शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 202 to 221
श्लोक ( Shlok ) 202 – 205
चित्रपद्मादिकूटाख्यौ कूटान्तनलिनः परः । एकशैलस्निकूटश्च कूटो वैश्रवणादिकः ॥ २०२ ॥अन्जनात्माम्जनौ श्रद्धावांश्च विजयावती । आशीविषाभिधानश्च सुखावहसमाह्वयः ॥ २०३ ॥चन्द्रमालस्तथा सूर्यमालो नागादिमालवाक् । देवमालः परो गन्धमादनो माल्यवानपि ॥ २०४ ॥विद्युत्प्रभः सौमनसः प्रलयोत्पत्तिदूरगाः । विभङ्गनद्यो झेताश्च स्वच्छाम्बुपरिपूरिताः ॥ २०५ ॥
चित्रकूट, पद्मकूट, नलिनकूट, एकशैल, त्रिकूट, वैश्रवणकूट, अञ्जनात्म, अञ्जन, श्रद्धावान्, विजयावती, आशीविष, सुखावह, चन्द्रमाल, सूर्यमाल, नागमाल और देवमाल ये सोलह इनके नाम हैं। इनके सिवाय गन्धमादन, माल्यवान्, विद्यत्प्रभ और सौमनस्य ये चार गजदन्त हैं। ये सब पर्वत उत्पत्ति तथा विनाशसे दूर रहते हैं- अनादिनिधन हैं। इधर स्वच्छ जलसे भरी हुई ये विभङ्ग नदियाँ हैं ।॥ २०२-२०५ ।।
“Chitrakuta, Padmakuta, Nalinakuta, Ekashaila, Trikuta, Vaishravanakuta, Anjanatma, Anjana, Shraddhavan, Vijayavati, Ashivisha, Sukhavaha, Chandramala, Suryamala, Nagamala, and Devamala—these are their sixteen names. Apart from these, Gandhamadana, Malyavan, Vidyutprabha, and Saumanasya are the four elephant-tusk-shaped mountains (Gajadanta). All of these mountains are untouched by creation or destruction—they are eternal and without end (Anadi-nidhana). And over here are the Vibhanga rivers, overflowing with crystal-clear waters.” [202-205]
श्लोक ( Shlok ) 206 – 207
हवाड्रदवतीसंज्ञे परा पक्वतीति च । तप्तमत्तजलाभ्याञ्च सहोन्मत्तजलाह्वया ॥ २०६ ॥क्षीरोदा च सशीतोदा स्त्रोतोऽन्तर्वाहिनी परा । गन्धादिमालिनी फेनमालिन्यूर्यादिमालिनी ॥ २०७ ॥
हृदा, हृदवती, पङ्कवती, तप्तजला, मन्त्तजला, उन्मत्तजला, क्षीरोदा, शीतोदा, स्रोतोऽन्तर्वाहिनी, गन्धमालिनी, फेनमालिनी और ऊर्मिमालिनी ये बारह इनके नाम हैं ॥ २०६-२०७।।
“Hrada, Hradavati, Pankavati, Taptajala, Mattajala, Unmattajala, Kshiroda, Shitoda, Srotontarvahini, Gandhamalini, Phenamalini, and Urmimalini—these are their twelve names.” [206-207]
श्लोक ( Shlok ) 208 – 220
अमी च विषयाः कच्छसुकच्छपरिभाषितौ । महाकच्छा तथा कच्छकावत्यावर्तलाङ्गलाः ॥ २०८ ॥पुष्कला पुष्कलावस्यो वत्सा नाम्ना च कीर्तिता । सुवत्सा च महावत्सा विख्याता वत्सकावती ॥२०९॥रम्या च रम्यकाख्या रमणीया मङ्गलावती । पद्मा सुपद्मा महापद्मा पद्मावत्यभिख्यया ॥ २१० ॥ शङ्का च नलिनान्या च कुमुदा सरिता परा । वप्रा सुवप्रा च महावप्रया वप्रकावती ॥ २११ ॥गन्धा सुगन्धा गन्धावत् सुगन्धा गन्धमालिनी । एताश्च राजधान्योऽत्र कुमारालोकयस्फुटम् ॥२१२॥क्षेमा क्षेमपुरी चान्याऽरिष्टाऽरिष्टपुरी परा । खङ्गाख्यया च मञ्जूषा चौषधी पुण्डरीकिणी ॥ २१३ ॥सुसीमा कुण्डला सार्द्धमपराजितसंज्ञया । प्रभङ्कराङ्कवत्याख्या पद्मावत्यभिधोदिता ॥ २१४ ॥शुभा शब्दाभिधाना च नगरी रजसञ्चया । अश्वसिंहमहापुर्यो विजयादिपुरी परा ॥ २१५ ॥अरजा विरजाश्चैवमशोका वीतशोकवाक् । विजया वैजयन्ती च जयन्ती चापराजिता ॥ २१६ ॥अथ चक्रपुरी खङ्गपुर्ययोध्या च वर्णिता । अवध्येत्यथ सीप्तोत्तराभागान्मेरुसन्निधेः ॥ २१७ ॥प्रविश्येन वाराश्च प्रतिपादितान । समनादिवनादीनि भूतोहिष्टानि अभुजा ॥ २१८ ॥पश्यतान्यानि च स्वैरं मानुषोत्तरभूभृतः । मध्यवर्तीनि सर्वाणि प्रीत्याविष्कृततेजसा ॥ २१९ ॥अकृत्रिमजिनागाराण्यभ्यर्च्य स्तुतिभिश्चिरम् । ‘स्तुत्वाऽर्थ्याभिनिवृत्यापि स्वपुरं परमोत्सवम् ॥ २२०॥
हे कुमार ! स्पष्ट देखिये, कच्छा, सुकच्छा, महाकच्छा, कच्छकावती, आवर्ता, लाङ्गला, पुष्कला, पुष्कलावती, वत्सा, सुवत्सा, महावत्सा, वत्सकावती, रम्या, रम्यका, रमणीया, मङ्गलावती, पद्मा, सुपद्मा, महापद्मा, पद्मावती, शङ्खा, नलिना, कुमुदा, सरिता, वप्रा, सुवप्रा, महाषप्रा, वप्रकावती, गन्धा, सुगन्धा, गन्धावत्सुगन्धा और गन्ध-मालिनी ये बत्तीस विदेइक्षेत्रके देश हैं। तथा तेमा, क्षेमपुरी, अरिष्टा, अरिष्टपुरी, खङ्ग, मञ्जूषा, औषधी, पुण्डरीकिणी, सुसीमा, कुण्डला, अपराजिता, प्रभैकरा, अंकवती, पद्मावती, शुभा, रत्नसञ्चया, अश्वपुरी, सिंहपुरी, महापुरी, विजयपुरी, अरजा, विरजा, अशोका, वीतशोका, विजया, वैजयन्ती, जयंती, अपराजिता, चक्रपुरी, खङ्गपुरी, अयोध्या और अवध्या ये बत्तीस नगरियाँ उन देशोंकी राजधानियाँ हैं। ये वक्षार पर्वत, विभंग नदी और देश आदि सब सीता नदीके उत्तरकी ओर मेरु पर्वतके समीपसे प्रदक्षिणा रूपसे वर्णन किये हैं। इनके सिवाय उन व्यन्तर देवोंने समुद्र, वन आदि जो जो दिखलाये थे वे सब राजकुमारने देखे । इच्छानुसार मानुषोत्तर पर्वत देखा और उसके बीचमें रहनेवाले समस्त प्रिय स्थान देखे । अपना तेज प्रकट करनेवाले राजकुमारने बड़ीप्रीतिसे अकृत्रिम जिन-मन्द्रिोंकी पूजा की, अर्थपूर्ण स्तुतियोंसे स्तुति की और तदनन्तर बड़े उत्सवों-से युक्त अपने नगरमें वापिस आ गये ॥ २०८-२२० ॥
““O Prince! Behold clearly: Kachha, Sukachha, Mahakachha, Kachhakavati, Avarta, Langala, Pushkala, Pushkalavati, Vatsa, Suvatsa, Mahavatsa, Vatsakavati, Ramya, Ramyaka, Ramaniya, Mangalavati, Padma, Supadma, Mahapadma, Padmavati, Shankha, Nalina, Kumuda, Sarita, Vapra, Suvapra, Mahavapra, Vaprakavati, Gandha, Sugandha, Gandhavatsugandha, and Gandhamalini—these are the thirty-two realms (deshas) of Videha-kshetra.
Furthermore, Kshema, Kshemapuri, Arishta, Arishtapuri, Khadga, Manjusha, Aushadhi, Pundarikini, Susima, Kundala, Aparajita, Prabhakara, Ankavati, Padmavati, Shubha, Ratnasanchaya, Ashvapuri, Simhapuri, Mahapuri, Vijayapuri, Araja, Viraja, Ashoka, Vitashoka, Vijaya, Vaijayanti, Jayanti, Aparajita, Chakrapuri, Khadgapuri, Ayodhya, and Avadhya—these thirty-two cities are the glorious capitals of those respective realms.
All of these Vakshara mountains, Vibhanga rivers, and kingdoms have been described in a circumambulatory order (pradakshina), starting near Mount Meru to the north of the Sita river.”
Apart from these, whatever oceans, grand forests, and celestial landscapes those Vyantara deities pointed out, the prince beheld them all. He gazed to his heart’s content upon the vast Manushottara Mountain and explored every beautiful, beloved sanctuary within its boundary. There, the radiant prince worshiped the eternal, uncreated Jain temples (Akrutrim Jina-mandirs) with profound devotion, offered praises filled with deep spiritual meaning, and subsequently returned to his own capital amid grand, jubilant celebrations.” [208-220]
श्लोक ( Shlok ) 221
दिव्याभरणदानेन परिपूज्य महीपतिम् । सामोक्तिभिश्च तौ व्यन्तेरेशौ स्वावासमीयतुः ॥ २२१ ॥
वहाँ आकर उन व्यन्तर देवोंने दिव्य आभरण देकर तथा शान्तिपूर्ण शब्द कहकर राजाकी पूजा की और उसके बाद वे निवासस्थान पर चले गये ।। २२१ ।।
“Upon arriving there, those Vyantara deities worshiped the king by presenting him with divine, exquisite ornaments and offering deeply peaceful, reverent words. Thereafter, they departed for their own celestial abodes.” [221]
श्लोक 222 से 231
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102 | श्लोक 103 से 114 | श्लोक 115 से 121 | श्लोक 122 से 132 | श्लोक 133 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 182 | श्लोक 183 से 192 | श्लोक 193 से 201
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