अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 123 to 131
श्लोक ( Shlok ) 123
उद्गमेनैव निर्भूतरिपुचक्रोऽयमक्रमात् । अर्कस्येव प्रतापोऽस्य व्याप्य विश्वमनुस्थितः ॥ १२३ ॥
उत्पन्न होते ही एक साथ समस्त शत्रुओंको नष्ट करनेवाला इसका प्रताप, सूर्यके प्रतापके समान समस्त संसारमें व्याप्त होकर भर गया था ॥ १२३ ।।
“Instantly upon his birth, his prowess, which was capable of simultaneously destroying all enemies, spread and filled the entire world, just like the radiant splendor of the sun. || 123 ||”
श्लोक ( Shlok ) 124
अनन्यगोचरा लक्ष्मीरसङ्ख्येयसमाः स्वयम् । इममेव प्रतीक्ष्यास्त गाढौत्सुक्यार्धचक्रिणम् ॥ १२४ ॥
अर्ध चक्रवर्तियों में गाढ़ उत्सुकता रखनेवाली तथा जो दूसरी जगह नहीं रह सके ऐसी लक्ष्मी असंख्यात वर्षसे स्वयं इस त्रिष्पृष्ठकी प्रतीक्षा कर रही थी ।। १२४॥
“Goddess Lakshmi (Sovereignty), who possesses a profound longing for the semi-emperors (Ardha-Chakravartis) and who could find no rest anywhere else, had herself been waiting for this Triprishta for countless years. || 124 ||”
श्लोक ( Shlok ) 125
लक्ष्मीलाञ्छनमेवास्य चक्रं विक्रमसाधितम् । मागधाद्यामरारक्ष्यं ससमुद्रं महीतलम् ॥ १२५ ॥
पराक्रमके द्वारा सिद्ध किया हुआ उसका चक्ररत्न क्या था मानो लक्ष्मीका चिह्न ही था और मगधादि जिसकी रक्षा करते हैं ऐसा समुद्र पर्यन्तका समस्त महीतल उसके आधीन था ॥१२५॥
“What was his weapon-disc (Chakra-ratna), achieved through sheer valor, but the very emblem of Goddess Lakshmi? Furthermore, the entire earth, extending up to the ocean and guarded by the regions of Magadha and others, was completely under his sovereignty. || 125 ||”
श्लोक ( Shlok ) 126
सिंहशौर्योऽयमित्येषोऽशेमुषीकैरभिष्टुतः । किं सिंह इव ‘निर्धीको नमितामरमस्तकः ॥ १२६ ॥
यह त्रिष्पृष्ठ ‘सिंहके समान शूरवीर है’ इस प्रकार जो लोग इसकी स्तुति करते थे वे मेरी समझसे बुद्धिहीन ही थे क्योंकि देवोंके भी मस्तकको नम्रीभूत करनेवाला वह त्रिष्पृष्ठ क्या सिंहके समान निर्बुद्धि भी था ? ।।१२६।।
“Those who praised this Triprishta saying, ‘He is as brave as a lion,’ were, in my opinion, utterly devoid of intellect. For was that Triprishta, who made even the heads of deities bow before him, also as lacking in intellect as a lion? || 126 ||”
श्लोक ( Shlok ) 127
जित्वा ज्योत्स्नां मितक्षेत्रीं वृद्धिहानिमतीं चिरम् । कीर्तिरस्याखिलं व्याप्य ज्ञातिर्वा वेधसः स्थिता ॥ १२७॥
उसकी कान्तिने परिमित क्षेत्रमें रहनेवाली और हानि वृद्धि सहित चन्द्रमाकी चाँदनी भी जीत ली थी तथा वह ब्रह्माकी जातिके समान समस्त संसारमें व्याप्त होकर चिरकालके लिए स्थित हो गई थी ।।१२७।
“His radiant splendor completely surpassed even the moonlight, which is confined to a limited sphere and is subject to waning and waxing; furthermore, like the cosmic nature of Brahma, his glory pervaded the entire universe and remained established for eternity. || 127 ||”
श्लोक ( Shlok ) 128 – 129
उदक्छ्रेण्यां खगाधीशो मयूरश्रीवनामभाक् । नीलाञ्जना प्रिया तस्याभूत्तयोरलकापुरे ॥ १२८ ॥ विशाखनन्दः संसारे चिरं भ्रान्त्वातिदुःखितः । अश्वग्रीवाभिधः सूनुरजनिष्टापचारवान् ॥ १२९ ॥
इधर विजयार्ध पर्वतकी उत्तर श्रेणीके अलकापुर नगरमें मयूरश्रीव नामका विद्याधरोंका राजा रहता था। उसकी रानीका नाम नीलाञ्जना था। विशाखनन्दका जीव चिरकाल तक संसारमभ्रमणकर तथा अत्यन्त दुखी होकर अनेक दुराचार करनेवाला उन दोनोंके अश्वग्रीव नामका पुत्र हुआ ।। १२८-१२९ ।।
“Meanwhile, in the city of Alkapura located on the northern range of Mount Vijayardha, there lived a king of the Vidyadharas (celestial beings) named Mayuragriva. His queen was named Nilanjana. The soul of Vishakhananda, after wandering through the cycle of worldly existence for a vast period and suffering extreme misery, was born to them as a son named Ashvagriva, who committed numerous wicked deeds. || 128-129 ||”
श्लोक ( Shlok ) 130
ते सर्वेऽपि पुरोपात्तपुण्यपाकविशेषतः । अभीष्टकामभोगोपभोगैस्तृप्ताः स्थिताः सुखम् ॥ १३० ॥
वे सब, पूर्वोपार्जित पुण्य कर्मके विशिष्ट उद्यसे प्राप्त हुए इच्छित काम भोग तथा उपभोगोंसे संतुष्ट होकर सुखसे रहते थे ॥ १३० ॥
“They all lived happily, completely satisfied with the desired pleasures of the senses (Kama), enjoyments (Bhoga), and repeated consumptions (Upabhoga), which were attained through the exceptional rise (Udaya) of their previously accumulated meritorious deeds (Punya-karma). || 130 ||”
श्लोक ( Shlok ) 131
इतः खेचरभूभर्तुर्दक्षिणश्रेण्यलंकृतिः । रथनूपुरशब्दादिचक्रवालपुरी परा ॥ १३१ ॥
इधर विजयार्थं पर्वतकी दक्षिण श्रेणीको अलंकृत करनेवाला ‘रथनूपुर चक्रवाल’ नामका एक श्रेष्ठ नगर था ।। १३१ ॥
“Meanwhile, adorning the southern range of Mount Vijayardha, there was a magnificent city named Rathnupura Chakravala. || 131 ||”
श्लोक 132 से 143
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अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22 | श्लोक 23 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 51 | श्लोक 52 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 83 | श्लोक 84 से 91 | श्लोक 92 से 102 | श्लोक 103 से 111 | श्लोक 112 से 122
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