पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 25 से 32 | श्लोक 33 से 43 | श्लोक 44 से 53 | श्लोक 54 से 66 | श्लोक 67 से 79 | श्लोक 80 से 92 | श्लोक 93 से 105
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 73- shlok 106 to 114
श्लोक ( Shlok ) 106 – 114
अहं प्रभुर्ममायं किं वा करोतीत्यवज्ञया । तपसो मम माहात्म्यमबुद्धवैवं ब्रवीषि किम् ॥ १०६ ॥पञ्चाग्निमध्यवर्तित्वं पवनाहारजीवनम् । ऊर्ध्वबाहुतया पादेनैकेनैव चिरं स्थितिः ॥ १०७ ॥स्वयंपतितपर्णादेरुपवासेन पारणम् । इत्यादिकायसन्तापि तापसानां सुदुर्धरम् ॥ १०८ ॥तपो नाधिकमस्त्यस्मादिति तद्वचनश्रुतेः । सुभौमः सस्मितोऽवादीन भवन्तमहं गुरुम् ॥ १०९ ॥अवमन्ये पुनः किन्तु सन्त्यज्याप्तागमादिकम् । मिथ्यात्वादिचतुष्केण पृथिव्यादिषु षट्स्वपि ॥ ११० ॥वाचा कायेन मनसा कृतकादित्रिकेण च । वधे प्रवर्तमानानामनाप्तमतसंश्रयात् ॥ १११ ॥निर्वाणप्रार्थनं तेषां तण्डुलावाप्तिवाञ्छया । तुषखण्डनखेदो वा घृतेच्छा वाम्बुमन्थनात् ॥ ११२ ॥हेमोपलब्धिबुद्धिर्वा दाहादन्धाश्मसंहतेः । अन्धस्येवाग्निसम्पातो दावभीत्या प्रधावतः ॥ ११३ ॥ज्ञानहीनपरिक्लेशो भाविदुःखस्य कारणम् । इति प्ररूप्यते युष्मत्स्नेहेन महता मया ॥ ११४ ॥
कि ‘मैं प्रभु हूँ, यह मेरा क्या कर सकता है’ इस प्रकारकी अवज्ञासे मेरे तपका माहात्म्य बिना जाने ही तू ऐसा क्यों बक रहा है ? पञ्चाग्निके मध्यमें बैठना, वायु भक्षण कर ही जीवित रहना, ऊपर भुजा उठाकर चिरकाल तक एक ही पैरते खड़े रहना, और उपवास कर अपने आप गिरे हुए पत्ते आदिसे पारण करना। इस प्रकार शरीरको सन्तापित करनेवाला तपस्वियोंका तप बहुत ही कठिन है, इस तपञ्चरणसे बढ़कर दूसरा तपश्चरण हो ही नहीं सकता। उस तपस्वीके ऐसे वचन सुन सुभौमकुमार हँसकर कहने लंगा कि मैं न तो आपको गुरु मानता हूं और न आपका तिरस्कार ही करता हूँ किन्तु जो आप्त तथा आगम आदिको छोड़कर मिथ्यात्व एवं क्रोधादि चार कषायोंके वशीभूत हो पृथिवीकायिक आदि छह कायके जीवोंकी हिंसामें मन, वचन, काय और कृत, कारित, अनुमोदनासे प्रवृत्ति करते हैं और इस तरह अनाप्तके कहे हुए मतका आश्रय लेकर निर्वाणकी प्रार्थना करते हैं- मोक्ष प्राप्त करना चाहते हैं सो उनकी यह इच्छा चावल पानेकी इच्छासे धानके छिलके कूटनेके प्रयासके समान है, अथवा जल मथकर घी प्राप्त करनेकी इच्छा के समान है, अथवा अन्धपाषाणके समूहको जलाकर सुवर्ण करनेकी इच्छाके समान है, अथवा जिस प्रकार कोई अन्धा मनुष्य दावानलके डरसे भागकर अग्निमें जा पड़े उसके समान है। ज्ञानहीन मनुष्यका कायक्लेश भावी दुःखका कारण है। यह बात मैं, आप पर बहुत भारी स्नेह होनेके कारण कह रहा हूँ’ ।। १०६-११४ ॥
He said, “Thinking ‘I am a prince, what can he do to me?’ and disrespecting me without understanding the greatness of my austerities, why are you speaking such nonsense?
Sitting in the midst of five fires, surviving solely on consuming air, standing on one foot for a very long time with arms raised high, and breaking fasts only with naturally fallen leaves after long periods of starvation—the penance of ascetics that torments the body in this manner is extremely difficult. There can be no greater penance than this.”
Hearing these words from the ascetic, Prince Shubhauma laughed and said, “I neither accept you as a Guru, nor am I insulting you. However, those who abandon the true omniscient Lord (Apta) and the authentic scriptures (Agama), and fall under the control of false beliefs (Mithyatva) and the four passions like anger (Kashayas), actively engage in harming the six classes of living beings (such as earth-bodied beings, etc.) through mind, speech, and body—whether by doing it themselves, causing others to do it, or approving of it—and then expect to achieve liberation (Nirvana) by relying on doctrines taught by false teachers… their desire is like trying to get rice grains by pounding empty husks.
It is like trying to extract butter by churning water, or trying to turn dark stones into gold by burning them, or like a blind man who, fleeing from a forest fire out of fear, runs straight into the flames.
The bodily torture endured by an ignorant person is only a cause for future misery. I am telling you this solely because of my great affection for you.” (106-114)
श्लोक 115 से 124
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