नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लो श्लोक 162 से 171| श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 223 to 234
श्लोक ( Shlok ) 223
तादृशं तादृशामासीद्धिग्धिग्दुष्कर्मणां गतिम् । निर्मूलयन्ति कर्माणि तत एव हि धीधनाः ॥ २२३ ॥
आचार्य गुणभद्र कहते हैं कि वैसे लोकोत्तर पुरुषोंकी वैसी दशा हुई इसलिए अशुभ कर्मोंकी गतिको बार-बार धिक्कार हो और निश्चयसे इसीलिए बुद्धिमान् पुरुष इन कर्मोंको निर्मूल करते हैं -उखाड़ कर नष्ट कर देते हैं ।। २२३ ।।
“Acharya Gunabhadra says: Since even such extraordinary, supreme beings (Lokottara Purushas) had to face such a tragic fate, a curse be upon the course of inauspicious karmas (Ashubha Karmas) again and again! In truth, it is for this very reason that wise men completely uproot and destroy these karmas.”— 223
श्लोक ( Shlok ) 224 – 226
यत्सर्व पाण्डवाः श्रुत्वा तदायन्मधुराधिपाः । स्वामिबन्धुवियोगेन निविंद्य त्यक्तराज्यकाः ॥ २२४ ॥महाप्रस्थानकर्माणः प्राप्य नेमिजिनेश्वरम् । तत्कालोचितसत्कर्म सर्वं निर्माप्य भाक्तिकाः ॥ २२५ ॥स्वपूर्वभवसम्बन्धमपृच्छन्संसृतेर्भयात् । अवोचद्भगवानित्थमप्रतर्व्यमहोदयः ॥ २२६ ॥
मथुराके स्वामी पाण्डव, यह सब समाचार सुनकर वहाँ आये । वे सब, स्वामी श्रीकृष्ण तथा अन्य बन्धुजनोंके वियोगसे बहुत विरक्त हुए और राज्य छोड़कर मोक्षके लिए महाप्रस्थान करने लगे। उन भक्त लोगोंने नेमिनाथ भगवान्के पास जाकर उस समयके योग्य नमस्कार आदि सत्कर्म किये तथा संसारसे भयभीत होकर अपने पूर्वाभव पूछे। उत्तर में अचिन्त्य वैभवके धारक भगवान् भी इस प्रकार कहने लगे ॥ २२४-२२६ ।।
“The Pandavas, the rulers of Mathura, arrived there upon hearing all this news. Deeply detached from the world (Virakta) due to their separation from their master, Shri Krishna, and their other kinsmen, they renounced their kingdom and set out on the Great Journey (Mahaprasthana) for the sake of ultimate liberation (Moksha).
Approaching Lord Neminatha with deep devotion, they performed the fitting rituals of reverence and prostration suitable for the occasion. Filled with intense detachment and fear of the cycle of rebirth (Samsara), they enquired about their past lives (Purvabhava). In response, the Lord—the possessor of unimaginable spiritual splendor (Achintya Vaibhava)—began to speak as follows.”— 224–226
श्लोक ( Shlok ) 227 – 230
जम्बूसम्भाविते द्वीपे भरतेऽङ्गे पुरी परा । चम्पाख्या कौरवस्तत्र महीशो मेघवाहनः ॥ २२७ ॥सोमदेवो द्विजोऽत्रैव ब्राह्मणी तस्य सोमिला । तयोः सुतास्त्रयः सोमदत्तसोमिलनामकः ॥ २२८ ॥सोमभूतिश्च वेदाङ्गपारगाः परमद्विजाः । अमीषां मातुलस्याग्निभूतेस्तिस्त्रोऽभवन्सुताः ॥ २२९ ॥अग्निलायां धनश्रीमित्रश्रीनागश्रियः प्रियाः । तेभ्यो यथाक्रमं दत्तास्ताः पितृभ्यां सुलक्षणाः ॥ २३० ॥
उन्होंने कहा कि इसी जम्बूद्वीपके भरत क्षेत्र सम्बन्धी अङ्गदेशमें एक चम्पापुरी नामकी नगरी है उसमें कुरुगंशी राजा मेघवाहन राज्य करता था। उसी नगरी में एक सोमदेव नामका ब्राह्मण रहता था उसकी ब्राह्मणीका नाम सोमिला था । उन दोनोंके सोमदत्त, सोमिल और सोमभूति ये वेदांगोंके पारगामी परम ब्राह्मण तीन पुत्र हुए थे। इन तीनों भाइयोंके मामा अग्निभूति थे उसकी अग्निला नामकी स्त्रीसे धनश्री, मित्रश्री और नागश्री नामकी तीन प्रिय पुत्रियाँ उत्पन्न हुई थीं। अग्निभूति और अग्निलाने शुभलक्षणोंवाली ये तीनों कन्याएँ अपने तीनों भानेजोंके लिए यथा क्रमसे दे दीं ।। २२७-२३० ।।
“The Lord said: In the Anga region of this very Bharata Kshetra within Jambudvipa, there is a city named Champapuri, where the Kuru-lineage King Meghavahana used to rule. In that same city lived a Brahmin named Somadeva; his wife’s name was Somila. To them were born three sons named Somadatta, Somil, and Somabhuti, who became supreme Brahmins deeply well-versed in the Vedangas (the auxiliary limbs of the Vedas).
The maternal uncle of these three brothers was Agnibhuti. From his wife named Agnila, three beloved daughters were born: Dhanashri, Mitrashri, and Nagashri. Agnibhuti and Agnila subsequently wedded these three highly virtuous daughters to their three nephews in successive order.”— 227–230
श्लोक ( Shlok ) 231 – 234
सोमदेवः सुनिविंद्य सुधीः केनापि हेतुना । प्राबाजीदन्यदा धर्मरुचिनामतपोधनम् ॥ २३१ ॥प्रविशन्तं गृहं भिक्षाकाले वीक्ष्यानुकम्पया । सोमदत्तः प्रतीक्ष्यैनमाह पत्नीं कनीयसः ॥ २३२ ॥नागश्रीविंतरास्मै त्वं भिक्षामिति कृतादरम् । मामेव सर्वदा सर्वमेष प्रेषयतीति सा ॥ २३३ ॥कुपिता विषसम्मिश्रं ददावनं तपोभृते । स सन्न्यस्य समाराव्य प्रापदन्त्यमनुत्तरम् ॥ २३४ ॥
तदनन्तर-बुद्धिमान् सोमदेवने किसी कारणसे विरक्त होकर जिन-दीक्षा ले ली। किसी एक दिन भिक्षाके समय धर्मरुचि नामके तपस्वी मुनिराजको अपने घरमें प्रवेश करते देखकर दयालुता वश सोमदत्तने उनका पडिगाहन किया और छोटे भाईकी पत्नीसे कहा कि हे नागश्री ! तू इनके लिए बड़े आदरके साथ भिक्षा दे दे । नागश्रीने मनमें सोचा कि ‘यह सदा सभी कार्यके लिए मुझे ही भेजा करता है’ यह सोचकर वह बहुत ही क्रुद्ध हुई और उसी क्रुद्धावस्थामें उसने उन तपस्वी मुनिराजके लिए विष मिला हुआ आहार दे दिया जिससे संन्यास धारण कर तथा चारों आराधनाओं की आराधना कर उक्त मुनिराज सर्वार्थसिद्धि नामक अनुत्तर विमानमें जा पहुंचे ॥ २३१-२३४ ।।
“Thereafter, the intelligent Somadeva, having attained detachment (Viragya) due to some reason, initiated into the Jina-order as a monk (Jina-Deeksha). One day, during the hours of seeking alms (Bhiksha), Somadatta saw the ascetic sage Muniraj Dharmaruchi entering his house. Driven by deep compassion, Somadatta performed the ritual welcome (Padigahana) and said to his younger brother’s wife: ‘O Nagashri! Please offer alms to this ascetic sage with great reverence.’
Nagashri thought to herself, ‘He always commands me alone for every piece of work.’ Thinking thus, she became thoroughly enraged. In that fit of anger, she served food mixed with poison to the ascetic sage. Consequently, that Muniraj embraced the final vow of voluntary spiritual death (Sanyasa/Sallekhana), successfully practiced the fourfold spiritual adorations (Aradhnas), and ascended to the supreme celestial realm known as the Sarvarthasiddhi Anuttara Vimana.”—231–234
श्लोक 235 से 248
उत्तरपुराण Uttarapurana home page
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141 | श्लोक 142 से 153 | श्लोक 154 से 161 | श्लोक 162 से 171 श्लोक 172 से 183 | श्लोक 184 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 222
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 | पर्व 58 | पर्व 59 | पर्व 60 | पर्व 61 | पर्व 62 | पर्व 63 | पर्व 64 | पर्व 65 |