अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 323 to 330
श्लोक ( Shlok ) 323
पुण्यहेतुर्विनेयानां वीरो निर्गत्य तद्गहात् । विहितेच्छो ‘विविक्तेषु विधातुं विधिवत्तपः ॥ ३२३ ॥
तदनन्तर शिष्योंका पुण्य बढ़ाने वाले वे भगवान् एकान्त स्थानोंमें विधिपूर्वक तप करनेकी इच्छासे उसके घरसे निकले ।। ३२३ ॥
“Thereafter, the Lord, who augments the spiritual merit (punya) of His disciples, departed from the king’s house with the desire to perform rigorous, scriptural penance (tap) in solitary and secluded places. || 323 ||”
श्लोक ( Shlok ) 324 – 329
विषयद्रुमसङ्कीर्ण करणाटविकोत्कटम् । परीषहमहाघोरविश्वश्वापदसङ्गुलम् ॥ ३२४ ॥ कषायमत्तमातङ्ग सङ्घातशतसन्ततम् । विवृतास्यान्तकानन्तकुम्भीनसविभीषणम् ॥ ३२५ ॥ चतुविधोपसर्गोग्रकण्ठीरवकठोरितम् । विप्नौघतस्करारुद्धं त्यक्त्वा भववनं शनैः ॥३२६ ॥ तपोवनं सतां सेव्यमव्याहतसुखावहम् । महाजनसमाकीर्ण विस्तीर्णमनुपप्लुतम् ॥ ३२७ ॥महाव्रतमहासामन्तान्वितः सुनयानुगः । दर्शनज्ञानचारित्रव्यक्तशक्तित्रयोजितः ॥ ३२८ ॥ शीलायुधो गुणब्रातकवचः शुद्धमार्गगः । सद्भावनासहायः सन् प्रविश्य परमः पुमान् ॥ ३२९ ॥
जो विषयरूपी वृक्षोंसे सङ्कीर्ण है, इन्द्रिय रूपी व्याधोंसे भरा हुआ है, परीषह रूपी महाभयंकर सब प्रकारके दुष्ट जीवोंसे सहित है, कषाय रूपी मदोन्मत्त हाथियोंके सैकड़ों समूहसे व्याप्त है, मुँह फाड़े हुए यमराज रूपी अनन्त अजगरोंसे भयंकर है, चार प्रकारके उपसर्ग रूपी दुष्ट सिंहोंसे कठोर है, और विघ्नो के समूह रूपी चोरोंसे घिरा हुआ है ऐसे संसार रूपी वनको धीरे-धीरे छोड़कर उन परम पुरुष भगवान् ने, जो सज्जनोंके द्वारा सेवन करने योग्य है, जिसमें अव्याबाध – बाधारहित सुख भरा हुआ है, जो उत्तम मनुष्योंसे व्याप्त है, विस्तीर्ण है और सब तरहके उपद्रवोंसे रहित है ऐसे तपोवनमें, महाव्रत रूपी महा सामन्तों सहित, उत्तम नयोंकी अनुकूलता धारणकर, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान तथा सम्यक्चारित्र रूपी प्रकट हुई तीन शक्तियोंसे अत्यन्त बलवान्, शील रूपी आयुध लेकर, गुणोंके समूहका कवच पहिनकर, शुद्धता रूपी मार्गसे चलकर और उत्तम भावनाओं की सहायता लेकर प्रवेश किया ।। ३२४-३२९ ।।
“Gradually leaving behind the forest of worldly existence (Samsara)—which is densely tangled with the trees of sensual pleasures, infested with the hunters of the senses, filled with all kinds of terrifying, malicious creatures in the form of afflictions (parishahas), swarming with hundreds of herds of furious elephants in the form of passions (kashayas), made horrific by endless pythons in the form of Yama (the God of Death) with jaws wide open, rendered harsh by cruel lions in the form of the fourfold disturbances (upasargas), and surrounded by thieves in the form of multitudes of obstacles—
—that Supreme Soul, the Lord, entered the forest of penance (Tapovana). This forest of penance is worthy of being resorted to by the righteous, filled with uninterrupted and unobstructed bliss, populated by noble souls, vast, and entirely free from all adversities. He entered it accompanied by the great chieftains in the form of the supreme vows (mahavratas), adopting the harmony of the exalted viewpoints (nayalas), rendered exceedingly powerful by the three manifest strengths of Right Faith, Right Knowledge, and Right Conduct (Ratnatraya), wielding the weapon of moral virtue (sheela), wearing the armor of the multitude of spiritual attributes (gunas), walking along the path of absolute purity, and sustained by the aid of sublime reflections (bhavanas). || 324–329 ||”
श्लोक ( Shlok ) 330
“आवसंस्तन्त्र निश्शनं नानायोगान्प्रवर्तयन् । धर्म्यध्यानं विविक्तस्थो ध्यायन् दशविधं मुहुः ॥ ३३० ॥
वहाँपर निःशङ्क रीतिसे रहकर उन्होंने अनेक योगोंकी प्रवृत्ति की और एकान्त स्थानमें स्थित होकर बार-बार दश प्रकारके धर्म्य ध्यानका चिन्तवन किया ।। ३३० ।।
“Dwelling there in absolute fearlessness, He practiced various forms of spiritual concentration (yogas) and, seated in a solitary place, repeatedly meditated upon the ten facets of righteous contemplation (Dharmya-dhyana). || 330 ||”
श्लोक 331 से 342
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्तीपर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462 | नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 288 | पाश्र्वनाथ तीर्थंकर के पुराण का वर्णन पर्व 73 – श्लोक 1 से 170
अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222 | श्लोक 223 से 232 | श्लोक 233 से 241 | श्लोक 242 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 270 | श्लोक 271 से 281 | श्लोक 282 से 293 | श्लोक 294 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 322
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