आचार्य पूज्यपादस्वामी द्वारा विरचित इष्टोपदेश पर मुनि श्री प्रणम्यसागरजी के प्रवचनों का संग्रह, अतिशयक्षेत्र बिजोलियाजी, 2016
पिछले दो श्लोकों में आपको बताया गया था कि भगवान ज्ञान स्वरूप हैं और उस ज्ञान स्वरूप परमात्मा की प्राप्ति स्वयं अपनी आत्मा में भी हो सकती है। एक उदाहरण दिया था कि जैसे स्वर्ण पाषाण से स्वर्ण की प्राप्ति होती है ऐसे ही आप अपनी आत्मा से परमात्म तत्त्व की उत्पत्ति कर सकते हैं। जब यह बात कही गयी तो एक प्रश्न शायद आचार्य पूज्यपाद महाराज के मन में स्वयं आया होगा कि हमने यहाँ लिखा है स्वभाव की प्राप्ति स्वयं होती है और फिर दूसरी बार हमने श्लोक में लिखा कि जब उपादान योग्य होता है, द्रव्य, क्षेत्र आदि सुयोग्य मिल जाते हैं तो अपने आप यह आत्मा परमात्मा बन जाती है। आचार्य महाराज के मस्तिक में तुरन्त विचार आया होगा कि लोग यह न सोच लें कि जब अपना उपादान योग्य हो जायेगा तो हमें अपने आप परमात्म तत्त्व की प्राप्ति हो जायेगी और जब हमें सुद्रव्य, सुक्षेत्र, सुकाल और सुभाव मिलेंगे तभी परमात्म तत्त्व की उत्पत्ति होगी तो जब होगा तब देखा जायेगा। जिस समय ऐसे द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव मिले, उपादान की योग्यता बने तब अपने आप हमें आत्मा से परमात्म तत्त्व की उत्पत्ति होगी। ऐसा कहने का अर्थ समझकर लोग सो ना जायें और उस निश्चितता में न ढल जाये कि जब हमारा उपादान योग्य होगा तो हमें अपने आप निमित्त की प्राप्ति हो जायेगी और जब अपने आप वह निमित्त मिल जायेंगे तो हम अपनी आत्मा को परमात्मा के रूप में ढाल लेंगे। जब तक आपको सुद्रव्य, सुक्षेत्र, सुकाल और सुभाव नहीं मिलते तब तक के लिए आपकी एक व्यवस्था यहाँ बनाई जा रही है। आचार्य महाराज के लिए यह चिन्ता हो गयी होगी कि आपके अंदर प्रमाद उत्पन्न न हो जाये या हमारी इस भाषा का आप कहीं दुरुपयोग नहीं कर लें क्योंकि आप तो वैसे ही मोही प्राणी है। आप अपनी बुद्धि से अर्थ का अनर्थ भी बहुत जल्दी लगा सकते हैं और बहुत जल्दी आप अपने हित की बात भी समझ सकते हैं। चाहे उस हित में आपका अहित ही क्यों न छिपा हो। यह सोचकर आचार्य महाराज ने यहाँ पर एक श्लोक लिखा है और वह तीसरे नम्बर का श्लोक है-
वरं व्रतै: पदं दैवं, नाव्रतैर्वत नारकम् छायातपस्थयो र्भेद: प्रतिपालयतोर्महान् ॥3॥
varaṁ vrataihiḥ padaṁ daivaṁ, nāvratairvata nārakam
chāyātapasthayor bhedaḥ pratipālayator mahān ॥3॥
आचार्य कहते हैं जब तक आपको अपने योग्य द्रव्य, क्षेत्र, काल और भाव की प्राप्ति न हो तब तक व्रतों के साथ जीवन जीना है क्योंकि व्रतों के साथ रहना श्रेष्ठ है। व्रतों के साथ रहने से आपको सुख सुविधाओं का वातावरण मिलता रहेगा और व्रतों के साथ रहने वाले जीव को देव पद की प्राप्ति होती है यह निश्चित है। जिस जीव ने व्रतों का पालन किया है वह जीव नियम से देवत्व को ही प्राप्त होता है, देवगति को ही प्राप्त होता है, इसलिए जब तक आपको चतुर्थकाल नहीं मिल जाये, जब तक आपको विदेह क्षेत्र न मिल जाये, जब तक आपको वज्रवृषभनाराचसंहनन आदि का द्रव्य न मिल जाये तब तक आप अपने लिए सुरक्षित मार्ग बना लें और उस सुरक्षित मार्ग के माध्यम से चलेंगे तो आपकी सुरक्षा बनी रहेगी। इस दुनियाँ में जो चौरासी लाख योनियाँ है उनमें भटकेंगे नहीं और एक सही रास्ते पर चलते हुए आपको हमेशा सही मार्ग का ज्ञान भी बना रहेगा। इसलिए आचार्यों ने कहा है कि व्रतों को अंगीकार कर लो क्योंकि व्रतों को अंगीकार करने से दो लाभ हैं। एक तो यह निश्चित हो जायेगा कि आप देव ही बनेंगे। पहला लाभ यह है कि जिसने व्रतों को धारण किया है वह मनुष्य, तिर्यंच, नारकी नहीं बनेगा वह देवगति में ही जन्म लेगा। दूसरी बात अगर आपने उन व्रतों को धारण किया है तो आपको यहाँ पर भी किसी प्रकार का दुःख नहीं होगा और परलोक में भी आपको किसी प्रकार का कोई दुःख नहीं होगा। यह बात अलग है कि आप सोचते होंगे कि महाराज व्रतों के धारण करने से तो कष्ट व दुःख ही भोगना पड़ेगा। अगर वह दुःख आपको लिए दुःख के रूप में दिखाई दे रहा है तो आचार्य कहते हैं कि आपको समीचीन मार्ग के ऊपर श्रद्धान नहीं हुआ है। क्योंकि सबसे पहले आपके अन्दर जब सम्यग्दर्शन की बात आयेगी तो सम्यग्दृष्टि जीव को जो श्रद्धान होता है उस श्रद्धान में उसके लिए जीव आदि सात तत्त्वों का श्रद्धान हो जाता है। उन जीवादि सात तत्त्वों के श्रद्धान से यह भी ज्ञात हो जाता है कि आस्रव व बन्ध तत्त्व संसार के कारण और संवर व निर्जरा तत्त्व मोक्ष के कारण हैं। जब आपको यह श्रद्धान हो गया कि संवर व निर्जरा तत्त्व मोक्ष के कारण हैं तो आपको यह भी श्रद्धान में आ जायेगा कि वह संवर होगा कैसे, कर्मों का आत्मा आगमन कैसे रुकेगा और उस संवर तत्त्व की प्राप्ति करने के लिए हमें क्या करना पड़ेगा? हम विषय कषायों राग में उलझे रहेंगे तो क्या हमें संवर की प्राप्ति होगी? इन विषय कषायों को और रागादि परिणति को छोड़ने से ही संवर की प्राप्ति होगी। इसलिए जब आपको संवर तत्त्व का श्रद्धान होगा तब आपको यह भी श्रद्धान में आ जायेगा कि “आतम के अहित विषय कषाय इनमें मेरी परिणति नहीं।” यह विषय कषाय आत्मा का अहित करने वाले हैं और इनसे आत्मा का अहित हो रहा है तो हित किससे होगा। जिससे अहित हो रहा है उसी का विपरीत कारण आपको अपनाना पड़ेगा। अहित हो रहा है उसको छोड़ दो सुहित आपके सामने स्वयं उपलब्ध हो जायेगा। पाँच इंद्रियों के विषय और इनके माध्यम से बढने वाली कषाय यह हमारे लिए अहित करने वाली हैं। जब यह अहित के रूप में आपको दिखाई दे जायेगी तो सुहित अपने आप आपको दिखाई दे जायेगा। विषय कषायों को छोड़ो, उसमें कमी करोगे तो अपने आप विरति के परिणाम उत्पन्न होंगे, इसी का नाम है व्रतों को धारण करना।
व्रतों से लाभ :
व्रतों का मतलब है अशुभ से विरति लेना और शुभ में प्रवृत्ति करना। जो हमारे लिए अहितकारी है और जिससे हमें पाप का बन्ध होता है उसको छोड़ना और जिससे हमारे लिए पुण्य मिले, हमारे हित में प्रवृत्ति हो उसको ग्रहण करना यह हमारे लिए व्रत के कारण हैं। अगर आपको जीवादि तत्त्व पर सही श्रद्धान हो गया तब आपको व्रतों को पालन करने में कभी भी कष्ट दिखाई नहीं देगा। सम्यग्दृष्टि जीव की एक भीतरी पहचान बता रहा हूँ आपको। सम्यग्दृष्टि जीव कभी भी यह नहीं सोचेगा कि व्रत लेने से मुझे कष्ट होगा इसलिए मैं व्रत ना धारण करूँ या कष्ट को नहीं सहन कर पाऊँगा इसीलिए मैं व्रत नहीं ले रहा हूँ। यह सम्यग्दृष्टि जीव कभी सोच ही नहीं सकता क्योंकि उसको मालूम है कि राग परिणति अहितकारक है जो हमें विषय कषायों में ले जा रही है। और इस राग परिणति को छोडे बिना हम कभी भी अपनी आत्मा का हित नहीं कर सकते हैं और जब भी कभी यह राग परिणति छोड़ने की बात आयेगी तो यहीं से शुरु होगी कि आपको पाप और विषय कषाय की परिणति छोड़ना और सु परिणति को अपनाना पड़ेगा। क्योंकि पाप यही विषय कषाय है और जो हिंसा आदि पाँच पापों में आपकी परिणति हो रही है यह परिणति ही आप के अन्दर विषय कषायों को जन्म देती है। इसके माध्यम से आत्मा के अन्दर पाप का बन्ध होता है और इसी के माध्यम से आत्मा में अनेक प्रकार की तिर्यंच आदि गति के फलों की प्राप्ति होती है।
जब भी कभी आत्मा को अपने हित की बात करनी पड़ती है तो सबसे पहले उसे काम करना पड़ता है कि वह पापों से विरति ले, पापों से विरति लेने का मतलब यह नहीं है कि आप पाप को पुण्य की तरह छोड़ने के लिए तैयार हो जाये। आचार्य कहते हैं कि पहले आपको पापों से विरति लेनी है और पापों से विरति लेकर के जब आप पुण्य में प्रवृत्ति करेंगे तो वह पुण्य भी धर्म का काम करेगा और उस धर्म से भी आपको स्वर्ग आदि की प्राप्ति होगी। जब मोक्ष प्राप्ति के योग्य वातावरण तैयार हो जायेगा तो आप उस पुण्य को भी छोड़कर अपने आत्म ज्ञान में लीन होकर केवलज्ञान की प्राप्ति कर लेंगे। इसलिए पाप और पुण्य इन दोनों पदार्थों के बीच के भेद को समझना भी बहुत आवश्यक है। जब जीवादि सात तत्त्वों में पाप और पुण्य जुड़ जाते हैं तो वह नौ पदार्थ बन जाते हैं। नौ पदार्थों का श्रद्धान भी उसी ढंग से करना जैसे आप छः द्रव्य और सात तत्त्वों का श्रद्धान करते हैं। यह पुण्य और पाप दो पदार्थ उसमें जुड़ गये तो इसका मतलब है कि दोनों चीजें अलग-अलग हैं। पुण्य अलग पदार्थ है और पाप अलग पदार्थ है। जब हम पुण्य और पाप को अलग-अलग रूप में देखेंगे तो हमें पाप से छूटने का और पुण्य में प्रवृत्ति करने का मन बनेगा। जब हम पुण्य और पाप को एक रूप में देखेंगे तो जैसा पाप है वैसा ही पुण्य है। आप चाहे पुण्य में प्रवृत्ति करो या चाहे पाप में प्रवृत्ति करो। आपको अगर पाप और पुण्य एक ही हो गया तो फिर आपकी प्रवृत्ति या तो एक ज्ञान स्वभाव में हो जायेगी या फिर पूरे के पूरे अज्ञान स्वभाव में हो जायेगी। आपको लिए पुण्य और पाप दोनों ही पदार्थों का सही-सही ज्ञान होना चाहिए। जब तक पाप और पुण्य इन दोनों पदार्थों को हम सही-सही नहीं जानेंगे तब तक न तो हम व्यवहार में अच्छे आदमी बन पायेंगे न हम परमार्थ में कुछ कर पायेंगे।
आपको सही राह पर चलने को कहा जाये तो सबसे पहले अपने बेटे और बेटियों को समझाना पड़ेगा कि बेटा बिना वजह किसी जीव की हिंसा मत करना, झूठ मत बोलना, झूठ बोलने से लोगों को दुःख उत्पन्न होता है और अपने अंदर भी दुःख की प्राप्ति होती है। किसी भी वस्तु की चोरी मत करना, किसी की रखी हुई वस्तु को भी मत उठाना और पराई वस्तु को अपनी मत मानना यह तुम्हारे लिए बड़ा सुखद परिणाम देने वाला है। कभी भी अपनी विवाहिता के अलावा किसी दूसरे से सम्बन्ध मत बनाना यह तुम्हारे लिए ब्रह्मचर्य का परिणाम है। अपने लिए उतनी ही आवश्यक चीजें रखना जितनी अपने उपयोग में आने वाली हैं। अनावश्यक परिग्रह हमारे लिए पाप का कारण है और उसमें अगर आप ज्यादा लोभ करेंगे तो आपको अनेक प्रकार की परेशानियाँ उठानी पड़ेगी। यही आप अपने बेटे को सिखायेंगे कि बेटा सबसे पहले तू पाप से दूर हो जा और अपने पाप में कमी ला, अपने अन्दर हिंसा, झूठ, चोरी, कुशील और परिग्रह का भाव आता है तो इन सब भावों पर कण्ट्रोल रखना। इनमें कमी लाना और जब तुम्हारे अंदर यह भाव कम आयेंगे तो आप अपने आप देखोगे कि आप का बेटा अपने आप अच्छा बन गया है। भले ही उसके अंदर हिंसा का भाव आता हो लेकिन अगर कभी उसने हिंसा नहीं की है तो आप कहोगे कि मेरा बेटा किसी पर कभी भी हाथ नहीं उठाता है, बहुत अच्छा है। मेरा बेटा बिना वजह बहुत सारी चीजों की माँग नहीं करता है और किसी भी प्रकार की उसकी परिग्रह में लालसा नहीं है जो दे दो वही ले लेता है। जो उसको खेलने लिए दे दो खेल लेता है और जो उसको पहनने के लिए दे दो पहन लेता है, वह बड़ी-बड़ी माँग नहीं रखता है। आप कहोगे कि मेरा जैसा बेटा किसी को मिला ही नहीं होगा। आपने अपने बेटे को अच्छा तब कहा जब उसके अंदर इन पाँच पापों की कमी आयी। यह पाँच प्रकार के जो पाप हैं इनसे जितना जितना अपने आप को बचाओगे उतने ही आप एक अच्छे मनुष्य बनते चले जाओगे। पहले एक अच्छे मनुष्य बन जाओ फिर भगवान बनने की बात करेंगे। आप बहुत जल्दी करने लग जाते हो, एक अच्छे मनुष्य बन नहीं पाते हो उससे पहले ही कहने लग जाते हो-
यस्य स्वयं स्वभावाप्तिरभावे कृत्स्न्कर्मणः । तस्मै संज्ञानरूपाय नमोस्तु परमात्मने।॥ इष्टोपदेश । ।।
आपको लगता है कि बस में भी कर्म से रहित बिल्कुल अपने स्वभाव को उपलब्ध हो गया हूँ और मैं भी भगवान बन गया हूँ और महाराज कल आपने कह दिया था God is myself & myself is god भगवान ही मुझमें हैं और भगवान में मैं हूँ। जैसे ही यह आपके मन में आ जाता है तो आपका दिमाग तो ऊँचा उठ जाता है लेकिन आप वहीं के वहीं रहते हो। जब आपके दिमाग और काम में दूरियाँ ज्यादा बन जायेंगी तो परेशानियाँ खुद-ब-खुद बढ़ने लग जायेंगी। आप खुद अपने दिमाग से परेशान होंगे कि हम सुनकर के तो आते हैं बड़ी अच्छी-अच्छी बातें, जिस समय पर हम यहाँ पर बैठकर के सुनते हैं तो लगता है कि वास्तव में हम ही भगवान बन गये। ऐसा लगता है कि महाराज ने अर्ह का ध्यान कराते-कराते खुद हमें भगवान की अनुभूति करा दी और जैसे ही हम यहाँ से उठकर के बाहर जाते हैं तो हमें लगता है कि हम फिर वही इंसान और शैतान की तरह दिख रहे हैं। जैसे सामने से एक आदमी आ रहा है उसको पहले की तरह ही देख रहे हैं, कार्य भी उसी तरह के चल रहे हैं।
पुण्य और पाप :
अपने अन्दर कोई परिवर्तन (change) अगर आयेगा तो बहुत जल्दी नहीं आता है और वह change आपके अन्दर आयेगा तो सबसे पहले आपको इसी प्रकार की पद्धति से चलना होगा जो आचार्य कहने वाले हैं कि देखो सबसे पहले आप अगर अपने अन्दर change ला सकते हो तो अपने पाप में थोड़ी सी कमी लाओ, पाप प्रवृत्तियों में कमी लाओ। अपने अन्दर के दया, हिंसा परिणाम को देखो कि हमारे अन्दर कब हिंसा और दया का परिणाम पैदा होता है। कितनी बार हम झूठ बोलने की, दूसरों की पड़ी हुई चीज को चुराने की भी इच्छा कर लेते हैं। यह बात अलग है कि इसलिए नहीं चुरा पाते कि लोग देख लेंगे या पकड़ लेंगे तो क्या होगा। जब आप किसी के घर में गये हो और अकेले हो और वहाँ पर सब कुछ रखा हो सामने मोबाईल व पैसे भी रखे हों तो आपकी नियत न बिगड़े। तब उस समय आप पहचान करना अपने मन की कि हमारे मन में चोरी का भाव आता है या मैं चोरी को पाप मानता हूँ या नहीं। ठीक उसी प्रकार आपके सामने कुशील के उपाय सामने हो और आपकी आँखें नीची हो जायें। आपके मन में विचार न आये तो आप जानना कि हमारे अन्दर इस पाप को पाप समझने की भावना है। जब आपके सामने परिग्रह, परिग्रह के रूप में पड़ा हो और आपको लगे कि नहीं यह नरक का कारण है, यह पाप का कारण है तब आप मन में विचार करना कि वास्तव में परिग्रह से मुझे अनासक्ति है। पाँचो पापों में कमी लाये बिना आप एक अच्छे इंसान नहीं बन सकते हैं। आप आज देखोगे कि जितने भी लोग परेशान मिलेंगे वो बड़े-बड़े तो होंगे लेकिन भीतर से भी बहुत परेशान होंगे। उन्होंने धन तो बहुत कमा लिया लेकिन उनके अंदर इतने बड़े-बड़े डर पड़े रहते हैं कि हमारे घर में कभी भी छापा पड़ सकता है, कभी भी हमारा भेद खुल सकता है, डाका पड़ सकता है, अनेक प्रकार के भय उनके अंदर पड़े रहते हैं और आपको बाहर से लगता है कि यह अमीर आदमी है। उसका दुःख भूल जाते हैं। जब भी आपके अन्दर पाप की प्रवृत्ति आयेगी आपको दुःख देगी और अगर आपके अन्दर पुण्य की प्रवृत्ति होगी तो आपको सुख मिलेगा। पुण्य से अगर आपने धन कमाया है तो वह आपको परेशान नहीं करेगा, पुण्य से जो आया है वह आपके अन्दर भय पैदा नहीं करेगा वह सुरक्षा देगा। चक्रवर्ती को कभी भय पैदा नहीं होता। पूरा का पूरा राज, रजवाड़ा सब खुला पड़ा रहता है लेकिन कभी भी उसकी नव निधियाँ चुराने वाला कोई नहीं है, चौदह रत्न चुराने वाला कोई नहीं है। उसके दास उसके लिए हैं, उसको कोई चुरा नहीं सकता है। उसे कभी ताला चाबी की जरूरत नहीं पड़ती है। पुण्य के उदय से जिसको जो मिलेगा उसे कोई ले भी नहीं जा सकता, उसको कोई चुरा भी नहीं सकता। इसलिए आपके घरों में ताले पड़े रहते हैं क्योंकि आपने पुण्य को जबरदस्ती खींचा है। तिजोरियाँ इसलिए गुप्त रूप में रखी रहती है कि आपने हर चीज को अपने पुण्य से नहीं कमाया अपितु पाप की प्रवृत्ति से उसको बढ़ाया है। अपने लिए सुरक्षा प्रदान की है कहीं कुछ ऐसा हो गया तो समय पर हमारे लिए कुछ काम में आयेगा। आपने तरह-तरह से धन भी कमाया है लेकिन वह सब चीजें जो आपने अन्याय से की हैं वह आपके अन्दर जरूर भय पैदा करेंगी, डर पैदा करेंगी।
इसलिए आचार्य कहते हैं पहले पाप और पुण्य इन दो पदार्थों को चुन लो। पाप हमेशा नरक व तिर्यञ्च गति का कारण है और पुण्य देव आदि सुगति का कारण है। यदि धर्म की श्रद्धा के साथ वह पुण्य बढ़ता चला जाये तो वह पुण्य मोक्ष का कारण भी बन जाता है। इसलिए आचार्य कहते हैं कि पुण्य और पाप दोनों पदार्थों को ठीक प्रकार से समझ लो। कहने में आता है कि पाप और पुण्य इन दोनों में अन्तर है भी और नहीं भी। आचार्य ने तो दोनों रूप में कथन किया है और इन दोनों की प्ररूपणायें अलग-अलग रूप में अलग-अलग हो जाती हैं। सिद्धान्त, आचरण एवं सामाजिक और धार्मिक दृष्टि से देखोगे तो आपको पाप और पुण्य में भेद मिलेगा और जब आप केवल अध्यात्म की दृष्टि से देखोगे तो कहा जायेगा कि पाप और पुण्य दोनों एक है इनमें कोई भेद नहीं है। जब दोनों एक हैं तो आचार्यों ने कहा हेतु, कारण की उपेक्षा से दोनों एक हैं। पाप अशुभ भावों के कारण से उत्पन्न होगा और पुण्य शुभ भावों से उत्पन्न होगा। जब शुभ भावों से हुआ तो पुण्य हो गया और अशुभ भावों से हुआ तो पाप हो गया। कारण दोनों के अलग-अलग हो गये और स्वभाव दोनों का अलग-अलग है। पुण्य का स्वभाव आपके लिए सुख सामग्री उपलब्ध कराना, आपको सुखरूप फल देना, सातावेदनीय, शुभ आयु, शुभनाम सब पुण्य फल है। पाप का स्वभाव आपको दुखी बनाना, आपको कष्ट पहुँचाना, नरक आदि के दुःखों की प्राप्ति कराना है। पाप और पुण्य दोनों के कारण व स्वभाव अलग हैं और दोनों के अनुभव भी अलग हैं। पाप का अनुभव होगा तो आपके अन्दर दुख के परिणाम, क्लेश उत्पन्न होंगे और जब पुण्य का अनुभव होगा तो आप अपने आप को बड़ा प्रसन्न अनुभव करोगे एवं अपने अंदर विशुद्धि महसूस करोगे। यह जो पुण्य और पाप दोनों के अनुभव में अंतर आता है इससे भी दोनों में भेद दिखाई देता है। आचार्य कहते हैं कि इन दोनों के आश्रय में भी भेद है। पुण्य कथंचित शुभ भाव होने के कारण मोक्षमार्ग में आश्रय होता है और पाप तो सर्वथा अशुभ का कारण होने से यह बन्ध मार्ग का ही आश्रय करता है। इसलिए इनमें चार कारणों से भेद पड़ जाते हैं। हेतु, स्वभाव, अनुभव व आश्रय की अपेक्षा से पुण्य और पाप में भेद है और जब यह भेद सामने आ जाता है तो एक दृष्टि ऐसी भी आ जाती है जिसमें अभेद आ जाता है क्योंकि कोई भी वस्तु है वह भेद और अभेद दोनों रूप में है। आप जिस वस्तु में भेद डाल रहे हैं उसी वस्तु को आप अभेद दृष्टि से भी देख सकते हो। एक उदाहरण दिया गया है समयसार आदि ग्रंथों में कि किसी शूद्र के यहाँ पर दो बच्चों का जन्म हुआ और उसने दोनों बच्चों को एक स्थान पर ले जाकर छोड़ दिया। एक बच्चे को तो मदिरा पीने वाला चांडाल उठा करके ले गया। एक बच्चे को ब्राह्मण ले आया और उसने अपने धर्म, संस्कारों से उसका पालन पोषण किया। एक बच्चा आगे चलकर मदिरा पान करना, माँस खाना, हिंसा करना और सब प्रकार के पाप करना सीख गया। एक बच्चा जिसको कि एक ब्राह्मण पालने के लिए ले गया था, उसके यहाँ पर पहुँचने के बाद में वह न कभी हिंसा करता, न माँस खाता, न मदिरा पान करता और न कभी झूठ बोलता। अब दोनों के संस्कार अलग-अलग हो गये जन्म तो दोनों का शूद्र के पेट से हुआ था। एक शूद्री के ही दोनों बच्चे थे लेकिन संस्कारों के कारण से दोनों अलग-अलग हो गये यद्यपि और दोनों की प्रवृत्तियाँ अलग हो गयीं। यह भेद दृष्टि है जिसको नहीं मालूम कि यह कहाँ उत्पन्न हुए है। तो कहा जायेगा कि यह ब्राह्मण का बेटा है और यह शूद्र का बेटा है। वह शूद्र का बेटा है तो दिखाई भी दे रहा है वह सब प्रकार के पाप कर रहा है, मदिरा पी रहा है आदि और एक ब्राह्मण का बेटा है जो मदिरा नहीं पी रहा है। यह अच्छा है और वह बुरा है। यह हमारे लिए योग्य है और वह अयोग्य। यह अपने आप जो भी देखेगा उसकी दृष्टि में आ जायेगा। आप थोड़ा इसे समझने का प्रयास करना कि वास्तव में देखा जाये तो वह एक शूद्री के ही बेटे हैं लेकिन एक का पालन ब्राह्मण के यहाँ हुआ और संस्कारित हो गया तो वह ब्राह्मण कहलाने लगा। वह मदिरा पान व माँस खाने से दूर हो गया और एक का किसी चांडाल ने पालन पोषण किया था तो वह उससे भी गया बीता हो गया। हम क्या कहेंगे कि इन दोनों में अन्तर है कि नहीं? जब आप व्यवहार की दृष्टि से देखोगे तो आपको इन दोनों में अन्तर कहना ही पड़ेगा।
इन दोनों में अगर कोई अन्तर नहीं रहेगा तो अच्छाई व बुराई के बीच में कोई अन्तर नहीं रह जायेगा। अगर इन दोनों में कोई अन्तर नहीं रहेगा तो सदाचरण व दुराचरण में कोई अन्तर नहीं रह जायेगा। यह दोनों का अन्तर है और यह दोनों का अन्तर ही आपकी दृष्टि में आयेगा और जो कोई भी व्यक्ति उसको देखेगा तो जो ब्राह्मण के यहाँ संस्कारित हुआ है उसको अच्छा कहेगा और जो शूद्र के यहाँ संस्कारित हुआ है उसको बुरा कहेगा। अब कोई ऐसा व्यक्ति हो जो यह भी जानता हो कि दोनों ही शूद्र के पुत्र हैं। क्या फर्क पड़ेगा कि वह ब्राह्मण के यहाँ संस्कारित हुआ है कि वह मदिरा पान नहीं कर रहा है, कि वह माँस नहीं खा रहा है और हिंसा नहीं कर रहा है। दूसरा मदिरा पान कर रहा है उससे क्या फर्क पड़ना है? है तो दोनों शूद्री के पुत्र। यह आप की दृष्टि कब बनेगी जब आप पाप और पुण्य, अच्छाई और बुराई इन दोनों से ऊपर उठे हुए होंगे तब यह आपकी दृष्टि देखने में आयेगी उसको अभेद दृष्टि कहेंगे।
अपने अन्दर दोनों प्रकार के attitude (दृष्टिकोण) रखने पड़ते हैं। जब आँख खोलकर के व्यवहार में प्रवृत्ति करो तो आपको भेद दृष्टि काम में लेनी पड़ेगी। जैसे अगर यहाँ पर कोई शराबी आकर बैठ जाये, अगर यहाँ पर कोई चांडाल आकर के बैठ जाये तो आप उसे यहाँ पर बैठने नहीं देंगे। आप उससे कहोगे कि यह धर्म सभा है यहाँ शुद्धि से आया जाता है, सभ्यता के साथ बैठते हैं। तुम यहाँ पर बोतल लेकर बैठ जाओगे तो क्या होगा? पाप और पुण्य तो दोनों बराबर हैं- क्या फर्क पड़ता है? बोतल में भी पानी है और तुम भी जो बोतल लाये हो उसमें भी पानी है। एक बोतल आप रखे हो जिसमें minneral water है और एक बोतल वो रखे है जिसमें काला पानी है जिसे शराब कहते हैं। दोनों में पानी है। पानी की दृष्टि से व अभेद दृष्टि से दोनों पानी है क्योंकि जब भी आचार्य के द्वारा लिखित ग्रंथ पढ़ोगे तो इन दृष्टियों में भेद करना नहीं आयेगा तो आप उनकी विवक्षा को कभी समझ नहीं पाओगे। लोग समयसार पढ़कर भी इसलिए भटक जाते हैं क्योंकि उन्हें दृष्टियाँ समझ नहीं आती हैं। किस दृष्टि से क्या लिखा है? पानी की दृष्टि से दोनों पानी है चाहे वह मिनरल वॉटर हो चाहे वह शराब का पानी हो। पानी की दृष्टि से दोनों पानी है क्योंकि दोनों में पानी का स्वभाव है। दोनों को लुढ़का दोगे तो ढलान की तरफ ही लुढ़केंगे, दोनों तरल हैं। अगर कोई बच्चा नहीं जानता होगा तो दोनों में से किसी को भी पी जायेगा, उसको कोई फर्क नहीं पड़ेगा। जो जानने वाला होगा वह देखेगा कि यह पानी काला क्यों है? इसमें दूर से गंध क्यों आ रही है? हमें इसको पीना है कि नहीं पीना है। यह विवेक उसी के अन्दर आयेगा जो वास्तव में संस्कारों को धारण किए हुए होंगे जिसके बीच में भेद दृष्टि होगी तो वह दोनों में (अन्तर) difference करेगा और अगर भेद दृष्टि नहीं है तो कुछ भी पी लो। पानी के स्वभाव की अपेक्षा से दोनों एक है लेकिन दोनों में बड़ा अन्तर है। एक को पीओगे तो यहीं अभी पागल की तरह डोलने लग जाओगे, यहाँ गिर पड़ोगे और एक को पीओगे तो स्फूर्ति आयेगी, अच्छे ढंग से बैठोगे, सुनोगे। दोनों में अन्तर है। ठीक उसी प्रकार आचार्य समयसार आदि ग्रन्थों में पाप और पुण्य की व्याख्या करते हैं तो उनकी दृष्टि में अभेद आयेगा। वे पाप और पुण्य में भेद नहीं करेंगे क्योंकि भेद करने वाले ग्रंथ दूसरे हैं व दृष्टि दूसरी है।
जब आप सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ोगे, तत्त्वार्थ सूत्र, सर्वार्थसिद्धि, धवला आदि ग्रंथ पढ़ोगे तो इनमें पाप और पुण्य में भेद मिलेगा। इनमें कहा जायेगा कि यह पाप प्रकृत्तियाँ हैं, यह पुण्य प्रकृतियाँ हैं।
यह पाप के फल हैं, यह पुण्य के फल हैं। यह पाप के भाव हैं और यह पुण्य के भाव हैं और जब आप समयसार पढ़ने बैठोगे, पुण्य और पाप अधिकार खोलकर बैठोगे तो आचार्य उसमें कहेंगे-
सोवण्णियं पि णिलयं बंधदि कालायसं पि जह पुरिसं ।
बंधदि एवं जीवं सुहमसुहं वा कदं कम्म ।।
चाहे स्वर्ण की बेडी हो चाहे वह लोहे की बेड़ी हो, दोनों बाँधने का काम करती है। इसलिए चाहे पाप कर्म हो चाहे पुण्य कर्म हो यह दोनों ही आत्मा को बाँधने का काम करते हैं और यह दोनों ही कर्म बन्ध के कारण हैं। पुगल की ही परिणति है। पाप कर्म व पुण्य कर्म दोनों ही पुगल की परिणति है इसलिए इन दोनों में भेद मत करो और इन दोनों से ऊपर उठकर के अभेद स्वरूप जो अपना ज्ञान आत्मा है उसमें लीन हो जाओ यह अभेद दृष्टि हो गयी। यह दृष्टि गलत नहीं है। गलत हमारी दृष्टि हो जाती है। जब हमारी दृष्टि में पाप और पुण्य का सही-सही विभाजन नहीं होगा तो हम व्यवहार में भी उस अभेद दृष्टि को लगा देंगे और जहाँ व्यवहार में अभेद दृष्टि लग गई, वहाँ गड़बड़ हो गयी। किस दृष्टि से क्या सोचना, किस दृष्टि को कहाँ लगाना और किस कथन को किस रूप में अपने अन्दर समाहित करना है यह ज्ञान जब तक नहीं होता है तब तक हमारे लिए वह समयसार भी अभिशाप सिद्ध हो सकता है और हो रहा है और हो जाता है। जब आप व्यवहार में चल रहे हैं इसका मतलब ही यही है कि आप दूसरों को देख रहे हैं, दूसरों को आप दिखा रहे हो। दूसरों के सामने आपकी जो प्रवृत्तियाँ होगी और दूसरों की प्रवृत्तियाँ को आप देखोगे तो व्यवहार की दृष्टि से ही देखना होगा। व्यवहार का मतलब है आँख खोलकर के देखना और निश्चय का मतलब है आँख बंद करके अपने को देखना। जैसे ही आपने आँख खोली आपकी दृष्टि में दो चीजें ही आनी चाहिए वह पाप और पुण्य है। आँख खुली यानि दृष्टि टूट गई अभेद दृष्टि छूटेगी, आपको भेद दृष्टि से ही सब देखने में आयेगा। यह पाप कर रहा है। यह पुण्य कर रहा है। यह मंदिर जा रहा है, यह मंदिर नहीं जा रहा है, यह होटल में भोजन करता है और वह घर पर भोजन करता है। यह सब कुछ खा रहा है जैसे आलू, बैंगन, प्याज सब खा रहा है और यह केवल शुद्ध चीजें खाता है जैसे लौकी, तोरी आदि यह अन्तर आयेगा, आपकी दृष्टि में आयेगा, यह अन्तर तब आयेगा। जब आपको पाप-पुण्य दोनों के बीच का भेद मालूम होगा और व्यवहार में ही यह दोनों दृष्टियाँ आपको प्रयोग करनी पड़ेंगी और जैसे ही आप आँख बंद करके बैठेंगे अभेद दृष्टि डालो। पाप और पुण्य यह दोनों ही कर्म है और कर्म आत्मा को बाँधने वाले हैं। जब तक कर्म आत्मा से चिपका रहेगा तब तक हमें अपने स्वभाव की प्राप्ति नहीं होगी इसलिए अभेद दृष्टि से तो मैं कहता हूँ कि ‘यस्य स्वयं स्वाभावाप्ति’।
इसको सभी कर्मों के नाश से अपने स्वभाव की प्राप्ति हुई है और हमको भी अपने सभी कर्मों के नाश से स्वभाव की प्राप्ति होगी इसलिए हे भगवान! मैं पाप और पुण्य इन दोनों के भाव छोड़कर अपने ज्ञान स्वरूप आत्मा की भावना कर रहा हूँ, यह अभेद दृष्टि हो गयी। यह अभेद दृष्टि अपने लिए अपने अन्दर डालने की थी लेकिन इस दृष्टि को डाल रहे हैं दूसरों के ऊपर तो सब उल्टा पुल्टा हो जायेगा। अभेद दृष्टि को अगर आपने व्यवहार में लागू कर दिया और व्यवहार में आप उसको समझाने लगें कि बेटा पाप और पुण्य सब बराबर हैं। चाहे मिनरल वॉटर हो, चाहे ब्लैक वॉटर हो सब बराबर हैं। तब दुराचरण और सदाचरण के बीच का अन्तर ही मिट जायेगा, क्या संसार की प्रक्रिया है, क्या मोक्ष की प्रक्रिया है इसके बीच का अन्तर ही मिट जायेगा और अच्छे-बुरे के बीच का अन्तर ही मिट जायेगा। इन चीजों को समझना इसलिए जरूरी है। जब तक आप इन दोनों दृष्टियों को नहीं समझेंगे तब तक आप पाप और पुण्य पदार्थ को भी समझ नहीं पाओगे। नौ पदार्थों में, पाप और पुण्य को इसलिए अलग-अलग रखा गया है क्योंकि पाप अलग है और पुण्य अलग और उनके स्वभाव अलग हैं। आचार्य अमृतचन्द्र जी महाराज जब समयसार की टीका करते हैं तो लिखते हैं-
हेतु स्वभाव :
कि हेतु, स्वभाव और अनुभव व आश्रय की दृष्टि से इनमें कथंचित भेद है और कथंचित अभेद भी है यह स्याद्वाद दृष्टि है। भेद होगा तो आपको इन दोनों बातों में अलग-अलग स्वभाव दिखाई देगा। पाप का कार्य अलग और पुण्य का कार्य अलग। पाप के कारण मोह भाव अलग और पुण्य के कारण मोह भाव अलग। पाप का अनुभव होगा तो अलग और पुण्य का अनुभव होगा तो अलग। जब हम अभेद दृष्टि से देखते से हैं तो-
‘पाप पुण्य फलमांही हरख बिलखो मत भाई।’
अब अपने अंदर अभेद दृष्टि लाना। न पाप के फल में दुखी होना और न पुण्य के फल में हर्षित होना, यह अभेद दृष्टि अपने अंदर लाना।
हमारा स्वभाव तो ज्ञान स्वभाव है यह पाप पुण्य तो मेरे स्वभाव नहीं हैं, यह अभेद दृष्टि होगी। दोनों प्रकार की दृष्टि आपके अन्दर रहेंगी तो आपको दोनों चीजें सही-सही समझ में आयेगी और अगर आप इनमें असावधान हो गये तो आपको कभी समझ आयेगा ही नहीं कि स्याद्वाद क्या कहलाता है और भगवान अरहंत देव के द्वारा कही गयी जिनवाणी को जो आचार्यों ने गूंथा है, लिखा है वह किस दृष्टि से लिखा है आपको यह समझ में ही नहीं आयेगा। कई बार लोगों की ऐसी स्थिति हो जाती है जब वह शास्त्र पढते हैं तो मान लो वह अभेद दृष्टि वाले हैं, निश्चय दृष्टि वाले हैं जिन्होंने केवल समयसार पढ़ा है तो उन्हें तत्त्वार्थ सूत्र पढ़ने में बड़ी कठिनाई होती है। तत्त्वार्थ सूत्र की टीका, सर्वार्थसिद्धि, राजवार्तिक या कोई भी सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ेंगे जहाँ पर पाप और पुण्य दोनों के फल अलग-अलग हैं इनके भेद अलग-अलग दिखाई देंगे तो उन्हें सब मिथ्या दिखता है कि यह सब गलत है। उन्हें केवल एक अभेद दृष्टि ही अच्छी लगती है और जो इन चीजों को पढ़ने वाले हैं तत्त्वार्थ सूत्र, राजवार्तिक, सर्वार्थसिद्धि पढ़ेंगे, पाप और पुण्य के भेद वाले ग्रंथ पढ़ेंगे और जब वह समयसार पढ़ने बैठ जाते हैं तो उन्हें समझ में नहीं आता कि वह अभेद कैसे हो गया? जब तक आप भेद और अभेद दोनों दृष्टियों को नहीं समझेंगे तब तक आप स्याद्वाद के माध्यम से सात तत्त्व व नौ पदार्थ की व्याख्या को समझ ही नहीं सकते। इसको बोलते हैं चित्त भी अपना और पट्ट भी अपना रुपया अपनी जेब में। जो वह रुपया है दोनों ओर से अपना है। चित्त देखो तो उसमें कोई चित्र दिखाई देगा और पट्ट देखो तो उसमें भी कोई आकृति बनाई हुई दिखाई देगी और रुपया दोनों का नाम है। अगर वह ऊपर से घिस गया है उसमें दिखाई नहीं दे रहा है कि यह एक का है या पाँच का है या पाँच सौ का है तो भी वह रुपया नहीं रहा और पीछे अगर उसमें अशोक का चिह्न बना रहता है वह नहीं रहा है, भारतीय रिजर्व बैंक नहीं लिखा हुआ है वह घिस गया तो वह कुछ काम का नहीं रहा। दोनों तरफ से अगर वह किसी भी रूप में घिस गया तो वह किसी काम का नहीं रहा, आप के लिए दोनों चीजें स्पष्ट होना चाहिए। चित्त में क्या लिखा है और पट्ट में क्या लिखा है। पाप में क्या होता है और पुण्य में क्या होता है? फिर कभी आप उन दोनों की दृष्टि को हटा सकते हो। जब आपको व्यवहार में काम लेना है तब आप देखोगे पाँच सौ का नोट है, यह दस का नोट है और यह पचास का नोट है। यह व्यवहार में जब आप खरीदारी करने जाओगे, किसी से व्यवहार करोगे, किसी से कोई चीज उसके बदले में ले आओगे तो आपको दोनों तरफ देखना पडेगा और वह भी दोनों तरफ देखेगा कि कहीं खोटा सिक्का तो नहीं आ गया है। जब आपकी दृष्टि इन दोनों से हट जाये कि यह क्या रुपया है यह तो लोहा है और लोहा समझकर के उसमें आप कोई प्रयोजन ही नहीं रखो, छोड दो जैसे लोहे का कोई वायसर पड़ा हुआ है, लोहे का कोई टुकड़ा पड़ा हुआ है वैसे ही वह लोहे का सिक्का पड़ा हुआ है और आप उसको छोड़कर के बैठे हो। कोई भी घर आया जैसे पड़ोसी या घर के बाहर का बच्चा खेलते हुए आया और उसने वह सिक्का उठा लिया है अब आपके दिमाग में अगर अभेद दृष्टि होगी। तो वह लोहा है आपको उससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा। वह लोहा ले जा रहा है ठीक है हमारे घर पर बहुत रखा है, कम हो जायेगा। यह कहलाती है अभेद दृष्टि ।
जब आपके अन्दर अभेद दृष्टि आ जायेगी तब आपको पुण्य फल की भी इच्छा नहीं रहेगी और पाप से भी डर नहीं लगेगा। पाप का फल भी मिल रहा होगा तो आप उसमें घबरायेंगे नहीं।
Bussines (व्यापार) नहीं चल रहा, लड़की की शादी नहीं हो रही, हमारा घर वैसा का वैसा ही पड़ा हुआ है जैसा हमारे पुरखे दे गये हैं। अभी तक हम नया नहीं बना पाये यह सब आपकी फल में दृष्टि जा रही है। जिसके लिए पुण्य का फल नहीं मिल रहा है या बहुत मिल रहा है तो उसकी पुण्य फल में दृष्टि जाती है तो वह हमेशा उस पुण्य की ओर देखता रहता है। जब तक आप पाप और पुण्य को देखते रहोगे तब तक आपके अंदर अभेद दृष्टि आने वाली नहीं। ज्ञान तो आ जायेगा लेकिन वास्तव में वह दृष्टि नहीं आयेगी जिस दृष्टि से आपके अंदर की परिणति बदलेगी। इसलिए ध्यान रखना जब भी कभी आप सिद्धान्त ग्रंथ पढ़ें तो आप समझना पाप और पुण्य दोनों अलग- अलग हैं और जब आप समयसार खोलकर के बैठें तो समझ लेना कि उसमें यही लिखा मिलेगा पाप और पुण्य दोनों एक है। यह दृष्टि जब आपके अंदर आ जायेगी तो किसी भी अनुयोग का शास्त्र पढ़ोगे तो आप भ्रमित नहीं होओगे। आदमी इसलिए ही भ्रमित हो जाता है, एक दृष्टि बना लेता है, एक तरफा बस, एक तरफा सिक्का देखोगे और दूसरी तरफ का सिक्का खराब हो गया। यह सब समझ लो कि पूरा ही सिक्का खराब हो गया है। आप एक को तो घिसे जा रहे हो और एक को सुरक्षित किए हो, मानो आप पूरे सिक्के को खराब कर रहे हो। बिल्कुल यही स्थिति है आचार्य कहते हैं कि अगर आप पाप और पुण्य दोनों को सही ढंग से नहीं समझो, केवल एक अभेद दृष्टि से ही समझते चले जाओगे तो भी आपको लाभ होने वाला नहीं है। अभेद दृष्टि में हमेशा रमते रहोगे तो आप कभी पाप को छोड़ने का भाव ही नहीं करोगे तो आपको यह श्लोक उल्टे लगेंगे।
वरं व्रतैः पदं दैवं नाव्रतैर्वत नारकम् ।
व्रतों के साथ में देव पद को प्राप्त कर लेना अच्छा है लेकिन अव्रतों के साथ नरक में जाना अच्छा नहीं है। स्वर्ग और नरक की बात कर रहे हैं यह तो सब चार गतियों में आने वाली चीजें है, नरक में जाना क्या बुरा है और स्वर्ग में जाना क्या अच्छा हो गया? व्रतों से अगर स्वर्ग मिलता है तो ऐसे स्वर्ग तो हमने कई बार भोग लिए हैं उससे क्या मिलेगा? आपको शास्त्र उल्टे लगेंगे आप इनकी इसी तरह व्याख्या करोगे जैसे मैं बोल रहा हूँ क्योंकि यह भी एक व्याख्या है। अगर यह व्याख्या आप के मन में आ गई तो आपको इष्टोपदेश ग्रंथ कभी अच्छा नहीं लगेगा आप कहोगे कि कैसे आचार्य हैं जो स्वर्ग को अच्छा बता रहे हैं नरक को बुरा बता रहे हैं जबकि चारों गतियाँ है और चारों गतियों में खूब रह चुके हैं क्या अच्छा और क्या बुरा। इसलिए व्रतों का पालन करने से क्या मतलब। जब आप को स्वर्ग अच्छा नहीं लगेगा तो ऐसे व्रतों का पालन क्यों करना। और अगर ऐसे व्रतों के पालन भी हो जाते हैं, स्वर्ग में भी पहुँच जाते हैं तो वहाँ पर जाकर फिर वही असंयम ही रहा है। उस तथ्य की बात करते तो समझते कि हाँ यह इष्टोपदेश है जिनको अपने स्वभाव की उत्पत्ति हो जाती है। जो अपने योग्य उपादान से इस तरह के निमित्तों के माध्यम से अपने अंदर केवलज्ञान की पूर्णता प्राप्त कर लेते हैं। यह तो सब अच्छा चल रहा था एक दम से सब कुछ क्यों बदल गया। यह कुछ बदल नहीं गया है तुम्हें बस अपना दिमाग बदलना पड़ेगा। जिनवाणी के हिसाब से अपने दिमाग को बदलना है न कि अपने दिमाग के हिसाब से जिनवाणी को चलाना है। जिनवाणी में जो लिखा है उसे समझने का प्रयास करो यह किस ढंग से और किसके लिए कहा जा रहा है। आचार्य कहते हैं कि अभी वर्तमान में तुम्हें केवलज्ञान होने वाला नहीं है। तुम्हारे पास वज्रवृषभनाराचसंहनन नहीं है, तुम्हें अरिहंतों के अभी साक्षात दर्शन नहीं हैं, तुम्हें क्षायिक सम्यग्दर्शन नहीं हो सकता तब तक तुम अपने लिए एक रिजर्वेशन कर लो। एक बहुत अच्छा उदाहरण दिया गया है नीचे-
छायातपस्थयोर्भेदः प्रतिपालयतोर्महान् ।
कहीं पर दो तीन मित्र थे और वह एक गाँव में गये अपने अपने अलग-अलग घरों में गये। दो मित्र वापस लौटकर अपनी-अपनी जगहों पर खड़े हो गये और एक मित्र का इंतजार कर रहे हैं कि वह भी आ जाये तो हम तीनों मिलकर साथ में आगे बढ़ें। वे इंतजार कर रहे हैं, एक तो धूप में खड़ा है और एक खड़ा है छाँव में। जो आने वाला मित्र है उसका इंतजार करना है एक धूप में खड़ा होकर के इंतजार कर रहा है और एक छाँव में खड़ा होकर के इंतजार कर रहा है। खड़े तो दोनों ही है कोई फर्क नहीं है उन दोनों के इंतजार करने में। कोई फर्क नहीं है कि अगर वहाँ पर वृक्ष है या रेस्ट हाऊस बना हुआ है तो अगर समझदार आदमी होगा तो उसमें बैठेगा या वृक्ष के नीचे बैठेगा इंतजार ही तो करना है। आयेगा तो इसी रास्ते से आयेगा। आप किसी बस का इंतजार कर रहे हो तो आप धूप में भी खड़े रहकर इंतजार कर सकते हो और यदि रेस्ट हाउस बना है तो कुर्सी पर बैठकर भी इंतजार कर सकते हो। अगर आपके अंदर विवेक या ज्ञान होगा तो आप उसका उपयोग करेंगे और अगर आप के अन्दर ज्ञान नहीं है तो क्या फर्क पड़ता है चाहे धूप में खड़े-खड़े तपते रहो और खड़े होने का दुःख उठाते रहो चाहे बैठ जाओ क्या फर्क पड़ता है? दोनों में हमें करना तो इंतजार ही है। आचार्यों की दृष्टि कितनी करुणापूर्ण दृष्टि होती है आपको पहले तो यह बताया कि जब तक आपको सही द्रव्य, क्षेत्र, काल, और भाव की सामग्री नहीं मिलेगी तब तक आपके लिए कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति नहीं होगी और अगर आपको वह पूर्ण सामग्री मिलने में विलम्ब हो रहा है तो छाया में बैठो] अच्छी A.C. में बैठो। एक घंटे के बाद गाड़ी आनी है, यह निश्चित है कि गाडी एक घंटे के बाद आयेगी तो एक घंटे परेशान होने की क्या जरूरत है, आराम से बैठो यह आचार्यों की करुणा पूर्ण दृष्टि है। आपके लिए जब चतुर्थकाल आयेगा तब आयेगा। तब तक क्या करोगे? दो जगह हैं और दोनों में बराबर-बराबर टाइम लिमिट रहती है एक नरक की जगह है और एक स्वर्ग की जगह। आप कभी इनकी आयु का वर्णन देखोगे तो नरक में भी जघन्य आयु दस हजार वर्ष होती है, कम से कम 10000 वर्ष और उत्कृष्ट आयु 33 सागर की होती है। ऐसे ही स्वर्गों में भी जघन्य आयु होती है 10000 वर्ष की और उकृष्ट आयु 33 सागर की। आप मनुष्य गति में तो बहुत दिनों तक रह नहीं पाओगे। आपको कुछ न कुछ तो करना ही पड़ेगा अगर आप पुण्य नहीं करोगे तो यह मानकर चलो कि आप पाप कर रहे हो। कोई तीसरी स्थिति में तो आप पहुँचने वाले हो नहीं। पाप कर रहे हो तो उसका फल क्या मिलेगा तिर्यञ्च गति, नरकगति। अगर पाप और पुण्य दोनों का वेलेन्स बना रहा तो हो सकता है आपको पुनः मनुष्य गति मिल जाये। और अगर पुण्य का बेलेन्स बढ़ गया तो आपको देव गति ही मिलेगी। अब देव गति में भी जाकर उस समय को निकाल सकते हैं और नरक गति में जाकर भी उस समय को निकाल सकते हो और वह समय कुछ हजार वर्षों के बाद आने वाला है। मानलो कल आप से कहा था कि राजा श्रेणिक का जीव है। जब तक इस अवसर्पिणी काल का पूरा का पूरा यह पंचम काल पूरा न हो जाये, यह पाँचवाँ काल 21000 वर्ष का है फिर छठवाँ काल आयेगा वह भी 21000 वर्ष का है। इतना काल उसको व्यतीत करना है। 42000 वर्ष तक उसके बाद फिर 6 वाँ काल 21000 वर्ष का फिर पाँचवाँ काल आयेगा 21000 वर्ष का उसके बाद चौथा काल आयेगा। इस भरत क्षेत्र में उस उत्सर्पिणी काल के माध्यम से धर्म तीर्थ की प्रवृत्ति पुनः शुरू होगी तब कोई पहला तीर्थंकर उत्पन्न होगा। इन चौबीस तीर्थंकरों के बाद अब कोई अगला तीर्थंकर उत्पन्न होगा तो उसके लिए 84000 वर्ष का समय शेष है। अब दो स्थितियाँ हैं अगर आपको पुनः इसी भरत क्षेत्र में जन्म लेकर यहाँ से ही मोक्षमार्ग लेना है तो आपको 84000 वर्ष तक कुछ नहीं होने वाला है यहाँ पर। विदेह क्षेत्र में तो हमेशा चलता है मोक्षमार्ग। लेकिन यहाँ पर 84000 वर्ष तक कुछ नहीं मिलने वाला अब यह 84000 वर्ष आप कहाँ गुजारना चाहते हो। आप अपनी ही गति से शूकर भी बन सकते हो लेकिन वहाँ पर 84000 वर्ष नहीं गुजरेंगे वहाँ सब 50, 100 वर्ष में सब निपट जाता है। नरक में ही जाकर इतनी लम्बी-लम्बी आयु गुजरती है या स्वर्ग में जाकर। अब आपको नरक व स्वर्ग में कोई फर्क नहीं दिखाई दे रहा है वह आप जानो लेकिन आचार्य तो आपकी व्यवस्था बना रहे हैं। देखो अगर तुम पाप से बच जाओगे, व्रत ले लोगे तो तुम्हें स्वर्ग में हर जगह से सुखद वातावरण मिलेगा और हर पल तुम्हारा वहाँ पर ऐसे आनन्द के साथ बीतेगा, तुम्हें पता ही नहीं पड़ेगा कि 84000 वर्ष कब बीत गये हैं। उस राजा श्रेणिक की तरह जो अभी नरक में गया है उसको वहाँ पर 84000 वर्ष बिताने पड़ेंगे और वहाँ पर हमेशा हिंसा, मार-काट, झूठ अनेक प्रकार के दुखद वातावरण के साथ ही उसका समय गुजरेगा और गुजर रहा है। आपको बीच का समय गुजारना है उसके लिए आचार्य एक अच्छी व्यवस्था दे रहे हैं क्योंकि जो व्रती हो जाता है वह नियम से देव गति को ही प्राप्त होता है। उस देव गति के बाद में जो मनुष्य गति आपको मिलेगी तो उस गति में आपको पूर्ण सामग्री मिल जायेगी। तब तक आपके लिए सब प्रकार के साधन भी मिलते रहेंगे और देव गति में भी अरिहंत भगवान का समवसरण में दर्शन होगा। नरक गति में कुछ नहीं होगा। यहाँ आपको सम्यग्दर्शन होगा तो आपके काम आयेगा और नहीं होगा तो उस सम्यग्दर्शन की प्राप्ति भी वहाँ जाकर कर लोगे। सुखपूर्वक आप का जीवन बीतेगा इसलिए व्रतों से कभी भी हानि नहीं है। चाहे सम्यग्दृष्टि हो या न हो। यह बात ठीक हैं कि सम्यग्दर्शन होने पर ही व्रत लिए जायेंगे तो ही वह व्रत कहलायेंगे लेकिन अगर सम्यग्दर्शन नहीं भी है तो भी उसका कारण बन गया।
कल आपको बताया गया था कि एक मुनि महाराज से एक भील ने व्रत ले लिया। जब व्रत ले लिया तो सम्यग्दर्शन नहीं हो गया लेकिन अगले ही जन्म में देव बनने के बाद जब वह मनुष्य बना तब सम्यग्दर्शन के लिए सब योग्यता उसके सामने आ गयी। ऐसा ही होता है, इसलिए व्रत लेने से कभी भी हानि नहीं होती है। जो व्रत किसी के साथ में हो, सम्यग्दर्शन के साथ हो तो अति उत्तम और नहीं भी हो तो आपको सम्यग्दर्शन कराने में सहायक बन जायेंगे। व्रत में अगर आपकी श्रद्धा है कि इस प्रकार के व्रतों से ही संवर निर्जरा होगी तो वह व्रत सम्यग्दर्शन में आपके लिए सहायक बन जायेंगे। इसलिए आचार्य कहते हैं व्रत हमेशा सार्थक होते हैं। पाप से दूर हटने का संस्कार अर्जित करना अपने आप में बहुत कठिन है और इसी संस्कार से आपके अंदर सम्यग्दर्शन का प्रादुर्भाव होगा। यही यहाँ पर लिखा है कि व्रतों के साथ में स्वर्ग चले जाओ और वहाँ जाकर
के भी धर्म करते रहो। जो धर्म यहाँ कर रहे हो वहाँ भी करने को मिलेगा। यहाँ पर भी क्या ज्यादा कर रहे हो। कोई संयम तो तुम्हारे पास है नहीं। बस भगवान के दर्शन करते हो, पूजन करते हो वह वहाँ पर भी करते रहना और नरक में गये तो वहाँ पर वह भी करने को नहीं मिलेगा। बस मारकाट में ही जीवन जायेगा और दुख के साथ ही भोगना पड़ेगा। हम कितने ही सम्यग्दृष्टि हो जायें लेकिन हमें उसी पर्याय का अनुभव होगा जो पर्याय हमारे शरीर के साथ में है अगर शरीर में कष्ट है तो कष्ट ही अनुभव में आयेगा। सम्यग्दर्शन का कोई सुख आपकी अनुभूति में नहीं आयेगा। इसलिए आचार्य कहते हैं जब तक वह समय नहीं आता तब तक के लिए आप अपनी अच्छी व्यवस्था कर लो। व्रतों के साथ जीवन जी करके इस पर्याय का अंत करोगे तो नियम से आपका मोक्षमार्ग बना रहेगा यह आचार्य कह रहे हैं। इनकी वाणी को समझो और अभेद दृष्टि से तो समयसार में कहा है वह इसलिए कहा है कि वहाँ कर्मों का बंध जो हमारे अन्दर हो रहा है चाहे वह पुण्य हो चाहे पाप हो, कर्म तो हमारा स्वभाव है ही नहीं, हम तो पुण्य और पाप इन दोनों कर्मों से रहित हैं। इसलिए अपने अंदर अभेद दृष्टि भी रखो जिसके माध्यम से आप अपने ज्ञान स्वभाव को पहचान पाओगे। यह पुण्य हमारा स्वभाव नहीं है क्योंकि पुण्य में आदमी रमण करने लग जाता है और पुण्य स्वभाव से भी अपने आप को हटाना है। हमारा स्वभाव तो ज्ञान स्वभाव है। यह अभेद दृष्टि से चिंतन में लाना और जब आँख खुले तो भेद दृष्टि से देखना कि पाप ना हो जाये और पुण्य हमको करना है, हिंसा नहीं हो जाये दया हमको धारण करना है। परिग्रह में आसक्ति ना हो जाये अपरिग्रह हमको अपनाना है। ये अनेक प्रकार के पाप भाव छोड़कर हमें पुण्य भाव की समायोजना करनी है।
- जब हमारा उपादान योग्य होगा तो हमें अपने आप निमित्त की प्राप्ति हो जायेगी?
- जिस जीव ने व्रतों का पालन किया है वह नियम से देवत्व को ही प्राप्त होता है।
- सम्यग्दृष्टि यह नहीं सोचेगा कि व्रत लेने से कष्ट होगा इसलिए मैं व्रत धारण ना करूँ।
- पुण्य और पाप को अलग-अलग देखें तो पाप से छूटने का और पुण्य करने का मन बनेगा।
- जितना अपने को पाप से बचाओगे, उतने ही अच्छे इंसान बनते चले जाओगे।
- हेतु, स्वभाव, अनुभव व आश्रय की अपेक्षा से पुण्य और पाप में भेद है।
- पाप-पुण्य, अच्छाई-बुराई से ऊपर उठकर देखना अभेद दृष्टि है।
- दृष्टियों में भेद से ही सिद्धांत ग्रंथों की विवक्षा समझ सकते हैं।
- पाप और पुण्य का सही-सही विभाजन नहीं होगा तो व्यवहार में भी भटक जायेंगे।
- न पाप के फल में दुखी होना और न पुण्य के फल में हर्षित होना यह दृष्टि अपने अंदर लाना।
- अभेद दृष्टि होगी तो लोहा व सोना में कोई फर्क नहीं पड़ेगा।
- अव्रतों के साथ नरक जाने से अच्छा है व्रतों के साथ देव पद पाना।
- जब सही द्रव्य, क्षेत्र, काल, और भाव की सामग्री मिलेगी तभी केवलज्ञान की प्राप्ति होगी।
- व्रत लेने से कभी भी हानि नहीं होती है।
Adhyatm Yog Chapter 1 | Chapter 2 |
अध्यात्म योग अध्याय1 | अध्याय 2 | अध्याय 3 | अध्याय 4 | अध्याय 5 | अध्याय 6
अध्यात्म योग (इष्टोपदेश ) मुनि श्री प्रणम्यसागरजी
अध्यात्म योग (इष्टोपदेश ) स्वाध्याय
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English Translation of Adhyatm Yog ( Ishtopdesh ) Chapter 2
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इष्टोपदेश – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
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