आचार्य पूज्यपादस्वामी विरचित इष्टोपदेश का आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-यहाँ पर शिष्य कहता है कि इसमें निर्ममता कैसे हो? इसमें निर्ममता के चिंतन करने के उपायों का सवाल किया गया है। अब आचार्य उसकी प्रक्रिया को “एकोऽहं निर्ममः” से प्रारम्भ कर “मम विज्ञस्य का स्पृहा” तक के श्लोकों द्वारा बतलाते हैं-
एकोऽहं निर्मम: शुद्धो, ज्ञानी योगीन्द्रगोचर: बाह्या: संयोगजा भावा, मत्त: सर्वेऽपि सर्वथा ॥27॥
अन्वयार्थ (अहम् एकः) मैं एक हूँ (निर्ममः) ममता रहित (शुद्धः) शुद्ध हूँ (ज्ञानी) ज्ञानी हूँ तथा (योगीन्द्रगोचरः) योगियों मुनियों द्वारा जानने योग्य हूँ (सर्वे अपि) सभी (संयोगजाः) संयोग से उत्पन्न होने वाले (भावाः) पदार्थ (मत्तः) मुझसे (सर्वथा) सब तरह से (बाह्याः) भिन्न हैं।
पद्यानुवाद
एक अकेला निर्मम हूँ मैं, योगी को ही दिखता हूँ,
शुद्ध-शुभ्र हूँ ज्ञानी होता, ज्ञानामृत को चखता हूँ।
माया, ममता, मोह, मान, मद, संयोगज ये भाव अरे!
भिन्न सर्वथा मुझसे हैं यूँ, इनमें हम समभाव धरे ॥२७॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 27
विवेचना
आचार्य कहते हैं कि जीवन का वास्तविक स्वरूप समझने का प्रयास करो। आज तक यही समझते रहे कि मैं हूँ, मेरा परिवार है, मेरा समाज है, मेरा देश है, मेरा राष्ट्र है आदि। इस विचारधारा से व्यक्ति अपने आपको बाहर में कितना व्यापक समझता है। सभी से अपने सम्बन्धों को जोड़ता है। भले ही उन सम्बन्धों से अनेक प्रकार के तनाव उत्पन्न होते हों, लेकिन फिर भी सम्बन्धों के बीच में ही रहना पसंद करता है। जबकि वास्तव में देखें तो बाह्य समस्त पदार्थों से भिन्न मेरा अस्तित्व मेरे चैतन्य तक सीमित है अर्थात् मैं एक हूँ। फिर भी संसारी मोही प्राणी अपने को अनेक रिश्तों से, सम्बन्धों से जोड़कर अनेक रूप मानता है। मैं निर्मम हूँ, ममत्व भाव मेरा स्वभाव नहीं है, मेरा-तेरापन का विचार तो मोहनीय कर्मोदय से प्रभावित ज्ञान की वैभाविक परिणति है। ममत्व भाव के द्वारा यह प्राणी अपने आपको सभी का और अन्य सभी बाह्य चेतन अचेतन वस्तुओं को अपना मानता है, जबकि यह उसकी भूल है, उसका अज्ञान है। मैं शुद्ध हूँ, ज्ञानी हूँ, योगियों के गोचर हूँ अर्थात् योगियों के शुद्धोपयोग मात्र से संवेदन करने योग्य हूँ। दुनिया के जितने भी शरीरादिक पदार्थ हैं वे सभी संयोगजन्य हैं और मेरे स्वभाव से भिन्न हैं। प्रत्येक पदार्थ एक-दूसरे से पूर्णतः पृथक् और स्वतंत्र अस्तित्व को लिए हुए है।
इस स्वतंत्र अस्तित्व को जो स्वीकार करता है वही अपने आपको एक, निर्मम, ज्ञानी आदि के रूप में स्वीकार कर सकता है। यह स्वरूप आप लोगों को स्वीकार है तो मुझे बताओ ? यदि स्वीकृत है तो जीवन वास्तविकता की ओर है, ऐसा समझना चाहिए। अन्यथा आज तक जैसा जीवन जीते आए हैं, जैसा मानते आए हैं वैसी ही धारणा आगे भी रहेगी और हम वास्तविकता के परिचय से बहुत दूर होते जायेंगे।
विचार करो, तुमने किस-किसको अपना माना और कौन-कौन तुम्हारा अपना बना ? मान्यतानुसार मोह के प्रभाव में आकर किसी ने अपना होने का भले ही कितना भी आश्वासन दिया हो कि मैं हमेशा-हमेशा तुम्हारा हूँ फिर भी सब एक-दूसरे को छोड़कर चले जाते हैं। आप मंगतराय कृत बारहभावना में पढ़ते ही हैं कि-
ज्यों मेले में पंथी जन मिल नेह फिर धरते, ज्यों तरुवर पै रैन बसेरा पंछी आ करते। कोस कोई दो कोस कोई उड़ फिर थक-थक हारै, जाय अकेला हंस संग में, कोई न पर मारै ॥४/११॥
एकत्व एवं अन्यत्व आदि भावनाओं के चिन्तन द्वारा यही निष्कर्ष निकलता है कि मैं वास्तव में अकेला हूँ भले ही लौकिक मान्यता के अनुसार उसे मानो या न मानो। जो मान लेते हैं वे अपने आपको पाने का प्रयास करके अपने आपमें लीन हो जाते हैं और आत्मलीनता के समय शान्ति एवं आनन्द का अनुभव करते हैं।
धन्य हैं वे, जिन्होंने जीवन की वास्तविकता को समझकर अपने वास्तविक स्वाभाविक जीवन को प्राप्त कर लिया है, उन्हीं की शरण को स्वीकार करके हम भी जीवन की वास्तविकता की ओर कदम बढ़ायें इसी में जीवन की सार्थकता है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 27
इष्टोपदेश गाथा 27 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (अहम् एकः) मैं एक हूँ (निर्ममःशुद्धः) ममता रहित शुद्ध हूँ (ज्ञानी) ज्ञानी हूँ तथा (योगीन्द्रगोचरः) योगियों [केवली, श्रुतकेवली] द्वारा जानने योग्य हूँ (सर्वे अपि) सभी (संयोगजा भावा) संयोग से उत्पन्न होने वाले पदार्थ (मत्तः) मुझसे (सर्वथा बाह्याः) सब तरह से भिन्न हैं।
भावार्थ-मेरी आत्मा वास्तव में सब जड़, चेतन पदार्थों से भिन्न अकेली एक है, जगत में मेरा कोई नहीं है। शुद्धनय की अपेक्षा द्रव्यकर्म, भावकर्म और नोकर्म से रहित होने से मैं शुद्ध हूँ, स्वपर प्रकाशन स्वभाववाला होने से ज्ञानी हूँ। अनंत पर्यायों से विशिष्ट होने से केवलज्ञानी तथा शुद्धोपयोगमय श्रुतकेवली के गोचर हूँ, संवेद्य हूँ। शरीर और कर्मों के संयोग से जो मेरा, तेरापन को लिए हुए मोह ममता के, रागद्वेष के भाव होते हैं, वे वास्तव में मेरे भाव नहीं हैं, ये सब मुझसे अलग हैं। इस तरह अपने आत्मा का शुद्ध स्वरूप विचार करने वाला सम्यग्दृष्टि मनुष्य चिन्तन करे।
उत्थानिका – फिर भावना करने वाला सोचता है कि देहादिक के सम्बन्ध से प्राणियों को क्या होता है? क्या फल मिलता है ? उसी समय वह स्वयं ही समाधान करता है कि-
स्वाध्याय गाथा सं 26 to 29
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English Translation of Ishtopadesh Gatha 27
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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