नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 23 to 34
श्लोक ( Shlok ) 23 – 24
तेन संकुध्य ते ताभ्यां मृत्वा पापविपाकतः । अभ्राम्यन् कुगतीदर्दीर्घ तौ च ब्राह्मणपुत्रको ॥ २३ ॥मन्नतो जीवितस्यान्ते कल्पे सौधर्मनामनि । पञ्चपल्योपमायुष्कौ जातौ पारिषदाग्रिभौ ॥ २४ ॥
पुत्रोंकी यह प्रवृत्ति देख, उनके माता-पिता आदि उनसे क्रोध करने लगे और मरकर पापके उदयसे दीर्घकाल तक अनेक कुगतियोंमें भ्रमण करते रहे। उधर उन दोनों ब्राह्मण-पुत्रोंने व्रतसहित जीवन पूरा किया इसलिए मरकर सौधर्म स्वर्गमें पाँच पल्यकी आयुवाले पारिषद जातिके श्रेष्ठ देव हुए ॥ २३-२४ ॥
“Seeing this inclination of their sons, the parents and other relatives grew angry with them. Upon dying, due to the rise of their sinful karmas (papodaya), they wandered through various miserable states of existence (kugatis) for a very long time. On the other hand, those two Brahmin sons completed their lives practicing sacred vows; therefore, upon death, they were reborn in the Saudharma Heaven as noble deities of the Parishada class, endowed with a lifespan of five palyas. ॥ 23-24 ॥”
श्लोक ( Shlok ) 25 – 34
तत्रानुभूय सद्भोगान् द्वीपेऽस्मिन् कौशले पुरे । साकेतेऽरिञ्जयो राजा सशौर्योऽभूदरिञ्जयः॥ २५ ॥तयार्हद्दासवाक्छ्रेष्ठी वप्रश्रीस्तन्मनःप्रिया । अग्निभूतिस्तयोः पूर्णभद्रोऽन्यो माणिभद्रकः ॥ २६ ॥सुतौ समुदभूतां तावन्येद्यः स महीपतिः । सिद्धार्थवनमध्यस्थमहेन्द्रगुरुसन्निधिम् ॥ २७ ॥वहुभिः सह सम्प्राप्य श्रुत्वा धर्म विशुद्धधीः । अरिन्दमे समारोप्य राज्यभारं भरक्षमे ॥ २८ ॥अर्हद्दासादिभिः सार्द्ध संयमं प्रत्यपद्यत । तत्रैव पूर्णभद्रेण प्राक्तनं मद्गुरुद्वयम् ॥ २९ ॥काद्य वर्तत इत्येतत्परिपृष्टो मुनिर्जगौ । जिनधर्मविरुद्धत्वात्कृतपापोऽभवन्मृतः ॥ ३० ॥रनप्रभाबिले सर्पावर्तनान्नि ततोऽजनि । मातङ्गः काकजङ्घाख्यः सोमदेवो भवत्पिता ॥ ३१ ॥माताग्निला च तस्यैव जायते स्म शुनी गृहे । इहेत्याकर्ण्य तत्प्रोक्त’ तेन तौ परिबोधितौ ॥ ३२ ॥सम्प्राप्योपशमं भावं सन्न्यस्य विधिना मृतः । काकजङ्खोऽभवन्नन्दीश्वरद्वीपे निधीश्वरः ॥ ३३ ॥तत्पुराधीश्वरारिन्दमाख्यभूभृत्पतेः सुता । श्रीमत्याश्च शुनी सुप्रबुद्धाख्याजायत प्रिया ॥ ३४ ॥
वहाँ पर उन्होंने अनेक उत्तम सुख भोगे । तदनन्तर इसी जम्बूद्वीपके कोशल देश सम्बन्धी अयोध्या नगरीमें शत्रुओंको जीतनेवाला अरिंजय नामका पराक्रमी राजा राज्य करता था। उसी नगरीमें एक अर्हद्दास नामका सेठ रहता था उसकी स्त्रीका नाम वप्रश्री था। वे अग्निभूति और वायुभूतिक जीव पाँचवें स्वर्गसे चयकर उन्हीं अर्हद्दास और वप्रश्रीके क्रमशः पूर्णभद्र और मणिभद्र नामके पुत्र हुए। किसी एक दिन राजा अरिंजय, सिद्धार्थ नामक वनमें विराजमान महेन्द्र नामक गुरुके समीप गया। वहाँ उसने अनेक लोगोंके साथ धर्मका उपदेश सुना जिससे उसकी बुद्धि अत्यन्त पवित्र हो गई और उसने भार धारण करनेमें समर्थ अरिन्दम नामक पुत्रके ऊपर राज्य भार रखकर अर्हद्दास आदिके साथ संयम धारण कर लिया। उसी समय पूर्णभद्र नामक श्रेष्ठि-पुत्रने पूर्वज मुनिराजसे पूछा कि हमारे पूर्वभवके माता-पिता इस समय कहाँ पर हैं? उत्तरमें मुनिराज कहने लगे कि तेरे पिता सोमदेवने जिनधर्मसे विरुद्ध होकर बहुत पाप किये थे अतः वह मरकर रत्नप्रभा पृथिवीके सर्पावर्त नामके बिलमें नारकी हुआ था और वहाँ से निकलकर अब इसी नगरमें काकजंघ नामका चाण्डाल हुआ है। इसी तरह तेरी माता अनिलाका जीव मरकर उसी चाण्डालके घर कुत्ती हुआ है। मुनिराजके वचन सुनकर पूर्णभद्रने उन दोनों जीवोंको संबोधा जिससे उपशम भावको प्राप्त होकर दोनोंने विधिपूर्वक संन्यास धारण किया और उसके फलस्वरूप काकजङ्घ तो नन्दीश्वर-द्वीपमें कुबेर नामका व्यन्तर देव हुआ। और कुत्ती उसी नगरके स्वामी अरिन्दम नामक राजाकी श्रीमती नामकी रानीसे सुप्रबुद्धा नामकी प्यारी पुत्री हुई ।। २५-३४ ।।
“There, they enjoyed numerous supreme celestial pleasures. Subsequently, in the city of Ayodhya within the Kosala region of this very Jambu-dvipa, a mighty king named Arinjaya, who was victorious over his enemies, ruled the kingdom. In that same city lived a merchant (Seth) named Arhaddasa, whose wife was named Vaprashri. Having completed their lifespans and descended (chayakar) from the celestial realm, the souls of Agnibhuti and Vayubhuti were reborn to Arhaddasa and Vaprashri as sons named Purnabhadra and Manibhadra, respectively.
One day, King Arinjaya visited a spiritual master (Guru) named Mahendra, who was staying in the Siddhartha forest. There, along with many others, the king listened to a discourse on righteousness (Dharma), which rendered his intellect exceedingly pure. Consequently, he entrusted the burden of the kingdom to his capable son, Arindama, and embraced asceticism (Samyama) along with Arhaddasa and others. At that time, the merchant’s noble son, Purnabhadra, asked the venerable Muniraj (the sage who was previously the king), ‘Where are our parents from our previous birth at this moment?’
In response, the Muniraj said, ‘Your father, Somadeva, accumulated profound sins by opposing the Jina-dharma (Jain faith). Consequently, upon death, he was reborn as a hellish being (Naraki) in the Sarpavarta cavern of the Ratnaprabha hellish realm. Having emerged from there, he is now born in this very city as a Chandal (outcaste) named Kakajangha. Similarly, the soul of your mother, Agnila, died and was reborn as a female dog in the household of that very Chandal.’
Hearing the words of the Muniraj, Purnabhadra spiritually awakened (Sambodha) both those souls. As a result, they attained a state of inner tranquility (Upashama-bhava) and ritually embraced the vow of holy fasting unto death (Sannyasa). Consequently, upon death, Kakajangha was reborn in the Nandishvara-dvipa as a Vyantara deity named Kubera, while the female dog was reborn as Suprabuddha, the beloved daughter of Queen Shrimati and King Arindama, the ruler of this city. ॥ 25-34 ॥”
श्लोक 35 से 46
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नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22
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