शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 63- shlok 23 to 31
श्लोक ( Shlok ) 23 – 24
इत्यवोचत्तदाकर्ण्य सुमतिर्नाम सार्थकम् । कुर्वती पितृनिर्मुक्ता ‘प्राब्राजीत्सुव्रतान्तिके ॥ २३ ll कन्यकाभिः शतैः सार्द्धं सप्तभिः सा महातपाः । त्यक्तप्राणानते कल्पे देवोऽभवदनूदिशे ॥ २४ ॥
इस प्रकार उस देवीने कहा। उसे सुन कर सुमति अपना नाम सार्थक करती हुई पितासे छुट्टी पाकर सुव्रता नामकी आर्यिका के पास सात सौ कन्या-ओंके साथ दीक्षित हो गई। दीक्षित हो कर उसने बड़ा कठिन तप किया और आयुके अन्तमें मर कर आनत नामक तेरहवें स्वर्ग के अनुदिश विमान में देव हुई ।। २३-२४ ।।
Thus spoke the goddess. Upon hearing her words, Sumati, truly living up to the meaning of her name (which means ‘one with good intellect’), obtained permission from her father and received initiation (Diksha) under an Aryika (Jain female ascetic) named Suvrata, along with seven hundred young women.
Following her initiation, she practiced severe austerities and penance. At the end of her lifespan, she passed away and was reborn as a celestial being (Deva) in the Anudisha Vimana (heavenly vehicle/abode) of the thirteenth heaven, known as Aanata. || 23-24 ||
श्लोक ( Shlok ) 25
आधिपत्यं त्रिखण्डस्य विधाय विविधैः सुखैः । प्राविशत्केशवः पापात् प्रान्ते रत्नप्रभां क्षितिम् ॥२५॥
इधर अनन्तवीर्य नारायण, अनेक प्रकारके सुखोंके साथ तीन खण्डका राज्य करता रहा और अन्तमें पापोदयसे रत्नप्रभा नामकी पहिली पृथिवीमें गया ।॥ २५ ॥
Meanwhile, Anantavirya Narayana continued to rule over the three realms (Khandas), enjoying various kinds of pleasures. In the end, however, due to the rise of his sinful karmas (Papodaya), he descended into Ratnaprabha, the first hellish earth (Prithvi). || 25 ||
श्लोक ( Shlok ) 26 – 27
तच्छोकात्सीरपाणिश्च राज्यलक्ष्मी प्रबुद्धधीः । प्रदायानन्तसेनाय यशोधरमुनीश्वरात् ॥ २६ ॥आदाय संयमं प्राप्य तृतीयावगमं शमी । त्रिंशद्दिवससंन्यासादच्युताधीश्वरोऽभवत् ॥ २७ ॥
उसके शोकसे बलभद्र अपराजित, पहले तो बहुत दुःखी हुए फिर जब प्रबुद्ध हुए तब अनन्तसेन नामक पुत्रके लिए राज्य देकर यशोधर मुनिराजसे संयम धारण कर लिया। वे तीसरा अवधिज्ञान प्राप्तकर अत्यन्त शान्त हो गये और तीस दिनका संन्यास लेकर अच्युत स्वर्गके इन्द्र हुए ॥ २६-२७ ॥
Overwhelmed with grief for him, the Balabhadra named Aparajita was initially deeply sorrowful. Later, upon gaining spiritual awakening, he handed over the kingdom to his son named Anantasena and embraced self-restraint (Sanyam) under the sage Yashodhara.
Attaining the third degree of Avadhijnana (clairvoyant knowledge), he became profoundly tranquil. After undertaking Sanyasa (a vow of ritual fast unto death) for thirty days, he was reborn as the Indra (lord) of the Achyuta Heaven. || 26-27 ||
श्लोक ( Shlok ) 28 – 30
धरणेन्द्रात् पितुर्बुध्वा प्राप्तसम्यक्त्वरत्नकः । संख्यातवर्षेः प्रच्युत्य नरकाद् दुरितच्युतेः ॥ २८ ॥द्वीपेऽस्मिन्भारते खेचराद्रयुदश्रेणिविश्रुते । मेघवाहनविद्याधरेशो गगनवल्लभे ॥ २९ ॥देव्यां तुग्मेघमालिन्यां मेघनादः खगाधिपः । श्रेणीद्वयाधिपत्येन भोगांश्चिरममुक्त सः ॥ ३० ॥
अपराजित और अनन्तवीर्य का जीव मरकर धरणेन्द्र हुआ था। उसने नरकमें जाकर अनन्तवीर्यको समझाया जिससे प्रतिबुद्ध हो कर उसने सम्यग्दर्शन रूपी रत्न प्राप्त कर लिया। संख्यात वर्षकी आयु पूरी कर पापका उदय कम होनेके कारण वह वहाँ से च्युत हुआ और जम्बूद्वीप सम्बन्धी भरतक्षेत्रके विजयार्ध पर्वत की उत्तर श्रेणी में प्रसिद्ध गगनवल्लभ नगरके राजा मेघवाहन विद्याधरकी मेघमालिनी नामकी रानीसे मेघनाद नामका विद्याधर पुत्र हुआ। वह दोनों श्रेणियोंका आधिपत्य पाकर चिरकालतक भोगोंको भोगता रहा ॥ २८-३० ॥
The soul of Aparajita had passed away and was reborn as Dharanendra (the lord of the underworld deities). He descended into hell and enlightened Anantavirya, who, upon receiving this spiritual awakening, attained the precious jewel of Samyagdarshana (Right Faith).
After completing his destined lifespan of a specific number of years, and due to the reduction of his sinful karmas (Papodaya), Anantavirya’s soul departed from that hellish realm. He was then reborn as a Vidyadhara (celestial being) son named Meghanada to Queen Meghamalini and King Meghavahana—the Vidyadhara ruler of the famous city of Gaganavallabha, located on the northern ridge of Mount Vijayardha within the Bharata-kshetra of Jambu-dvipa. Attaining sovereignty over both the ridges, he enjoyed worldly pleasures for a very long time. || 28-30 ||
श्लोक ( Shlok ) 31
कदाचिन्मन्दरे विद्यां प्रशप्ति नन्दने वने । साधयन्मेघनादोऽयमच्युतेशेन बोधितः ॥ ३१ ॥
किसी समय यह मेघनाद मेरु पर्वतके नन्दन वनमें प्रज्ञप्ति नामकी विद्या सिद्ध कर रहा था, वहाँ अपराजितके जीव अच्युतेन्द्रने उसे समझाया ॥ ३१ ॥
Once, while this Meghanada was mastering a mystical lore (Vidya) named Prajnapti in the Nandana forest of Mount Meru, Achyutendra—the soul of Aparajita who had become the lord of the Achyuta Heaven—arrived there and enlightened him. || 31 ||
श्लोक 32 से 41
उत्तरपुराण Uttarapurana home page –
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . english translation
अजितनाथ तथा सगर चक्रवर्ती पर्व 48 – श्लोक 1 से 143 | संभवनाथ पर्व 49 – श्लोक 1 से 59 | श्री अभिनन्दनस्वामी पर्व 50 – श्लोक 1 से 70 | सुमतिनाथ पर्व 51 – श्लोक 1 से 87 | पद्मप्रभ पर्व 52 – श्लोक 1 से 70 सुपार्श्वनाथ स्वामी पर्व 53 – श्लोक 1 से 56 | चन्द्रप्रभ पर्व 54 – श्लोक 1 से 276 | पुष्पदन्त पर्व 55 – श्लोक 1 से 62 | शीतल पर्व 56 – श्लोक 1 से 96 | श्रेयांसनाथ त्रिष्टष्ठनारायण, विजय बलभद्र और अश्वमीव पर्व 57 – श्लोक 1 से 100 | श्री वासुपूज्य , द्विपृष्ठनारायण, अचल बलभद्र और तारक प्रति-नारायण पर्व 58 – श्लोक 1 से 124 | विमलनाथ , धर्म, स्वयंभू, मधु, संजयन्त, मेरु और मंदर गणधर पर्व 59 – श्लोक 1 से 319 | अनन्तनाथ , सुप्रभ बलभद्र, पुरुषोत्तम नारायण और मधुसूदन प्रति-नारायण पर्व 60 – श्लोक 1 से 85
धर्मनाथ , सुदर्शन बलभद्र, पुरुषसिंह नारायण, मधुक्रीड़ प्रतिनारायण, मघवा और सनत्कुमार चक्रवर्ती पर्व 61 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 23 | श्लोक 24 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 |श्लोक 62 से 71 | श्लोक 72 से 81 | श्लोक 82 से 90 | श्लोक 91 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 121 | श्लोक 122 से 130
अपराजित बलभद्र और अनन्तवीर्य नारायण के अभ्युदय का वर्णन पर्व 62 – श्लोक 1 से 10 | श्लोक 11 से 21 |श्लोक 22 से 31 | श्लोक 32 से 41 | श्लोक 42 से 52 | श्लोक 53 से 61 | श्लोक 62 से 72 | श्लोक 73 से 82 | श्लोक 83 से 92 | श्लोक 93 से 101 | श्लोक 102 से 112 | श्लोक 113 से 122 | श्लोक 123 से 131 | श्लोक 132 से 141 | श्लोक 142 से 151 | श्लोक 152 से 161 | श्लोक 162 से 171 |श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 191 | श्लोक 192 से 201 | श्लोक 202 से 211 | श्लोक 212 से 221 | श्लोक 222 से 231 | श्लोक 232 से 240 | श्लोक 241 से 252 | श्लोक 253 से 261 | श्लोक 262 से 271 | श्लोक 272 से 283 | श्लोक 284 से 292 | श्लोक 293 से 301 | श्लोक 302 से 311 | श्लोक 312 से 321 |श्लोक 322 से 331 | श्लोक 332 से 341 | श्लोक 342 से 351 | श्लोक 352 से 363 | श्लोक 364 से 371 | श्लोक 372 से 382 | श्लोक 383 से 390 | श्लोक 391 से 401 | श्लोक 402 से 411 | श्लोक 412 से 421 | श्लोक 422 से 433 | श्लोक 434 से 442 | श्लोक 443 से 451 | श्लोक 452 से 462 | श्लोक 463 से 472 | श्लोक 473 से 481 | श्लोक 482 से 491 | श्लोक 492 से 501 | श्लोक 502 से 513
शान्तिनाथ तीर्थंकर तथा चक्रवर्तीका पुराण वर्णन पर्व 63 – श्लोक 1 से 11 | श्लोक 12 से 22
Download PDF
आदिपुराण उत्तरपुराण हिन्दी-भाषानुवाद
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 | पर्व 11 | पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 |पर्व 33 | पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 |पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 |पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 | उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 | पर्व 54 |पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |
आदिपुराण उत्तरपुराण सारांश
पर्व 1 | पर्व 2 | पर्व 3 | पर्व 4 | पर्व 5 | पर्व 6 | पर्व 7 | पर्व 8 | पर्व 9 | पर्व 10 |पर्व 11 |पर्व 12 | पर्व 13 | पर्व 14 | पर्व 15 | पर्व 16 | पर्व 17 | पर्व 18 | पर्व 19 | पर्व 20 | पर्व 21 | पर्व 22 | पर्व 23 | पर्व 24 | पर्व 25 | पर्व 26 | पर्व 27 | पर्व 28 | पर्व 29 | पर्व 30 | पर्व 31 | पर्व 32 | पर्व 33 |पर्व 34 | पर्व 35 | पर्व 36 | पर्व 37 | पर्व 38 | पर्व 39 | पर्व 40 | पर्व 41 | पर्व 42 | पर्व 43 | पर्व 44 | पर्व 45 | पर्व 46 | पर्व 47 उत्तरपुराण पर्व 48 | पर्व 49 | पर्व 50 | पर्व 51 | पर्व 52 | पर्व 53 |पर्व 54 | पर्व 55 | पर्व 56 | पर्व 57 |