आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-आगे की कारिका में आचार्य कहते हैं कि ये शरीर, गृह, स्त्री आदि सर्वथा अन्य हैं, मेरे से पृथक् हैं, फिर भी मोही प्राणी इन्हें अपना मानता है-
गाथा 8
वपुर्गृहं धनं दारा:, पुत्रा मित्राणि शत्रव: सर्वथान्यस्वभावानि, मूढ: स्वानि प्रपद्यते ॥8॥
अन्वयार्थ – (वपुः गृहं) शरीर, घर (धनं दाराः) धन, स्त्रियाँ (पुत्राः मित्राणि) पुत्र, मित्र और (शत्रवः) शत्रु (सर्वथा) सब तरह से (अन्यस्वभावानि) अन्य स्वभाव वाले हैं परन्तु (मूढः) मोही प्राणी इन्हें (स्वानि प्रपद्यते) अपना समझता है।
धन-तन केतन वतन उपावन, मात-पिता सुत-सुता अरे !
परिजन पुरजन सहचर अनुचर, अग्रेचर रिपु तथा रहें।
सुन-सुन सब ये आतम से अति भिन्न-स्वभावी ज्ञात रहे,
मूढ इन्हें नित निजी मानते भव में भटके भ्रान्त रहें ॥८॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 8
विवेचना –
आचार्य अपनी बात शरीर से ही प्रारम्भ करते हैं, अन्य दूसरी वस्तुओं का कथन बाद में किया। शरीर क्या है? शरीर शरीर है, यह ज्ञान सही है। लेकिन शरीर मेरा है, ऐसा समझना मोह का परिणाम है। पूर्वमोह का संस्कार है। शरीर मेरा है, इसकी धारणा बनी हुई है। इसीलिए शरीर की संतति प्राप्त होती रहती है। लेकिन जो शरीर से निर्ममत्व हो जाता है वह शरीर संतति से मुक्त हो जाता है। देखो, परिजन वाले पुलिस हैं, क्योंकि वे पुलिस के समान काम करते हैं। कहीं जाना है तो पहले बताकर जाओ कि कहाँ जा रहे हो? बेटा कहता है कि पिता जी में भी साथ में चलूँगा। गृहलक्ष्मी कहती है कि कहीं नहीं जाना है, जाना भी है तो मेरे बिना नहीं जा सकते इत्यादि विचार चलते रहते हैं। घर घर नहीं है किन्तु’ कारागृह’ है। जिसको आप पसीना बहा बहाकर श्रम करके बनवाते हो। आचार्य कहते हैं कि वह तो कारागृह है। जेल है। मतलब यह हुआ कि आपने जेल का निर्माण किया। ‘वनिता बेड़ी’ पत्नि को बेड़ी की संज्ञा दी है। बेड़ी कहाँ पर पहनाई जाती है? पाँव में। जिसने बेड़ी पहिन ली हो तो वह चल नहीं सकता, हथकड़ी होती तो चल भी लेता। नहीं समझे ? जो हाथ में डाली जाती है, उसको बेड़ी नहीं कहते। कहते तो हैं कि पाणिग्रहण हो गया, लेकिन स्थिति ऐसी है कि जिसका पाणिग्रहण होता है, मानो उसके पैरों में बेड़ी डल गई। इसका नाम विवाहबन्धन है। ‘वनिता’ बेड़ी है, हथकड़ी नहीं। हथकड़ी पहने हुए अपराधी कई बार जेल से भाग जाते हैं, लेकिन पैरों में जब बेड़ी पड़ जाती है तो वे भाग नहीं सकते। आप सब मिलकर एक जेल में ही रह रहे हो। छोटे जेल में रहो या बड़े जेल में, बात तो एक ही है। अरे! इसे तो रहने को कुटिया मिली, मुझे तो ६-६ खण्ड का मकान मिला। ऐसा सोचकर लोग बड़े खुश होते हैं लेकिन उन्हें सोचना चाहिए कि वह तो छोटे जेल में है, अतः छोटा अपराधी है। मैं तो इतने बड़े जेल में हूँ अतः उससे बड़ा अपराधी हूँ।
एक बार हम लोग विहार कर रहे थे। एक भैंस को एक व्यक्ति चला रहा था, लेकिन वह चल नहीं पा रही थी। मुझे देखकर दया आ गई। मुझे लगा देखो, यह क्या कर रहा है? कितना निर्दय है? ऊपर से मार भी रहा है। उसके पैर को भी बाँधा है। उससे पूछा-ऐसा क्यों कर रहा है? उसने बताया कि यह मारती ज्यादा है, अतः उसे एक तरफ से सींग से और एक पैर से इस प्रकार से बाँधा है कि वह चल तो सकती है, पर भाग नहीं सकती। सरकती-सरकती जा रही है। मैंने सोचा, इसकी यात्रा कैसी होगी ? इसी प्रकार आचार्य कहते हैं कि यह संसारी प्राणी अपराध करता है तो कारागृह में बन्द कर दिया जाता है। पैरों में बेड़ियाँ डाल दी जाती हैं। हाथों में हथकड़ी डाल दी जाती हैं। इसके साथ और भी साधन अपनाये जाते हैं। जैसे हाथी के लिए अंकुश होता है, ऊँट के लिए नकील होती है, घोड़े के लिए लगाम होती है, साईकिल के लिए ब्रेक होता है, आप लोगों के लिए क्या होता है? संयम होता है। सोचो, विचार करो कि ये सारे के सारे किसी न किसी बन्धन से ही चल रहे हैं, इसीलिए ठीक चलते हैं। यदि किसी पर कोई बन्धन नहीं होगा तो क्या होगा ? संयम ही एक मात्र मनुष्य की सुरक्षा के लिए बन्धन है और कोई भी बन्धन, बन्धन नहीं है। असंयम तो मोह के गर्त में ढकेलने वाला है। यदि आप अपनी आत्मा की रक्षा करना चाहते हो तो संयम के माध्यम से कर सकते हो, अन्यथा नहीं।
घर, मित्र, शत्रु, पुत्र, पत्नि, वैभव, धन ये सारे के सारे पदार्थ आत्म स्वभाव से पृथक् हैं, सबको ऐसा विश्वास होना चाहिए। लेकिन जो मोही/मूढ़ होता है, वह समस्त पदार्थों को अपना मानता है। शरीर मेरा नहीं है, ऐसी धारणा बनाकर शरीर से मोह छोड़कर साधना में तत्पर रहता है तो वह शरीर से छूट सकता है, लेकिन शरीर को अपना मानने वालों की स्थिति कैसी होगी ? पृथक् को अपृथक् मानने वालों से छहढाला में पं० दौलतराम जी कहते हैं-
पुद्गल नभ, धर्म अधर्म काल, इनतें न्यारी है जीव चाल।
ताको न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान ॥२/३॥
उक्त जितने भी द्रव्य हैं वे सब आत्मद्रव्य से पृथक् हैं फिर भी मोही प्राणी उनके गुण धर्मों को नहीं जानता। उसके लिए पुनः पं० दौलतराम जी कहते हैं-
“ताको न जान विपरीत मान, करि करै देह में निज पिछान ॥”
सबसे ज्यादा खतरनाक है-देह में अपने आपका अनुभव करना। मैं खा रहा हूँ, मैं पी रहा हूँ, मैं बैठा हूँ, मैं जा रहा हूँ, मैं बोल रहा हूँ, मैं कह रहा हूँ, ये सब जितने भी विकल्प हैं वे सभी आत्मा को शरीरमय मानने वालों के हैं। शरीर सम्बन्धी क्रियाओं को लेकर ही आप लोगों की सुबह से शाम हो जाती है। यही कार्यक्रम चलता रहता है। “ज्ञानी तो वह है जो शरीर को पृथक् करके आत्मा को देखने का प्रयास करता है और हमेशा इसी पुरुषार्थ में लगा रहता है कि शरीर सो मैं नहीं हूँ।” शरीर में घटन-बढ़न कुछ भी हो वह मेरा नहीं है। इस प्रकार धीरे-धीरे जानोगे, चिन्तन करोगे, तो उदासी आयेगी और आत्मज्ञान पुष्ट होगा, अन्यथा नहीं। सब कुछ कार्य शरीर के आधीन होकर करो और मोक्षपुरुषार्थ सम्बन्धी सुख-सुविधा चाहो तो यह उचित नहीं है। मोक्षमार्ग के लिए कोई पूछे कि-शार्टकट है या लांग ही लांग है? न शार्टकट है न लांग। मोक्षमार्ग तो राइट कट है। सही-सही चलो, नहीं तो फिर घूम करके आना ही पड़ेगा। सही मार्ग का अर्थ यह है कि शरीर से मैं पृथक् हूँ, मेरा अस्तित्व पृथक् है। प्रत्येक क्रिया के साथ इसी पृथकता का अनुभव करने का प्रयास करके चलना, यही मोक्षमार्ग का उपाय है।
वपुर्गृहं… शरीर के बाद घर की बात आती है। आप सभी अपने-अपने घर की बात कर रहे हो। घर में रहने वाले लोग जिनके पास घर नहीं है उन्हें देखकर क्या कहते हैं? कि देखो। इनका जीवन कैसा है? रहने को घर ही नहीं है। कोई पूछताछ तक करने वाला नहीं है। हम तो कितने भाग्यवान हैं? सोचिये, विचार करिये ! जिनके पास रहने को घर नहीं है, उन्हें लोग बेघर कहते हैं। लेकिन वास्तव में देखें, तो घर वाले कोई नहीं हैं सभी बेघर हैं अथवा किराये के घर में हैं। यह शरीर भी किराये का घर है। कौन ऐसा है यहाँ जो स्वाधीन जीवन जी रहा हो ? मात्र सिद्ध परमेष्ठी स्वाधीन होकर अपने घर में जी रहे हैं। वे शरीरातीत हैं। आत्मा ही उनका निजी गृह है। यह गृह तो गृह नहीं कारागृह है। आप लोग वैराग्य भावना में बोलते हैं कि-
घर कारागृह वनिता बेड़ी, परिजन जन रखवाले । १४।
इसलिए आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी ने कहा- “मूढ़ः स्वानि प्रपद्यते”। वीतराग सन्तों ने उन सभी को मोही, मूढ़ या अज्ञानी कहा है। वह सुजान नहीं अनजान है। जीवन क्या है? आत्मा क्या है? शरीर क्या है? इन सबका उसे समीचीन ज्ञान नहीं होता। लेकिन सन्तों ने जिन्हें ज्ञानी कहा है, वे हमेशा-हमेशा इन सब पदार्थों से बचते रहते हैं। कभी भी मेरा तेरा नहीं करते, क्योंकि ज्ञानीजन कभी भी पर-पदार्थों में मेरा तेरा नहीं करते।
सुबह से शाम तक आप सभी लोग अन्य पदार्थों के साथ कर्तृत्व, भोक्तृत्व, स्वामित्व भाव रखते हैं। इनको जितना जितना छोड़ोगे उतना उतना ही आप मोक्षमार्ग के निकट होते चले जाओगे। इनके जितने निकट रहोगे, उतने ही मार्ग से दूर होते जाओगे। सोचना चाहिए कि मेरे आत्म-तत्त्व से भिन्न शरीर, गृह, वनिता, पुत्र, पुत्री, माता-पिता आदि जितने भी पदार्थ है उनका
आत्मा से मात्र संयोगी सम्बन्ध है। आत्मा तो इन सबसे पृथक् है। यह सब बाहरी दृश्य है और आत्म-तत्त्व अंदर का दर्शन है, भीतरी दृश्य है। इसलिए आत्मा आँखों के द्वारा देखने में नहीं आता। रसना के द्वारा चखने में नहीं आता। नासिका के द्वारा सूंघने में नहीं आता। कानों से सुनने में नहीं आता। वह तो भीतर रहता है, बाहरी जितने भी पदार्थ हैं, वे सब मोह के कारण अपने जैसे लगते हैं। “संसार की मूल भित्ति इसी मान्यता पर खड़ी होती है।
प्रत्येक कार्य के लिए कोई न कोई कारण अवश्य होता है। संसार रूपी महाप्रसाद जो आज तक मजबूती के साथ खड़ा हुआ है। इसकी एक ईंट भी नहीं हिली। प्रत्येक जन्म में उसे सुरक्षित रखने का ही प्रयास चलता रहा। विषय-कषाय रूपी रसायन का प्रयोग किया जाता है जिसके द्वारा वह मजबूत बना रहता है। इसको ब्रह्मा या महावीर भगवान् जैसे भी आ जायें तो नहीं हिला सकते। इससे यह निश्चित हो जाता है कि भगवान् महावीर स्वामी जी के बल से भी आपके मोह का बल अधिक मजबूत है, क्योंकि उनके बल से भी यह डिगने वाला नहीं है, धराशाही होने वाला नहीं है। यह सब क्यों होता है? इतनी मजबूती कहाँ से आती है? आचार्य कहते हैं- यह सब मोह के कारण, अज्ञान के कारण होता है।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 8
इष्टोपदेश गाथा 8 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (वपुः) शरीर (गृहं) गृह (धनं) धन (दाराः) स्त्री (पुत्राः) पुत्र (मित्राणि) मित्र और (शत्रवः) शत्रु (सर्वथा) सब तरह से (अन्यस्वभावानि) अन्य स्वभाव वाले हैं परन्तु (मूढः) मोही प्राणी इन्हें (स्वानि प्रपद्यते) अपना समझता है।
भावार्थ -शरीर, घर, धन, स्त्री, पुत्र, मित्र, शत्रु आदि दृष्टिगोचर होने वाले चेतन, अचेतन पदार्थ सर्वथा (द्रव्य, क्षेत्र, काल, भाव से) अन्य (भिन्न) स्वभाव वाले हैं परन्तु मूढ़ (स्वपर विवेवज्ञान रहित बहिरात्मा) इन पदार्थों को अपना समझता है। इनके संयोग से अपने आपको सुखी अनुभव करता है और वियोग से अपने आपको दुःखी मानता है, किसी को अपना बैरी समझकर उससे द्वेष करता है तथा उससे भयभीत होता है। इसी तरह राग, द्वेष, भय, शोक आदि अनेक प्रकार के विकारी भाव संसारी आत्मा में मोह के कारण ही हुआ करते हैं।
उत्थानिका -शरीर, कुटुम्ब आदिक पदार्थ जो कि मोहवान् प्राणी के द्वारा उपकारक एवं हितकारक समझे जाते हैं, वे कैसे हैं – गाथा 9
स्वाध्याय गाथा सं 7 & 8
स्वाध्याय गाथा सं 8 & 9
इष्टोपदेश स्वाध्याय
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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