शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation of Uttar Puran parv 63- shlok 103 to 114
श्लोक ( Shlok ) 103 – 106
सुदत्तस्तेन निर्विण्णः सुत्रताख्यजिनान्तिके । प्रब्रज्य सुचिरं घोरं तपः कृत्वाऽऽयुषोऽवधौ ॥१०३॥संन्यस्येशानकल्पेऽभूदेकसागरजीवितः । तत्र भोगोंश्चिरं भुक्त्वा ततः प्रच्युल्य पुण्यभाक् ॥१०४॥जम्बूद्वीपसुकच्छाख्य विजयार्द्धाचलोत्तर- । श्रेण्यां पुरेऽभवत्काञ्चनाद्यन्ततिलकाह्वये ॥ १०५ ॥महेन्द्रविक्रमस्येष्टतनूजोऽजितसेनवाक् । अभवन्नीलवेगायां विद्याविक्रमदुर्गतः ॥ १०६ ॥
सुदत्त इस घटनासे बहुत ही विरक्त हुआ । उसने सुव्रत नामक जिनेन्द्रके समीप दीक्षा ले ली और चिर काल तक घोर तपश्चरण कर आयुके अन्तमें संन्यासमरण किया जिससे ऐशान स्वर्गमें एक सागरकी आयुवाला देव हुआ । वह पुण्यात्मा चिर काल तक भोग भोग कर वहाँ से च्युत हुआ और इसी जम्बूद्वीप सम्बन्धी सुकच्छ देशके विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीपर काञ्चनतिलक नामक नगर में राजा महेन्द्रविक्रम और नीलवेगा नामकी रानीके अजितसेन नामका प्यारा पुत्र हुआ। यह विद्या और पराक्रमसे दुर्जेय है।॥१०३-१०६।।
“Deeply detached from the world due to this tragic event, Sudatta accepted spiritual initiation (Diksha) under the Jinendra named Suvrata. He practiced severe penances for a very long time, and at the end of his lifespan, he embraced a holy ritual death (Sanyasa-marana), by virtue of which he was reborn as a deity with a lifespan of one Sagara in the Aishana heaven.
After enjoying celestial pleasures for a vast period, that meritorious soul departed from heaven and was reborn on the northern ridge of the Vijayardha Mountain, in the Sukachha province of this very Jambudvipa. In the city of Kanchanatilaka, he became the beloved son, named Ajitasen, of King Mahendravikrama and Queen Nilavega. Armed with supernatural arts (Vidyas) and immense prowess, he is invincible in battle.”) 103 – 106
श्लोक ( Shlok ) 107 – 108
इतो नलिनकेतुश्च वीक्ष्योल्कापातमात्मवान् । निविंद्य प्राक्तनात्मीयं दुश्चरित्रं विनिन्दयन् ॥१०७॥सोमङ्करमुनिं श्रित्वा दीक्षामादाय शुद्धधीः । क्रमात्कैवल्यमुत्पाद्य सम्प्रापत्क्षितिमष्टमीम् ॥१०८॥
इधर नलिनकेतुको उल्कापात देखनेसे आत्मज्ञान हो गया। उसने विरक्त हो कर अपने पिछले दुश्चरित्रकी निन्दा की, सीमंकर मुनिके पास जाकर दीक्षा ली, बुद्धिको निर्मल बनाया, क्रम क्रमसे केवलज्ञान उत्पन्न किया और अन्तमें अष्टम भूमि – मोक्ष स्थान प्राप्त कर लिया ॥१०७-१०८।।
“Meanwhile, upon witnessing a falling meteor (Ulkapata), Naliniketu attained self-realization. Becoming deeply detached from worldly life, he intensely condemned his past wicked behavior.
He went to the ascetic Seemankara Muni to receive spiritual initiation (Diksha), purified his intellect, and gradually attained Kevalajnana (omniscience). Ultimately, he achieved the Ashtama Bhumi—the eighth realm, which is the state of absolute liberation (Moksha).”107 – 108
श्लोक ( Shlok ) 109 – 114
प्रौतिङ्करापि ‘निर्वेगास्संश्रिता सुब्रतान्तिकम् । गृहसङ्गपरित्यागात्कृत्वा चान्द्रायणं परम् ॥१०९॥प्रान्ते संन्यस्य सा प्रायात्कल्पमीशाननामकम् । तत्र स्वायुः स्थिति नीत्वा दिव्यैर्भोगैस्ततश्च्युता ॥११०॥तवाजनि तनूजेयमयं विद्याविघातकृत् । तत्सम्बन्धादिति प्रोक्तं सर्वमाकर्ण्य भूभुजा ॥१११॥निविंद्य संसृतेः शान्तिमती क्षेमङ्कराह्वयात् । तीर्थेशाद्धर्ममासाद्य सद्यः प्राप्य सुलक्षणाम् ॥११२॥गणिनीं संयमं श्रित्वा संन्यस्येशानसंज्ञके । नाके निलिम्पो भूत्वा स्वकायपूजार्थमागमत् ॥११३॥तदामीमेव कैवल्यं प्रापत् पवनवेगवाक् । सहैवाजितसेनेन कृत्वा पूजां तयोरयात् ॥ ११४ ॥
प्रीर्तिकरा भी विरक्त हो कर सुव्रता आर्थिकाके पास गई और घर तथा परिग्रहका त्याग कर चान्द्रा-यण नामक श्रेष्ठ तप करने लगी। अन्तमें संन्यासमरण कर ऐशान स्वर्गमें देवी हुई। वहाँ दिव्य भोगोंके द्वारा अपनी आयु पूरी कर वहाँ से च्युत हुई और अब तुम्हारी पुत्री हुई है। पूर्व पर्यायके सम्बन्धसे ही इस विद्याधरने इसकी विद्यामें विन्न किया था’। इस प्रकार राजा वज्रायुधके द्वारा कही हुई सब बात सुनकर शान्तिमती संसारसे विरक्त हो गई। उसने क्षेमंकर नामक तीर्थंकरसे धर्म श्रवण किया और शीघ्र ही सुलक्षणा नामकी आर्यिकाके पास जा कर संयम धारण कर लिया। अन्तमें संन्यास मरण कर वह ऐशान स्वर्गमें देव हुई। वह अपने शरीरकी पूजाके लिए आई थी उसी समय पवनवेग और अजितसेन मुनिको केवलज्ञान प्राप्त हुआ सो उनकी पूजा कर वह अपने स्थान पर चली गई ।॥ १०९-११४ ॥
“Preetinkara also became detached from worldly life, approached the nun Suvrata Aryika, and renouncing her home and all material possessions (Parigraha), began practicing the supreme penance known as Chandrayana. Ultimately, embracing a holy ritual death (Sanyasa-marana), she was reborn as a goddess in the Aishana heaven.
After completing her lifespan there amid celestial pleasures, she departed from heaven and has now been born as your daughter (Shantimati). It was solely due to the unresolved connection of their past life that this Vidyadhara (Ajitasen) had created obstacles in her spiritual practice.”
Hearing this entire narrative recounted by King Vajrayudha, Shantimati became completely detached from the cycle of worldly existence (Samsara). She listened to the sacred discourse delivered by the Tirthankara named Kshemankara, and immediately went to the nun Sulakshana Aryika to embrace a life of self-restraint (Sanyama).
Ultimately, through Sanyasa-marana, she was reborn as a deity in the Aishana heaven. She had initially descended to Earth to perform the ritual worship of her own past physical body; however, at that exact moment, Pawanvega and the monk Ajitasen attained Kevalajnana (omniscience). Therefore, after worshiping them, she returned to her celestial abode.”109 – 114
श्लोक 115 से 121
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 |श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 92 | श्लोक 93 से 102
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