अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 432 to 440
श्लोक ( Shlok ) 432– 433
पुत्रेणानेन सार्धं त्वमिहाद्यैनमुपस्थितः । शृण्वन्पुराणसद्भावमित्याहाकर्ण्य तद्वचः ॥ ४३२ ॥सर्व निधाय तच्चित्ते श्रद्धाभून्महती मते । जैने कुतस्तथापि स्यान्न मे व्रतपरिग्रहः ॥ ४३३ ॥
हे राजन् ! आज तू इहाँ उसी बुद्धिमान् पुत्रके साथ उपस्थित हुआ पुराण श्रवण कर रहा है। इस प्रकार गणधर स्वामीके वचन सुनकर राजा श्रेणिकने अपने हृदयमें धारण किये और कहा कि हे भगवन् ! यद्यपि मेरी जैनधर्म में श्रद्धा बहुत भारी है तो भी मैं व्रत ग्रहण क्यों नहीं कर पाता ? ।। ४३२-४३३ ।।
“O King! Today you are present here along with that same wise son, listening to the Puranas.
Having heard these words of the Ganadhara Swami, King Shrenika took them to heart and said, ‘O Holy One! Although my faith in Jainism is immense, why am I still unable to take the vows (Vratas)?'” [432-433]
श्लोक ( Shlok ) 434 – 436
इत्यनुश्रेणिकप्रश्नादवादीगणनायकः । भोगसन्जननाद्गाढमिथ्यात्वानुभवोदयात् ॥ ४३४ ॥ दुश्चरित्रान्महारम्भात्सञ्चित्यैनो निकाचितम् । नारकं बद्धवानायुस्त्वं प्रागेवात्र जन्मनि ॥ ४३५ ॥ बद्धदेवायुषोन्यायुर्नाङ्गी स्वीकुरुते व्रतम् । श्रद्धानं तु समाधत्ते तस्मात्त्वं नाग्रहीव्रतम् ॥ ४३६ ॥
राजा श्रेणिकका प्रश्न समाप्त होनेपर गणधर स्वामीने कहा कि तूने इसी जन्ममें पहले भोगोंकी आसक्ति, तीव्र मिथ्यात्वका उदय, दुश्चरित्र और महान् आरम्भके कारण, जो बिना फल दिये नहीं छूट सकती ऐसी पापरूप नरकायुका बन्ध कर लिया है। ऐसा नियम है कि जिसने देवायुको छोड़कर अन्य आयुका बन्ध कर लिया है वह उस पर्यायमें व्रत धारण नहीं कर सकता। हाँ, सम्यग्दर्शन धारण कर सकता है। यही कारण है कि तू इच्छा रहते हुए भी व्रत धारण नहीं कर पा रहा है ।। ४३४-४३६ ॥
“Upon the conclusion of King Shrenika’s question, the Ganadhara Swami replied, ‘In this very lifetime, due to your attachment to sensual pleasures, the rise of intense delusion (Mithyatva), misconduct, and indulgence in grave sinful undertakings (Maharambh), you have bound yourself to a sinful hellish lifespan (Narakayu)—a bond that cannot be severed without bearing its fruits.
It is an established rule that a soul who has bound themselves to any lifespan other than a celestial one (Devayu) cannot formally adopt vows (Vratas) in that particular birth. However, they can certainly attain right faith (Samyagdarshana). This is the sole reason why, despite your desire, you are unable to take the vows.'” [434-436]
श्लोक ( Shlok ) 437
पुराणश्रुतसम्भूतविशुद्धया करणत्रयात् । सम्यक्त्वमादिमं प्राप्य शान्तसप्तमहारजाः ॥ ४३७ ॥
इस प्रकार पुराणोंके सुननेसे उत्पन्न हुई विशुद्धिके द्वारा उसने अधःकरण, अपूर्वकरण और अनिवृत्तिकरण रूप तीन परिणाम प्राप्त किये और उनके प्रभावसे मोहनीय कर्मकी सात प्रकृतियोंका उपशमकर प्रथम अर्थात् उपशम सम्यग्दर्शन प्राप्त किया ॥ ४३७ ॥
“In this manner, through the spiritual purity born from listening to the Puranas, he attained the three successive stages of pure consciousness—namely, Adhah-karana (initial spiritual manifestation), Apurva-karana (unprecedented spiritual manifestation), and Anivritti-karana (advanced non-retrogression spiritual manifestation).
By the virtue of these results, he suppressed the seven sub-types of Mohaniya Karma (deluding karma) and attained the first type of right faith, known as Upashama Samyagdarshana (subsidial right faith).” [437]
श्लोक ( Shlok ) 438 – 440
अन्तर्मुहूर्तकालेन सम्यक्त्वोदयभाविते । क्षायोपशमिके स्थित्वा श्रद्धाने सञ्चलात्मके ॥ ४३८ ॥ सप्तप्रकृतिनिर्मूलक्षयात्क्षायिकमागतः । आज्ञामार्गोपदेशोत्थं सूत्रबीजसमुद्भवम् ॥ ४३९ ॥ सङ्क्षेपाद्विस्तृतेरर्थाच्चावाप्तमवगाढकम् । परमाद्यवगाढञ्च संम्यक्त्वं दशधोदितम् ॥ ४४० ॥
अन्तर्मुहूर्तके बाद उसके सम्यक्त्व प्रकृतिका उदय हो गया जिससे चलाचलात्मक, क्षायोपशमिक सम्यग्दर्शनमें आ गया और उसके कुछ ही बाद सातों प्रकृतियोंका निर्मूल नाशकर वह क्षायिक सम्यग्दर्शनको प्राप्त हो गया । सम्यग्दर्शन उत्पत्तिकी अपेक्षा दश प्रकारका कहा गया है- आज्ञा, मार्ग, उपदेशोत्थ सूत्रसमुद्भव, बीजसमुद्भव, संक्षेपज, विस्तारज, अर्थज, अवगाढ और परमावगाढ़ ॥ ४३८- ४४० ।।
“After an Antarmuhurta (a scriptural unit of time within 48 minutes), the fruition of his Samyaktva-prakriti (the clouding-yet-right-faith-permitting karma) arose, due to which he transitioned into the Kshayopashamika Samyagdarshana (destructive-subsidiary right faith), which is inherently characterized by subtle fluctuations. Shortly thereafter, by completely eradicating the roots of all the seven sub-types of deluding karmas, he attained Kshayik Samyagdarshana (permanent, destructive right faith).
With respect to its origin, Samyagdarshana (right faith) is said to be of ten kinds:
- Agya (born from accepting scriptural commandment)
- Marga (born from witnessing the path of liberation)
- Upadeshodhtha (born from hearing preaching)
- Sutrasamudbhava (born from studying the aphorisms)
- Beejasamudbhava (born from understanding seeds/principles of knowledge)
- Sankshepaja (born from brief instruction)
- Vistaraja (born from extensive study)
- Arthaja (born from grasping the profound meaning of realities)
- Avagadha (deeply absorbed, based on scriptural knowledge)
- Paramavagadha (supremely absorbed, experienced directly by omniscient beings)” [438-440]
श्लोक 441 से 453
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322 | श्लोक 323 से 330 | श्लोक 331 से 342 | श्लोक 343 से 352 | श्लोक 353 से 362 | श्लोक 363 से 372 | श्लोक 373 से 385 | श्लोक 386 से 396 | श्लोक 397 से 413 | श्लोक 414 से 422 | श्लोक 423 से 431
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