आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका– फिर भी शिष्य पूछता है कि बड़े आश्चर्य की बात है कि जब “इतनी मुश्किलों से यह सम्पत्ति कमायी जाती है एवं धनादिक सम्पत्ति दोनों लोकों में दुःख देने वाली भी है, तब ऐसी सम्पत्ति को लोग छोड क्यों नहीं देते ?” आचार्य उत्तर देते हैं-
विपत्तिमात्मनो मूढ:, परेषामिव नेक्षते दह्यमान-मृगाकीर्णवनान्तर – तरुस्थवत् ॥14॥
अन्वयार्थ – (दह्यमान-मृगाकीर्ण-वनान्तर-तरुस्थवत्) अग्नि से जलते हुए मृग आदि जीवों से भरे वन के मध्य वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्य के समान (मूढः) मूर्ख प्राणी (परेषां) दूसरे की (विपत्तिम् इव) विपत्ति के समान (आत्मनः) अपनी विपत्ति को (न ईक्षते) नहीं देखता है।
पद्यानुवाद
वन में तरु पर बैठा जैसा, मन में चिंतन करता है,
वन्य-जन्तु अब जले मरे सब, आग लगी वन जरता है।
पर की चिन्ता जैसी करता, अपनी चिन्ता कब करता?
मूढ़ बना तन पुनि-पुनि धरता, मरता है पुनि-पुनि डरता ॥१४॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 14
विवेचना
हिरण, सिंह, व्याघ्र आदि अनेक जीवों से भरे हुए वन में आग लग जाने पर उससे वचने के लिए यदि कोई मनुष्य, किसी ऊँचे वृक्ष की शाखा पर बैठकर यह समझता है, कि मैं तो ऊँचे वृक्ष पर बैठ गया हूँ, अतः यह अग्नि मेरा कुछ नहीं बिगाड़ सकती, ऐसा सोचकर निश्चिन्त हो जाता है, परन्तु उस अज्ञानी जीव को यह ज्ञात नहीं रहता कि जिस प्रकार इस वन के सभी जीव मेरे देखते-देखते जल रहे हैं उसी प्रकार थोड़ी देर में मैं भी भस्म हो जाऊँगा।
ठीक इसी प्रकार यह अज्ञानी प्राणी धनादि के निमित्त से दूसरों पर आई हुई विपत्तियों का बार-बार स्मरण करता है लेकिन मदिरा के नशे में उन्मत्त हुए मनुष्य के समान अपने ऊपर आई हुई विपत्तियों को भूलकर स्व-हित का ध्यान नहीं रख पाता।
लोक में भी देखा जाता है कि कोई भी धनिक दूसरों की विनष्ट होती हुई सम्पत्ति, गृह आदि को देखकर कभी भी यह विचार नहीं करता कि यह काल रूपी अग्नि, जिस तरह उसकी धन- सम्पत्ति को विनष्ट कर रही है उसी प्रकार मुझे भी नहीं छोड़ेगी। मेरी भी धन सम्पत्ति को वह काल रूपी अग्नि नष्ट कर देगी।
इष्टोपदेश गाथा 14 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – ( मृणाकीर्ण) मृग आदि जीवों से भरे तथा (दह्यमान) अग्नि से जलते हुए (वनान्तर) वन में (तरुस्थवत्) वृक्ष पर बैठे हुए मनुष्य के समान (मूढः) मूर्ख प्राणी (परेषां) दूसरों की (विपत्तिम् इव) विपत्ति के समान (आत्मनः) अपनी विपत्ति को (न ईक्षते) नहीं देखता है।
भावार्थ – जैसे सिंह, बाघ, सर्प आदि हिंसक जीव जन्तुओं से भरे हुए तथा चारों ओर से लगी हुई अग्नि द्वारा जलने वाले वन में किसी वृक्ष पर बैठा हुआ कोई मनुष्य उस आग से बचने के लिए इधर-उधर भागते हुए जानवरों को तो देख रहा हो परन्तु अपनी ओर आती हुई अग्नि से और हिंसक पशुओं से आने वाली अपनी विपत्ति की ओर न देखे तो ऐसे मूर्ख मनुष्य की तरह ही संसारी मोही जीव है जो कि रोग, शोक, भय, पुत्र, मित्र आदि के मरण शत्रु, चोर, डाकू आदि के संयोग आदि से होने वाले दुःखों से दूसरे जीवों को तो दुःखी देखता है परन्तु वैसे ही दुःख मेरे ऊपर भी आने वाले हैं या आ सकते हैं उस ओर नहीं देखता, अपने आपको सुखी समझता रहता है।
उत्थानिका – फिर भी शिष्य का कहना है- हे भगवन्! क्या कारण है कि लोगों को निकट आयी हुई विपत्तियाँ दिखायी नहीं देतीं ? आचार्य जबाब टते हैं-‘ लोभात्’ लोभ के कारण। हे वत्स! धनादिक की आसक्ति से धनी लोग सामने आयी हुई भी विपत्ति को नहीं देखते हैं, कारण कि – गाथा 15
स्वाध्याय गाथा सं 13 to 17
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English Translation of Ishtopadesh Gatha 14
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