमसे, कितने ही शत्रुओं पर जमी हुई ईर्ष्यासे, कितने ही यश पानेकी इच्छासे, कितने ही शूरवीरोंकी गति पानेके लोभसे, कितने ही अपने वंशके अभिमानसे और कितने ही युद्ध सम्बन्धी अन्य-अन्य कारणोंसे प्राणोंका नाश करनेके लिए तैयार हो गये थे ।॥ ८७-८८ ॥ उस समय श्रीकृष्ण भी बड़ा गर्व कर रहे थे, सब आभूषण पहिने थे और शरीर पर केशर लगाये हुए थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो सिन्दूर लगाये हुए हाथी हों ।। ८९ ।। ‘आपकी जय हो’, ‘आप चिरंजीव रहे’इस प्रकार बन्दीजन उनका मङ्गलपाठ पढ़ रहे थे जिससे वे ऐसे जान पड़ते थे मानो चातकोंकी सुन्दर ध्वनिसे युक्त नवीन मेघ ही हो ॥९०॥ उन्होंने सज्जनोंके द्वारा धारण की हुई पवित्र सुवर्णमय झारीके जलसे आचमन किया, शुद्ध जलसे शीघ्र ही पूर्ण जलाञ्जलि दी और फिर गन्ध पुष्प आदि द्रव्योंके द्वारा विघ्न्नोंका नाश करने वाले, स्वामी रहित (जिनका कोई स्वामी नहीं) तथा भव्य जीवोंका मनोरथ पूर्ण करनेके लिए कल्पवृक्षके समान श्री जिनेन्द्रदेवकी भक्तिपूर्वक पूजा की, उन्हें नमस्कार किया । तदनन्तर चारों ओर गुरुजनों और सामन्तोंको अथवा प्रामाणिक सामन्तोंको रखकर स्वयं ही शत्रुको नष्ट करनेके लिए उसके सामने चल पड़े ।। ९१-९ ३ ॥
श्लोक 94 से 101 : सेनाओं की व्यूह-रचना और युद्ध का प्रारम्भ
तदनन्तर कृष्णकी आज्ञासे अनुराग रखनेवाले प्रशंसनीय परिचारकोंने यथायोग्य रीतिसे सेनाकी रचना की ॥ ९४ ॥ जरासन्ध भी संग्राम रूपी युद्धभूमिके बीचमें आ बैठा और कठोर सेनापतियोंके द्वारा सेनाकी योजना करवाने लगा ।। ९५ ।। इस प्रकार जब सेनाओंकी रचना ठीक-ठीक हो चुकी तब युद्धके नगाड़े बजने लगे । शूर-वीर धनुषधारियोंके द्वारा छोड़े हुए बाणोंसे आकाश भर गया और उसने सूर्यकी फैलती हुई किरणोंकी सन्ततिको रोक दिया- ढक दिया। ‘सूर्य अस्त हो गया है’ इस भयकी आशङ्कासे मोहवश चकवा-चकवी परस्पर विद्युड़ गये। अन्य पक्षी भी शब्द करते हुए घोंसलोंकी ओर जाने लगे। उस समय युद्धके मैदानमें इतना अन्धकार हो गया था कि योद्धा परस्पर एक दूसरेको देख नहीं सकते थे परन्तु कुछ ही समय बाद क्रुद्ध हुए मदोन्मत्त हाथियोंके दाँतोंकी टक्कर से उत्पन्न हुई अग्निके द्वारा जब वह अन्धकार नष्ट हो जाता और सब दिशाएँ साफ-साफ दिखने लगतीं तब समस्त शस्त्र चलानेमें निपुण योद्धा फिरसे युद्ध करने लगते थे। विक्रमरसप्ते भरे योद्धाओंने क्षण भर में खूनकी नदियाँ बहा दीं ॥ ९९ -१०० ॥ भयङ्कर तलवारकी धारसे जिनके आगेके दो पैर कट गये हैं ऐसे घोड़े उन तपस्वियोंकी गतिको प्राप्त हो रहे थे जो कि तप धारण कर उसे छोड़ देते हैं ।॥ १०१ ॥
श्लोक 102 से 111: भीषण युद्ध का विकराल स्वरूप
जिनके पैर कट गये हैं ऐसे हाथी इस प्रकार पड़ गये थे मानो प्रलय कालकी महावायुसे जड़से उखड़ कर नीले रङ्गके बड़े-बड़े पहाड़ ही पड़ गये हों ।॥ १०२ ॥ शत्रु भी जिनके साहसपूर्ण कार्योंकी प्रशंसा कर रहे हैं ऐसे पड़े हुए योद्धाओंके प्रसन्नमुखकमल, स्थल कमल (गुलाब) की शोभा धारण कर रहे थे ॥ १०३ ॥ योद्धाओंने अपनी कुशलतासे परस्पर एक दूसरेके शस्त्र तोड़ डाले थे परन्तु उनके टुकड़ोंसे ही समीपमें खड़े हुए बहुतसे लोग मर गये थे॥ १०४ ॥ कितने ही योद्धा न ईष्र्यासे, न क्रोधसे, न यशसे, और न फल पानेकी इच्छा से युद्ध करते थे किन्तु ‘यह न्याय है’ ऐसा सोचकर युद्ध कर रहे थे ॥ १०५ ॥ जिनका शरीर सर्व प्रकार के शस्त्रोंसे छिन्न-भिन्न हो गया है ऐसे कितने ही वीर योद्धा हाथियोंके स्कन्धसे नीचे गिर गये थे परन्तु कानोंके आभरणोंमें पैर फँस जानेसे लटक गये थे जिससे ऐसे जान पड़ते थे मानो वे अपना चिर-परिचित स्थान छोड़ना नहीं चाहते हों और इसीलिए कानोंके अग्रभागका सहारा ले नीचेकी ओर मुखकर लटक गये हों ।॥ १०६-१०७ ॥ बड़ी चपलतासे चलनेवाले कितने ही योद्धा अपने रक्षाकी लिए बायें हाथमें भाल लेकर शस्त्रोंवाली दाहिनी भुजासे शत्रुओंको मार रहे थे ।। १०८ ॥ आगममें जो मनुष्योंका कदलीघात नामका अकालमरण बतलाया गया है उसकी अधिकसे अधिक संख्या यदि हुई थी तो उस युद्धमें ही हुई थी ऐसा उस युद्धके मैदानके विषयमें कहा जाता है ॥१०९ धा इस प्रकार दोनों सेनाओंमें चिरकाल तक तुमुल युद्ध होता रहा जिससे यमराज भी खूब सन्तुष्ट हो गया था ।। ११० ।। तदनन्तर जिस प्रकार किसी छोटी नदीके जलको महानदीके प्रवाहका जल दबा देता है उसी प्रकार श्रीकृष्णकी सेनाको शत्रकी सेनाने दबा दिया ।। १११ ॥
श्लोक 112 से 121 : जरासन्ध-वध और श्रीकृष्ण की दिग्विजय
यह देख, जिस प्रकार सिंह हाथियोंके समूह पर टूट पड़ता है उसी प्रकार श्रीकृष्ण क्रुद्ध होकर तथा सामन्त राजाओंकी सेनाके समूह साथ लेकर शत्रुको मारनेके लिए उद्यत हो गये- शत्रु पर टूट पड़े ॥ ११२ ॥ जिस प्रकार सूर्यका उदय होते ही अन्धकार विलीन हो जाता है उसी प्रकार श्रीकृष्णको देखते ही शत्रुओं की सेना विलीन हो गई – उसमें भगदड़ मच गई। यह देख, क्रोधसे भरा जरासन्ध आया और उसने रूक्ष दृष्टिसे देखकर, अपने पराक्रमसे समस्त दिशाओंको प्रकाशित करनेवाला चक्ररत्न ले श्रीकृष्णकी ओर चलाया ।। ११३-११४ ।। परन्तु वह चक्र प्रदक्षिणा देकर श्रीकृष्णकी दाहिनी भुजा पर ठहर गया। तदनन्तर वही चक्र लेकर श्रीकृष्णने मगधेश्वर – जरासन्धका शिर काट डाला ॥ ११५ ॥ उसी समय कृष्णकी सेनामें जीतके नगाड़े बजने लगे और आकाशसे सुगन्धित जलकी बूँदोंके साथ-साथ कल्पवृक्षों के फूल बरसने लगे ॥ ११६ ॥ चक्रवर्ती श्रीकृष्णने दिग्विजयकी भारी इच्छाके चक्ररत्न आगे कर बड़े भाई बलदेव तथा अपनी सेनाके साथ प्रस्थान किया ॥ ११७ ॥ जिनका उदय बलवान् है ऐसे श्रीकृष्णने मागध आदि प्रसिद्ध देवोंको जीत कर अपना सेवक बनाया और उनके द्वारा दिये हुए श्रेष्ठ रत्न ग्रहण किये ॥ ११८ ॥ लवण समुद्र सिन्धु नदी और विजयार्धपर्वतके बीचके म्लेच्छ राजाओंसे नमस्कार कराकर उनसे अपने पैरोंके नखोंकी कान्तिका भार उठवाया ।। ११९ ॥ तदनन्तर विजयार्ध पर्वत, लवणसमुद्र और गङ्गानदीके मध्यमें स्थित म्लेच्छ राजाओंको विद्याधरोंके साथ ही साथ जितेन्द्रिय श्रीकृष्णने शीघ्र ही वश कर लिया ।। १२० ।। इस प्रकार आधे भरतके स्वामी होकर श्रीकृष्णने, जिसमें बहुत ऊँची पताकाएँ फहरा रही हैं और जगह जगह तोरण बाँधे गये हैं ऐसी द्वारावती नगरी में बड़े हर्षसे प्रवेश किया ॥ १२१ ॥
श्लोक 122 से 130 : चक्रवर्ती श्रीकृष्ण का वैभव और जलक्रीड़ा
प्रवेश करते ही देव और विद्याधर राजाओंने उन्हें तीन खण्डका स्वामी चक्रवर्ती मानकर उनका बिना कुछ कहे सुने ही अपने आप राज्याभिषेक किया ॥ १२२ ॥
श्रीकृष्णकी एक हजार वर्षकी आयु थी, दश धनुषकी ऊँचाई थी, अतिशय सुशोभित नील-कमलके समान उनका वर्ण था, और लक्ष्मीसे आलिङ्गित उनका शरीर था ।॥ १२३ ॥ चक्र, शक्ति, गदा, शङ्ख, धनुष, दण्ड, और नन्दक नामका खङ्ग ये उनके सात रन थे। इन सभी रत्नोंकी देव लोग रक्षा करते थे ।। १२४ ॥ रत्नमाला, गदा, हल और मूसल ये देदीप्यमान चार महारत्न बलदेव प्रभुके थे ।। १२५ ।। रुक्मिणी, सत्यभामा, सती जाम्बवती, सुसीमा, लक्ष्मणा, गान्धारी, सप्तमी गौरी और प्रिया पद्मावती ये आठ देवियां श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ थीं। इनकी सब मिलाकर सोलह हजार रानियाँ थीं तथा बलदेवके सब मिलाकर अभीष्ट सुख देनेवाली आठ हजार रानियां थीं । ये दोनों भाई इन रानियोंके साथ देवोंके समान सुख भोगते हुए परम प्रीतिको प्राप्त हो रहे थे ।।१२६-१२८।। इस प्रकार पूर्व जन्ममें किये हुए अपने पुण्य कर्मके उदयसे पुष्कल भोगोंको भोगते हुए श्रीकृष्णका समय सुखसे व्यतीत हो रहा था। किसी एक समय शरद् ऋतुमें सब अन्तःपुरके साथ मनोहर नामके सरोवरमें सब लोग मनोहर जलकेली कर रहे थे। वहीं पर जल उछालते समय भगवान् नेमिनाथ और सत्यभामाके बीच चतुराईसे भरा हुआ मनोहर वार्तालाप हुआ ।। १२९ -१३०॥
श्लोक 131 से 141: नेमिकुमार का पराक्रम और विवाह का विचार
सत्यभामाने कहा कि आप मेरे साथ अपनी प्रियाके समान क्रीड़ा क्यों करते हैं? इसके उत्तर में नेमिराजने कहा कि क्या तुम मेरी प्रिया (इष्ट) नहीं हो ? सत्यभामाने कहा कि यदि मैं आपकी प्रिया (स्त्री) हूं तो फिर आपके भाई (कृष्ण) किसके पास जावेंगे ? नेमिनाथने उत्तर दिया कि वे कामिनीके पास जावेंगे ? सत्यभामाने कहा कि सुनूँ तो सही वह कामिनी कौन सी है ? उत्तर में नेमिनाथने कहा कि क्या तुम नहीं जानती ? अच्छा अब जान जाओगी। सत्यभामाने कहा किसब लोग आपको सीधा कहते हैं पर आप तो बड़े कुटिल हैं। इस प्रकार जब विनोद करते-करते स्नान समाप्त हुआ तब नेमिनाथने सत्यभामासे कहा कि हे नीलकमलके समान नेत्रों वाली ! तू मेरा यह स्नानका वस्त्र ले। सत्यभामाने कहा कि मैं इसका क्या करूँ ? नेमिनाथने कहा कि इसे धो डाल । तब सत्यभामा कहने लगी कि क्या आप श्रीकृष्ण हैं ? वह श्रीकृष्ण, जिन्होंने कि नागशय्या पर चढ़कर शार्ङ्ग नामका दिव्य धनुष अनायास ही चढ़ा दिया था और दिगदिगन्तको पूर्ण करने-वाला शङ्ख पूरा था ? क्या आपमें वह साहस है, यदि नहीं है तो आप मुझसे वस्त्र धोनेकी बात कहते हैं ? ।। १३१-१३६ ।। नेमिनाथने कहा कि ‘मैं यह कार्य अच्छी तरह कर दूंगा’ इतना कहकर वे गर्वसे प्रेरित हो नगरकी ओर चल पड़े और वह आश्चर्यपूर्ण कार्य करनेके लिए आयुधशालामें जा घुसे । वहाँ वे नागराजके महामणियोंसे सुशोभित नागशय्यापर अपनी ही शय्याके समान चढ़ गये, बार बार स्फालन करनेसे जिसकी डोरी रूपी लता बड़ा शब्द कर रही है ऐसा धनुष उन्होंने चढ़ा दिया और दिशाओंके अन्तरालको रोकनेवाला शङ्ख फूंक दिया ।। १३७-१३९ ।। उस समय उन्होंने अपने आपको महान् उन्नत समझा सो ठीक ही है क्योंकि राग और अहंकारका लेशमात्र भी प्राणीको अवश्य ही विकृत बना देता है ॥ १४० ॥ जिस समय आयुधशालामें यह सब हुआ था उस समय श्रीकृष्ण कुसुमचित्रा नामकी सभाभूमिमें विराजमान थे। वे सहसा ही यह आश्चर्यपूर्ण काम सुन कर व्यग्र हो उठे, उनका मन अत्यन्न व्याकुल हो गया ।॥ १४१ ॥
श्लोक 142 से 151 : राजीमती के साथ विवाह की तैयारी
बड़े आश्चर्यके साथ उन्होंने किंकरोंसे पूछा कि ‘यह क्या है ?’ किंकरोंने भी अच्छी तरह पता लगा कर श्रीकृष्णसे सब बात ज्योंकी त्यों निवेदन कर दी। किंकरोंके वचन सुनकर चक्रवर्ती कृष्णसे बड़ी सावधानीके साथ विचार करते हुए कहा कि आश्चर्य है, बहुत समय बाद कुमार नेमिनाथका चित्त रागसे युक्त हुआ है। अब यह नवयौवनसे सम्पन्न हुए हैं अतः विवाहके योग्य हैं- इनका विवाह करना चाहिए। सो ठीक ही है ऐसा कौन सकर्मा प्राणी है जिसे दुष्ट कामके द्वारा बाधा नहीं होती हो ।। १४२-१४४ ॥ यह कह कर उन्होंने विचार किया कि उग्रवंशरूपी समुद्रको बढ़ानेके लिए चन्द्रमाके समान, राजा उग्रसेनकी जयावती रानीसे उत्पन्न हुई राजीमति नामकी पुत्री है जो सर्वाङ्ग सुन्दर है ।। १४५ ।। विचारके बाद ही उन्होंने राजा उमसेनके घर स्वयं जाकर बड़े आदरसे ‘आपकी पुत्री तीन लोकके नाथ भगवान् नेमिकुमारकी प्रिया हो’ इन शब्दोंमें उस माननीय कन्याकी याचना की ।। १४६ ॥ इसके उत्तर में राजा उग्रसेनने कहा कि ‘हे देव ! तीन खण्डमें उत्पन्न हुए रत्नोंके आप ही स्वामी हैं, और खास हमारे स्वामी हैं, अतः यह कार्य आपको ही करना है- आप ही इसके नाथ हैं हम लोग कौन होते हैं?’ इस प्रकार राजा उग्रसेनके वचन सुन कर श्रीकृष्ण महाराज बहुत ही हर्षित हुए। तदनन्तर उन्होंने किसी शुभदिनमें वह विवाहका उत्सव करना प्रारम्भ किया और सबसे उत्तम तथा मनोहर पाँच प्रकारके रत्नोंका विवाहमण्डप बनवाया। उसके बीचमें एक वेदिका बनवाई गई थी जो नवीन मोतियोंकी सुन्दर रङ्गावलीसे सुशोभित थी, मङ्गलमय सुगन्धित फूलोंके उपहार तथा वृष्टिसे मनोहर थी, उस पर सुन्दर नवीन वस्त्र ताना गया था, और उसके बीचमें सुवर्णकी चौकी रखी हुई थी। उसी चौकी पर नेमिकुमारने वधू राजीमतीके साथ गीले चावलोंपर बैठनेका नेंग (दस्तूर) किया ॥१४७-१५१।।
श्लोक 152 से 162 : वैराग्य का कारण और पशुओं की करुण दशा
दूसरे दिन वरके हाथमें जलधारा देनेका समय था। उस दिन मायाचारियोंमें श्रेष्ठ तथा दुर्गतिको जानेकी इच्छा करनेवाले श्रीकृष्णका अभिप्राय लोभ कषायके तीव्र उदयसे कुत्सित हो गया। उन्हें इस बात की आशंका उत्पन्न हुई कि कहीं इन्द्रोंके द्वारा पूजनीय भगवान् नेमिनाथ हमारा राज्य न ले लें। उसी क्षण उन्हें विचार आया कि ‘ये नेमिकुमार वैराग्यका कुछ कारण पाकर भोगोंसे विरक्त हो जायेंगे। ऐसा विचार कर वे वैराग्यका कारण जुटानेका प्रयत्न करने लगे। उनकी समझमें एक उपाय आया। उन्होंने बड़े-बड़े शिकारियोंसे पकड़वाकर अनेक मृगोंका समूह बुलाया और उसे एक स्थानपर इकट्ठाकर उसके चारों ओर बाड़ी लगवा दी तथा वहाँ जो रक्षक नियुक्त किये थे उनसे कह दिया कि यदि भगवान् नेमिनाथ दिशाओंका अवलोकन करनेके लिए आवें और इन मृगोंके विषयमें पूछें तो उनसे आप लोग साफ साफ कह देना कि आपके विवाह में मारनेके लिए चक्रवर्तीने यह मृगोंका समूह बुलाया है। महा-पापका बन्ध करनेवाले श्रीकृष्णने ऐसा उन लोगोंको आदेश दिया ॥१५२-१५७ ॥ तदनन्तर जो नाना प्रकारके आभूषणोंसे देदीप्यमान हैं, जिनके शिरके बाल सजे हुए हैं, जो लाल कमलोंकी मालासे अलंकृत हैं, घोड़ोंके खुरोंसे उड़ी हुई धूलिके द्वारा जिन्होंने दिशाओंके अग्रभाग लिप्त कर दिये हैं, और जो समान अवस्था वाले, अतिशय प्रसन्न बड़े-बड़े मण्डलेश्वर राजाओंके पुत्रोंसे घिरे हुए हैं ऐसे नयनाभिराम भगवान् नेमिकुमार भी चित्रा नामकी पालकीपर आरूढ़ होकर दिशाओंका अवलोकन करनेके लिए निकले। वहाँ उन्होंने घोर करुण स्वरसे चिल्ला-चिल्लाकर इधर-उधर दौड़ते, प्यासे, दीनदृष्टिसे युक्त तथा भयसे व्याकुल हुए मृगोंको देख दयावश वहाँ के रक्षकोंसे पूछा कि यहपशुओंका बहुत भारी समूह यहाँ एक जगह किस लिए रोका गया है ? ।। १५८-१६२ ॥
श्लोक 163 से 171 : नेमिनाथ का वैराग्य और दीक्षा
उत्तरमें रक्षकोंने कहा कि ‘हे देव ! आपके विवाहोत्सवमें व्यय करनेके लिए महाराज श्रीकृष्णने इन्हें बुलाया है’ ।। १६३ ।। यह सुनते ही भगवान् नेमिनाथ विचार करने लगे ‘त्रिः ये पशु जङ्गलमें रहते हैं, तृण खाते हैं और कभी किसीका कुछ अपराध नहीं करते हैं फिर भी लोग इन्हे अपने भोगके लिए पीडा पहुँचाते हैं । ऐसे लोगोंको धिक्कार है। अथवा जिनके चित्तमें गाढ़ मिथ्यात्व भरा हुआ है ऐसे मूर्ख तथा दयाहीन प्राणी अपने नश्वर प्राणोंके द्वारा जीवित रहनेके लिए क्या नहीं करते हैं ? देखो, दुर्बुद्धि कृष्णने मुझपर अपने राज्य-ग्रहणकी आशङ्काकर ऐसा कपट किया है। यथार्थमें दुष्ट मनुष्योंकी चेष्टा कष्ट देनेवाली होती है’। ऐसा विचारकर वे विरक्त हुए और लौटकर अपने घर आ गये.। रत्नत्रय प्रकट होनेसे उसी समय लौकान्तिक देवोंने आकर उन्हें समझाया, अपने पूर्व भवोंका स्मरण कर वे भयसे काँप उठे। उसी समय इन्होंने आकर दीक्षा कल्याणकका उत्सव किया ।। १६४-१६८ ।। तदनन्तर देवकुरु नामक पालकीपर सवार होकर वे देवोंके साथ चल पड़े। सहस्राम्रवनमें जाकर तेलाका नियम लिया और श्रावण शुक्ला षष्ठी के दिन सायंकाल के समय, कुमार-कालके तीन सौ वर्ष बीत जानेपर एक हजार राजाओंके साथ-साथ संयम धारण कर लिया। उसी समय उन्हें चौथा-मनः-पर्यय ज्ञान हो गया और केवलज्ञान भी निकट कालमें हो जावेगा ॥ १६९ -१७१ ।।
श्लोक 172 से 181 : राजीमती का त्याग, आहारदान और केवलज्ञान
जिस प्रकार संध्या सूर्यके पीछे-पीछे अस्ताचलपर चली जाती है उसी प्रकार राजीमती भी उनके पीछे-पीछे तपश्चरणके लिए चली गई सो ठीक ही है क्योंकि शरीरकी बात तो दूर रही, वचन मात्रसे भी दी हुई कुलस्त्रियोंका यही न्याय है ॥ १७२ ॥ अन्य मनुष्य तो अपने दुखसे भी विरक्त हुए नहीं सुने जाते पर जो सज्जन पुरुष होते हैं वे दूसरेके दुःखसे ही महाविभूतिका त्याग कर देते हैं ।॥ १७३ ।। बलदेव तथा नारायण आदि मुख्य राजा और इन्द्र आदिदेव, सब अनेक स्तवनोंके द्वारा उन भगवान्की स्तुतिकर अपने-अपने स्थानपर चले गये ॥ १७४ ।। पारणाके दिन उन सज्जनोत्तम भगवान्ने द्वारावती नगरी में प्रवेश किया। वहाँ सुवर्णके समान कान्तिवाले तथा श्रद्धा आदि गुणोंसे सम्पन्न राजा वरदत्तने पडिगाहन आदि नवधा भक्तिकर उन्हें मुनियोंके ग्रहण करने योग्य-शुद्ध प्रासुक आहार दिया तथा पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये ।। १७५-१७६ ॥ उसके घर देवोंके हाथसे छोड़ी हुई साढ़ेबारह करोड़ रत्नोंकी वर्षा हुई, फूल बरसे, मन्दता आदि तीन गुणोंसे युक्त वायु चलने लगी, मेघोंके भीतर छिपे देवोंके द्वारा ताडित दुन्दुभियोंका सुन्दर शब्द होने लगा और आपने बहुत अच्छा दान दिया यह घोषणा होने लगी ।। १७७-१७८ ।। इस प्रकार तपस्या करते हुए जब उनकी छद्मस्थ अवस्थाके छप्पन दिन व्यतीत हो गये तब एक दिन वे रैवतक (गिरनार) पर्वतपर तेलाका नियम लेकर किसी बड़े भारी बाँसके वृत्तके नीचे विराजमान हो गये । निदान, आसौज कृष्ण पडिमाके दिन चित्रा नक्षत्रमें प्रातःकालके समय उन्हें समस्त पदार्थोंको विषय करनेवाला केवलज्ञान उत्पन्न हुआ । देवोंने केवलज्ञान कल्याणका उत्सवकर उनकी पूजा की ।। १७९ -१८१ ॥
श्लोक 182 से 190 : धर्मसभा और श्रीकृष्ण का आगमन
उनकी सभा में वरदत्तको आदि लेकर ग्यारह गणधर थे, चार सौ श्रुतज्ञानरूपी समुद्रके पारगामी पूर्वोके जानकार थे, ग्यारह हजार आठ सौ शिक्षक थे, पन्द्रह सौ तीन ज्ञानके धारक थे, इतने ही केवल-ज्ञानी थे, ग्यारह सौ विक्रियाऋद्धिके धारक थे, नौ सौ मनःपर्ययज्ञानी थे और आठ सौ वादी थे। इस प्रकार सब मिलाकर उनकी सभामें अठारह हजार मुनिराज थे। यक्षी, राजीमती, कात्यायनी आदि सब मिला कर चालीस हजार आर्यिकाएँ थीं, एक लाख श्रावक थे, तीन लाख श्राविकाएँ थीं, असंख्यात देव-देवियाँ थीं और संख्यात तिर्यञ्च थे। इस तरह बारह सभाओंसे घिरे हुए भगवान् नेमिनाथ, पापोंको नष्ट करनेवाले, धर्मोपदेश रूपी सूर्यकी किरणोंके प्रसारसे भव्य जीव रूपी कमलोंको बार-बार विकसित करते हुए समस्त देशोंमें घूमे थे। अन्त में कृतकृत्य भगवान् द्वारावती नगरी में आकर रैवतक गिरिके उद्यानमें विराजमान हो गये । अन्तिम नारायण कृष्ण तथा बलदेवने जब यह समाचार सुना तब वे अपनी समस्त विभूतिके साथ उनके पास गये । वहाँ जाकर उन दोनोंने वन्दना की, धर्मका स्वरूप सुना और प्रसन्नताका अनुभव किया ॥ १८२-१९ ० ।।
श्लोक 191 से 200 : जीवतत्त्व का उपदेश और देवकी का प्रश्न
तदनन्तर श्रीकृष्णने कहा कि हे भगवन् ! कोई तो कहते हैं कि जीव नामका पदार्थ है ही नहीं, कोई उसे नित्य मानते हैं, कोई क्षणस्थायी मानते हैं, कोई अणुसे भी सूक्ष्म मानते हैं ? कोई श्यामाक नामक धान्यके बराबर मानते हैं, कोई एक अङ्गुष्ठ प्रमाण मानते हैं, कोई पाँचसौ योजन मानते हैं, कोई आकाशकी तरह व्यापक मानते हैं? कोई एक मानते हैं, कोई नाना मानते हैं, कोईअज्ञानी मानते हैं और कोई उसके विपरीत ज्ञानसम्पन्न मानते हैं। इसलिए हे भगवन्, मुझे जीवं तत्त्वके प्रति संदेह हो रहा है, इस प्रकार श्रीकृष्णने भगवान्से पूछा। भगवान् उत्तर देने लगे कि जीव तत्त्वके विषयमें अब तक आप लोगोंने जो विकल्प उठाये हैं उनमेंसे इस जीवका एक भी लक्षण नहीं है यह आप निश्चित समझिए। यह जीव उत्पाद व्यय तथा ध्रौव्यसे युक्त है, गुणवान् है, सूक्ष्म है, अपने किये हुए कर्मोंका फल भोगता है, ज्ञाता है, ग्रहण किये शरीरके बराबर है, सुख-दुःख आदिसे इसका संवेदन होता है, अनादि कालसे कर्मबद्ध होकर चारों योनियोंमें भ्रमण कर रहा है। यदि यह जीव भव्य होता है तो कालादि लब्धियोंका निमित्त पाकर ज्ञानावरणादि आठ कर्मोंका क्षय हो जानेसे सम्यक्त्व आदि आठ गुण प्राप्त कर लेता है और मुक्त होकर चरम शरीरके बराबर हो जाता है। चूँकि इस जीवका स्वभाव ऊर्ध्वगमनका है इसलिए वह तीन लोकके ऊपर विद्यमान रहता है। इस प्रकार जगद्गुरु भगवान् नेमिनाथने जीवके सद्भावका निरूपण किया ॥ १९१-१९७ ।। उसे सुन कर जो भव्य जीव थे, उन्होंने जैसा भगवान्ने कहा था वैसा ही मान लिया परन्तु जो अभव्य अथवा दूरभव्य थे वे मिध्यात्वके उदयसे दूषित होनेके कारण संसारको बढ़ानेवाली अपनी अनादि वासना नहीं छोड़ सके । तदनन्तर देवकीने वरदत्त गणधर से पूछा कि हे भगवन् ! मेरे घर पर दो दो करके छह मुनिराज भिक्षाके लिए आये थे उन छहोंमें मुझे कुटुम्बियों जैसा स्नेह उत्पन्न हुआ था सो उसका कारण क्या है ? ।। १९८-२०० ।।
श्लोक 201 से 213 : भानुदत्त के सात पुत्र और मंगी की विषदुर्घटना
इस प्रकार पूछने पर गणधर भी उस कथाको इसप्रकार कहने लगे कि इसी जम्बूद्वीपके भरत-क्षेत्र सम्बन्धी मथुरा नगरमें शौर्य देशका स्वामी शूरसेन नामका राजा रहता था। उसी नगर में भानुदत्त सेठके सात पुत्र हुए थे। उनकी माताका नाम यमुनादत्ता था। उन सात पुत्रोंमें सुभानु सबसे बड़ा था, उससे छोटा भानुकीर्ति, उससे छोटा भानुशूर, पाँचवा शूरदेव, उसप्ते छोटा शूरदत्त, सातवाँ शूरसेन था । इन सातों पुत्रोंसे माता-पिता दोनों ही सुशोभित थे और वे अपने पुण्य कर्मके फलस्वरूप गृहस्थ धर्मको प्राप्त हुए थे। किसी दूसरे दिन आचार्य अभयनन्दीसे धर्मका स्वरूप सुन कर राजा शूरसेन और सेठ भानुदत्त दोनोंने उत्कृष्ट संयम धारण कर लिया। इसी प्रकार सेठकी स्त्री यमुनादत्ताने भी जिनदत्ता नामकी आर्यिकाके पास दीक्षा धारण कर ली ।। २०१-२०६ ।। माता-पिताके चले जानेपर सेठके सातों पुत्र सप्त व्यसनोंमें आसक्त हो गये। उन्होंने पापमें पड़कर अपना सब मूलधन नष्ट कर दिया और ऐसी दशा में राजाने भी उन्हें अपने देशसे बाहर निकाल दिया॥ २०७ ।। अब वे अवन्तिदेशमें पहुँचे और उज्जयिनी नगरीके श्मशानमें छोटे भाई शूरसेनकां बैठा कर बाकी छह भाई चोरी करनेके लिए नगरी में प्रविष्ट हुए ॥ २०८ ॥ उन छहों भाइयोंके चले जानेपर उस श्मशानमें एक घटना और घटी जो कि इस प्रकार है- उस समय उज्जयिनीका राजा वृषभध्वज था, उसके एक दृढ़प्रहार नामका चतुर सहस्रभट योद्धा था, उसकी स्त्रीका नाम वप्रश्री था और उन दोनोंके वज्रमुष्टि नामका पुत्र था । २०९ -२१० ॥ उसी नगर में विमलचन्द्र सेठकी बिमला स्त्रीसे उत्पन्न हुई मंगी नामकी पुत्री थी, वह वत्रमुष्टिकी प्रिया हुई थी। किसी एक दिन वसन्त ऋतुमें उस समयका सुख प्राप्त करनेकी इच्छासे सब लोग राजाके साथ वनमें जानेके लिए तैयार हुए। मंगी भी जानेके लिए तैयार हुई। उसने मालाके लिए कलशमें हाथ डाला परन्तु उसकी सास वप्रश्रीने बहूकी ईर्ष्यासे एक काला साँप मालाके साथ उस कलशमें पहलेसे ही रख छोड़ा था सो ठीक ही है क्योंकि ऐसा कौन सा कार्य है जिसे स्त्रियाँ नहीं कर सकें ॥ २११-२१३ ।।
श्लोक 214 से 221 : मंगी का पुनर्जीवन और शूरसेन का परीक्षण
वसन्त ऋतुके तीव्र विषवाले साँपने उस मंगीको हाथ डालते ही काट खाया जिससे उसके समस्त शरीरमें विष फैल गया और वह उसी समय निश्चेष्ट हो गई ।। २१४ ॥ वपश्री, बहूको पयालसे लपेट कर श्मशानमें छोड़ आई। जब वज्रमुष्टि वनक्रीड़ा समाप्त होनेपर लौट कर आया तो उसने आकुल होकर अपनी माँसे पूछा कि मंगी कहाँ है ? माताने झूठमूठ कुछ उत्तर दिया परन्तु उससे वह संतुष्ट नहीं हुआ। मंगीके नहीं मिलनेसे वह बहुत दुःखी हुआ और नंगी तीक्ष्ण तलवार लेकर ढूँढ़नेके लिए रात्रिमें ही चल पड़ा ।। २१५-२१६ ॥ उस समय श्मशानमें बरधर्म नामके मुनिराज योग धारण कर विराजमान थे । वज्रमुष्टिने भक्तिसे हाथ जोड़ कर उनके दर्शन किये और कहा कि हे पूज्य ! यदि मैं अपनी प्रियाको देख सकूंगा तो सहस्त्रदल वाले कमलोंसे आपकी पूजा करूँगा । ऐसी प्रतिज्ञा कर वज्रमुष्टि आगे गया। आगे चलकर उसने जिसे कुछ थोड़ी सी चेतना बाकी थी, ऐसी विषसे दूषित अपनी प्रिया देखी। वह शीघ्र ही पयाल हटाकर उसेमु निराजके समीप ले आया।।२१७-२१९ ।। और मुनिराज के चरण-कमलोंके स्पर्श रूपी ओषधिसे उसने उसे विषरहित कर लिया । मंगीने भी उठकर अपने पतिका आनन्द बढ़ाया ।। २२० ॥ तदनन्तर गुरुदेवके ऊपर जिसका मन अत्यन्त प्रसन्न है ऐसा वज्रमुष्टि इधर सहस्त्रदल कमल लानेके लिए चला गया। उधर वृक्षोंसे छिपा हुआ शूरसेन यह सब काम देख रहा था ।। २२१ ।।
श्लोक 222 से 231 : मंगी की चंचलता और शूरसेन का वैराग्य
वह मंगीकी परीक्षा करनेके लिए उसके पासआया और उसने उसे अपना शरीर दिखाकर मीठी बातों, चेष्टाओं, लीलापूर्ण विलोकनों और हँसी मजाक आदिसे शीघ्र ही अपने वश कर लिया। वह शूरसेनने कहने लगी कि मैं आपके साथ चलूँगी, आप मुझे लेकर चलिए। मंगीकी बात सुनकर उसने स्पष्ट कहा कि मैं तुम्हारे पत्तिसे डरता हूँ इसलिए तुम्हें ऐसी बात नहीं कहनी चाहिए । उत्तर में मंगीने कहा कि तुम डरो मत, वह नीच डरपोंक तुम्हारा क्या कर सकता है? फिर भी जिससे तुम्हारी कुछ हानि न हो वह काम मैं किये देती हूँ ।। २२२-२२५ ।। इस प्रकार इन दोनोंकी परस्पर बात-चीत हो रही थी कि उसी समय हाथमें कमल लिये वत्रमुष्टि आ गया। उसने अपनी तलवार तो मंगीके हाथमें दे दी और स्वय वह भक्तिसे मुनिराजके दोनों चरण-कमलोंकी पूजा करनेके लिए नम्रीभूत हुआ । उसी समय उसकी प्रियाने उसपर प्रहार करनेके लिए तलवार उठाई परन्तु शूरसेनने उसके हाथसे उसी वक्त तलवार छीन ली । इस कर्मसे शूरसेनके हाथकी अंगुलियाँ कट-कट कर जमीन पर गिर गई ।। २२६-२२८ ॥ यह देखकर वज्रमुष्टिने कहा कि हे प्रिये ! डरो मत। इसके उत्तरमें मंगीने झूठमूठ ही कह दिया कि हाँ, मैं डर गई थी ।॥ २२६ ॥ जिस समय यह सब हो रहा था उसी समय शूरसेन के छह भाई चोरीका धन लेकर आ गये और उससे कहने लगे कि हे भाई ! तू अपना हिस्सा ले ले ।। २३० ।। परन्तु, वह भव्य अत्यन्त विरक्त हो चुका था अतः कहने लगा कि मुझे धनसे प्रयोजन नहीं है, मैं तो संसारसे बहुत ही डर गया हूं इसलिए संयम धारण करूँगा ।। २३१ ।।
श्लोक 232 से 241 : संसार से विरक्ति का उदय
उसकी बात सुनकर भाइयोंने कहा कि तेरे तप ग्रहण करनेका क्या कारण है ? सो कह । इस प्रकार भाइयोंके कहनेपर उसने अपने हाथकी कटी हुई अंगुलियोंका घाव दिखाकर मङ्गी तथा अपने बीचकी सब चेष्टाएँ कह सुनाई। उन्हें सुनकर सुभानु इस प्रकार स्त्रियोंकी निन्दा करने लगा ।। २३२-२३३ ॥ कि पर पुरुषमें आसक्तिको प्राप्त हुई स्त्रियाँ ही निन्दाका स्थान हैं। ये वर्ण मात्रसे सुन्दर दिखती हैं और दूसरे पुरुषोंको अत्यन्त राग युक्त कर लेती हैं। ये बनावटी प्रेमसे ही रागी मनुष्योंके नेत्रोंको प्रिय दिखती हैं और अनेक प्रकारके आभूषणोंसे रमणीय चित्र विचित्र वेष धारण करती हैं ।॥ २३४-२३५ ।। ये विषय-सुख करनेके लिए तो बड़ी मधुर मालूम होती हैं परन्तु अन्तमें किंपाक फलके समूहके समान जान पड़ती हैं। आचार्य कहते हैं कि ये स्त्रियाँ किन्हें नहीं नष्ट कर सकती हैं अर्थात् सभीको नष्ट कर सकती हैं ।॥ २३६ ॥ ये स्त्रियाँ केवल अपनेपुत्रोंकी ही माताएँ नहीं हैं किन्तु दोषोंकी भी माताएँ हैं और जिस प्रकार बुरी शिक्षासे प्राप्त हुई बुरी विद्याएँ दुःख देती हैं उसी प्रकार दुःख देती हैं ।॥ २३७ ॥ ये स्त्रियाँ यद्यपि कोमल हैं, शीतल हैं, चिकनी हैं और प्रायः स्पर्शका सुख देनेवाली हैं तो भी सर्पिणियोंके समान प्राण हरण करने-वाली तथा पाप रूप हैं ।॥ २३८ ॥ साँपोंका विष तो उनके दाँतोंके अन्त में ही रहता है फिर भी वह किसीको मारता है और किसीको नहीं मारता है किन्तु स्त्रीका विष उसके सर्व शरीरमें रहता है वह उनका सहभावी होनेके कारण दूर भी नहीं किया जा सकता और वह हमेशा मारता ही रहता है ॥ २३९ ॥ पापी मनुष्य दूसरे प्राणियोंका अपकार करते अवश्य हैं परन्तु उनके प्राण रहते पर्यन्त ही करते हैं मरनेके बाद नहीं करते पर दयाके साथ द्वेष रखनेवाली स्त्रियाँ हिंसाके समान मरणोत्तर कालमें भी अपकार करती रहती हैं ।॥ २४० ॥ जिन नीतिकारोंने अलगसे विषकन्याओंकी रचना की है उन्हें यह मालूम नहीं रहा कि सभी स्त्रियाँ उत्पत्ति मात्रसे अथवा स्त्रीत्व जाति मात्रसे विषकन्याएँ होती हैं ।॥ २४१ ॥
श्लोक 242 से 257 : दीक्षा, देवगति और पुनर्जन्मों की श्रृंखला
ये स्त्रियाँ कुटिलताकी अन्तिम सीमा हैं, इनकी क्रूरताका पार नहीं है ये सदा पाँच पाप रूप रहती हैं और इनकी चेष्टाएँ सदा तलवार उठाये रखनेवाले पुरुषके समान दुष्टता पूर्ण रहती हैं फिर ये अनार्य अर्थात् म्लेच्छ क्यों न कही जावें ॥ २४२ ।। इस प्रकार सुभानुने अपने भाइयोंके साथ संसारसे विरक्त होकर अपना सब कमाया हुआ धन स्त्रियोंके लिए दे दिया और उन्हीं वरधर्म मुनिराजसे दीक्षा धारण कर ली ॥ २४३ ॥ उनकी स्त्रियोंने भी जिनदत्ता नामक आर्यिकाके समीप तप ले लिया सो ठीक ही है क्योंकि निकट भव्य जीवोंके तप ग्रहण करनेमें कौन-सा हेतु नहीं हो जाता अर्थात् वे अनायास ही तप ग्रहण कर लेते हैं ।॥ २४४ ॥ दूसरे दिन ये सातों ही भाई उज्जयिनी नगरीके उपवनमें पधारे तब वज्रमुध्नेि पास जाकर उन्हें विधि पूर्वक प्रणाम किया और पूछा कि आप लोगोंने यह दीक्षा किस कारणसे ली है ? उन्होंने दीक्षा लेनेका जो यथार्थ कारण था वह बतला दिया । इसी प्रकार वज्रमुष्टिकी स्त्री मंगीने भी उन आर्यिकाओंसे दीक्षाका कारण पूछा और यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर उन्हींके समीप दीक्षा धारण कर ली। वज्रमुष्टि वरधर्म मुनिराजका शिष्य बन गया । सुभानु आदि सातों मुनिराज आयुके अन्तमें संन्यासमरण कर प्रथम स्वर्गमें त्रायस्त्रिंश जातिके देव हुए ॥ २४५-२४८।। वहाँ दो सागर प्रमाण उनकी आयु थी। वहाँ से चयकर, अपने पुण्य प्रभावसे धातकीखण्ड द्वीपमें भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणी में जो निध्यालोक नामका नगर है उसके राजा चन्द्रचूलकी मनोहरी रानीसे सुभानुका जीव चित्राङ्गद नामका पुत्र हुआ॥ २४९ -२५० ।। बाकी छह भाइयोंके जीव भी इन्हीं चन्द्रचूल राजा और मनोहरी रानीके दो-दो करके तीन बार में छह पुत्र हुए। गरुड़ध्वज, गरुड़वाहन, मणिचूल, पुष्पचूल, गगननन्दन और गगनचर ये उनके नाम थे। उसी धातकीखण्डद्वीपके पूर्व भरत क्षेत्रमें विजयार्धं पर्वतकी दक्षिण श्रेणीमें एक मेघपुर नामका नगर है। उसमें धनञ्जय राजा राज्य करता था। उसकी रानीका नाम सर्वश्री था, उन दोनोंके धनश्री नामकी पुत्री थी जो सुन्दरतामें मानो दूसरी लक्ष्मी ही थी। उसी विजयार्धकी दक्षिण श्रेणीमें एक नन्दपुर नामका नगर है उसमें शत्रुओंके लिए सिंहके समान राजा हरिषेण राज्य करता था। उसकी स्त्रीका नाम श्रीकान्ता था और उन दोनोंके हरिवाहन नामका पुत्र उत्पन्न हुआ था। वह गुणोंसे प्रसिद्ध हरिवाहन नातेमें धनश्रीके भाईका साला था। उसी भस्तक्षेत्र के अयोध्यानगरमें धनश्रीका स्वयंवर हुआ उसमें धनश्रीने बड़े प्रेमसे हरिवाहनके गलेमें वरमाला डाल दी। उसी अयोध्या में पुष्पदन्त नामका चक्रवर्ती राजा था। उसकी प्रीतिंकरी स्त्री थी और उन दोनोंके पापकार्यमें पण्डित सुदत्त नामका पुत्र था। सुदत्तने हरिवाहनको मार कर धनश्रीको स्वयं ग्रहण कर लिया ।। २५१-२५७।
श्लोक 258 से 272 : निर्नामक की कथा और पूर्वकर्म का रहस्य
यह सब देखकर चित्राङ्गद आदि सातों भाई विरक्त हो गये और उन्होंने श्रीभूतानन्द तीर्थङ्करके चरणमूल में जाकर संयम धारण कर लिया। आयुका अन्त होने पर वे सब चतुर्थ स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए। वहाँ सात सागरकी उनकी आयु थी। उसके बाद वहाँ से च्युत होकर इसी भरत क्षेत्रके कुरुजांगल देशसम्बन्धी हस्तिनापुर नगर में सेठ श्वेतवाहनके उसकी स्त्री बन्धुमतीसे सुभानुका जीव शङ्ख नामका पुत्र हुआ। वह सुभानु धन-सम्पदा में स्वयं कुबेर था । उसी नगर में राजा गङ्गदेव रहता था। उसकी स्त्रीका नाम नन्दयशा था, सुभानु के बाकी छह भाइयोंके जीव उन्हीं दोनोंके दो-दो कर तीन बारमें छह पुत्र हुए। गङ्ग, गङ्गदेव, गङ्गमित्र, नन्द, सुनन्द, और नन्दिद्वेण ये उनके नाम थे। ये छहों भाई परस्परमें बड़े स्नेहसे रहते थे। नन्दयशाके जब सातवां गर्भरहा तब राजा उससे उदास हो गया, रानीने राजाकी इस उदासीका कारण गर्भमें आया बालक ही समझा इसलिए उसने रेवती धायको आज्ञा दे दी कि तू इस पुत्रको अलग कर दे । ॥ २५८-२६४ ॥ रेवती भी उत्पन्न होते ही वह पुत्र नन्दद्यशाकी बड़ी बहिन बन्धुमतीके लिए सौंप आई । उसका नाम निर्नामक रक्खा गया। किसी एक दिन ये सब लोग नन्दनवनमें गये, वहाँपर राजाके छहों पुत्र एक साथ खा रहे थे, यह देखकर शंखने निर्नामकसे कहा कि तू भी इनके साथ वा ।शङ्खके कहनेसे निर्नामक उनके साथ खानेके लिए बैठा ही था कि नन्दयशा उसे देखकर क्रोध करने लगी और यह किसका लड़का है, यह कहकर उसे एक लात मार दी। इस प्रकरणसे शङ्ख और निर्नामक दोनोंको बहुत शोक हुआ। किसी एक दिन शङ्ख और निर्नामक दोनों ही राजाके साथ-साथ अवधिज्ञानी द्रुमसेन नामक मुनिराजकी वन्दनाके लिए गये। दोनोंने मुनिराजकी वन्दना की, धर्मश्रवण किया और तदनन्तर शङ्खने मुनिराजसे पूछा कि नन्दयशा निर्नामकसे अकारण ही क्रोध क्यों करती है ? इस प्रकार पूछे जानेपर मुनिराज कहने लगे कि सुराष्ट्र देशमें एक गिरिनगर नामका नगर है। उसके राजाका नाम चित्ररथ था। चित्ररथके एक अमृत-रसायन नामका रसोइया था । वह मांस पकाने में बहुत ही कुशल था इसलिए मांसलोभी राजाने सन्तुष्ट होकर उसे बारह गाँव दे दिये थे। एक दिन राजा चित्ररथने सुधर्म नामक मुनिराजके समीप आगमका उपदेश सुना ॥ २६५-२७२ ।।
श्लोक 273 से 282 : रसोइए का पाप और निरनुकम्प की क्रूरता
उसकी श्रद्धा करनेसे राजाको रत्नत्रयकी प्राप्ति हो गई। जिसके फलस्वरूप वह मेघ रथ पुत्रके लिए राज्य देकर दीक्षित हो गया और राजपुत्र मेघरथ भी श्रावक बन गया ।। २७३ ।। तदनन्तर राजा मेघरथने रसोइयाके पास एकही गाँव बचने दिया, बाकी सब छीन लिये। ‘इन मुनिके उपदेशसे ही राजाने मांस खाना छोड़ा है और उनके पुत्रने हमारे गांव छीने हैं’ ऐसा विचार कर वह रसोइया उक्त मुनिराजसे द्वेष रखने लगा । एकदिन उस रसोइयाने सब प्रकारके मसालोंसे तैयार की हुई कडुबी तुमड़ीका आहार उन मुनिराजके लिए करा दिया। जिससे गिरनार पर्वत पर जाकर उनका प्राणान्त हो गया। वे समाधिमरण कर अपराजित नामक कल्पातीत विमानमें वहाँकी जघन्य आयु पाकर बड़ी-बड़ी ऋद्धियों के धारक अहमिन्द्र हुए। रसोइया आयुकेअन्तमें तीसरे नरक गया और वहाँ से निकलकर अनेक दुःख भोगता हुआ चिरकाल तक संसारमें भ्रमण करता रहा ।। २७४-२७७ ।। तदनन्तर इसी जम्बूद्वीप के भरत क्षेत्रसम्बन्धी मङ्गलदेशमें पलाशकूट नगरके यक्षदत्त गृहस्थके उसकी यक्षदत्ता नामकी स्त्रीसे यक्ष नामका पुत्र हुआ। कुछ समय बाद उन्हीं यत्तदत्त और यक्षदत्ताके एक यक्षिल नामका दूसरा पुत्र भी उत्पन्न हुआ। उन दोनों भाइयोंमें बड़ा भाई अपने कर्मोंके अनुसार निरनुकम्प-निर्दयथा इसलिए लोग उसे उसकी क्रियाओंके अनुसार निरनुकम्प कहते थे और छोटा भाई सानुकम्प था- दया सहित था इसलिए लोग उसे सानुकम्प कहा करते थे ।। २७८-२८० ।। किसी एक दिन दोनों भाई गाड़ी में बैठकर कहीं जा रहे थे। मार्गमें एक अन्धा साँप बैठा था। सानुकम्प केरोकनेपर भी दयासे दूर रहनेवाले निरनुकम्पने उस अन्धे साँपपर बर्तनोंसे भरी गाड़ी बैलोंके द्वारा चला दी। उस गाड़ीके भारसे साँप कट गया और अकामनिर्जरा करता हुआ मर गया ।। २८१-२८२ ।।
श्लोक 283 से 292 : कर्मफल, दीक्षा और देवकी का पूर्वजन्म
मरकर श्वेतविका नाम के नगर में वहाँ के राजा वासथके उसकी रानी वसुन्धरासे नन्दयशा नामकी पुत्री हुआ ।। २८३ ।। छोटे भाई सानुकम्पने निरनुकम्प नामक अपने बड़े भाईको फिर भी समझाया कि आपके लिए इस प्रकार दूसरोंको दुःख देनेवाला कार्य नहीं करना चाहिए’। इस प्रकार समझाये जानेपर वह शान्तिको प्राप्त हुआ ।। २८४॥ वही निरनुकम्प आयुके अन्त में मरकर यह निर्ना-मक हुआ है। पूर्वभवमें उपार्जन किये हुए पापकर्मके उदयसे ही नन्दयशाका निर्नामकके प्रति क्रोध.. रहता है। राजा द्रुमसेनके यह वचन सुनकर राजाके छहों पुत्र, शङ्ख तथा निर्नामक सब विस्त हुए और सभीने दीक्षा धारण कर ली। इसी प्रकार पुत्रोंके स्नेहसे उत्पन्न हुई इच्छासे रानी नन्दयशा तथा रेवती धायने भी सुव्रता नामक आर्यिका के समीप संयम धारण कर लिया। किसी एक दिन उन दोंनों आर्यिकाओंने मूर्खतावश निदान किया। नन्दयशाने तो यह निदान किया कि ‘आगामी जन्ममें भी ये मेरे पुत्र हों’ और रेवतीने निदान किया कि ‘मैं इनका पालन करूँ’ । तदनन्तर तपश्चर्या कर और अपनी योग्यताके अनुसार आराधनाओंकी आराधनाकर आयुके अन्तमें वे सब महाशुक्र स्वर्गमें सामानिक जातिके देव हुए। वहाँ सोलह सागरकी उनकी आयु थी और सब दिव्य भोगोंके वशीभूत रहते थे ।। २८५-२९० ।। वहाँसे च्युत होकर शङ्खका जीव हलका धारण करनेवाला बलदेव हुआ है और नन्दयशाका जीव मृगावती देशके दशार्णपुर नगरके राजा देवसेनके रानी धनदेवीसे देवकी नामकी पुत्री पैदा हुई है। निदान-बन्धके कारण ही तू स्त्रीपर्यायको प्राप्त हुई है ।। २९१-२९२ ॥
श्लोक 293 से 301 : देवकी के पुत्रों का रहस्य और सत्यभामा का प्रश्न
रेवतीका जीव मलय देशके भद्रिलपुर नगर में सुदृष्टि सेठकी अलका नामकी सेठानी हुई है। पहलेके छहों पुत्रोंके जीब दो दो करके तीन बारमें तेरे छह पुत्र हुए। उसी समय इन्द्रकी आज्ञासे कंसके भयके कारण नैगमर्षि देवने उन्हें अलका सेठानीके घर रख दिया था इसलिए अलकाने ही उन पुत्रोंका पालन किया है। देवदत्त, देवपाल, अनीकदत्त, अनीकपाल, शत्रुन्न और जितशत्रु ये उन छहों पुत्रों के नाम हैं, ये सभी इसी भवसे मोक्ष प्राप्त करेंगे ।। २९३-२९६ ॥ ये सब नई, अवस्थामें ही दीक्षा लेकर भिक्षाके लिए नगर में आये थे इसलिए इन्हें देखकर तेरा पूर्वजन्मसे चलाआयो स्नेह इनमें उत्पन्न हो गया है ॥ २९७ ॥ पूर्व जन्ममें जो तेरा निर्नामक नामका पुत्र था उसने तपश्चरण करते समय स्वयंभू नारायणका ऐश्वर्य देखकर निदान किया था अतः वह कंसका मारनेवाला श्री कृष्ण हुआ है ॥२९८॥ गणधर देव देवकीसे कहते हैं कि ‘हे देवकी ! तू कहाँ से आई ? तेरे ये पुत्र कहाँ से आये ? और बिना कारण ही इनके साथ यह सम्बन्ध कैसे आ मिला? इसलिए जान पड़ता है कि कर्मका उदय बड़ा विचित्र है और योगियोंके द्वारा भी अगम्य है’। इस प्रकार स्वभावसे ही समस्त भव्य जीवोंका उपकार करनेवाले गणधर भगवान्ने यह सब कथा कही। कथा सुनकर देवकीने उन्हें बड़ी भक्तिप्ते वन्दना की ॥ २९९ -३०० ॥ तदनन्तर – भक्तिसे भरी सत्यभामाने भी, अक्षरावधिको धारण करनेवाले गणधर भगवान्से अपने पूर्व भवोंका सम्बन्ध पूछा ॥ ३०१ ।।
श्लोक 302 से 315 : सत्यभामा के पूर्वभव का वर्णन
तब गणधर भगवान् भी उसका अभीष्ट कहने लगे सां ठीक ही है क्योंकि कृतकृत्य मनुष्योंका अनुग्रहको छोड़कर और दूसरा कार्य नहीं रहता है ।। ३०२ ।। वे कहने लगे कि शीतलनाथ भगवान्के तीर्थमें जव धर्मका विच्छेद हुआ तब भद्रिलपुर नगर में राजा मेघरथ राज्य करता था, उसकी रानीका नाम नन्दा था। उसी समय उस नगरमें भूतिशर्मा नामका एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, उसकी कमला नामकी स्त्री थी और उन दोनोंके मुण्डशा लायन नामका पुत्र था । मुण्डशालायन यद्यपि वेदवेदाङ्गका पारगामी था परन्तु साथ ही उसकी बुद्धि हमेशा भोगों आसक्त रहती थी इसलिए वह कहा करता था कि तपका क्लेश उठाना व्यर्थ है, जिनके पास धन नहीं है ऐसे साहसी मूर्ख मनुष्योंने ही परलोकके लिए इस तपके क्लेशकी कल्पना की है। वास्तवमें पृथिवी-दान, सुवर्ण-दान आदिसे ही इष्ट सुख प्राप्त होता है। इस प्रकार उसने अनेक कुदृष्टान्त और कुहेतुओंके बतलानेमें निपुण वाक्योंके द्वारा कायक्लंशके सहनेमें असमर्थ राजाको झूठमूठ उपदेश दिया। राजाको ही नहीं, अन्य दुर्बुद्धि मनुष्योंके लिए भी वह अपने जीवन भर ऐसा ही उपदेश देता रहा । अन्तमें मर कर वह सातवें नरक गया। वहाँसे निकल कर तिर्यश्च हुआ। इस तरह नरक और तिर्यश्च गतिमें घूमता रहा ॥ ३०३-३०८ ॥ अनुक्रमसे वह गन्धमादन पर्वतसे निकली हुई गन्धवती नदीके समीपवर्ती भल्लंकी नामकी पल्ली में अपने पापकर्मके उदयसे काल नामका भील हुआ । उस भीलने किसी समय वरधर्म नामक मुनिराजके पास जाकर मधु आदि तीन मकारोंका त्याग किया था । उसके फलस्वरूप वह विजयार्ध पर्वत पर अलकानगरीके राजा पुरबल और उनकी रानी ज्योतिर्माला के हरिबल नामका पुत्र हुआ। उसने अनन्तवीर्य नामके मुनिराजके पासद्रव्य-संयम धारण कर लिया जिसके प्रभावसे वह मरकर सौधर्म स्वर्ग में देव हुआ, वहाँ से च्युत होकर उसी विजयार्ध पर्वत पर रथनूपुर नगरके राजा सुकेतुके उनकी स्वयंप्रभा रानीसे तू सत्यभामा नामकी पुत्री हुई। एक दिन तेरे पिताने निमित्त आदिके जाननेमें कुशल किसी निमित्तज्ञानीसे पूछा कि मेरी यह पुत्री किसकी पत्नी होगी ? इसके उत्तर में उस श्रेष्ठ निमित्तज्ञानीने कहा था कि यह अर्धचक्रवर्तीकी महादेवी होगी। इस प्रकार गणधरके द्वारा कहे हुए अपने भव सुनकर सत्यभामा बहुत सन्तुष्ट हुई ।। ३०९ -३१५ ॥
श्लोक 316 से 324 : लक्ष्मीमति के पाप और दुःखद पुनर्जन्म
अथानन्तर – महादेवी रुक्मिणीने नमस्कार कर अपने भवान्तर पूछे और जिनकी समस्त
चेष्टाएँ परोपकारके लिए ही थीं ऐसे गणधर भगवान् कहने लगे ॥ ३१६ ॥ कि भरत क्षेत्र सम्बन्धी मगध देशके अन्तर्गत एक लक्ष्मीग्राम नामका ग्राम है। उसमें सोम नामका एक ‘ब्राह्मण रहता था, उसकी स्त्रीका नाम लक्ष्मीमति था। किसी एक दिन लक्ष्मीमति ब्राह्मणी, आभूषणादि पहिन कर दर्पण देखनेके लिए उद्यत हुई ही थी कि इतनेमें समाधिगुप्त नामके मुनि भिक्षाके लिए आ पहुँचे । ‘इसका शरीर पसीना तथा मैलसे लिप्त है और यह दुर्गन्ध दे रहा है’ इस प्रकार क्रोध करती हुई लक्ष्मीमतिने घृणासे युक्त होकर निन्दाके वचन कहे ॥ ३१७-३१९ ॥ मुनि-निन्दाके पापसे उसका समस्त शरीर उदुम्बर नामक कुष्ठसे व्याप्त हो गया इसलिए वह जहाँ जाती थी वहीं पर लोग उसे कठोर शब्द कह कर कुत्तीके समान ललकार कर भगा देते थे ॥ ३२० ॥ वह सूने मकानमें पड़ी रहती थी, अन्तमें हृदय में पतिका स्नेह रख बड़े दुःखसे मरी और उसी ब्राह्मणके घर दुर्गन्ध युक्त छबू दर हुई ।। ३२१ ।। वह पूर्व पर्यायके स्नेहके कारण बार-बार पतिके ऊपर दौड़ती थी इसलिए उसने क्रोधित होकर उसे पकड़ा और बाहर ले जाकर बड़ी दुष्टतासे दे पटका जिससे मर कर उसी ब्राह्मणके घर साँप हुई ॥ ३२२ ॥ फिर मरकर अपने पापकर्म के उद्यसे वहीं गधा हुई, वह बार-बार ब्राह्मणके घर आता था इसलिए ब्राह्मणोंने कुपित होकर उसे लाठी तथा पत्थर आदिसे ऐसा मारा कि उसका पैर टूट गया, घावोंमें कीड़े पड़ गये जिनसे व्याकुल होकर वह कुएँ में पड़ गया और दुःखी होकर मर गया ।॥ ३२३-३२४ ॥
श्लोक 325 से 341 : पूतिका का धर्ममार्ग और रुक्मिणी के रूप में जन्म
फिर अन्धा साँप हुआ, फिर मरकर अन्धा सुअर हुआ, उस सुअरको गाँवके कुत्तोंने खा लिया जिससे मरकर मन्दिर’ नामक गाँवमें नदी पार करानेवाले मत्स्य नामक धीवरकी मण्डकी नामकी खीसे पूतिका नामकी पापिनी पुत्री हुई। उत्पन्न होते हीउसका पिता मर गया और माता भी चल बसी इसलिए मातामही (नानी) ने उसका पोषण किया। वह सब प्रकारसे अशुभ थी और सबलोग उससे घृणा करते थे। किसी एक दिन वह नदीके किनारे बैठी थी वहीं पर उसे उन्न समाधिगुप्त मुनिराजके दर्शन हुए जिनकी कि उसने लक्ष्मीमतिपर्यायमं निन्दा की थी। वे मुनि प्रतिमायांगसे अवस्थित थे, पूतिकाकी काललब्धि अनुकूल थी इसलिए बह शान्तभावको प्राप्तकर रात्रिभर मुनिराजके शरीरपर बैठनेवाले मच्छर आदिको दूर हटाती रही । जब प्रातःकालके समय प्रतिमायोग समाप्तकर मुनिराज विराजमान हुए तब वह उनके चरणकमलोंके समीप जा पहुँची और उनका कहा हुआ धर्मोपदेश सुनने लगी। धर्मोपदेशसे प्रभावित होकर उस बुद्धिमतीने पर्वके दिन उपवास करनेका नियम लिया। दूसरे दिन वह जिनेन्द्र भगवान्की पूजा (दर्शन) करनेके लिए जा रही थी कि उसी समय उसे एक आर्थिकाके दर्शन हो गये। वह उन्हीं आर्यिकाके साथ दूसरे गाँव तक चली गई। वहींपर उसे भोजन भी प्राप्त हो गया। इस तरह वह प्रतिदिन प्रामान्तरसे लाये हुए भोजनसे प्राण रक्षा करती और पापके भयसे अपने आचारकी रक्षा करती हुई किसी पर्वतकी गुफामें रहने लगी। एक दिन एक श्राविका आर्यिकाके पास आई। आर्यि-काने उससे कहा कि पूतिका नीच कुत्तमें उत्पन्न होकर भी इस तरह सदाचारका पालन करती है यह आश्वर्यकी बात है। आर्यिकाकी बात सुनकर उस श्राविकाको बड़ा कौतुक हुआ। जब पूतिका पूजा (दर्शन) कर चुकी तब वह स्नेहवश उसके पास आकर उसकी प्रशंसा करने लगी। इसके उत्तरमें पूतिकाने कहा कि हे माता ! मैं तो महापापिनी हूँ, मुझे आप पुण्यवती क्यों कहती हैं? यह कह, उसने समाधिगुप्त मुनिराजसे जो अपने पूर्वभव सुने थे वे सब कह सुनाये। वह श्राविका पूतिकाकी पूर्वभबकी सखी थी। पूतिकाके मुखसे यह जानकर उसने कहा कि ‘यह जीव पापका भय होनेसे ही जैनमार्ग-जैनधर्मको प्राप्त होता है। इस संसारमें पूर्वभवले अर्जित पापकर्मके उदयसे विरूपता, रोगीपना, दुर्गन्धता तथा निर्धनता आदि किन्हें नहीं प्राप्त होती ? अर्थात् सभीको प्राप्त होती है इसलिए तू शोक मतकर, तेरे द्वारा ग्रहण किये हुए व्रत शील तथा उपवास आदि पर-जन्मके लिए दुर्लभ पाथेय (संबल) के समान हैं, तू अब भय मत कर।’ इस प्रकार उस श्राविकाने उसे खूच उत्साह दिया । तदनन्तर-समाधिमरणकर वह अच्युतेन्द्रकी अतिशय प्यारी देवी हुई। पचपन पल्य तक वह अखण्ड सुखका उपभोग करती रही। वहाँ से च्युत होकर विदर्भ देशके कुण्डलपुर नगर में राजा वासबकी रानी श्रीमतीसे तू रुक्मिणी नामकी पुत्री हुई ।। ३२५-३४१ ।।
श्लोक 342 से 351 : शिशुपाल के जन्म और भविष्यवाणी
तदनन्तर कोशल नामकी नगरी में राजा भेषज राज्य करते थे। उनकी रानीका नाम मद्री था; उन दोनोंके एक तीन नेत्रवाला शिशुपाल नामका पुत्र हुआ। मनुष्योंमें तीन नेत्रका होना अभूतपूर्व था इसलिए राजाने निमित्तज्ञानीसे पूछा कि इसका क्या फल है ? तब परोक्षकी बात जाननेवाले निमित्तज्ञानीने साफ-साफ कहा कि जिसके देखनेसे इसका तीसरा नेत्र नष्ट हो जावेगा यह उसीके द्वारा मारा जावेगा इसमें संशय नहीं है।।३४२-३४४।। किसी एक दिन राजा भेषज, रानी मद्री, शिशुपाल तथा अन्य लोग बड़ी उत्सुकताके साथ श्रीकृष्णके दर्शन करने के लिए द्वारावती नगरी गये थे वहाँ श्रीकृष्णके देखते ही शिशुपालका तीसर। नेत्र अदृश्य हो गया सो ठीक ही है क्योंकि द्रव्योंकी शक्तियाँ विचित्र हुआ करती हैं ।।३४५-३४६।। यह देख मत्रीको निमित्तज्ञानीकी बात याद आ गई इसलिए उसने डरकर श्रीकृष्णसे याचना की कि ‘हे पूज्य ! मेरे लिए पुत्रभिक्षा दीजिये ‘ ॥ ३४७७॥ श्रीकृष्णने उत्तर दिया कि ‘हे अम्ब ! सौ अपराध पूर्ण हुए बिना इसे मुझसे भय नहीं हैं अर्थात् जब तक सौ अपराध नहीं हो जायेंगे तब तक में इसे नहीं मारूँगा’ इसप्रकार श्रीकृष्णसे वरदान पाकर मद्री अपने नगरको चली गई ।। ३४८ ।। इधर वह शिशु-पाल बाल-अवस्थामें ही सूर्यके समान देदीप्यमान होने लगा क्योंकि जिस प्रकार सूर्येका मण्डल विशुद्ध होता है उसी प्रकार उसका मण्डल-मन्त्री आदिका समूह भी विशुद्ध था- विद्वेष रहित था, जिस प्रकार सूर्य उदित होते ही अन्धकारको नष्ट कर देता है उसी प्रकार शिशुपाल भी उदित होते ही निरन्तर शत्रुरूपी अन्धकारको नष्ट कर देता था, जिस प्रकार सूर्य पद्म अर्थात् कमलोंको आन-न्दित करता है उसी प्रकार शिशुपाल भी पद्मा अर्थात् लक्ष्मीको आनन्दित करता था, जिस प्रकार सूर्यकी किरण तीक्ष्ण अर्थात् उष्ण होती है उसी प्रकार उसका महसूल भी तीक्ष्ण अर्थात् भारी था, जिस प्रकार सूय क्रूर अर्थात् उष्ण होता है उसी प्रकार शिशुपाल भी क्रूर अर्थात् दुष्ट था, जिस प्रकार सूर्य प्रतापवान् अर्थात् तेजसे सहित होता है उसी प्रकार शिशुपाल भी प्रतापवान् अर्थात् सेना और कोशसे उत्पन्न हुए तेजसे युक्त था और जिस प्रकार सूर्य अन्य पदार्थोंके तेजको छिपाकर भूभृत अर्थात् पर्वतके मस्तकपर- शिखर पर अपने पाद अर्थात् किरण स्थापित करता है उसी प्रकार शिशुपाल भी अन्य लोगोंके तेजको आच्छादितकर राजाओंके मस्तकपर अपने पाद अर्थात् चरण रखता था। वह आक्रमणकी इच्छा रखनेवाले पराक्रमसे अपने आपको सब राजाओंमें श्रष्ठ समझने लगा और सिंहके समान, श्रीकृष्णके ऊपर भी आक्रमण कर उन्हें अपनी इच्छानुसार चलानेकी इच्छा करने लगा ।। ३४९ -३५१ ॥
श्लोक 352 से 362 : शिशुपाल-वध और रुक्मिणी का विवाह
इस प्रकार अहंकारी, समस्त संसारमें फैलनेवाले यशसे उपलक्षित और अपनी आयुको समर्पण करनेवाले उस शिशुपालने श्रीकृष्णके सौ अपराध कर डाले ।। ३५२ ।। वह अपने आपको ऊँचा-श्रेष्ठ बनाकर सबका शिरोमणि समझता था, सदा करने योग्य कार्योंकीपश्चसे सहित रहता था और श्रीकृष्णको भी ललकारकर उनकी लक्ष्मी छीननेका उद्यम करता था ।। ३५३ ।। शान्त हुआ भी शत्रुओंका समूह पापोंके समूहके समान नष्ट कर ही देता है इसलिए विजयकी इच्छा रखनेवाले राजाको मुमुक्षके समान, शत्रुको नष्ट करनेमें विलम्ब नहीं करना चाहिये ॥ ३५४ ॥ गणधर भगवान, महारानी रुक्मिणीसे कहते हैं कि इस प्रकार समय बीत रहा था कि इसी बीचमें तेरा पिता तुझे बड़ी प्रसन्नतासे शिशुपालको देनेके लिए उद्यत हो गया । जब युद्धकी चाह रखनेवाले नारदने यह बात सुनी तो वह श्रीकृष्णको सब समाचार बतला आया । श्रीकृष्णने छह प्रकारकी सेनाके साथ जाकर उस बलवान् शिशुपालको मारा और तुझे लेकर महा-देवीके पट्टपर नियुक्त किया। गणधर भगवान्के यह वचन सुनकर रुक्मिणीको बड़ा हर्ष हुआ । आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि इस तरह रुक्मिणीकी कथा सुनकर दुर्बुद्धिके सिवाय ऐसा कौन मनुष्य होगा जो कि महामुनियोंको मलिन देखकर उनसे घृणा करेगा ।। ३५५-३५८ ।।
अथानन्तर-रानी जाम्बवतीने भी बड़े आदरके साथ नमस्कार कर गणधर भगवान्से अपने पूर्वभव पूछे और गणधर भगवान् भी इस प्रकार कहने लगे कि इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें पुष्कलावती नामका देश है। उसके वीतशोक नगर में दमक नामका वैश्य रहता था ।॥३५९ -३६०।। उसकी स्त्रीका नाम देवमति था, और उन दोनोंके एक देविला नामकी पुत्री थी। वह पुत्री वसु-मित्रके लिए दी गई थी परन्तु कुछ समय बाद विधवा हो गई जिससे विरक्त होकर उसने जिनदेव नामक मुनिराजके पास जाकर व्रत ग्रहण कर लिये और आयुके अन्त में वह मरकर मेरु पर्वतके नन्दनवनमें व्यन्तर देवी हुई ॥ ३६१-३६२ ॥
श्लोक 363 से 372 : जाम्बवती के पूर्वजन्म और आध्यात्मिक उन्नति
तदनन्तर वहाँकी चौरासी हजार वर्षकी आयु समाप्त होनेपर वह वहाँ से चयकर पुष्कलावती देशके बिजयपुर नामक नगर में मधुषेण वैश्यकी बन्धुमती स्त्रीसे अतिशय सुन्दरी बन्धुयशा नामकी पुत्री हुई। उसका अभ्युदय दिनोंदिन बढ़ता ही जाता था। वहींपर उसकी जिनदेवकी पुत्री जिनदत्ता नामकी एक सखी थी उसके साथ उसने उपवास किये, जिसके फलस्वरूप मरकर प्रथम स्वर्गमें कुबेरकी देवाङ्गना हुई ।। ३६३-३६५ ।। वहाँ से चयकर पुण्डरीकिणी सगरी में वज्रनामक वैश्य और उसकी सुभद्रा स्त्रीके सुमति नामकी उत्तम पुत्री हुई । उसने वहाँ सुव्रता नामकी आर्यिकाके जिससे ब्रह्म स्वर्गमें श्रेष्ठ अप्सरा हुई। पर्वतकी उत्तर श्रेणीपर जाम्बव नामके लिए आहार दान देकर रत्नावली नामका उपवास किया, बहुत दिन बाद वहाँ से चयकर इसी जम्बूद्वीपके विजयार्ध नगर में राजा जाम्बव और रानी जम्बुषेणाके तू जाम्बवतीनामकी पुत्री हुई। उसी विजयार्ध पर्वतपर पवनवेग तथा श्यामलाका पुत्र नमि रहता था वह रिश्तेमें भाईका साला था और तुझे चाहता था। एक दिन वह ज्योतिर्वनमें बैठा था वहाँ तेरे प्रति तीव्र इच्छा होनेके कारण उसने कहा कि यदि जाम्बवती मुझे नहीं दी जावेगी तो मैं उसे छीनकर ले लूँगा। यह सुनकर तेरे पिता जाम्बवको बड़ा क्रोध आ गया। उसने उप्ते खानेके लिए माक्षिक-लक्षिता नामकी विद्या भेजी। उस समय बहाँ किन्नरपुरका राजा नमिकुमारका मामा यक्षमाली विद्याधर विद्यमान था उसने वह विद्या छेद डाली ॥ ३६६-३७२ ।।
श्लोक 373 से 382 : जाम्बवती का कृष्ण से विवाह
अपनी सब विद्याओंके छेदी जानेकी बात सुनकर राजा जाम्बवने अपना जम्बु नाम पुत्र भेजा। सेनाके साथ आक्रमण करता हुआ जम्बुकुमार जब वहाँ पहुँचा तो वह नमि डरकर अपने मामाके साथ अपने स्थानसे भाग खड़ा हुआ सो ठीक ही है क्योंकि जो कार्य बिना विचारके किये जाते हैं उनका फल पराभवके सिवाय और क्या हो सकता है ? ॥ ३७३-३७४ ।। नारद, यह सत्र जानकर शीघ्र ही कृष्णके पास गया और जाम्बवतीके अतिशय सुन्दर रूपका वर्णन करने लगा। यह सुनकर श्रीकृष्णने कहा कि मैं उस सतीको हठात् (जबरदस्ती) हरण करूँगा। यह कहकर वे अपनी सेना रूपी सम्पत्तिके साथ चल पड़े और विजयार्ध पर्वतके समीपवर्ती वनमें ठहर गये। बलदेव उनके साथ थे ही। यह कार्य अत्यन्त कठिन है ऐसा जानकर उन्होंने उपवासका नियम लिया और रात्रिके समय मनमें विचार किया कि यह कार्य किसके द्वारा सिद्ध होगा। देखो, जिसने तीन खण्ड वशकर लिये ऐसे श्रीकृष्णका भी भविष्य वहाँ खण्डित दिखने लगा परन्तु उस विद्याधर राजाके विरोधी श्रीकृष्णका पुण्य भी कुछ वैसा ही प्रबल था ।। ३७५-३७८ ॥ कि जिससे पूर्व जन्मका यक्षिल नामका छोटा भाई, जो तपकर महाशुक्र स्वर्ग में देव हुआ था, आया और कहने लगा कि ‘मैं ये दो विद्याएँ देता हूँ इन्हें तुम सिद्ध करो’ इस प्रकार कह कर तथा विद्याएँ सिद्ध करनेकी विधि वतला कर वह स्वर्ग चला गया । इधर श्रीकृष्ण श्रीरसागर बनाकर उसमें नागशय्यापर आरूढ़ हुए और विधि पूर्वक चार माह तक विद्याएँ सिद्ध करते रहे। अन्तमें बलदेवको सिंहवाहिनी और श्रीकृष्णको गरुड़वाहिनी विद्या सिद्ध हो गई । तदनन्तर उन विद्याओं पर आरूढ़ होकर श्रीकृष्णने युद्धमें जाम्बवको जीता और उसकी पुत्री तुझ जाम्बवती को ले आये। घर आकर उन्होंने तुझे बड़ी प्रीतिके साथ महादेवीके पद पर नियुक्त किया ॥ ३७९-३८२ ।।
श्लोक 383 से 391 : सुसीमा के प्रारम्भिक पूर्वभव
यद्यपि पूर्व जन्मका वृत्तान्त अस्पष्ट था तो भी वक्ता विशेषके मुखसे सुननेके कारण वह सबका सब जाम्बवतीको प्रत्यक्षके समान स्पष्ट हो गया ।। ३८३ ॥ अथानन्तर- इन्हीं गणनायक मुनिराजको नमस्कार कर सुसीमा नामकी पट्टरानी अपने पूर्व भवोंका सम्बन्ध पूछने लगी ।। ३८४ ।। तब शिष्यजनोंके अकारण बन्धु गणधर भगवान् अपने वचन रूपी किरणोंके समूहसे उसके मनरूपी कमलको प्रफुल्लित करते हुए इस प्रकार कहने लगे ॥ ३८५ ।। धातकीखण्ड द्वीपके पूर्वार्ध भागके पूर्व विदेहमें एक अतिशय प्रसिद्ध मङ्गलावती नामका देश है जो प्राणियोंके भोगोपभोगका एक ही साधन है। उसमें रत्नसंचय नामका एक नगर है। उसमें राजा विश्वदेव राज्य करता था और उसके शोभासम्पन्न अनुन्दरी नामकी रानी थी ॥ ३८६-३८७७। किसी एक दिन अयोध्याके राजाने राजा विश्वदेवको मार डाला इसलिए अत्यन्त शोकके कारण मंत्रियोंके निषेध करनेपर भी वह रानी अग्निमें प्रवेश कर जल मरी। मर कर वह विजयार्ध पर्वत पर दश हजार वर्षकी आयु वाली व्यन्तर देवी हुई। वहाँकी आयु पूर्ण होनेपर वह अपने कर्मोंके अनुसार संसारमें भ्रमण करती रही। तदनन्तर किसी समय इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी शालिग्राममें यक्षकी स्त्री देवसेनाके यक्षदेवी नामकी बुद्धिमती पुत्री हुई ।। ३८८-३९० ॥ किसी एक दिन उसने धर्मसेन मुनिके पास जाकर व्रत ग्रहण किये और एक महीनेका उपवास करनेवाले मुनिराजको उसने आहार दिया ।। ३९१ ॥
श्लोक 392 से 403 : सुसीमा और लक्ष्मणा के पूर्वभव
यत्तदेवी किसी दिन क्रीड़ा करनेके लिए बनमें गई थी। वहाँ अचानक बड़ी वर्षा हुई। उसके भयसे वह एक गुफामें चली गई। वहाँ एक अजगरने उसे निगल लिया जिससे हरिवर्ष नामक भोग-भूभिमें उत्पन्न हुई। वहाँ के भोग भोगकर नागकुमारी हुई। फिर वहाँसे चय कर विदेह क्षेत्रके पुष्कलावती देश-सम्बन्धी पुण्डरीकिणी नगरीमें राजा अशोक और सोमश्री रानीके श्रीकान्ता नामकी पुत्री हुई। किसी एक दिन उसने जिनदत्ता आर्यिका के पास दीक्षा लेकर अच्छे-अच्छे व्रतों-का पालन किया, चिरकाल तक तपस्या की और कनकावली नामका घोर उपवास किया ।। ३९१-३९५ ।। इन सबके प्रभावसे वह माहेन्द्र ध्वर्गमें देवी हुई, वहाँ देवोंके भोग भोगकर आयुके अन्त में वहाँ से च्युत हुई और सुराष्ट्रवर्धन राजाकी रानी सुज्येष्ठाके अच्छे लक्षणोंवाली तू पुत्री हुई है और श्रीकृष्णकी पट्टरानी होकर आनन्दसे बढ़ रही है ।। ३९६-३९७ ॥ इस प्रकार अपने भवान्तरोंका सम्बन्ध सुनकर सुसीमा रानी हर्षको प्राप्त हुई सो ठीक ही है क्योंकि अपनी उत्तरोत्तर वृद्धिको सुन कर कौन संतोषको प्राप्त नहीं होता ? ॥ ३९८ ॥
अथानन्तर – महारानी लक्ष्मणा भी मुनिराजको नमस्कार कर अपने भव सुननेकी इच्छाकरने लगी और इसका अनुग्रह करनेकी इच्छा रखनेवाले मुनिराज भी इस प्रकार कहने लगे। इसी जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें एक पुष्कलावती नामका देश है। उसके अरिष्ट्रपुर नगरमें राजा वासव राज्य करता था। उसकी वसुमती नामकी रानी थी और उन दोनोंके समस्त गुणोंकी खान स्वरूप सुषेण नामका पुत्र था। किसी कारणसे राजा वासवने विरक्त होकर सागरसेन मुनिराजके समीप दीक्षा ले ली परन्तु रानी वसुमती पुत्रके प्रेमसे मोहित होनेके कारण गृहवास छोड़नेके लिए समर्थ नहीं हो सकी इसलिए कुचेष्टासे मरकर भीलनी हुई। एक दिन उसने नन्दिवर्धन नामक चारण मुनिके पास जाकर श्रावकके व्रत ग्रहण किये ॥३९९ -४०३॥
श्लोक 404 से 413 : लक्ष्मणा का पूर्वभव और श्रीकृष्ण से विवाह
मर कर वह आठवें स्वर्गमें इन्द्रकी प्यारी नृत्यकारिणी हुई। वहाँ से चयकर जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीपर चन्द्रपुर नगरके राजा महेन्द्रकी रानी अनुन्दरीके नेत्रोंको प्रिय लगनेवाली कनकमाला नामकी पुत्री हुई और सिद्ध-विद्य नामके स्वयंवर में माला डालकर उसने हरिवाहनको अपना पति बनाया ।। ४०४-४०६ ।। किसी एक दिन उसने सिद्धकूटपर विराजमान यमधर नामक गुरुके पास जाकर अपने पहले भवोंकी परम्परा सुनी। तदनन्तर मुक्तावली नामका उपवासकर तीसरे स्वर्गकी प्रिय इन्द्राणी हुई। वहाँ नौ कल्पकी उसकी आयु थी, आयुके अन्त में वहाँ से चयकर सुप्रकारनगरके स्वामी राजा शम्बरकी श्रीमती रानीसे पुत्री हुई है। तू भी पद्म और ध्रुवसेनकी छोटी बहिन है, गुणोंमें ज्येष्ठ है, सर्व लक्षणोंसे युक्त है और लक्ष्मणा तेरा नाम है। किसी एक दिन पवनवेग नामका विद्याधर श्रीकृष्णके समीप जाकर कहने लगा कि हे चक्रपते ! विद्याधरोंके राजा शम्बरके एक लक्ष्मणा नामकी पुत्री है जो आकाशमें निर्मल चन्द्रमाकी कलाकी तरह सुशोभित है, कामको उद्दीपित करनेवाली है और आपके योग्य है। पवनवेगके बचन सुनकर श्रीकृष्णने ‘तो तूही उसे ले आ’ यह कहकर उसे ही भेजा और दह भी शीघ्र ही जाकर तेरे माता-पिताकी स्वीकृतिसे तुझे ले आया तथा श्रीकृष्णको समर्पित कर दी ।। ४०७-४१३ ॥
श्लोक 414 से 421 : लक्ष्मणा का सम्मान और गान्धारी के पूर्वभव का आरम्भ
कृष्णने भी महादेवीका पट्ट बाँधकर तुझे इस प्रकार सन्मानित किया है। इस तरह अपने भवान्तर सुनकर लक्ष्मणा बहुत ही प्रसन्न हुई ।। ४१४ ।।
तदनन्तर- श्रीकृष्णने गान्धारी, गौरी और पद्मावतीके भवान्तर पूछे । तब गणधरदेव इसप्रकार कहने लगे ।।४१५।। इसी जम्बूद्वीपमें एक सुकोशल नामका देश है। उसकी अयोध्या नगरीमें रुद्र नामका राजा राज्य करता था और उसकी विनयश्री नामकी मनोहर रानी थी। किसी एक दिन उस रानीने सिद्धार्थ नामक वनमें बुद्धार्थ नामक मुनिराजके लिए आहार दान दिया जिससे अपनी आयु पूरी होनेपर उत्तरकुरु नामक उत्तम भोगभूमिमें उत्पन्न हुई। वहाँ के भोग भोगकर च्युत हुई तो चन्द्रमाकी चन्द्रवती नामकी देवी हुई। आयु समाप्त होनेपर वहांसे च्युत होकर इसी जम्बूद्वीपके विजयार्ध पर्वतकी दक्षिण श्रेणीपर गगनवल्लभ नगर में विद्याधरोंके कान्तिमान् राजा विद्यद्वेगकी रानी विद्युद्वेगाके सुरूपा नामकी पुत्री हुई। वह विद्या और पराक्रमसे सुशोभित, नित्यालोक पुरके स्वामी राजा महेन्द्रविक्रमके लिए दी गई। किसी एक दिन वे दोनों दम्पति चैत्यालयोंमें जिनेन्द्र भगवान्की पूजा करनेके लिए उत्सुक होकर सुमेरु पर्वतपर गये ।। ४१६-४२१ ।।
श्लोक 422 से 431 : गान्धारी के पूर्वजन्म और विवाह
वहां पर विराजमान किन्ही चारणऋद्धिधारी मुनिके मुखरूपी चन्द्रमासे झरे हुए अमृतके समान धर्मका दोनों कानोंसे पानकर वे दोनों ही परमतृप्तिको प्राप्त हुए ॥ ४२२ ॥ उन दोनोंमेंसे राजा महेन्द्रविक्रमने तो उन्हीं चारण मुनिराजके समीप दीक्षा ले ली और रानी सुरूपाने सुभद्रा नामक आर्यिका के चरणमूल में जाकर संयम धारण कर लिया ।। ४२३ ॥ आयु पूरीकर सौधर्म स्वर्गमें देवी हुई, जब वहांकी एक पल्य प्रमाण आयु पूरी हुई तो वहांसे चयकर गान्धार देशकी पुष्करावती नगरीके राजा इन्द्रगिरि-की मेरुमती रानीसे गान्धारी नामकी पुत्री हुई है। राजा इन्द्रगिरि इसे अपनी बूआके लड़केको देना चाहता था, जब यह बात जगत्को अप्रिय पापबुद्धि नारदने सुनी तब शीघ्र ही उसने तुम्हें इसकी खबर दी। सुनते ही तू भी प्रेमके वश हो गया और सेना सजाकर युद्धके लिए चल पड़ा । युद्धमें राजा इन्द्रगिरि और उसके सहायक अन्य राजाओंको पराजितकर इस गान्धारीको ले आया और फिर इसे महादेवीका पट्टबन्ध प्रदान कर दिया – पट्टरानी बना लिया ।। ४२४-४२८ ।।
अथानन्तर – गणधर भगवान् कहने लगे कि अब मैं गौरीके भव कहता हूं सो हे कृष्ण तू सुन ! इसी जम्बू द्वीप में एक पुन्नागपुर नामका अतिशय प्रसिद्ध बड़ा भारी नगर है। उसकी रक्षा करनेवाला राजा हेमाभ था और उसकी रानी यशस्वती थी। किसी एक दिन यशोधर नामके चारण ऋद्धिधारी मुनिराजको देखकर उसे अपने पूर्व भवोंका स्मरण हो आया। राजाके पूछनेपर बह अपने दांतोंकी कान्तिसे उन्हें नहलाती हुई इस प्रकार अपने पूर्वभव कहने लगी ।। ४२९ -४३१ ।।
श्लोक 432 से 441 : गौरी के पूर्वभव और पुण्य का प्रभाव
धातकीखण्ड द्वीपके पूर्व मेरुसे पश्चिमकी ओर जो विदेह क्षेत्र हैं उसमें एक अशोकपुर नामका नगर है। उसमें आनन्द नामका एक उत्तम वैश्य रहता था उसकी स्त्रीके एक आनन्दयशा नामकी पुत्री उत्पन्न हुई। किसी समय आनन्दद्यशाने अमितसागर मुनिगजके लिए आहार दान देकर पञ्चाश्चर्य प्राप्त किये । इस दानजन्य पुण्यके प्रभावसे वह आयु पूर्ण होनेपर उत्तरकुरुमें उत्पन्न हुई, वहांके सुख भोगनेके बाद भवनवासियोंके इन्द्रकी इन्द्राणी हुई और वहाँ से च्युत होकर यहाँ उत्पन्न हुई हूँ। इस प्रकार रानी यशस्वतीने अपने पति राजा हेमाभके लिए बड़े हर्षसे अपने पूर्वभव सुनाये । तदनन्तर, रानी यशस्वती किसी समय सिद्धार्थ नामक वनमें गई, वहाँ सागरसेन नामक मुनिराजके पास उसने उपवास ग्रहण किये । आयुके अन्त में मरकर प्रथम स्वर्गमें देवी हुई । तदनन्तर वहांकी स्थिति पूरी होनेपर इसी जम्बूद्वीपकी कौशाम्बी नगरीमें सुमति नामक सेठकी सुभद्रा नामकी स्त्रीसे धार्मिकी नामकी पुत्री हुई ॥ ४३२-४३७ ॥ यहाँपर उसने जिनमति आर्यिकाके दिये हुए जिनगुणसम्पत्ति नामके व्रतका अच्छी तरह पालन किया जिसके प्रभावसे मरकर महाशुक्र स्वर्गमें देवी हुई । बहुत समय बाद वहांसे चयकर वीतशोकनगरके स्वामी राजा मेरुचन्द्रकी चन्द्रवती रानीके रूप, लावण्य और कान्ति आदिकी खान यह गौरी नामकी पुत्री हुई है। स्नेहसे भरे, विजयपुर नगरके स्वामी राजा विजयनन्दनने यह लाकर तुझे दी है और तू ने भी इसे पट्टरानी बनाया है। इस प्रकार गणधर भगवान्ने गौरीके भवान्तर कहे जिन्हें सुनकर श्रीकृष्ण हर्षको प्राप्त हुए ॥ ४३८-४४१ ।।
श्लोक 442 से 459 : पद्मावती के पूर्वभव और आध्यात्मिक साधना
तदनन्तर-गुणोंकी खान, गणधर देव, लोगोंका मन हरण करने वाले पद्मावती के पूर्व भवों का सम्बन्ध इस प्रकार कहने लगे ॥ ४४२ ॥ इसी भरतक्षेत्रकी उज्जयिनी नगरी में राजा विजय राज्य करता था उसकी विक्रान्तिके समान अपराजिता नामकी रानी थी। उन दोनोंके विनयश्री नामकी पुत्री थी। वह हस्तशीर्षपुरके राजा हरिषेणको दी गई थी। विनयश्रीने एक बार समाधिगुप्त मुनिराजके लिए बड़े हर्षसे आहार-दान दिया था जिसके पुण्यसे वह हैमवत क्षेत्रमें उत्पन्न हुई । चिरकाल तक वहाँ के भोग भोगकर आयुके अन्तमें वह चन्द्रमाकी रोहिणी नामकी देवी हुई। जब एक पल्य प्रमाण वहांकी आयु समाप्त हुई तब मगध देशके शाल्मलिगाँवमें रहनेवाले विजयदेवकी देविला स्त्रीसे पद्मदेवी नामकी पतिव्रता पुत्री हुई। उसने किसी समय वरधर्म नामक मुनिराजके पास ‘मैं कष्टके समय भी अनजाना फल नहीं खाऊँगी’ ऐसा दृढ़-व्रत लिया। किसी एक समय आक्रमणकर घात करनेवाले भीलोंने उस गांवको लूट लिया। उस समय सब लोग, भीलों के राजा सिंहरथके डरसे पद्मदेवीको महाअटवीमें ले गये। वहाँ भूखसे पीड़ित होकर सब लोगोंने विषफल खा लिये जिससे वे शीघ्रही मर गये परन्तु व्रतभङ्गके डरसे पद्मदेवीने उन फलोंको छुआ भी नहीं इसलिए वह आहारके विना ही मरकर हैमवत क्षेत्र नामक भोगभूमिमें उत्पन्न हुई। आयु पूर्ण होनेपर वहांसे चयकर स्वयंप्रभद्वीपमें स्वयंप्रभ नामक देवकी स्वयंप्रभा नामकी देवी हुई। वहांसे चयकर इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्र सम्बन्धी जयन्तपुर नगर में वहांके राजा श्रीधर और रानी श्रीमतीके सुन्दर शरीरवाली विमलश्री नामकी पुत्री हुई। वह भद्रिलपुरके स्वामी राजा मेघरथकी इच्छित सुख देनेवाली रानी हुई थी। किसी समय शुद्ध बुद्धिके धारक राजा मेघनादने राज्य छोड़कर धर्म नामक मुनिराजके समीप व्रत धारण कर लिया जिससे वह सहस्त्रार नामक स्वर्गमें अठारह सागरकी आयुवाला देदीप्यमान कान्तिका धारक इन्द्र हो गया। इधर रानी विमलश्रीने भी पद्मावती नामक आर्यिका के पास जाकर संयम धारण कर लिया और आचाम्लवर्ध नामका उपवास किया जिसके फलस्वरूप वह आयुके अन्तमें उसी सहस्त्रार स्वर्गमें देवी हुई और आयुके अन्त में वहाँसे च्युत होकर अरिष्टपुर नगरके स्वामी राजा हिरण्यवर्माकी रानी श्रीमतीके यह पद्मावती नामकी पुत्री है। इसने स्नेहसे युक्त हो स्वयंवर में रत्नमाला डालकर आपका सन्मान किया और तदनन्तर इस शीलवतीने महादेवीका पद प्राप्त किया। इस प्रकार गण-धर भगवान्के मुखारविन्दसे अपने-अपने भव सुनकर श्रीकृष्णकी गौरी, गान्धारी और पद्मावती नामकी तीनों रानियाँ हर्षको प्राप्त हुई ।। ४४३-४५९ ।। इस प्रकार गुणोंके भाण्डार गणधर देवने स्पष्ट और मिष्ट अक्षरोंके द्वारा पूर्व भवावलीसे सुशोभित निर्णयका साक्षात् वर्णन कर दिखाया और श्रीकृष्ण भी अपनी प्यारी आठों रानियोंकी सुख-दुःखभरी कथाएँ अच्छी तरह सुनकर अन्तमेप्रवृत्ति प्रदान करनेवाले संतोषको प्राप्त हुए ।। ४६० ॥ वे देवियाँ भी अनेक जन्ममें कमाये हुए अपने पापोंका नाश करनेवाले श्री गणधर भगवान्के दिव्य वचन हृदयमें धारण कर बहुत प्रसन्न हुई और सबने कल्याणकारी तथा बहुत भारी सुख प्रदान करनेवाले अर्हन्त भगवान्के धर्ममें अपनी बुद्धि लगाई ॥ ४६१ ।। ‘इस संसार में एक धर्मको छोड़कर दूसरा कार्य प्राणियोंका कल्याण करनेवाला नहीं है, धर्म रहित मूर्ख जीवोंका जो चरित्र है उसे धिक्कार है’ इस प्रकार विचार करते हुए सब सभासदोंने पाप रहित होकर, श्री नेमिनाथ भगवान्का कहा हुआ धर्म स्वीकार किया ।। ४६२ ।।
इस प्रकार आर्ष नामसे प्रसिद्ध गुणभद्राचार्य प्रणीत त्रिषष्टिलक्षण महापुराण संग्रहके नेमि-चरित्र प्रकरणमें भवान्तरोंका वर्णन करनेवाला इकहत्तरवां पर्व समाप्त हुआ ।॥ ७१ ॥
उत्तरपुराण पर्व 71 सारांश
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आदिपुराण Adi purana by Acharya Jinasena
आदिपुराण भाग – 2 Adi purana Part-2 by Acharya Jinasena