अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 262 to 270
श्लोक ( Shlok ) 262 – 267
नवमे मासि सम्पूर्णे चैत्रे मासि त्रयोदशी । दिने शुक्ले शुभे योगे सत्यर्यमणि नामनि ॥ २६२ ॥अलङ्कारः कुलस्याभूच्छीलानामालयो महान् । आकरो गुणरत्नानामाश्रयो विश्रुतश्रियः४ ॥ २६३ ॥भानुमान् बन्धुपश्चानां भुवनत्रयनायकः । दायको मुक्तिसौख्यस्य श्रायकः सर्वदेहिनाम् ॥ २६४ ॥ भर्मधतिर्भवध्वंसी मर्मभित्कर्मविद्विषाम् । धर्मतीर्थस्य धौरेयो निर्मलः ‘शर्मवारिधिः ॥ २६५ ॥ प्राच्यां दिशीव बालार्को यामिन्यामिव चन्द्रमाः । पद्मायामिव गङ्गौधो धात्र्यामिव धनोत्करः ॥ २६६ ॥ वाग्वध्वामिव वाग्राशिर्लक्ष्म्यामिव सुखोदयः । तम्यां सुतोऽच्युताधीशो लोकालोकैकभास्करः ॥ २६७ ॥
तदनन्तर नौवाँ माह पूर्ण होनेपर चैत्र-शुक्ल त्रयोदशीके दिन अर्यमा नामके शुभ योगमें, जिस प्रकार पूर्व दिशामें बाल सूर्य उत्पन्न होता है, रात्रिमें चन्द्रमा उत्पन्न होता है, पद्म नामक हृदमें गङ्गाका प्रवाह उत्पन्न होता है, पृथिवीमें धनका समूह प्रकट होता है, सरस्वतीमें शब्दोंका समूह उत्पन्न होता है और लक्ष्मीमें सुखका उदय उत्पन्न होता है उसी प्रकार उस रानीमें वह अच्युतेन्द्र नामका पुत्र उत्पन्न हुआ। वह पुत्र अपने कुलका आभूषण था, शीलका बड़ा भारी घर था, गुणरूपी रत्नोंकी खान था, प्रसिद्धलक्ष्मीका आधार था, भाईरूपी कमलोंको विकसित करनेके लिए सूर्य था, तीनों लोकोंका नायक था, मोक्षका सुख देनेवाला था, समस्त प्राणियोंकी रक्षा करनेवाला था, सूर्यके समान कान्तिवाला था, संसारको नष्ट करनेवाला था, कर्मरूपी शत्रुके मर्मको भेदन करनेवाला था, धर्मरूपी तीर्थका भार धारण करनेवाला था, निर्मल था, सुखका सागर था, और लोक तथा अलोकको प्रकाशित करनेके लिए एक सूर्यके समान था ॥ २६२-२६७ ॥
Here is the English translation of the text, keeping the grand, metaphorical, and classical epic style intact:
Subsequently, upon the completion of the ninth month, on the day of Chaitra Shukla Trayodashi (the thirteenth day of the bright half of the month of Chaitra) under the auspicious astrological alignment (yoga) named Aryama, that son—who was the Lord of Achyuta Heaven (Achyutendra) in his previous life—was born to the Queen.
His birth was like the rising of the infant sun in the eastern sky, like the emergence of the moon in the night, like the flowing of the Ganges from the lake named Padma, like the appearance of vast wealth from the earth, like the manifestation of cosmic speech from Saraswati, and like the dawn of absolute bliss from Lakshmi.
That son was the crowning ornament of his lineage, a grand abode of pristine character (sheela), a mine of virtuous gems, and the bedrock of glorious prosperity. He was a sun to blossom the lotus-like hearts of his brethren, the supreme leader of the three worlds, the giver of the bliss of liberation (moksha), and the protector of all living beings. Possessing a radiance like the sun, he was the destroyer of the cycle of worldly existence (samsara), the piercer of the core of the enemy that is karma, and the bearer of the responsibility of the sacred path of righteousness (dharma-tirtha). He was stainless, an ocean of happiness, and like a singular sun destined to illuminate both the universe (loka) and the beyond (aloka). || 262-267 ||
श्लोक ( Shlok ) 268
मानुषाणां सुराणाञ्च तिरश्चाञ्च चकार सा । तत्प्रसूत्या पृथु प्रीतिं तत्सत्यं प्रियकारिणी ॥ २६८ ॥
रानी प्रियकारिणीने उस बालकको जन्म देकर मनुष्यों, देवों और तिर्यञ्चों को बहुत भारी प्रेम उत्पन्न किया था इसलिए उसका प्रियकारिणी नाम सार्थक हुआ था ।। २६८ ॥
By giving birth to that child, Queen Priyakarini aroused immense and profound love among humans, deities, and animals alike; thus, her name Priyakarini (meaning “one who brings forth love or delight”) truly became meaningful and fulfilled its purpose. || 268 ||
श्लोक ( Shlok ) 269
मुखाम्भोजानि सर्वेषां तदाकस्माद्दधुः श्रियम् । प्रमुक्तानि प्रसूनानि प्रमोदास्त्राणि वा दिवा ॥ २६९ ॥
उस समय सबके मुख-कमलोंने अकस्मात् ही शोभा धारण की थी और आकाशसे आनन्दके आँसुओंके समान फूलोंकी वर्षा हुई थी ॥ २६९ ॥
At that moment, the lotus-like faces of everyone suddenly bloomed with radiant splendor, and a shower of flowers rained down from the sky like tears of pure joy. || 269 ||
श्लोक ( Shlok ) 270
ननादानकसङ्घातो ननाट प्रमदागणः । जगाद गायकानीकः पपाठौघोऽपि वन्दिनाम् ॥ २७० ॥
उस समय नगाड़ोका समूह शब्द कर रहा था, स्त्रियोंका समूह नृत्य कर रहा था, गानेवालोंका समूह गा रहा था और बन्दीजनोंका समूह मङ्गल पाठ पढ़ रहा था ।॥ २७० ॥
At that moment, the assembly of drums resounded with thundering beats, the group of women danced in joy, the choir of singers sang melodious songs, and the gathering of bards recited auspicious panegyrics. || 270 ||
श्लोक 271 से 281
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