अन्तिम तीर्थंकर वर्धमान स्वामी, राजा श्रेणिक और अभयकुमार के चरित का वर्णन पर्व 74 – श्लोक 162 से 171 | श्लोक 172 से 181 | श्लोक 182 से 192 | श्लोक 193 से 202 | श्लोक 203 से 211 | श्लोक 212 से 222
मूल संस्कृत श्लोक . हिंदी अनुवाद . English translation of Uttar Puran parv 74- shlok 223 to 232
श्लोक ( Shlok ) 223
सार्ध कनकवत्यासौ मन्दरं क्रीडितुं गतः । समीक्ष्य प्रियमित्राख्यमवधिज्ञानवीक्षणम् ॥ २२३ ॥
किसी एक दिन वह अपनी कनकवती नामक स्त्रीके साथ क्रीड़ा करनेके लिए मन्द्र-गिरि पर गया था वहाँ उसने प्रियमित्र नामक अवधिज्ञानी मुनिके दर्शन किये ।। २२३ ॥
“One day, he went to Mount Mandara (Mandra-giri) to spend leisurely time with his wife, Kanakavati. There, he was blessed with the sight (Darshan) of a great sage named Priyamitra, who possessed clairvoyant knowledge (Avdhijnana).” 223
श्लोक ( Shlok ) 224
भक्तया प्रदक्षिणीकृत्य कृती कृतनमस्कृतिः । ब्रूहि धर्मस्य सद्भावं पूज्येति परिष्टष्टवान् ॥ २२४ ॥
उस चतुर विद्याधरने भक्तिपूर्वक प्रदक्षिणा देकर उन मुनिराजको नमस्कार किया और ‘हे पूज्य ! धर्मका स्वरूप कहिये’ इस प्रकार उनसे पूछा ॥ २२४ ॥
“That intelligent Vidyadhara devotionally circumambulated (Pradakshina) the great sage, bowed down to him in reverence, and inquired, ‘O worshipful master! Kindly expound the true nature of Dharma.'”224
श्लोक ( Shlok ) 225 – 226
धर्मो दयामयो धर्म श्रय धर्मेण नीयसे । मुक्ति धर्मेण कर्माणि छिन्धि धर्माय सन्मतिम् ॥ २२५॥देहि नापेहि धर्मात्त्वं याहि धर्मस्य नृत्यताम् । धर्मे तिष्ठ चिरं धर्म पाहि मामिति ‘चिन्तय ॥ २२६॥
उत्तरमें मुनिराज कहने लगे कि धर्म दयामय है, तू धर्मका आश्रय कर, धर्मके द्वारा तू मोक्षके निकट पहुंच रहा है, धर्मके द्वारा कर्मका बन्धन छेद, धर्मके लिए सद्बुद्धि दे, धर्मसे पीछे नहीं हट, धर्मकी दासता स्वीकृत कर, धर्ममें स्थिर रह और ‘हे धर्म मेरी रक्षाकर’ सदा इस प्रकारकी चिन्ता कर ।। २२५-२२६ ।।
“In response, the great sage began to speak: ‘Dharma is rooted in compassion. Seek refuge in Dharma; through Dharma, you are drawing close to liberation (Moksha); with Dharma, sever the bonds of karma; dedicate your noble intellect to Dharma; do not turn away from Dharma; accept subservience to Dharma; remain steadfast in Dharma; and always contemplate thus: “O Dharma, protect me!”‘”225 – 226
श्लोक ( Shlok ) 227
इति धर्म विनिश्चित्य नीत्वाप्यत्वादिपर्ययम् । सन्ततं चिन्तयानन्त्यं गन्तासि गणितैः क्षणैः ॥ २२७ ॥
इस प्रकार धर्मका निश्चय कर उसके कर्ता करण आदि भेदोंका निरन्तर चिन्तवन किया कर। ऐसा करनेसे तू कुछ ही समयमें मोक्षको प्राप्त हो जावेगा ।। २२७ ॥
“In this manner, having firmly established the true certainty of Dharma, you must continuously contemplate its various aspects, such as the agent (Karta) and the instrument (Karana). By doing so, you will attain absolute liberation (Moksha) in a very short period of time.”227
श्लोक ( Shlok ) 228
इत्यब्रवीदसौ सोऽपि निधाय हृदि तद्वचः । तृषितो वा जलं तस्मात् पीत्तधर्मरसायनः ॥ २२८ ॥
इस तरह मुनिराजने कहा। मुनिराजके वचन हृदयमें धारण कर और उनसे धर्मरूपी रसायनका पानकर वह ऐसा सन्तुष्ट हुआ जैसा कि प्यासा मनुष्य जल पाकर संतुष्ट होता है ।। २२८ ॥
“Thus spoke the great sage. Taking the words of the saint deeply into his heart and drinking the life-giving elixir (Rasayana) of Dharma from them, he felt as profoundly satisfied as a parched man who has finally found water.”228
श्लोक ( Shlok ) 229
भोगनिवैंगयोगेन दूरीकृतपरिग्रहः । चिरं संयम्य सन्न्यस्य कल्पेऽभूत्सप्तमेऽमरः ॥ २२९ ॥
उसने उसी समय भोगोंसे विरक्त होकर समस्त परिग्रहका त्याग कर दिया और चिर काल तक संयम धारणकर अन्तमें सन्यास मरण किया जिसके प्रभावसे वह सातवें स्वर्गमें देव हुआ ।। २२९ ।।
“At that very moment, becoming completely detached from worldly pleasures, he renounced all worldly possessions (Parigraha). Having observed rigorous self-restraint (Sanyama) for a very long period, he ultimately embraced the ritual death of fasting (Sanyasa-marana), by the spiritual merit of which he was reborn as a celestial being in the seventh heaven.”
श्लोक ( Shlok ) 230 – 232
त्रयोदशाब्धिमानायुरात्मसात्कृततत्सुखः । सुखेनास्मात्समागत्य सुसमाहितचेतसा ॥ २३० ॥द्वीपेऽस्मिन्कोसले देशे साकेतनगरेशिनः । वज्रसेनमहीपस्य शीलवत्यामजायत ॥ २३१ ॥ हरिषेणः कृताशेषहर्षो नैसगिकैर्गुणैः । वशीकृत्य श्रियं स्वस्य चिरं कुलवधूमिव ॥ २३२ ॥
वहाँ तेरह सागरकी आयु प्रमाण उसने वहाँ के सुख भोगे और सुखसे काल व्यतीतकर समाधिपूर्वक प्राण छोड़े। वहाँ से च्युत होकर वह इसी जम्बूद्वीपके कोसल देश सम्बन्धी साकेत नगरके स्वामी राजा वज्रसेनकी शीलवती रानीसे अपने स्वाभाविक गुणोंके द्वारा सबको हर्षित करने वाला हरिषेण नामका पुत्र हुआ। उसने कुलवधूके समान राज्यलक्ष्मी अपने वश कर ली ।। २३०-२३२ ।।
“There, he enjoyed the celestial pleasures for a lifespan lasting thirteen Sagaras (ocean-like cosmic time-measured spans), and having spent his time in sheer bliss, he departed his life in perfect meditative composure (Samadhi). Descending from that heaven, he was reborn in this very Jambudvipa, within the Kosala country, in the city of Saketa; there, he became the son named Harishena—who delighted everyone with his innate virtues—born to Queen Sheelavati and King Vajrasena, the ruler of the realm. In time, he brought the goddess of royal fortune (Rajyalakshmi) under his absolute control, just as a master commands a dutiful bride of the household.”230 – 232
श्लोक 233 से 241
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