अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433
English translation of Uttar Puran parv 62- shlok 434 to 442
श्लोक ( Shlok ) 434
दभितारिं ‘सभामध्ये सन्निविष्टं स्वविष्टरे । “अस्तमस्तकभास्वन्तमिव प्रपतनोन्मुखम् ॥ ४३४ ॥
वहाँ सभाके बीचमें राजा दमितारि अपने आसनपर बैठा था और ऐसा जान पड़ता था मानो अस्ता-चलकी शिखरपर स्थित पतनोन्मुख सूर्य ही हो ॥ ४३४ ॥
“There, in the midst of the assembly, King Damitarī sat upon his throne, appearing just like the setting sun resting on the peak of the western mountain.” 434
श्लोक ( Shlok ) 435
सद्यो विलोक्य सोऽप्याशु प्रत्युत्थानपुरस्सरम् । प्रतिगृह्य प्रणम्योच्चैर्विष्टरे सन्निवेश्य तम् ॥ ४३५ ॥
उसने नारदजीको आता हुआ देख लिया अतः शीघ्र ही उठकर उनका पडिगाहन किया, प्रणाम किया और ऊँचे सिंहासनपर बैठाया ।। ४३५ ।।
“Seeing Sage Nārada approaching, he immediately stood up, welcomed him with deep reverence, bowed down to him, and seated him upon a high throne.”435
श्लोक ( Shlok ) 436 – 437
जब नारदजी आशीर्वाद देकर बैठ गये तब उसने पूछा कि आप क्या उद्देश्य लेकर हमारे यहाँ पधारे हैं ? क्या मुझे सम्पत्ति देनेके लिए पधारे हैं अथवा कोई बड़ा भारी पद प्रदान करनेक लिए आपका समागम हुआ है ? यह सुनकर नारदजीका मुखकमल खिल उठा। वे राजाको हर्ष उत्पन्न करते हुए प्रीति बढ़ानेवाले वचन कहने लगे ॥ ४३६-४३७ ॥
“When Sage Nārada had given his blessings and taken his seat, the king asked, ‘With what purpose have you blessed our home with your presence? Have you come to bestow great wealth upon me, or has your arrival occurred to grant me some immensely high position?’ Hearing this, Nārada’s lotus-like face blossomed with a smile. Bringing joy to the king, he began to speak words that increased their mutual affection.” 436 – 437
श्लोक ( Shlok ) 438
सारभूतानि वस्तूनि तवान्वेष्टुं परिभ्रमन् । नर्तकीद्वयमद्राक्षं प्रेक्षायोग्यं तवैव तत् ॥ ४३८ ॥
उन्होंने कहा कि हे राजन् ! मैं तुम्हारे लिए सारभूत वस्तुएँ खोजनेके लिए निरन्तर घूमता रहता हूँ। मैंने आज दो नृत्यकारिणी देखी हैं जो आपके ही देखने योग्य हैं ॥ ४३८ ॥
“He said, ‘O King! I constantly wander about in search of the most excellent and precious things for you. Today, I have seen two female dancers who are truly worthy of being beheld by you alone.'” 438
श्लोक ( Shlok ) 439
अस्थानस्थं समीक्ष्यैवमनिष्टं सोढुमक्षमः । आगतोऽहं कथं सह्यं पादे चूड़ामणिस्थितिः ॥ ४३९ ॥
वे इस समय ठीक स्थानोंमें स्थित नहीं हैं। मैं ऐसी अनिष्ट बात सहनेके लिए समर्थ नहीं हूँ इसीलिए आपके पास आया हूँ, क्या कभी चूड़ामणिकी स्थिति चरणोंके बीच सहन की जा सकती है ? ॥ ४३९ ॥
“Currently, they are not situated in their proper places. I am unable to tolerate such an unfitting state of affairs, which is why I have come to you. Can the placement of a crest-jewel among the feet ever be tolerated?”439
श्लोक ( Shlok ) 440 – 442
सम्प्रत्यप्रतिमल्लौ वा नूतनश्रीमदोद्धतौ । प्रभाकरीपुराधीशौ व्यलीकविजिगीषुकौ ॥ ४४० ॥सप्तव्यसनसंसक्तौ सुखोच्छेद्यौ प्रमादिनौ । तयोर्गृहे सुखग्राह्यं जगत्सारमवस्थितम् ॥ ४४१ ॥तदूतप्रेषणादेव तवाद्यायाति हेलया । कालहानिर्न कर्तव्या हस्तासन्नेऽतिदुर्लभे ॥ ४४२॥
इस समय जिनसे कोई लड़नेवाला नहीं है, जो नवीन लक्ष्मीके मदसे उद्धत हो रहे हैं और जो झूठमूठके ही विजिगीषु बने हुए हैं ऐसे प्रभाकरी नगरीके स्वामी राजा अपराजित तथा अनन्तवीर्य हैं। वे सप्त-व्यसनोंमें आसक्त होकर प्रमादी हो रहे हैं इसलिए सरलतासे नष्ट किये जा सकते हैं। संसारका सारभूत वह नृत्यकारिणियों-का जोड़ा उन्हींके घरमें अवस्थित है। उसे आप सुखसे ग्रहण कर सकते हैं, दूत भेजनेसे वह आज ही लीलामात्रमें तुम्हारे पास आ जावेगा इसलिए अत्यन्त दुर्लभ वस्तु जब हाथके समीप ही विद्यमान है तब समय बिताना अच्छा नहीं ।। ४४०-४४२ ॥
“At present, the masters of the city of Prabhākarī—King Aparājita and Anantavīrya—face no adversaries. They have become arrogant with the intoxication of their newly acquired wealth and pose as false conquerors. Intoxicated and negligent due to their addiction to the seven vices (sapta-vyasana), they can easily be destroyed. That pair of female dancers, who are the very essence of the world, resides in their palace. You can easily claim them; by merely sending a messenger, they will come to you today as if in mere play. Therefore, when an exceedingly rare treasure is right within your reach, it is not wise to waste any time.”440 – 442
श्लोक 443 से 451
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433
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