नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 72 – श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 72- shlok 142 to 153
श्लोक ( Shlok ) 142 – 143
पुरगोपुरनिर्याणप्रवेश नगतान् जनान् । सप्रहासान् समापाद्य प्रविश्य नगरं पुनः ॥ १४२ ॥शालाख्यवैद्यवेषेण स्वं प्रताप्य स्वविद्यया । विच्छिन्नकर्णसन्धानवेदित्वादि प्रघोषयन् ॥ १४३ ॥
इस क्रिया सेउसने नगरके गोपुरमें आने जानेवाले लोगोंको खूब हँसाया । तदनन्तर नगरके भीतर प्रवेश किया और अपनी विद्याके बलसे शाल नामक वैद्यका रूप बनाकर घोषणा करना शुरू कर दी कि मैं कटे हुए कानोंका जोड़ना आदि कर्म जानताहूँ ।। १४२-१४३ ।।
By doing this, he thoroughly amused and brought great laughter to the people moving in and out of the city’s gateway (gopuram). Thereafter, he entered the city and, by the power of his magical lore, assumed the guise of a physician named Shala. He then began to proclaim publicly, “I possess the skill to reattach severed ears and perform other such medical feats!”[ 142-143]
श्लोक ( Shlok ) 144 – 145
प्राप्य भानुकुमाराय दातुमानीतकन्यकाः । तत्राविर्भावितानेकधाहास्योऽनु द्विजाकृतिः ॥ १४४ ॥ सत्यभामागृहं गत्वा भोजनावसरे द्विजान् ।। विप्रकृत्य स्वधायन भुक्त्वा स्वीकृतदक्षिणः ॥ १४५ ॥
इसके बाद भानुकुमारको देनेके लिए कुछ लोग अपनी कन्याएँ लाये थे उनके पास जाकर उसने उनकी अनेक प्रकार से हँसी की। पश्चात् एक ब्राह्मणका रूप बनाकर सत्यभामाके महलमें पहुंचा वहाँ भोजनके समय जो ब्राह्मण आये थे उन सबको उसने अपनी धृष्टतासे बाहर कर दिया और स्वयं भोजन कर दक्षिणा ले ली ।। १४४-१४५ ॥
After this, he approached the people who had brought their daughters to be given in marriage to Bhanukumar, and mocked them in various ways. Afterwards, assuming the guise of a Brahmin, he reached the palace of Satyabhama. There, through his sheer audacity, he turned away all the Brahmins who had gathered for the feast, ate the food himself, and collected the monetary offerings (dakshina).[144-145]
श्लोक ( Shlok ) 146 – 148
ततः क्षुल्लकवेषेण समुपेत्य स्वमातरम् । बुभुक्षितोऽहं सद्दष्टे ! सम्यग्भोजय मामिति ॥ १४६ ॥सम्प्रार्थ्य विविधाहारान् भुक्त्वा तृप्तिमनाप्तवान् । कुरु मे देवि सन्तृप्तिमिति व्याकुलतां नयन् ॥ १४७॥तद्वितीर्णमहामोदकोपयोगात्स तृप्तवान् । ईषच्छान्तमनास्तत्र सुखं समुपविष्टवान् ॥ १४८ ॥
तदनन्तर क्षुल्लकका वेष रखकर अपनी माता रुक्मिणीके यहाँ पहुंचा और कहने लगा कि हे सम्यग्दर्शनको धारण करनेवाली ! मैं भूखा हूँ, मुझे अच्छी तरह भोजन करा । इस तरह प्रार्थना कर अनेक तरहके भोजन खाये परन्तु तृप्तिको प्राप्त नहीं हुआ तब फिर व्याकुलताको प्रकट करता हुआ कहने लगा कि हे देवि ! मुझे संतुष्ट कर, पेट भर भोजन दे ! तदनन्तर उसके द्वारा दिये हुए महामोदक खाकर संतुष्ट हो गया। भोजनके पश्चात् वह कुछ शान्तचित्त होकर वहीं पर सुखसे बैठ गया ।। १४६-१४८ ।।
Thereafter, assuming the guise of a Kshullaka (a junior Jain monk), he arrived at the mansion of his mother, Rukmini, and said, “O possessor of right faith (Samyagdarshana)! I am hungry; feed me well.”
Requesting her in this manner, he consumed various kinds of food but remained unsatisfied. Expressing great distress and agitation again, he said, “O Goddess! Satisfy me, give me enough food to fill my stomach!” Thereupon, he ate the massive laddoos (Maha-modaka) given by her and was finally satisfied. After the meal, having attained peace of mind, he sat down there comfortably.[146-148]
श्लोक ( Shlok ) 149 – 153
अकाले चम्पकाशोकपुष्पाण्यभिसमीक्ष्य सा । कलालिकोकिलालापवाचालितवनान्तरे ॥ १४९ ॥तदा विस्मयमापन्ना मुदा पप्रच्छ किं भवान् । भद्रासौ मत्सुतो नारदोक्तकाले समागतः ॥ १५० ॥इति तस्याः परिप्रश्ने स्वं रूपं सम्प्रकाशयन् । कृत्वा शिरसि तत्पादनखदीधितिमञ्जरीः ॥ १५१ ॥अभिधाय स्ववृत्तान्तमशेषं परिबोधयन् । जननीं सह सम्भुज्य तया तदभिवान्छितैः ॥ १५२ ॥बालक्रीडाविशेषैस्तां परां प्रीतिमवापयन् । प्राग्जन्मोपार्जितापूर्वपुण्योदय इव स्थितः ॥ १५३ ॥
उसी समय रुक्मिणीने देखा कि असमयमें ही चम्पक तथा अशोकके फूल फूल गये हैं और साराका सारा वन भ्रमरों तथा कोकिलाओंके मनोहर कूजनसे शब्दायमान हो रहा है। यह देख वह आश्रर्यसे चकित बड़े हर्षसे पूछने लगी कि हे भद्र ! क्या आप मेरे पुत्र हैं और नारदके द्वारा कहे हुए समय पर आये हैं। माताका ऐसा प्रश्न सुनते ही प्रद्युम्न्नने अपना असली रूप प्रकट कर दिया और उसके चरण-नखोंकी किरण रूप मंजरीको शिरपर रखकर उसे अपना सब वृत्तान्त कह सुनाया। माताके साथ भोजन किया, उसकी इच्छानुसार बाल-कालकी क्रीड़ाओंसे उसे परम प्रसन्नता प्राप्त कराई और पूर्व जन्ममें उपार्जित अपूर्व पुण्य कर्मके उदय के समान वहीं ठहर गया ।। १४९-१५३ ।।
At that very moment, Rukmini noticed that the Champaka and Ashoka trees had burst into bloom out of season, and the entire grove was echoing with the delightful humming of bees and the sweet cooing of cuckoos. Witnessing this, she was struck with wonder and, filled with immense joy, began to ask, “O gentle one! Are you my son, and have you arrived at the time foretold by Narada?”
The moment he heard his mother’s question, Pradyumna revealed his true form. Placing the blossoms of light emanating from the nails of her feet upon his head, he narrated his entire story to her. He then dined with his mother, brought her supreme happiness by recreating his childhood play according to her wishes, and stayed right there—resembling the awakening of unprecedented meritorious deeds (punya-karma) accumulated in a past lifetime.[149-153]
श्लोक 154 से 161
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अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव प्रतिनारायण पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85 | धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 130 | अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण पर्व 62 – श्लोक 1 से 513 | शान्तिनाथ पर्व 63 – श्लोक 1 से 510 | कुन्थुनाथ पर्व 64 – श्लोक 1 से 55 | अरनाथ, सुभौम चक्रवर्ती, नन्दिषेण बलभद्र, पुण्डरीक नारायण और निशुम्भ प्रतिनारायण पर्व 65 – श्लोक 1 से 192 | मल्लिनाथ , पद्मचक्रवर्ती, नन्दिमित्र बलदेव, दत्त नारायण और बलीन्द्र प्रति-नारायण पर्व 66 – श्लोक 1 से 125 | मुनिसुव्रत, हरिषेण चक्रवर्ती, राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण और रावण पर्व 67 – श्लोक 1 से 473 | राम बलभद्र, लक्ष्मण नारायण, सीता , रावण और अणुमान् के पुराण का वर्णन पर्व 68 – श्लोक 1 से 732 | नमिनाथ तीर्थंकर तथा जयसेन चक्रवर्ती के पुराण का वर्णन पर्व 69 – श्लोक 1 से 92 | नेमिनाथ स्वामी के चरित में श्रीकृष्णकी विजय का वर्णन पर्व 70 – श्लोक 1 से 497 | नेमि चरित्र प्रकरण में श्रीकृष्ण, बलदेव, श्रीकृष्णकी पट्टरानियाँ आदि भवान्तरों का वर्णन पर्व 71 – श्लोक 1 से 462
नेमिनाथ तीर्थंकर, पद्म बलभद्र, कृष्ण अर्धचक्रवर्ती, जरासन्ध प्रतिनारायण और ब्रह्मदत्त नामक सकल चक्रवर्ती के पुराणका वर्णन पर्व 72 – श्लोक 1 से 22 | श्लोक 23 से 34 | श्लोक 35 से 46 | श्लोक 47 से 61 | श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 91 | श्लोक 92 से 101 | श्लोक 102 से 111 | श्लोक 112 से 123 | श्लोक 124 से 141
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