अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 12 to 22
श्लोक ( Shlok ) 12
रागादिदोषनिर्मुक्तो निरपेक्षोपकारकृत् । भव्यानां दिव्यया वाचा कथकः स हि कथ्यते ॥ १२ ॥
कथक – कथा कहनेवाला वह कहलाता है जो कि रागादि दोषोंसे रहित हो और अपने दिव्य वचनोंके द्वारा निरपेक्ष होकर भव्य जीवों का उपकार करता हो ।। १२ ।।
“A story-teller (Kathak) is one who is free from flaws like attachment and aversion, and who, being completely impartial, benefits noble souls through their divine words.”12
श्लोक ( Shlok ) 13
एतद्वितयमत्रैत्र पुराणे जिनभाषिते । नान्येषु दुष्धुराणेषु तस्माद् ग्राह्यमिदं बुरैः ॥ १३ ॥
ये दोनों ही अर्थात् कथा और कथक, जिनेन्द्र भगवान् के द्वारा कहे हुए इसी महापुराणमें हैं अन्य मिथ्या पुराणोंमें नहीं हैं इसलिए विद्वानोंके द्वारा यही पुराण ग्रहण करनेके योग्य है ।। १३ ।।
“Both of these—namely, the narrative (katha) and the narrator (kathak)—are contained only in this very Mahapurana as expounded by Lord Jinendra, and not in other false scriptures. Therefore, this Purana alone is worthy of being accepted by wise scholars.” || 13 ||
श्लोक ( Shlok ) 14 – 16
अथ जम्बूद्रुमालक्ष्ये द्वीपानां मध्यवर्तिनि । द्वीपे विदेहे पूर्वस्मिन् सीतासरिदुदक्तटे ॥ १४ ॥विषये पुष्कलावत्यां नगरी पुण्डरीकिणी । मधुकाख्ये’ वने तस्या नान्ना व्याधाधिपोऽभवत् ॥ १५ ॥पुरूरवाः प्रियास्यासीत्कालिकाख्यानुरागिणी । अनुरूपं विधचे हि वेधाः सङ्गममङ्गिनाम् ॥ १६ ॥
अथानन्तर- सब द्वीपोंके मध्यमें रहनेवाले इस जम्बूद्वीपके पूर्व विदेह क्षेत्रमें सीता नदीकेउत्तर किनारेपर पुष्कलावती नामका देश है उसकी पुण्डरीकिणी नगरीमें एक मधु नामका वन है।उसमें पुरूरवा नामका एक भीलोंका राजा रहता था। उसकी कालिका नामकी अनुराग करनेवाली स्त्री थी सो ठीक ही है क्योंकि विधाता प्राणियोंका अनुकूल ही समागम करता है ।। १४-१६ ।।
“Thereafter—in the Eastern Videha region of this Jambudvipa, which lies in the very center of all the concentric islands (dvipas), situated on the northern bank of the Sita River, there is a country named Pushkalavati. In its city of Pundarikini, there is a forest called Madhu. In that forest lived a king of the Bhils (tribal people) named Pururava. He had a deeply loving wife named Kalika—which is indeed fitting, for the Creator always unites living beings with partners who are perfectly suited to them.” || 14–16 ||
श्लोक ( Shlok ) 17 – 18
कदाचित्कानने तस्मिन् दिग्विभागविमोहनात् । मुनिं सागरसेनाख्यं पर्यटन्तमितस्ततः ॥ १७ ॥विलोक्य तं मृगं मत्वा हन्तुकामः स्वकान्तया । वनदेवाश्चरन्तीमे मावधीरिति वारितः ॥ १८ ॥
किसी एक दिन दिग्भ्रम हो जानेके कारण सागरसेन नामके मुनिराज उस वनमें इधर-उधर भ्रमण कररहे थे। उन्हें देख, पुरूरवा भील मृग समझकर उन्हें मारनेके लिए उद्यत हुआ परन्तु उसकी स्त्रीने यह कहकर मना कर दिया कि ‘ये वनके देवता घूम रहे हैं इन्हें मत मारो’ ।।१७-१८।।
“One day, having lost his way due to disorientation, an ascetic (Muniraj) named Sagarsen was wandering here and there in that forest. Seeing him, the Bhil Pururava mistook him for a deer and was about to kill him; however, his wife stopped him, saying, ‘This is a deity of the forest wandering about; do not kill him!'” || 17–18 ||
श्लोक ( Shlok ) 19
तदैव स प्रसन्नात्मा समुपेत्य पुरूरवाः । प्रणम्य तद्वचः श्रुत्वा सुशान्तः श्रद्धयाहितः ॥ १९ ॥
वह पुरूरवा भील उसी समय प्रसन्नचित्त होकर उन मुनिराजके पास गया और श्रद्धाके साथ नमस्कारकर तथा उनके वचन सुनकर शान्त हो गया ॥ १९ ॥
“At that very moment, that Bhil Pururava, with a joyful heart, went near the ascetic (Muniraj). Paying his respects with deep faith and listening to his words, he became completely peaceful.” || 19 ||
श्लोक ( Shlok ) 20 – 22
शीतलाम्भस्तटाकं वा निदाघे तृषितो जनः । संसारदुःखहेतोर्वा भीरुजैनेश्वरं मतम् ॥ २० ॥शास्त्राभ्यासनशीलो वा ख्यातं गुरुकुलं महत् । मध्वादित्रितयत्यागलक्षणं व्रतमासदत् ॥ २१ ॥जीवितावसितौ सम्यक्पालयित्वादराद् व्रतम् । सागरोपमदिव्यायुः सौधर्मेऽनिमिषोऽभवत् ॥ २२ ॥
जिस प्रकार ग्रीष्मऋतु में प्यासा मनुष्य शीतल जल से भरे हुए तालाब को पाकर शान्त होता है अथवा जिस प्रकार संसार-दुःखके कारणोंसे डरनेवाला जीव, जिनेन्द्र भगवान्का मत पाकर शान्त होता है अथवा जिस प्रकार शास्त्राभ्यास करनेवाला विद्यार्थी किसी बड़े प्रसिद्ध गुरुकुलको पाकर शान्त होता है उसी प्रकार वह भील भी सागरसेन मुनिराज को पाकर शान्त हुआ था। उसने उक्त मुनिराजसे मधु आदि तीन प्रकारके त्याग का व्रत ग्रहण किया और जीवन पर्यन्त उसका बड़े आदरसे अच्छी तरह पालन किया। आयु समाप्त होनेपर वह सौधर्म स्वर्ग में एक सागर की उत्तम आयु को धारण करनेवाला देव हुआ ॥ २०-२२ ॥
“Just as a thirsty person in the scorching heat of summer finds peace upon reaching a pond filled with cold water; or as a soul, terrified of the miseries of this worldly cycle (samsara), finds peace upon obtaining the path of Lord Jinendra; or as a student seeking scriptural knowledge finds peace upon reaching a great, renowned gurukul—in the very same way, that Bhil attained supreme peace upon finding the ascetic Sagarsen Muniraj.
From the said Muniraj, he took a vow to renounce the three vices (including the consumption of honey, meat, and alcohol) and strictly observed it with immense reverence throughout his life. Upon completing his life span, he was reborn as a celestial being (deva) in the Saudharma Heaven, possessing an excellent life span of one sagar (cosmic age).” || 20–22 ||
श्लोक 23 से 31
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288
पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 24 | श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105 | श्लोक 106 से 114 | श्लोक 115 से 124 | श्लोक 125 से 133 | श्लोक 134 से 141 | श्लोक 142 से 152 | श्लोक 153 से 161 | श्लोक 162 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11
Download PDF
महापुराण हिन्दी-भाषानुवाद
आदिपुराण पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71
महापुराण सारांश
आदिपुराण पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 | पर्व 66 | पर्व 67 | पर्व 68 | पर्व 69 | पर्व 70 | पर्व 71