आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
गाथा 1 | गाथा 2 | गाथा 3 | गाथा 4 | गाथा 5 | गाथा 6 | गाथा 7 | गाथा 8 | गाथा 9 | गाथा 10 | गाथा 11 | गाथा 12 | गाथा 13 | गाथा 14 | गाथा 15 | गाथा 16 | गाथा 17 | गाथा 18 | गाथा 19 | गाथा 20 | गाथा 21 | गाथा 22 | गाथा 23 | गाथा 24 | गाथा 25 | गाथा 26 | गाथा 27 | गाथा 28 | गाथा 29 | गाथा 30
उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य कहता है कि वे पुद्गल क्यों बंध जाते हैं? अर्थात् जीव के द्वारा पुद्गल क्यों और किस प्रकार से हमेशा बन्ध को प्राप्त होते रहते हैं?
कर्म कर्म हिताबन्धि, जीवो जीवहितस्पृह: स्वस्वप्रभावभूयस्त्वे, स्वार्थं को वा न वाञ्छति ॥31॥
अन्वयार्थ (कर्म) कर्म (कर्महिताबन्धि) अपने हित रूप साथी कर्मों को ही बाँधता है तथा (जीवः) आत्मा (जीवहितस्पृहः) अपने आत्मा के हित की इच्छा करता है (स्वस्वप्रभावभूयस्त्वे) अपने-अपने शक्तिशाली प्रभाव के होने पर (को वा स्वार्थ) कौन-सा व्यक्ति अपना हित (न वाञ्छति) नहीं चाहता?
पद्यानुवाद
कर्म चाहता तभी कर्म-हित, कर्म-कर्म से जब बंधता
जीव चाहता तभी जीवहित, जीवन जिससे है सधता ।
अपने-अपने प्रभाव के वश, बलशाली हैं जब होते,
स्वार्थ सिद्धि में कौन-कौन फिर, तत्पर ना हो? सब होते ॥३१॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 31
विवेचना
जीव जीव का हित चाहता है, कर्म कर्म का हित चाहता है। कर्म जब कमजोर होता है तब जीव बलजोर होता है और जीव जब कमजोर होता है तब कर्म बल जोर होता है। कर्म को नष्ट करने के लिए जीव को विशुद्धि की एक विशिष्ट भूमिका का निर्वाह करना आवश्यक होता है। कर्म के तीव्रोदय में कर्म नहीं कटते किन्तु कर्म के मन्दोदय में विशुद्धि होने पर कर्म कटते हैं। जीव के अंदर हित का परिणाम हमेशा नहीं रहता सुबह हित का भाव होता है शाम तक नहीं रहता, शाम को होता है तो सुबह तक नहीं रहता।
जैसे कोई तैराक है तैरने में निष्णात है फिर भी वह उस समय अपने तैरने की कला को नहीं दिखा सकता। जिस समय नदी में वेग तीव्र होता है तब डूबने की संभावना रहती है। नदी को पार करना है तो आषाढ़ की बाढ़ युक्त नदी में आप नहीं कूदते। जब एक-दो दिन वर्षा नहीं होती फलतः नदी का वेग कम हो जाता है साथ ही उस समय यदि आपका संवेग भी कम हो जाये तब भी नदी पार नहीं की जा सकती, क्योंकि वेग भी कम और संवेग भी यानि इच्छा भी कम और हाथ पैर हिलाने की प्रवृत्ति भी कम हो जाती है अतः तैरने की क्रिया सफल नहीं हो पाती। वेग भले ही कम हो परन्तु पानी अच्छी मात्रा में हो और हाथ-पैर भी यथायोग्य प्रवृत्त हों तो तैरने की क्रिया सफल होती है। आपका संवेग (इच्छा) उस समय कार्य करने में सफल हो सकता है जिस समय आप तैरने के लिए उत्साहित हो जाते हैं और कार्य को सफल करना अपना कर्त्तव्य समझते हैं।
निष्कर्ष यह हुआ कि जिस प्रकार तैराक संवेग भाव से नदी पार कर सकता है उसी प्रकार संसारी प्राणी संवेग-निर्वेग भावों के द्वारा संसाररूपी समुद्र को पार करने में सक्षम हो सकता है। संवेग-निर्वेग भावों के बिना संसार-समुद्र को तीन काल में भी पार नहीं किया जा सकता।
संसारी प्राणी कर्मोदय की तीव्र अवस्था होने के कारण अपने हित की चिन्ता छोड़कर दूसरे के हित की चिन्ता करता है, किन्तु कर्म के कमजोर होने पर जीव जब स्वयं बलजोर होता है तब अपना हित करने में सफल हो सकता है। जिस समय जीव कमजोर हो जाता है अर्थात् जीव जब रागद्वेष करता है तो कर्म बन्ध होता है। जीव कर्म बाँधना नहीं चाहता तो भी कर्म बन्ध जाते हैं। अन्त में यही निष्कर्ष निकला कि जिस समय कर्मों की बाढ़ कमजोर हो और जीव बलजोर बनकर छलांग लगा ले तो निश्चित रूप से वह अपना हित कर सकता है।
धर्मध्यान और शुक्लध्यान के द्वारा ही जीव अपना हित कर सकता है। शुक्लध्यान के लिए आचार्यों द्वारा दो उदाहरण दिये गये हैं-
जैसे कि कोई एक बालक है जो कि सशक्त नहीं है उसके हाथ-पैरों में बल कम है और उसके हाथों में एक कुल्हाड़ी दे दी, वह कुल्हाड़ी से लकड़ी को काट रहा है, लकड़ी के ऊपर धीरे-धीरे प्रहार करता चला जा रहा है जिससे बहुत देर में वह लकड़ी कटती है। लेकिन यदि कोई सशक्त जवान पहलवान लकड़ी के संधि स्थान पर एक बार प्रहार करता है, एक बार में ही वह तीन भागों में विभाजित हो जाती है। उसी प्रकार साधक धर्मध्यानरूपी कुल्हाड़ी से कर्मों पर धीरे-धीरे प्रहार करता है तो अधिक समय में कर्म कम कटते हैं लेकिन जब वह शुक्लध्यानरूपी सशक्त कुल्हाड़ी के द्वारा संधि स्थान देखकर कर्मों पर प्रहार करता है तो एक बार में ही बहुत से कर्म कट जाते हैं।
कर्म कर्म का हित चाहते हैं इसका अर्थ यह है कि पूर्वोपार्जित बलवान द्रव्यकर्म जीव में औदयिक आदि भावों को पैदा कर नवीन द्रव्यकर्मों को ग्रहण कर अपनी संतान को पुष्ट करता है। जीव, जीव का हित चाहता है। इसका अर्थ स्वतः सिद्ध है कि जीव स्वात्मोपलब्धि रूप मोक्ष को चाहता है इसीलिए मोक्ष प्राप्ति के साधनभूत रत्नत्रय, चार आराधना आदि को अपनाकर मोक्षमार्ग को प्रशस्त करता है इसी से जीव का हित होता है। इसीलिए यह सार्थक उक्ति कही गई है कि “स्वार्थं को वा न वाञ्छति”।
“अपने-अपने माहात्म्य के प्रभाव के बढ़ने पर स्वार्थ को अर्थात् अपनी-अपनी उपकारक वस्तु को कौन नहीं चाहता ? सभी चाहते हैं।”
इसी को स्पष्ट करते हुए आचार्य कहते हैं कि अपने-अपने प्रभाव के बलशाली होने पर कौन अपना स्वार्थ सिद्ध नहीं करता ? जैसे जीव यदि छठवें गुणस्थान में प्रमाद की भूमिका में आ जाता है तो वह शीघ्र ही प्रमाद से दूर होने का प्रयास करता है क्योंकि प्रमाद से जीव का अहित होता है। मोक्षमार्ग प्रकाशक में भी कहा है कि-
“कोउ-कोउ समय आत्मा कर्म ने दाबे छै और कोउ कोउ समय कर्म आत्मा ने दाबे छै।” यह निश्चित बात है कि कर्म के बलशाली होने पर आत्मा दब जाता है और आत्म पुरुषार्थ बलशाली होने पर कर्म दब जाते हैं। फिर भी दोनों के बीच कभी-कभी आत्मपुरुषार्थ इतना अधिक बलशाली हो जाता है कि कर्म आत्मा पर अपना प्रभाव नहीं दिखा पाते। अन्ततः आत्मा की विजय हो जाती है और अन्तर्मुहूर्त में कर्मों पर प्रहार कर अनन्त काल तक के लिए विजय शील होकर वह आत्मा सिद्धालय में विराजमान हो जाता है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 31
इष्टोपदेश गाथा 31 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (कर्म) कर्म (कर्महिताबन्धि) अपने हित रूप साथी कर्मों को ही बाँधता है तथा (जीवः) आत्मा (जीवहितस्पृहः) अपने आत्मा के हित की इच्छा करता है (स्वस्व) अपने-अपने (प्रभावभूयस्त्वे) शक्तिशाली प्रभाव के होने पर (को वा स्वार्थ) कौन सा व्यक्ति अपना हित (न वाञ्छति) नहीं चाहता ?
भावार्थ – संसार में सभी अपना बल पाकर अपना स्वार्थ सिद्ध किया करते हैं तदनुसार जब संसारी जीव के मोहनीय, ज्ञानावरण आदि कर्म प्रबल होते हैं तब आत्मा को मोह, राग, द्वेष, मिथ्यात्व, अज्ञान आदि भाव उत्पन्न करके और अपने साथी मोहनीय, ज्ञानावरण आदि कर्मों को हम आत्मा के साथ बंधन कराते हैं तथा आत्मा को नरक, निगोद आदि गतियों में भ्रमण कराते हैं। अनादिकाल से अब तक अनन्तानन्त संसारी जीव इस बलवत्ता (शक्ति) के कारण संसार में भ्रमण कर रहे हैं परन्तु सच्चे गुरु का उपदेश आदि का शुभ समागम पाकर जब आत्मा को अपनी रुचि हो जाती है तब आत्मा प्रबल बन जाता है। उस समय वह कर्मों का संवर, निर्जरा करके कर्मों की शक्ति को क्षीण करता हुआ अपने ज्ञान, चरित्र आदि गुणों को बढ़ा करके कर्मों से मुक्त होने का प्रयत्न करता है। इस तरह सभी अपना अवसर पाकर अपना स्वार्थ सिद्ध किया करते हैं।
उत्थानिका – इसलिए समझो कि कर्मों से बँधा हुआ प्राणी कर्मों का संचय किया करता है, जबकि ऐसा है तब – गाथा 32
स्वाध्याय गाथा सं 31 to 33
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 ( Gatha 10)| गाथा 11 ( Gatha 11 )| गाथा 12 ( Gatha 12) | गाथा 13 ( Gatha 13 )| गाथा 14 ( Gatha 14 )| गाथा 15 ( Gatha 15 ) | गाथा 16 ( Gatha 16 )| गाथा 17 ( Gatha 17 )| गाथा 18 ( Gatha 18 )| गाथा 19 ( Gatha 19 )| गाथा 20 ( Gatha 20 )| गाथा 21 ( Gatha 21)| गाथा 22 ( Gatha 22 )| गाथा 23 ( Gatha 23 )| गाथा 24 ( Gatha 24 )| गाथा 25 ( Gatha 25 ) | गाथा 26 ( Gatha 26 )| गाथा 27( Gatha 27 ) | गाथा 28 ( Gatha 28 )| गाथा 29 ( Gatha 29 )| गाथा 30 ( Gatha 30 )| गाथा 31 | गाथा 32 | गाथा 33
English Translation of Ishtopadesh Gatha 31
Download PDF
इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
उपरोक्त PDF डाउनलोड करने के लिए सबसे पहले आपको जैन समुदाय FD फोरम का सदस्य बनना होगा
To download above pdf first you have to become member of Jain community FD forum