अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 143 | श्लोक 144 से 151 | श्लोक 152 से 161
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 162 to 171
श्लोक ( Shlok ) 162 – 163
स विलक्षो हयग्रीवो मायायुद्धेऽपि निर्जितः । चक्रं सम्प्रेषयामास त्रिपृष्ठमभि निष्ठरम् ॥ १६२ ॥तत्तं प्रदक्षिणीकृत्य मङ्क्षु तद्दक्षिणे भुजे । तस्थौ सोऽपि तदादाय रिपुं प्रत्यक्षिपत्क्रुधा ॥ १६३ ॥
जब अश्वग्रीव मायायुद्धमें भी पराजित हो गया तब उसने लज्जित होकर त्रिष्पृष्ठके ऊपर कठोर चक्र चला दिया परन्तु वह चक्र प्रदक्षिणा देकर शीघ्र ही उसकी दाहिनी भुजा पर आकर स्थिर हो गया । त्रिपृष्ठने भी उसे लेकर क्रोधवश शत्रुपर चला दिया ।। १६२-१६३ ।।
“When Ashvagriva was defeated even in the warfare of illusions (Maya-yuddha), filled with shame, he hurled the fierce discus (Chakra) at Triprishta. However, that discus, having circumambulated Triprishta in reverence, swiftly came to rest upon his right arm. Driven by fury, Triprishta then took up that very weapon and hurled it back at the enemy. || 162-163 ||”
श्लोक ( Shlok ) 164
खण्डद्वयं हयग्रीवग्रीवां सद्यो व्यधाददः । त्रिखण्डाधिपतित्वेन त्रिपृष्ठञ्चार्धचक्रिणम् ॥ १६४ ॥
उसने जाते ही अश्वग्रीवकी ग्रीवाके दो टुकड़े कर दिये । त्रिखण्डका अधिपति होनेसे त्रिपृष्ठको अर्धचक्रवर्तीका पद मिला. ।। १६४ ।।
“No sooner did it strike than it severed the neck of Ashvagriva into two pieces. By virtue of becoming the sovereign lord of the three realms (Tri-khanda), Triprishta attained the exalted status of an Ardha-chakravarti. || 164 ||”
श्लोक ( Shlok ) 165 – 166
विजयेनात्र लब्धेन विजयेनेव चक्रभृत् । विजयार्थं समं गत्वा रथनूपुरभूपतिम् ॥ १६५ ॥श्रेणिद्वयाधिपत्येन प्रापयंश्चक्रवर्तिताम् । प्रभोरभूत्फलस्यात्र व्यक्तिः कोपप्रसादयोः ॥ १६६ ॥
युद्धमें प्राप्त हुई विजयके समान विजय नाम के भाईके साथ चक्रवर्ती त्रिष्पृष्ठ, विजयार्थं पर्वतपर गया और वहाँ उसने रथनूपुर नगरके राजा ज्वलनजटी को दोनों श्रेणियोंका चक्रवर्ती बना दिया सो ठीक ही है क्योंकि स्वामीके क्रोध और प्रसन्न होनेका फल यहाँ ही प्रकट हो जाता है ।। १६५-१६६ ।।
“Accompanied by his elder brother Baladeva Vijaya—who personified the very victory achieved in battle—the Emperor Triprishta ascended Mount Vijayardha. There, he invested King Jvalanajati of Rathanupura as the supreme ruler (Chakravarti) of both the northern and southern mountain ranges. This was indeed fitting, for the consequences of a sovereign lord’s wrath and benevolence manifest themselves in this very world. || 165-166 ||”
श्लोक ( Shlok ) 167
राज्यलक्ष्मी चिरं भुक्त्वाप्यतृप्त्या भोगकांक्षया । मृत्वागात्सप्तमीं पृथ्वीं बह्रारम्भपरिग्रहः ॥ १६७ ॥
उस त्रिपृष्ठने चिरकाल तक राज्यलक्ष्मीका उपयोग किया परन्तु तृप्त न होनेके कारण उसे भोगोंकी आकांक्षा बनी रही। फलस्वरूप बहुत आरम्भ और बहुत परिग्रहका धारक होनेसे वह मरकर सातवें नरक गया ।।१६७।।
“Although that Triprishta enjoyed the sovereign fortune of his kingdom (Rajyalakshmi) for an exceptionally long duration, his desire for worldly pleasures remained entirely ungratified due to his insatiable nature. Consequently, owing to his engagement in extensive sinful undertakings (Arambha) and his profound attachment to worldly possessions (Parigraha), he descended to the seventh hell upon his death. || 167 ||”
श्लोक ( Shlok ) 168 – 171
परस्परकृतं दुःखमनुभूय चिरायुषा । स्वधात्रीकृतदुःखञ्च तस्मान्निर्गत्य दुस्तरात् ॥ १६८ ॥ द्वीपेऽस्मिन्भारते गङ्गानदीतटसमीपगे । वने सिंहगिरौ सिंहो भूत्वाऽसौ बृंहितांहसा ॥ १६९ ॥ रत्नप्रभां प्रविश्यैव प्रज्वलद्वह्निमाप्तवान् । दुःखमेकाब्धिमेयायुस्ततश्च्युत्वा पुनश्च सः ॥ १७० ॥ द्वीपेऽस्मिन् ‘सिन्धुकूटस्य प्राग्भागे हिमवगिरेः । सानावभून्मृगाधीशो ज्वलत्केसरभासुरः ॥ १७१ ॥
वह वहाँ परस्पर किये हुए दुःखको तथा पृथिवी सम्बन्धी दुःखको चिरकाल तक भोगता रहा। अन्तमें उस दुस्तर नरकसे निकलकर वह तीव्र पापके कारण इसी जम्बूद्वीपके भरतक्षेत्रमें गङ्गानदी के तटके समीपवर्ती वनमें सिंहगिरि पर्वतपर सिंह हुआ। वहाँ भी उसने तीव्र पाप किया अतः जिसमें अग्नि जल रही है ऐसी रत्नप्रभा नामकी पृथिवीमें गया। वहाँ एक सागर तक भयंकर दुःख भोगता रहा । तदनन्तर वहाँ से च्युत होकर इसी जम्बूद्वीपमें सिन्धुकूटकी पूर्व दिशा में हिमवत् पर्वतकी शिखरपर देदीप्यमान बालों से सुशोभित सिंह हुआ।।१६८-१७१।।
“There, he endured for an exceptionally long duration both the torments mutually inflicted by the denizens upon one another and the excruciating miseries inherent to that infernal region. At last, emerging from that impassable hell, he—owing to the remnants of his intense sinful karma—was reborn as a lion on Mount Simhagiri, situated within a forest near the banks of the river Ganga in the Bharata Kshetra of this very Jambudvipa. Even in that state, he committed severe sins; consequently, he descended to the first hellish earth named Ratnaprabha, which blazes with perpetual fire. Having endured terrifying miseries there for the span of one Sagara (oceanic cosmic age), he departed from that realm and was subsequently reborn in this very Jambudvipa as a magnificent lion, adorned with resplendent manes, upon the peak of the Himavat mountain to the east of Sindhukuta. || 168-171 ||”
श्लोक 172 से 181
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