आचार्य श्री विद्यासागरजी महाराज द्वारा पद्यानुवाद एवं विवेचना
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उत्थानिका-यहाँ फिर भी शिष्य कहता है कि अध्यात्मलीन ज्ञानी को क्या फल मिलता है? अथवा स्वात्मनिष्ठ योगी की अपेक्षा स्वात्मध्यान का फल क्या होता है? आचार्य कहते हैं-
परीषहाद्यविज्ञानादास्रवस्य निरोधिनी जायतेऽध्यात्मयोगेन, कर्मणामाशु निर्जरा ॥24॥
अन्वयार्थ (अध्यात्मयोगेन) अध्यात्म के योग से/चिन्तन से (परीषहाद्यविज्ञानात्) परीषह आदि का अनुभव/ज्ञान नहीं होने से (आस्त्रवस्य) आस्रव को (निरोधिनी) रोकने वाली (कर्मणाम्) कर्मों की (निर्जरा) निर्जरा (आशु जायते) शीघ्र होती है।
पद्यानुवाद
योगी जन अध्यात्म योग से, चेतन में निर्बाध रहे,
मनो-योग को वचन-योग को, काय-योग को साध रहे।
परीषहों को, उपसर्गों को, सहते विचलित कब होते?
कर्म-निर्जरा आस्त्रव-रोधक, संवर प्रचलित सब होते ॥२४॥
English Translation of Ishtopadesh Gatha 24
विवेचना
आप लोगों ने ‘तत्त्वार्थ सूत्र’ ग्रन्थ पढ़ा होगा उसमें एक सूत्र आता है, आप लोगों को याद भी होगा “मार्गाच्यवननिर्जरार्थं परिषोढव्याः परीषहाः ॥ ९/८ ॥” मार्ग से च्युत न हों तथा संवर-निर्जरा होती रहे इसलिए मोक्षमार्गी को हमेशा परीषहों को सहन करना अनिवार्य बताया है। मोक्षमार्ग ऐसा नहीं है कि चलने के लिए वहाँ फूल बिछाये हों, जिसके ऊपर हमें चलना है। पंखा लगा हो, कूलर चल रहे हों और आप उसका आनन्द लेते हुए आराम से चल रहे हों, ऐसा नहीं है। यहाँ पर तो कंकड़ पत्थर हैं, कण्टक हैं, ऊबड़-खाबड़ जमीन है। यहाँ तो बोलने में परीषह, चलने में परीषह, बैठने में परीषह, सोने में परीषह, खाने-पीने में परीषह, यश नहीं मिलता तो परीषह, विद्वान् बन गये तो परीषह, अज्ञानी रह गये तो परीषह, सत्कार मिलता है तो परीषह, सत्कार पाने की भूख रहती है तो परीषह, कोई आक्रोश के शब्द बोले तो परीषह, पल-पल परीषहों को समता से सहन करने का अभ्यास आवश्यक है। यदि समता है तो संवर निर्जरा होती है। यदि मन में समता का काँटा थोड़ा-सा ममता की ओर खिसक जाये तो बन्ध होना प्रारम्भ हो जाता है। जैसे-रेडियो का थोड़ा-सा काँटा इधर का उधर खिसक जाये तो ‘सीलोन’ के स्थान पर ‘विविध- भारती’ स्टेशन चालू हो जाती है। मोक्षमार्ग में साधक एक बार भोजन करता है एक बार पानी पीता है। अन्तराय हो जाये तो क्षुधा, पिपासा और अधिक बढ़ जाती है। शीत बढ़ती है तो शीत लगती है। तपा लगते हैं तो उष्णता भी और अधिक महसूस होती है। क्या-क्या नहीं होता? पल-पल में कष्ट है एक साथ अनेक कष्टों को समता से सहना आवश्यक होता है।
‘तत्त्वार्थसूत्र’ में आचार्य उमास्वामी महाराज कहते हैं कि एक साथ अधिक से अधिक बाईस परीषहों में से उन्नीस परीषह हो सकते हैं, सभी को एक साथ सहन करो (९/१७)। रो-रोकर नहीं समता भाव से सहन करो, तब मार्ग में हम स्थिर रह सकते हैं, अन्यथा थोड़े में ही मार्ग से विचलित हो सकते हैं। कहावत है-” जो परिश्रम करता है उसका मुख मीठा रहता है” और भी कहा है कि “जहाँ पर परिश्रम होता है वहाँ पर यश रूपी फूल खिलते हैं।” हम यश चाहते हैं, तो परिश्रम भी करना होगा। लेकिन आज लोग यश तो चाहते हैं परन्तु परिश्रम से दूर भागते हैं, उन्हें कैसे यश मिलेगा ?
जिसको भी यश, लाभ, सत्कार आदि जो भी मिलते हैं वे परिश्रम के बिना नहीं मिलते। सुनते हैं कि किसी को कम परिश्रम करने पर भी यश का लाभ हो जाता है। किसी के जीवन में बिना परिश्रम के भी यश के फूल खिलते हुए देखे जाते हैं। इसमें उसका पूर्व भव का परिश्रम भी जुड़ जाता है। जैसे किसी को फाइनल एक्जाम में कम नम्बर आये लेकिन पूर्व परीक्षा फल यदि जोड़ दिया जाता है तो परिणाम अच्छा आ जाता है। यह उसके पूर्व की की हुई मेहनत का फल होता है। और यदि पहले सो गया, आलस कर गया, मेहनत नहीं की, लेकिन फाइनल एक्जाम में अच्छी मेहनत कर ली तो भी परिणाम अच्छा आ जाता है। कहने का तात्पर्य यह है कि “मेहनत कभी भी करो पहले करो या अब वर्तमान में करो, मेहनत का फल तो निश्चित मिलता ही है। अतः जीवन को श्रमशील बनाने का प्रयास करना चाहिए।” कभी कम फल मिलता है, कभी विशेष फल प्राप्त होता है यह किये गये कम या अधिक श्रम का ही परिणाम होता है इसलिए कहा है कि-
“किया हुआ श्रम कभी विफल नहीं होता”
अतः परिश्रम करने में डरो नहीं। जो व्यक्ति मोक्षमार्ग में आरुढ़ हो गया है उसे तो कभी भी भयभीत होना ही नहीं चाहिए। आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी कह रहे हैं कि मोक्षमार्गी को परीषह सहन करते समय हर्ष-विषाद नहीं होना चाहिए।’ अविज्ञानात्’ कहा है अर्थात् हर्ष-विषाद पूर्वक परीषहों का संवेदन नहीं होना चाहिए किन्तु समता के साथ उनका संवेदन होना आवश्यक है। मोक्षमार्ग में इनको सहन करने में यदि हर्ष-विषाद रूपी थोड़ा भी घाटा लग जाता है तो वह पुनः कमर कसकर तैयार हो जाता है।
समता सर्वभूतेषु, संयमे शुभभावना।
आर्त्तरौद्रपरित्यागः तद्धि सामायिकं मतं
(सामायिकपाठ)
हमेशा समता रखो, आर्त रौद्रध्यान का त्याग करो, संयम में शुभ भाव रखो, स्वयंकृत कर्म का ही फल प्राप्त होता है, जो कुछ मिला है या जो भी मिलता है वह सब अपने किए हुए कर्म का फल होता है, ऐसी भावना ही बार-बार करना चाहिए। सामायिक पाठ के समय तो यह विषय याद आ जाता है। यह तो बिल्कुल कण्ठस्थ है कि-
स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा,
फलं त्वदीयं लभते शुभाशुभम्।
परेण दत्तं यदि लभ्यते स्फुटं,
स्वयं कृतं कर्म निरर्थकं तदा ॥
(द्वात्रिंशतिका, ३०)
इसका याद रहना तो ठीक है लेकिन इसके प्रयोग के समय याद रहना आवश्यक है। जैसे सीता ने मात्र सामायिक के समय इस पंक्ति को याद किया हो ऐसा नहीं परन्तु हर घटित परिस्थिति में उसने इस भावना का स्मरण ही नहीं किन्तु प्रयोग किया। हमें भी हमेशा हमेशा इस भावना का प्रयोग करते समय यह बात स्मरण में आना ही चाहिए। सीता से कोई भी कुछ पूछता तो वह यही कहती थी कि क्या करें ? अपना ही किया हुआ कर्म का फल है। कदम-कदम पर ये भावना काम आने वाली है। इस भावना का प्रयोग करना खेल नहीं है।
इसे ध्यान में रखना क्योंकि कोई भी अपने द्वारा किये गये कर्मों को याद करना नहीं चाहता। सीता स्वयं अपने आपसे कहती है कि सोचो क्या किया है तुमने? हे आत्मन् ! तुम्हारे कारण कितने व्यक्तियों को विकल्प हुआ है? राम को विकल्प, लक्ष्मण को विकल्प, तेरे कारण सारी अयोध्या रो रही है, तेरी वजह से रावण को भी समस्या आई। यह सब क्या किया था, जो ऐसा फल मिला ? कृतान्तवक्र भी रो रहा है। यदि वह राजा का सेवक न होता तो सब कुछ स्पष्ट बता देता, लेकिन मैं क्या करूँ?
सीता कहती है कि अरे! तुम सभी विकल्प क्यों करते हो! मेरे कर्म का उदय ही ऐसा है इसमें कोई भी क्या कर सकता है? मुहूर्त ठीक नहीं निकला। अयोध्या की महारानी और महाराज की स्थिति ऐसी हो रही है कि देखा नहीं जाता। राज्य ज्योतिषी होकर भी कुछ न कर सका। मुहूर्त टाल सकता था, लेकिन मेरे कर्म का उदय ही ऐसा था कि कोई कुछ भी नहीं कर पाया। उधर पिता के घर से भी कोई नहीं आया और यह भी नहीं सोचा कि नारी का रनवास में रहना उचित नहीं। वे भी सोच रहे होंगे कि बाद में आर्यिका तो बनना ही है, फिर तो वन में रहना ही है इसलिए क्या आना और क्या पूछना ? लेकिन ऐसा सोचने में भी उन सभी का कोई दोष नहीं, दोष तो मेरे कर्मों का ही है। अपने किये हुए कर्म अपना फल देने का कार्य तो छोड़ नहीं सकते। अतः सतियों की कथायें पढ़िये, महापुरुषों की कथायें पढ़िये, तब लगेगा कि उनके जीवन के कष्टों की तुलना में हमारा दुःख तो बिन्दु मात्र भी नहीं है। उन्होंने सिन्धु बराबर दुःख सहा है यहाँ तो हम बिन्दु मात्र ही सह रहे हैं, फिर भी इसको आप सिन्धु बराबर कह दो तो बात ही अलग है।
आत्मतत्त्व की ओर ध्यान रखो। पर की ओर दृष्टि जा रही थी, वह रुक जायेगी और अपना किया हुआ जो कर्म है उसकी ओर दृष्टि जायेगी। यहां निश्चित बात है कि चाहे रोते हुए करो या हँसते हुए करो, किये हुए कर्म का फल तो सहन करना ही होगा।
लेख लिखा था शुभ घड़ियों में, शुभ घड़ियाँ है आई।
आत्मज्ञान की ज्योति जला दो, भव से पार उतरना है ।।
भजन में बोलते हैं न आप लोग-आत्मज्ञान की ज्योति जलाने भव से पार उतरना है…इसी बात को ध्यान में रखो कि शुभ घड़ियों में जो लिखा है वही तो उदय में आ रहा है। किसी दूसरे के द्वारा उदय में नहीं लाया जा रहा है। स्वयं का किया कर्म स्वयं के लिए उदय में आया है। जो आप खाओगे वही तो डकार में आयेगा। मड्डे की खिचड़ी (महेरी) और उसमें भी दही मिलाकर खाओगे तो थोड़ी देर बाद खट्टी ही डकार आयेगी। मतलब यह है कि खट्टी चीज खाओगे तो खट्टी डकार आयेगी और बासमती चावल से बनी मीठी-मीठी खीर खाओगे तो मीठी डकार आयेगी अर्थात् स्वाद के अनुसार ही डकार आती है। उसी प्रकार अच्छे कर्म किये होंगे तो अच्छा फल मिलेगा, बुरे कर्मों का बुरा फल मिलेगा। कर्म हमेशा सत्ता में ही रहते हैं, ऐसा नहीं है। अपने-अपने समय के अनुसार फल देकर निर्जरित हो जाते हैं। ज्ञानी अच्छे-बुरे सभी प्रकार के कर्मों के फल में साम्य भाव रखता है और “स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा” का विचार करता हुआ संतुष्ट रहता है।
ज्ञानी विचार करता है कि शुभ फल मिलता है तो उससे मेरा कोई मतलब सिद्ध होने वाला नहीं है क्योंकि शुद्धत्व की अनुभूति, शुभकर्म के फल में नहीं होती। बल्कि उसमें तो गाफिल होने की सम्भावना रहती है और यदि अशुभ का उदय रहता है तो अरिहंत-सिद्ध भगवान् याद आते हैं।
“स्वयं कृतं कर्म यदात्मना पुरा”। इसे ही प्रत्येक समय याद रखिये कि-
“स्वयं किये जो कर्म शुभाशुभ फल निश्चय ही वे देते।”
घड़ी बन्द हो सकती है लेकिन कर्मोदय की क्रिया कभी रुकती नहीं। जब तक मुक्ति की प्राप्ति न हो जाये तब तक प्रत्येक समय कर्म का उदय चलना ही है। उदय के साथ-साथ उदीरणा भी चलती रहती है लेकिन चौदहवें गुणस्थान में उदय तो रहता है किन्तु उदीरणा नहीं होती। इस कारिका को सामायिक पाठ में दिन में तीन बार याद कर लेते हैं। आप कह सकते हो कि और कितने बार याद करें? आचार्य कहते हैं यह अपने मतलब की बात है इसलिए इसे तो हमेशा ही और बार-बार याद करते रहना चाहिए, क्योंकि इसी के माध्यम से कल्याण होने वाला है। प्रवचन में १००-१०० के नोट कम आते हैं, चिल्लर पार्टी ज्यादा आती है, मतलब बड़े लोग कम आते हैं, बच्चे ज्यादा आ जाते हैं। जब हम विहार करके एक गाँव को छोड़कर दूसरे गाँव में प्रवेश करते हैं, उस समय सर्वप्रथम चिल्लर पार्टी अर्थात् बहुत सारे बच्चे एक साथ टोली बनाकर, हाथ में केशरिया झण्डा लिए जय-जयकार करते हुए आते हैं। बिल्कुल छोटे-छोटे बच्चे झण्डे फहराते हुए आते हैं। भले ही झण्डा पकड़ते बने या न बने। दूसरे लोग उन्हें सम्हालने को चाहिए। कोई-कोई बच्चे झालर बजाते हुए और अब तो बच्चों की वैण्ड पार्टी ही आ जाती है। नारे भी लगाते हैं। कोई बच्चे जल्दी- जल्दी आने की कोशिश में गिर जाते हैं, कोई उन्हें उठाते हैं, कोई दौड़ते-दौड़ते आते हैं। उस चिल्लर पार्टी को देखकर लगता है कि अब गाँव पास में आ गया। बच्चों का आना इसी का संकेत होता है। इसी प्रकार आगम में कुछ ऐसे सूत्र दिये हैं, जिनको याद करते हुए हमेशा कर्मफल को हँसते हुए सहने का सामर्थ्य पा सकते हैं। वैसे सभी को मरना तो है ही, तो हँसते हुए मरें। रोते हुए क्यों मरना ? आचार्य कहते हैं कि हँसते-हँसते वीर मरण करो न। क्या बात है जो रोते हो ? वीर- मरण करो तो मरण का भी मरण हो जायेगा। जिससे बार-बार मरने की बात ही समाप्त हो जायेगी, लेकिन संसारी प्राणी कर्मों के उदय में जल्दी-जल्दी रोने लगता है।
“परीषहाद्यविज्ञानात्” अर्थात् जो परीषहों की उपस्थिति होने पर सुख-दुःख रूप संवेदन न करते हुए साम्य भाव रखते हैं, उनके आस्त्रव का निरोध करने वाली निर्जरा होती है। आस्स्रव के निरोध का अर्थ ही संवर होता है। संवर और निर्जरा तत्त्व भावों की अपेक्षा समान होते हैं, ऐसी स्थिति में भीतर अध्यात्म का योग फलीभूत होता है। कर्मों के उदय होने पर जो विषम परिस्थितियाँ आती हैं, उस समय अध्यात्म का प्रयोग होना चाहिए। कर्मों का उदय समाप्त होने पर अध्यात्म की चर्चा तो बहुत लोग कर लेते हैं, लेकिन उससे संवरपूर्वक निर्जरा नहीं होती। कर्मों का उदय समाप्त होने पर अध्यात्म में डुबकी लगायें तो इसमें सार्थकता नहीं होती। अध्यात्म तो उसका नाम है कि कर्मों के उदय में हम विचलित न हों किन्तु साम्य भाव में स्थिर बने रहें।
इस युग में तीर्थंकरों की दशा भी उनके कर्मोदय के कारण बिगड़ी है। कैसे बिगड़ी ? बिगड़ी का मतलब उनके जीवन में ऐसी-ऐसी कठिनाईयाँ प्राप्त हुई हैं, जिन्हें भगवान् ने भी सहन किया। देखो ! ‘पार्श्वनाथ भगवान्’ पर जब उपसर्ग हुआ उस समय की स्थिति को सुनते हैं या पुराणों में पढ़ते हैं, तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। कैसे सहन किया होगा ? लोहे को पिघला पिघला कर ऊपर धारा कर दी, घटाओं के माध्यम से ऐसी भयानक आवाज की गई जिसे सुनकर कान बहरे हो जायें। ओले-शोले, पत्थर, पानी अग्नि आदि सभी की वर्षा हुई। सभी को समता से सहा। सोचो, कब का किया हुआ कर्म रहा होगा ? कुछ न कुछ तो रहा होगा, तभी तो प्रतिफल मिला वह भी तीर्थंकर की पर्याय में। उन्होंने उस समय पूर्ण रूप से अध्यात्म योग का प्रयोग किया होगा जिसके फलस्वरूप वे हमेशा-हमेशा के लिए उपसर्ग परीषहों से मुक्त हो गये।
आचार्य कहते हैं इसी का नाम अध्यात्म योग है। समता व शांति को प्राप्त करने के लिए अन्यत्र कहीं जाने की जरूरत नहीं है। जहाँ कहीं भी जाओगे वहीं कर्मों का उदय रहेगा। कर्मों के उदय में विषम प्रतिफल भी मिलेगा। उसमें शांति व समता रखना यही आत्म पुरुषार्थ है, जिससे आस्रव निरोधिनी निर्जरा होती है। गोपुच्छ रूप में प्रति समय असंख्यातगुणी निर्जरा होती है। जैसे गाय की पूछ नीचे कम चौड़ी होती है, ऊपर ऊपर अधिक चौड़ी होती है उसी प्रकार परीषह, उपसर्ग आदि के समय पर समता की परीक्षा होती है जो समता रखने में उत्तीर्ण होता है उसके प्रारम्भ में कम होते-होते आगे असंख्यातगुणी बढ़ती हुई कर्म निर्जरा होती है। अन्त में तो एक दम बाढ़ सी आती है। इसको गो पुच्छाकार निर्जरा कहते हैं। जिस निर्जरा को वर्षों में किया जाता है उसको चुटकी बजाते बजाते भी किया जा सकता है। समता और शान्ति के द्वारा यह सब सम्भव है। आचार्यों ने समता को हमेशा महत्त्वपूर्ण बतलाया है। एक कारिका सुनाता हूँ मुझे याद आ गई, प्रायः भाद्रपद में याद आ जाती है मुझे –
पुष्पकोटिसमं स्तोत्रं, स्तोत्रकोटिसमं जपः ।
जपकोटिसमं ध्यानं, ध्यानकोटिसमं क्षमा ॥
आप वैश्य-वृत्ति रखते हो तो सौदा अच्छे ढंग से करना चाहिए। देखो! किसका फल कितना जोरदार है? सिद्धचक्रमण्डल आदि विधानों में आप हजारों या करोड़ों फल या नारियल चढ़ा दीजिए और एक बार भगवान् की मन, वचन, काय की एकाग्रता से स्तुति कीजिए तब फल की अपेक्षा देखे तो दोनों का फल समान होता है। स्तोत्र पढ़ने में धन नहीं लगा, मन लगा है, वचन लगा है, उपयोग लगा है। इसका अर्थ यह हुआ कि करोड़ों रुपया लगाने की अपेक्षा एक बार भगवान् की स्तुति करेंगे तो उसमें करोड़ गुना फल अधिक प्राप्त हो सकता है। हाँ महाराज, बहुत अच्छा उपाय बताया आपने। ऐसा ही कुछ मंत्र आप हम लोगों को दिया करो, ताकि कुछ करना-धरना न पड़े और काम हो जाये। हाँ, आप लोग तो यही चाहते हैं कि-
“हर्र लगै न फिटकरी रंग चौखो हो जाये।”
इसी कहावत के अनुसार आप लोग काम निकालना चाहते हैं। अभी क्या ? और आगे बढ़िये “स्तोत्रकोटिसमं जपः” करोड़ों बार स्तुति करने से जो फल मिलता है उतना एक जप करने में मिलता है, क्योंकि स्तोत्र तो जोर से पढ़ने में आ सकता है उसमें वाचनिक प्रवृत्ति होती है, लेकिन जाप शान्ति से किया जाता है। इसमें प्रवृत्ति को रोका जाता है। इसके उपरान्त “जपकोटिसमं ध्यानं” अर्थात् करोड़ों जाप करने से जो फल मिलता है वह एक बार ध्यान करने से मिल सकता है। उससे भी आगे कहते हैं कि ” ध्यानकोटिसमं क्षमा” अर्थात् करोड़ों बार ध्यान करने से जो फल मिलता है वह एक बार क्षमा करने से मिल सकता है। लेकिन मन, वचन, काय त्रियोग पूर्वक क्षमा होना चाहिए। क्षमा करने की जो विधि है, उस विधि से क्षमा होना चाहिए। आप कहेंगे-महाराज ! हम लोग तो भाद्रपद में दशलक्षण महापर्व के दस दिनों के उपरान्त क्षमावाणी पर्व पर ” खंमामि खमंतु मे” कहते हैं। लेकिन वह भी पवित्र मन से होना चाहिए। दस दिन का समय पर्वों में कैसे निकल जाता है, पता नहीं चलता। बहुत सौदा हो जाता है, घणी (बहुत) बातें हो जाती हैं आगम की और अध्यात्म की। दश धर्मों की देशना भी हो जाती है। इसी प्रकार कम समय में अधिक काम करना चाहिए। कम समय में इतना कमायें कि मालामाल हो जायें, ऐसा रास्ता अपनाइये।
ऋषभनाथ भगवान् को करोड़ों वर्षों की आयु मिली थी और आज तो पचास-साठ वर्ष के बाद कोई विश्वास नहीं, ज्यादा से ज्यादा १००, १०५-१०७ वर्ष की हो सकती है। बहुत कम समय, वह भी घटिया किस्म का मिला है। लेकिन ध्यान रखिए, कि उस काल में जो करोड़ों वर्षों में फल मिलता था वह आज बहुत कम समय में भी मिल सकता है। अपनी कुशलता हो तो निश्चित ऐसा ही होता है।
कर्मों की निर्जरा कितने जल्दी करना चाहते हो ? जितने जल्दी चाहते हो तो उतने जल्दी हो जायेगी, केवल अपनी आत्मा की ओर देखने की आवश्यकता है। आत्मा को देखते समय इतने भीतर जाना आवश्यक है कि बाहर पर्वत भी टूट जाये तो मालूम न चले।
पूर्वाचार्यों की जीवन झाँकी की ओर थोड़ा झाँक कर देख लेना चाहिए कि आचार्य समन्तभद्र स्वामी के जीवन में कैसी-कैसी समस्यायें आईं? आचार्य कुन्दकुन्द स्वामी जी, आचार्य पूज्यपाद स्वामी जी, आचार्य जिनसेन महाराज जी आदि सभी के जीवन में कैसी-कैसी समस्यायें आईं थीं? और आचार्य अकलंकदेव के सामने की समस्या को तो हम क्या कहें? कैसे कहें? कहने में समर्थ नहीं हैं, फिर सहने की तो बात ही अलग है। जैसी जैसी समस्यायें/घटनायें सुनने को मिलती हैं, उनमें से एक घटना का अंश भी घटित हो जाये तो हम सह नहीं सकेंगे। आज के युग में कर्म निर्जरा करना चाहो तो बहुत आसानी से हो सकती है, लेकिन ज्ञान की बात है। छहढाला में भी कहा है कि-
“ज्ञानी के छिनमांहि त्रिगुप्तितें सहज टरें जै। ४/५।”
“जायते अध्यात्मयोगेन” अध्यात्मयोग से आस्त्रव निरोधनी निर्जरा होती है। अतः अध्यात्म योग का अवलम्बन लेना चाहिए।
English Translation of Ishtopadesh Gatha 24
इष्टोपदेश गाथा 24 – द्वादशवर्षीय श्रमण संस्कृति स्वाध्याय पाठ्यक्रम
अन्वयार्थ – (अध्यात्मयोगेन) अध्यात्म के योग से (चिन्तन) से (परिषहाद्यविज्ञानात् ) परीषह आदि का अनुभव नहीं होने से (आस्त्रवस्य ) आस्रव को (निरोधिनी) रोकने वाली अर्थात् संवर सहित (कर्मणाम् ) कर्मों की (निर्जरा) निर्जरा (आशु जायते) शीघ्र होने लगती है
भावार्थ – मन जिस ओर लग जाता है, उस समय उसके सिवाय अन्य बातों का अनुभव नहीं होता। तदनुसार जब चित्त आत्म चिन्तन में लग जाता है तब मन का उपयोग अपने शरीर की ओर नहीं जाता, इसी कारण आत्मध्यानी सर्दी, गर्मी, भूख, प्यास आदि 22 परीषहों का, किसी मनुष्य द्वारा, किसी वैरी देव द्वारा अथवा किसी पशु के द्वारा या आंधी, वर्षा आदि द्वारा होने वाले उपसर्ग का अनुभव नहीं करते, उन परीषहों और उपसर्गों का अनुभव न होने से आत्मा में शरीर को राग, दुःख, क्षोभ तथा उपसर्ग करने वाले पर द्वेष आदि नहीं होता। इस तरह रागद्वेष न होने से उस समय कर्मों का आस्त्रव नहीं होता है, अर्थात् निष्पन्नयोगी के शुभाशुभ दोनों प्रकार का संवर होता है और अनिष्पन्न योगी के असाता वेदनीय आदि अशुभ कर्मों का संवर और निर्जरा ही होता है।
उत्थानिका – उपर्युक्त अर्थ को बतलाने वाला और भी श्लोक सुनो –
स्वाध्याय गाथा सं 23 & 24
स्वाध्याय गाथा सं 24 & 25
इष्टोपदेश स्वाध्याय Youtube Playlist
गाथा 1 (Gatha 1) | गाथा 2 ( Gatha 2 )| गाथा 3 ( Gatha 3)| गाथा 4 ( Gatha 4) | गाथा 5 ( Gatha 5) | गाथा 6 ( Gatha 6 )| गाथा 7 ( Gatha 7 )| गाथा 8 ( Gatha 8 ) | गाथा 9 ( Gatha 9 ) | गाथा 10 ( Gatha 10)| गाथा 11 ( Gatha 11 )| गाथा 12 ( Gatha 12) | गाथा 13 ( Gatha 13 )| गाथा 14 ( Gatha 14 )| गाथा 15 ( Gatha 15 ) | गाथा 16 ( Gatha 16 )| गाथा 17 ( Gatha 17 )| गाथा 18 ( Gatha 18 )| गाथा 19 ( Gatha 19 )| गाथा 20 ( Gatha 20 )| गाथा 21 ( Gatha 21)| गाथा 22 ( Gatha 22 )| गाथा 23 ( Gatha 23 )| गाथा 24 | | गाथा 25 | गाथा 26 | गाथा 27
English Translation of Ishtopadesh Gatha 24
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